डायपर से लेकर अन्य आविष्कारों में महिलाएं

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विनीता परमार/

विनीता परमार

स्त्री सदैव सृजन का कार्य करती रही है और हर युग की सामाजिक दशाओं में स्त्री की स्थिति बदलती रही है. पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी विषय के योगदानकर्ताओं के रूप में महिलाओं का नाम बमुश्किल याद किया जाता है. एक बार पाषाण काल से नवपाषाण की ओर ध्यान देने पर लगता है कि वह कोई स्त्री ही होगी जिसने सबसे पहले बीज से आटा और आटे को गूंथकर रोटी बनाया होगा. फिर धीरे-धीरे सभ्यता के विकास के साथ प्रौद्यौगिकी में महिलाओं ने योगदान दिया होगा. महाभारत काल से नारी का पतन होना शुरू हुआ तो मध्यकाल आते-आते नारी पूरी तरह से पुरुषों की गुलाम, दासी और भोग्या बन गई.

वैसे, भारत में महिलाओं के विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की कोशिश कम ही सही, पर बहुत पहले से रही है. प्राचीनकाल में घोषा, लीलावती, गार्गी का नाम उल्लेखनीय है तो अरुंधती को आज भी सितारे के रूप में देख हर भारतीय नारी मंगलकामना करती है. मध्यकाल दमघोटूं था फिर भी गुलबदन बेगम ने गुलाब वाले इत्र का आविष्कार किया था.

स्वतंत्रता से पूर्व भारत में विज्ञान शिक्षा के क्षेत्र में पहला नाम आनंदी बाई जोशी का आता है, जिन्होंने 1886 में अमेरिका के फिलाडेल्फिया विश्वविद्यालय से चिकित्सक की डिग्री हासिल की थी.

तकनीक और वैज्ञानिक जीवन शैली हमारे पूर्वजों ने अपनाई लेकिन वही लिपिबद्ध नहीं होने या पेटेंट के लिए नामांकित नहीं किया गया तो कई आविष्कार भारत के वैज्ञानिकों  के नाम नहीं है. बचपन से ही पढ़ते आ रहे हैं “आवश्यकता आविष्कार की जननी है ” दैनिक जीवन में अपने कार्यों के निष्पादन में होनेवाली परेशानियों को देखते हुए पुरातन काल से ही भारतीय महिलाओं ने पेटेंट विहीन जुगाड़ तकनीक का ईजाद किया गया. विश्व के कुछ देशों की महिलाओं के आविष्कारों ने अपनी दुनिया को आसान करने के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई.

आप सभी को आश्चर्य होगा कि बच्चों को पालने में होनेवाली तकलीफ को देखते हुए मारियन डोनोवन ने 1946 में डाईपर का आविष्कार किया तो चाईल्ड कैरियर का आविष्कार पिस्किपर एन मूरे जैसी महिलाओं ने किया.

बर्तन धोने में होनेवाली तकलीफ को देखते हुए डिशवॉशर का आविष्कार जोसेफैन कोचर ने किया. रोटी बनाने के मुद्दे पर कितने ही संयुक्त परिवार की नींव हिल गई और आखिर रोटी बनाने की परेशानी का समाधान ऑटोमैटिक रोटीमेकर के रूप में आया और इसका आविष्कार  नागरिका इसरानी नामक महिला ने किया. गाड़ियों के कांच को साफ़ करनेवाले पहले विंडस्क्रीन वाइपर का आविष्कार ‘मेरी एंडरसन’ ने 1903 में किया तो लड़कियों के घुंघराले बाल को सीधा करने के शौक को पूर्ण करने हेतु हॉट कौंब की खोज एनी मलाने ने की.

एथेंस की डॉक्टर ‘एगनोडिस’ ने महिला डॉक्टरों के भी पुरूषों की तरह लैब कोट पहनने के लिए आंदोलन चलाया था. मारिया सिब्ला मारियन  ने पहली बार तितलियों के कायांतरण का अध्ययन किया तो जॉय एडमसन ने अपने पति के द्वारा एक सिंहनी की हत्या का विरोध किया और संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देते हुए ‘बॉर्न फ्री’ नाम की प्रसिद्ध पुस्तक लिखी.

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता वांगारू मथाई  के हरित पट्टी आंदोलन से हम सब वाक़िफ हैं. DDT पर रोक लगाने के लिए रेचल कर्सन ने साइलेंट स्प्रिंग नाम की किताब लिखी. चीन ने लगभग दो हज़ार वर्षों तक रेशम के कीड़े से रेशम के धागे निर्माण की बात छुपाई थी तो बाद में पता चला इस तकनीक की खोज भी चीनी महिला जिलिंशी ने की. आधुनिक कम्प्यूटर युग में COBOL  भाषा की खोज भी  ग्रेसर हूपर ने की.

फ्लोरेंस नाइटेंगल को आधुनिक नर्सिंग जनक माना जाता है तो कलेरा बर्टन को रेड क्रॉस का जनक माना जाता है

विश्व की बढ़ती आबादी से चिंतित होकर पहला जन्म नियंत्रण क्लीनिक 1916 में मार्ग्रेट सैंगर ने खोला. ऊपर के सृजन के अलावा पोलोनियम और रेडियम जैसे रेडियोसक्रिय तत्व की खोज मेरी क्युरी ने की. नाभिकीय विखंडन की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता ऑटो हान के साथ लीज मिटनर ने भी कार्य किया था जिन्हें श्रेय नहीं दिया गया.

भारत में लीलावती, गार्गी, घेाषा, अपाला, कादम्बिनी गांगुली से लेकर टेसी थॉमस, सुनीता विलियम्स, किरण मजूमदार तक का सफर तय किया है. उम्मीद है मंगल मिशन में कंधे से कंधा मिलाकर चलनेवाली औरते सफल उपग्रह प्रेक्षण की  तरह अपनी पहचान बनाते हुए उपस्तिथि दर्ज़ कराएंगी.

वहीं एक कड़वी सच्चाई यह है कि प्रतिभावान भारतीय महिला वैज्ञानिकों से हमारे ही देश के लोग परिचित नहीं हैं. आप किसी स्कूल में जाएं और बच्चों से कुछ महिला वैज्ञानिकों के नाम लेने के लिए कहें. उनमें से ज्यादातर मैरी क्यूरी का नाम लेंगे. लेकिन उनमें से कोई किसी भारतीय महिला का नाम नहीं लेगा, क्योंकि हमारी स्कूली किताबों, मीडिया और पढ़े-लिखे लोगों में इनका कभी जिक्र ही नहीं क्योंकि किसी भी समारोह में मुख्य अतिथि कोई राजनीतिज्ञ होता है और हम संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ को छोड़ देते हैं. हमें इन महान महिलाओं के जीवनी तथा कार्यों को रेखांकित करना होगा.

यहाँ तक कि विद्यालयों के कार्यक्रमों में भी संबंधित विशेषज्ञ को बुलाने की जरूरत है. ये सभी वैज्ञानिक कैरियर के साथ परिवार के मध्य तो बेहतर सामंजस्य बैठा ही रही हैं, अपनी प्रतिभा और मेहनत के बूते विशेष तौर पर देश की भी सेवा कर रही हैं.

(लेखिका युवा कवियत्री हैं और विभिन्न विषयों पर स्वतंत्र लेखन करती हैं)

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