तीन दिन, तीन फैसले और बुलंद होता स्त्री पक्ष

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गार्गी मिश्रा/

ये सच है कि पिछले एक हफ़्ते के भीतर लगातार तीन अदालती फैसलों ने जनता को आश्वस्त किया है  और एक तरह से लोकतंत्र का विस्तार भी किया है लेकिन अन्य सामाजिक, राजनैतिक, संरचनाओं की लगातार विफलता ने न्यायपालिका पर अतिरिक्त काम का दबाव भी बढ़ाया है. कई ऐसे मामले अदालतों का काम बढ़ा रहे हैं जो व्यवस्था, कार्यपालिका और विधायिका के सही काम करने की सूरत में न्यायपालिका तक नहीं पहुंचते. सिर्फ़ अदालतों पर ही विश्वास बढ़ने के साथ-साथ मुकदमों की संख्या भी बढ़ रही है और जजों की अपर्याप्त संख्या पर तमाम बातें पहले ही हो चुकी हैं.

एक साथ तीन तलाक पर बैन, निजता का अधिकार और गुरमीत सिंह को दोषी करार दिया जाना: इन तीनों मामलों में कुछ साम्य है. तीनों मामलों से जुड़े फैसलों को कुछ जन-समूहों ने अवमानना पूर्ण ढंग से चुनौती सी दी है. तीनों फैसलों में स्त्रियाँ महत्वपूर्ण हिस्सा हैं या होने जा रही हैं.

तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध ठहराने और सरकार को कानून बनाने के लिए कहने पर मुस्लिम संगठनों की पहली प्रतिक्रिया यही रही कि यह कुरानशरीफ और हदीस का मामला है. और यह भी कि सरकार या कोर्ट को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिये. इस प्रकार स्पष्टतः स्त्री विरोधी कुप्रथा को अब ग़लत कह रहे संगठन भी शक के दायरे में हैं क्योंकी अगर उन्होंने पहल की होती तो आज इस मसले पर न्यायालय को  कलम चलानी ही नहीं पड़ती. शिक्षा और नौकरियों में पर्याप्त रूप से पिछड़ी हुई मुस्लिम महिलाओं को इससे राहत ज़रूर मिलेगी लेकिन उन्हें अभी लम्बा रास्ता तय तक करना है. कट्टरपंथी संगठन इसे अपने अहम् पर चोट की तरह ले सकते हैं. दूसरी तरफ इस फैसले का राजनितिकरण करके श्रेय लेने का खेल शुरू हो चुका है.

निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बना कर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया है. इसका विस्तार अभी ठीक से ज्ञात नहीं है लेकिन शुरु में ही इसका आधार बीफ, समलैंगिकता जैसे संवेदनशील मुद्दों से इसे जोड़कर देखा जा रहा है.  भारतीय समाज जो व्यक्ति की निजता को महत्व नहीं देता रहा है और सदैव इसे अतिक्रमण के लायक समझता रहा है वहां इस तरह का फैसला दिलचस्प होने जा रहा है. यह सामाजिक व्यवहार में बड़ा परिवर्तन लाने वाला फैसला  है. अगर वह निजी संसार स्त्री का हो तो भारतीय परिवार और समाज में उस निजता को वाकई और बड़े कानूनी समर्थन की ज़रूरत है.

मई 2002 में एक डेरा साध्वी ने गुमनाम पत्र लिखकर डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत सिंह पर यौन शोषण का आरोप लगाया था. पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और कुछ न्यायधीशों को भेजा गया था. उसके बाद से डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह और डेरा विवादों में रहे. अभी गुरमीत सिंह को उसी मामले में दोषी करार दिया गया है.  इस सिलसिले में डेरा और गुरमीत सिंह पर हत्याओं के भी आरोप हैं.

यौन शोषण की शिकार स्त्री के साहस को सलाम करने और उसके साथ हुए अन्याय को करुणा से देखने की बजाय गुरमीत सिंह के अनुयायी जिसमें स्त्रियां भी हैं न्यायालय और पीड़ितों के विरुद्ध और मुजरिम के साथ हैं. उसके पक्ष में आगजानी और हिंसा कर रहे हैं और अबतक दर्जनों लोग मारे जा चुके हैं. इस संगठित शक्ति तंत्र के विरुद्ध 15 साल तक लड़ने वाली स्त्री पर पड़ रहे दबावों का अनुमान लगाने से पहले जान लें कि धमकियों की वजह से सीबीआई के जज को सुरक्षा बुलानी पड़ी थी.

इन तीनों फैसले से स्त्री पक्ष बुलंद होता है. लोगों का न्यायालय के मानवीय फैसलों पर समूह बनाकर आक्रोश व्यक्त करना एक गंभीर संकेत है. यह यूँ हीं नहीं है.

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