महिला आरक्षण बिल: क्या यह इंतज़ार ख़त्म होगा?

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उमंग कुमार/

क्या 21 साल से लंबित महिला आरक्षण बिल कानून का रूप ले सकेगा? यह सवाल उन सब लोगों का है जो देश के कुल 50 प्रतिशत आबादी की स्थिति से वाकिफ हैं. महिलाओं को इतनी बड़ी आबादी के बावजूद देश का प्रतिनिधित्व करने से वंचित रखा गया है. इस समस्या से निपटने के लिए 1996 में ही महिला आरक्षण बिल का प्रस्ताव लाया गया था पर तमाम विरोधों की वजह से यह कानून की शक्ल नहीं ले पाया है.

अब नई उम्मीद जगी है. इस सप्ताह जहाँ मीडिया में यह खबर आ रही है कि नरेन्द्र मोदी सरकार अपने दो पिटे हुए फैसले नोटबंदी और जीएसटी के प्रभाव को कम करने के लिए पुनः इस बिल को लोकसभा में पेश कर सकती है. वहीं बुधवार को सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख महिला आरक्षण अधिनियम बिल लोक सभा में लाने को कहा. उनके हिसाब से प्रधानमंत्री को लोकसभा में पूरा बहुमत प्राप्त है और इसका फायदा उठा उन्हें इस अधिनियम को कानूनी जामा पहनाना चाहिए.

महिला आरक्षण बिल 2008 लोकसभा और देश के तमाम विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात करता है. साथ में पहले से आरक्षित समूहों के कुल आरक्षण में भी 33 प्रतिशत आरक्षण उस समूह की महिलाओं को मिलेगा. इसके अनुसार अगर एक बार यह कानून बन गया तो उस दिन से पंद्रह साल तक यह मान्य होगा.

इस बिल को राज्य सभा ने 2010 में ही अपना समर्थन दे दिया है. चूँकि राज्य सभा कभी भंग नहीं होता, इसलिए यह बिल अभी भी मान्य है. नियम के मुताबिक इसे बस लोक सभा का समर्थन प्राप्त करना है.

अभी के चुने हुए सांसदों में महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम है. पीआरएस लेजिस्लेटिव के अनुसार अभी कुल 543 सांसद है जिनमे महिलाओं की संख्या महज़ 62 है. पिछले लोकसभा यानि 2009 में हुए चुनाव में यह संख्या और भी कम थी. महज़ 58.

महिला बिल इतिहास के आईने में

– यह बिल पहली बार देवगौड़ा सरकार द्वारा लोक सभा में सितम्बर 12, 1996 को रखा गया.

– अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने इसे पुनः 13 जुलाई, 1998 को लोक सभा के पटल पर रखा जब राष्ट्रीय जनता दल के सांसद सुरेन्द्र प्रसाद यादव ने इसे स्पीकर से छीनकर फाड़ दिया.
– वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने इस बिल को पुनः लोकसभा के पटल पर 1999 में रखा. इसके बाद फिर यह बिल 2002 में लाया गया.

– वर्ष 2003 में यह बिल दो बार लोकसभा के पटल पर लाया गया पर पास नहीं हो सका. 2004 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी ने वादा किया कि अगर पुनः उनकी सरकार बनती है तो इस बिल को कानूनी जामा जरुर पहनाएंगे. कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए ने भी इसे अपने चुनावी घोषणापत्र में रखा.

– चूंकि ये लोकसभा चुनाव यूपीए ने जीता तो वर्ष 2005 में भाजपा ने इस बिल के लिए पूरा समर्थन देने का वादा किया.

– वर्ष 2008 में यूपीए  सरकार ने इसे राज्य सभा में पेश किया ताकि यह सरकार बदलने के बावजूद भी यह बिल मान्य रहे. 2009 में संसदीय स्थायी समिति ने इसे राज्य सभा में पास करने करने को कहा.

– केन्द्रीय कैबिनेट ने इसे 25 फ़रवरी 2010 को मंजूरी दी. तब से अब तक लोक सभा में इस पर मतदान नहीं हुआ है.

अगर लोक सभा इसको मंजूरी दे देता है तो इस बिल को कम से कम देश के आधे राज्यों की मंजूरी की जरुरत पड़ेगी. फिर इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होंगे.

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