दस साल की एक बच्ची को माँ बुलाया जाना भी डराता है

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ममता सिंह/

 

हमारे महान देश जहां स्त्रियों के लिए शानदार नारे, श्लोक गढ़े गए, जहां उन्हें देवी कहकर पूजा गया, उसकी दो तसवीरें आपको दिखाना चाहूंगी.

तस्वीर एक-अभी अभी शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा की आराधना का पर्व समाप्त हुआ है, जिसमें एक मुख्य अनुष्ठान कन्यापूजन भी होता है. इनदिनों हम बच्चियों और स्त्रियों का इतना सम्मान करते हैं कि उन्हें देविपद पर बिठा देते हैं. कन्याओं के पैर पखार,उन्हें सजा-संवार,भरपेट भोजन करा, यथाशक्ति उपहार दे विदा करते हैं. लगभग देश भर में कन्याओं को इन दिनों बहुत मान-सम्मान मिलता है, हर कोई भक्ति की गंगा में डुबकी लगाये,जयकारे लगाता दिखता है. ये सब देख कर एकबारगी तो विश्वास ही नहीं होता कि नारियों के इतने सम्मान वाले देश- समाज में बलात्कार, दहेज हत्या या कन्या भ्रूण हत्या  जैसी कुप्रथाएं भी होंगी.

 

तस्वीर दो-आये दिन दो साल की बच्ची से लेकर अस्सी साल की बूढ़ी औरत से रेप और हत्या की खबर अखबारों की सुर्खियाँ बने रहते हैं. दस साल की एक बच्ची के माँ बनने की खबर भी हमें भयभीत नहीं करती, क्योंकि हमें लगता है ये सब हमारे बच्चों के साथ नहीं हो सकता. हम अपने बच्चों खासकर छोटी बच्चियों से बैड टच के बारे में बात करना शर्म की बात समझते हैं. हम बढ़ते चाइल्ड पोर्नोग्राफी के आंकड़ों को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं,हम भूल जाते हैं कि हम  महानता के तले दबे हिप्पोक्रेट समाज मे जी रहे हैं.

 

हम भूल जाते हैं कि ये देश सेक्स को लेकर हद दर्जे तक बीमार और विकृत मानसिकता वाले भेड़ियों का देश बन चुका है जहां छोटी बच्चियां भी निरापद नहीं. भले पूजा पाठ में खर्च, भीड़, चमक-दमक हर वर्ष बढ़ती जा रही हो पर उसी अनुपात में बच्चियों के साथ होने वाले अपराध भी बढ़ रहे हैं और मजे की बात ये कि अपराधी आस-पास ही होते हैं, बस हम ही आंख-कान बन्द किये बैठे रहते हैं.

एक वाकया बताना चाहूंगी. जुलाई माह में, मैं और मेरी भाभी अपने बीमार रिश्तेदार को देखने शहर गए, हम सुबह जल्दी गए ताकि धूप तेज होने तक घर लौट सकें. पर उनके यहां से निकलते-निकलते दोपहर हो गई, प्रचंड गर्मी और लगभग सुनसान गली में हम तेज़ कदमों से चल रहे थे कि दूर एक रिक्शा दिखा. हमने कदम बढ़ाया पर वो स्कूल का रिक्शा था जिसपर लकड़ी की बेंच भी लगी थी. रिक्शे वाले की पीठ हमारी ओर थी, हम थोड़ा पास पहुंचे और हमने जो देखा उससे हम थर्रा उठे.

हमने देखा बेंच पर लगभग पांच-छह साल की एकमात्र स्कूली बच्ची बैठी थी और रिक्शे वाले ने उसकी स्कर्ट उठा ,पैंटी में हाथ डाल रखा था. हम स्तब्ध,अवाक रह गए. इतनी गिरी हरकत करने वाला जरूर नशे और आपराधिक प्रवृत्ति का होगा और हमारे शोर मचाने पर वो बच्ची को कोई चोट न पहुंचा दे ये सोचकर हमने और भाभी ने आंखों -आंखों में बात की और तेज आवाज में बच्ची को पुकारा. हमारी आवाज सुन रिक्शेवाला चौंक, बच्ची को रिक्शे से उतार भाग गया.

बच्ची बहुत सहमी हुई थी और हमारे कुछ पूछने पर बोल ही नहीं रही थी. हमने बैग से उसकी स्कूल डायरी निकाल घर के नम्बर पर फ़ोन किया. फ़ोन उसके पापा ने उठाया. जितना संक्षेप में हो सकता था हमने उन्हें बताया, पर वो फोन पर ही बिफर गए कि रिक्शेवाला उनका विश्वासपात्र है, हम झूठ कह रहे हैं. हमें वहीं पांच मिनट रुकने को कह उन्होंने फोन काट दिया, अगले दो मिनट में हमारे नम्बर पर बच्ची की माँ का फोन आया.

हमें घर का पता बता कर उन्होंने हमसे घर तक बच्ची को पहुंचाने का अनुरोध किया, चिलचिलाती दोपहरी में हम एक किलोमीटर दूर उनके घर किसी तरह पहुंचे ही थे कि बच्ची के पिता भी आ गए. उन्होंने आव देखा न ताव हमारे ऊपर बरस पड़े कि हम झूठ-मूठ में उनकी बच्ची को परेशान कर रहे हैं,वो इतने बड़े आदमी हैं कि किसी रिक्शेवाले की औकात नहीं जो उनके घर की तरफ नजर उठा कर देख सके.

बच्ची की दादी ने भी तोहमत लगाया कि हम उनकी पोती को बदनाम करना चाहते हैं. हम सदमे में थे कि आज से पहले हमने इन्हें देखा नहीं था, जानते नहीं थे..भला इतनी छोटी बच्ची का हम क्यों बुरा चाहेंगे.

अभी हम चुपचाप उनलोगों की बकवास सुन ही रहे थे कि बच्ची की माँ उसे सीने से लगाये रोती हुई बाहर आई, अपनी सास और पति को लगभग चिल्लाते हुए उन्होंने चुप कराया, और हमारे गले लग बिलख उठीं.

उन्होंने बताया कि भीतर ले जाकर जब सहमी बच्ची को पुचकार कर पता किया तो उसने बताया कि रिक्शेवाले अंकल कई महीने से उसके साथ ये गंदी हरकत, सब बच्चों के उतर जाने के बाद करते थे. रिक्शे की गद्दी के नीचे से चाकू निकाल वो पहले बच्ची को धमकाता था कि अगर घर में किसी को बताया तो वो उसके मम्मी, पापा और भाई को मार देगा. 

अब हतप्रभ और शर्मिंदा होने की बारी बच्ची के पापा और दादी की थी. कमाल की बात ये कि रिक्शेवाले का बिना पुलिस वेरिफिकेशन कराये ही वो उसे भरोसे का व्यक्ति मान रहे थे. 

उन्होंने बार-बार हमें शुक्रिया बोला कि हमारे कारण उनकी बच्ची उस जानवर के चंगुल से बची. पर प्रश्न है कि बच्चियों को देवी कहने वाले देश में हर जगह ऐसे जानवर खुलेआम घूम रहे, उनकी शिनाख्त और उनसे बचाव के लिए आखिर हम अपने बच्चों खासकर बच्चियों के लिए क्या कर रहे हैं?

हम मानने को तैयार नहीं कि ऐसा हमारे बच्चों के साथ भी हो सकता है, समस्या का सामना करने के बजाय हमारा समाज रेत में सर घुसाए शुतुरमुर्ग की तरह खड़ा है. यह और ऐसी घटनाएं हम रोज अपने आसपास देखते, सुनते और पढ़ते हुए इस क़दर अभ्यस्त हो गए हैं कि हमारा मस्तिष्क यह पन्ना देख कर किसी चिंता में डूबता नहीं, पन्ना पलटने की जल्दी में एक दो बार उफ्फ! क्या हो गया समाज को! कह कर मन ही मन इस बात का संतोष मनाता है कि यह बच्ची हमारी नहीं थी.

हमारे समाज की यह संतोषी प्रवृत्ति ही हमें डुबा रही है. केवल यही घटना नहीं हर अपराध के प्रति हमारा यही रवैया हो रहा है. यह संतोष बड़ा ही घातक भाव है जो हमारे सभी धर्मग्रंथ, सभी बाबा, सभी बड़े बुज़ुर्ग हमें सिखा रहे हैं. समाज और सामाजिकता का हत्यारा है यह एक अकेला शब्द. यही शब्द हमें प्रतिपल कायर बनाता है, हमें अन्याय के विरुद्ध व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों तरह के प्रतिरोध करने से रोकता है. प्रतिरोधी चेतना को ही कुंद करता है और प्रकारांतर से अपराध और अपराधी को अजेय बना देता है. हे भले लोगों भीतर से महसूस करो इस विषपान की प्रक्रिया को और बंद करो सहने की यह परंपरा जो सीधे-सीधे अन्याय और अन्यायी के साथ खड़ी होती है.

मेरी सखियों, माताओं, बेटियों, अन्याय का प्रतिकार करना शुरू करो घर-बाहर हर जगह, हर स्तर पर अकेले और सामूहिक हर प्रकार से. सोचने से डर नहीं जाता बल्कि बढ़ता है. प्रतिकार से, चाहे वह कितना ही छोटा, कितना ही कमज़ोर प्रतिरोध क्यों न हो, अपराधी का मनोबल घटता है. मज़बूती शारीरिक क्षमता में नहीं होती ,वह हमारे निश्चय में होती है. इसलिए अपने निश्चय को मजबूत करो. हम आधी दुनिया हैं. कहीं भी अपनी बहनों के प्रति अन्याय अपराध होते देखो, सुनो तो विरोध करो, प्रतिरोध करने वालों का साथ दो. देखना तुम्हारा समर्थन करने वाले भी तुम्हारी कल्पना से कहीं अधिक हैंं.[spacer height="20px"]

 

(अमेठी की रहने वाली ममता सिंह पेशे से शिक्षक हैं. आपकी कवितायें , लेख इत्यादि समकालीन पत्र-पत्रिकाओं  में प्रकाशित हो चुके हैं)

 

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