आधी आबादी को ठेंगा दिखाता सत्रहवीं लोकसभा का परिणाम

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डॉ विनीता परमार/

डॉ विनीता परमार

एक बार फिर सत्रहवीं लोकसभा का परिणाम हमारे सामने है। यह लोकसभा चुनाव हमारे लोकतंत्र के लिए खास रहा। एक बार फिर महिला प्रत्याशियों की संख्या बहुत कम रही। कुल मिलाकर सात सौ महिला प्रत्याशियों ने नामांकन किया था, जिसमें से राष्ट्रीय पार्टियों ने सिर्फ़ कुल साठ उम्मीदवारों को चुनावी रण में उतारा था।

वर्ष 2014 में 543 सदस्यों की लोकसभा में 66 महिलाएं चुनी गई थीं, जो प्रथम लोकसभा में चुने गए 24 सदस्यों में से लगभग तीन गुनी और अब तक की संख्याओं में अधिकतम संख्या थी। इस चुनाव में महिला प्रत्याशियों को टिकट देने में क्षेत्रीय दल आगे रहे। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने 41% और ओडिशा में नवीन पटनायक ने 33% महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया था। हालांकि इन प्रत्याशियों में कुछ बाहुबलियों की पत्नी, अभिनेत्री या वंशवादी परंपरा से थीं। जहां कॉंग्रेस ने सोनिया गाँधी, शीला दीक्षित, प्रिया दत्त, उर्मिला मातोंडकर, रंजीता रंजन, गीता कोड़ा जैसे लोगों को प्रत्याशी बनाया था, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी, साध्वी प्रज्ञा, रूपा गांगुली, जया प्रदा, रमा देवी, मीनाक्षी लेखी आदि को चुनाव लड़वाया। समाजवादी पार्टी ने डिम्पल यादव, पूनम सिन्हा को खड़ा किया था। इधर राष्ट्रीय जनता दल ने मीसा भारती, हिना शबाब, विभा देवी और  जनता दल (यू ) ने कविता सिंह को उम्मीदवार बनाया था। तृणमूल कॉंग्रेस ने मुनमुन सेन और पीडीपी से महबूबा मुफ़्ती, अपना दल की अनुप्रिया पटेल को मैदान में खड़ा किया था।

इनमें से साध्वी प्रज्ञा, स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी, रूपा गांगुली, कविता सिंह, रमा देवी, साध्वी निरंजना ज्योति, अनुप्रिया पटेल, गीता कोड़ा आदि महिलाएं नई लोकसभा में जाने के लिए तैयार हैं। जीतने वाली अधिकांश महिला प्रत्याशी या तो ग्लैमर के दुनिया से आती हैं या बाहुबली की पत्नियाँ हैं।

हालाँकि सड़कों पर, नौकरियों में, रैलियों और संसद में, जहां भी नज़र दौड़ाएं महिलाएं संख्या में कम ही नज़र आती हैं। लेकिन इस बार हर चरण के मतदान में यह दृश्य कुछ बदला – बदला सा था। हर पोलिंग बूथ पर महिलाओं ने बढ़-चढ़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 1980 से 2014 के बीच महिला मतदाताओं की संख्या में 15 प्रतिशत इज़ाफा हुआ है। 1980 में महिला वोटर्स की संख्या जहां 51 प्रतिशत थी, वहीं 2014 में बढ़कर 66 प्रतिशत हो गई है। जाति, धर्म, उम्र और पेशे के आधार पर मतदाता कई तरह के वोट बैंक में बंट चुके थे। आज राजनीतिक दलों ने महिलाओं को वोट बैंक के रूप में देखा है। चुनावी घोषणा पत्र की कुछ बातों को हकीकत में बदलना, महिला वोटरों को बूथ तक खींचने में कामयाब हुआ है।

साईकिल, स्कूटी, लैपटाप, पोशाक, शौचालय, उज्ज्वला आदि योजनाओं ने महिलाओं को वोट करने के लिए प्रेरित किया है। पहले  महिलाओं के मुद्दों की बात हो तो सिर्फ़ दुष्कर्म, छेड़छाड़ और सुरक्षा तक ही रुक जाती थी। तो फिर सबरीमला मंदिर जैसे मुद्दे पर महिलाओं के अधिकारों और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ताक पर रखते हुए बीजेपी और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल धार्मिक परंपराओं के पक्ष में मज़बूती से खड़े दिखे। वहीं तीन तलाक जैसे मसले पर पार्टियों का आगे आना महिला वोटरों के बाहर आने के कारण बने।

अगर विकासशील देशों  में महिलाओं की सक्रिय राजनीति  की बात करें तो 2017 में रवांडा जैसे देश की साठ प्रतिशत महिलाएँ अपने संसद की सदस्य थीं।  भारत, ग्रीस, ब्राज़ील, मलेशिया, जापान, श्रीलंका जैसे देशों की संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 15 प्रतिशत है। आई.पी.यू और संयुक्तराष्ट्र संघ महिला रिपोर्ट “राजनीति में महिला 2017” के सर्वेक्षण के अनुसार लोक सभा और राज्यसभा दोनों जगहों में ग्यारह प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी रही है।

प्रथम लोकसभा से लेकर सोलहवीं लोकसभा तक में महिलाओं की स्थिति देखने से स्पष्ट है कि सोलहवीं लोकसभा में महिलाओं ने साठ से ज्यादा की संख्या को छुआ। सत्रहवीं लोकसभा के अबतक के परिणाम यह बता रहे हैं कि 44 (सोलहवीं लोकसभा) महिला सदस्यों में से 28 ने ही जीत दर्ज की है। स्पष्ट है कि इस बार फिर महिलाओं की संख्या कम हो जाएगी। इस बार लीक से हटकर मिले मंत्रालय के  विभागों में भी महिलाओं ने अपना परचम लहराया था।

इस बार हर चरण के मतदान में यह दृश्य कुछ बदला – बदला सा था। हर पोलिंग बूथ पर महिलाओं ने बढ़-चढ़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 1980 से 2014 के बीच महिला मतदाताओं की संख्या में 15 प्रतिशत इज़ाफा हुआ है

सक्रिय राजनीति में महिलाओं की बुरी स्थिति के लिए ज़िम्मेदार सिर्फ राजनीतिक पार्टियां ही नहीं, बल्कि हमारी निम्न स्तरीय राजनीति और समाज भी है, जो महिलाओं को आज भी वस्तु से ज़्यादा कुछ नहीं समझता है। अबकी बार के चुनाव प्रचार में आतिशी का मामला हो या जयाप्रदा का, हमारा यह समाज महिलाओं को राजनीति में स्वीकारने को तैयार नहीं है।

प्रियंका गांधी अगर राजनीति में आती हैं तो उनके कपड़े से लेकर उनके नैन-नक्श पर टिप्पणी की जाती है और वसुंधरा के मोटापे को मजाक का विषय बनाया जाता है। इसी तरह ममता बनर्जी, मायावती, सुषमा स्वराज, स्मृति ईरानी से लेकर तमाम उन महिला राजनीतिज्ञ को चरित्र से लेकर हर तरह के कटाक्ष सहना पड़ता है। महिला उम्मीदवार के जीतने की उम्मीद बहुत कम होती है, इस बात को साबित करने के लिए तमाम तरह के तर्क गढ़े जाते हैं। मसलन, महिलाओं की राजनीतिक समझ कम होती है, महिलाएं अपने घरेलू कामों की वजह से राजनीति में एक पुरुष के मुकाबले समय नहीं दे पाती हैं। कई महिलाएं चुनाव जीतकर तो आती हैं, लेकिन उन्हें कहां, क्या और कैसे फैसले लेने हैं, इस सबका निर्धारण उनके घर के पुरुष ही करते हैं। हालांकि यह स्थिति पंचायत चुनावों में ज़्यादा देखने को मिलती है। विधानसभा और लोकसभा चुनाव के मामले में तस्वीर थोड़ी अलग है।

महिलाओं के मुद्दों के प्रति राजनीतिक दलों की गंभीरता महिला आरक्षण बिल को पास करने में असफलता से ही साफ़ हो जाती है। व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका में महिलाओं के लिए सकारात्मक दिशा में काम किया जाना इस वक्त की ज़रूरत है। इसके लिए महिलाओं के लिए चुनावी प्रक्रिया में बाधक बनने वाली चीज़ों को दूर किए जाने के साथ ही इसे लैंगिक भागीदारी वाला बनाने की ज़रूरत है।

(लेखिका केंद्रीय विद्यालय, पतरातू (झारखंड) में शिक्षिका हैं और स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं। संपर्क: [email protected])

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