लन्दन के उपशहर से एक ऐसी खबर आ रही है जो पूरे मानवता को शर्मसार करती है

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जितेन्द्र राजाराम/

जिंतेंद्र राजाराम

लंदन के उपशहर एजेक्स में जारी एक भयावाह प्रथा का ख़ुलासा हुआ है। विश्वप्रसिद्ध अंग्रेजी के अख़बार द गर्जीयन के हवाले से पता चला है कि दुनिया के सबसे विकसित देश के सबसे बड़े शहर में युवा हो रही लड़कियों के वक्षों को गरम लोहे से दबाया जाता है। इस कुकृत्य को अंजाम ख़ुद उन युवा हो रही बच्चियों की माँ ही देती है। बताते चलें कि अफ़्रीका के बहुत से देशों में ये कुप्रथा अभी भी है जिसमें जवान हो रही लड़कियों के वक्षों को गरम लोहे से दबाया जाता है ताकि उनके वक्ष देर से विकसित हों और उन्हें पुरुषों की बुरी नज़र से बचाया जा सके। एजेक्स में चल रही इस कुप्रथा के पीछे भी यही वजह है।

ये 21वीं सदी है और यह कुप्रथा उस देश में जारी है जो 20वीं सदी में दुनिया का बादशाह था और आज भी दुनिया के बेहतरीन सुख सुविधाओं वाले देशों में गिना जाता है। भारत में भी महिलाओं की स्थिति से हिंदी समाज तो वाकिफ ही है। कन्या भ्रूण हत्या, दहेज के लिए की गयी हत्या और बलात्कार जैसी हवस भरी प्रथाएं इक्कसवीं सदी के भारत में बदस्तूर जारी है। यहाँ तक की एक धड़ा हमेशा से ही महिलाओं को पुरुषों के अधीन रहने का मशवरा देता रहा है।

लगभग पूरे विश्व में महिलाओं को पुरुष से कमतर समझा जाता है। यहाँ तक की अमेरिका में भी सन 1984 के बाद ही महिलाओं को सरकार चुनने के लिए मताधिकार का प्रयोग करने और शादीशुदा महिलाओं को सम्पत्ति खरीदने का अधिकार प्राप्त हुआ था। अमेरिका में महिलाओं को संविधान में पुरुषों के समान दर्जा प्राप्त करने का संघर्ष 18वीं सदी में शुरू हुआ और सन 1920 में अमरीकी संविधान के 19वें संशोधन के बाद महिलाओं को समानता का अधिकार मिला जिसे लागू करने में अमरीका को 60 साल लगे। बताते चले की इस संशोधन ने भी केवल शादीशुदा महिलाओं को सम्पत्ति का अधिकार दिया था। कुँवारी लड़कियों को नहीं! लगभग पूरा विश्व अमेरिका और लंदन को एक प्रतिनिधि देश की तरह देखता है। ऐसे में महिलाओं के प्रति इन देशों के समाज की उदासीनता भी मानव जाती को शर्मशार करती है।

क्यों लंदन जैसे शहर भी सदियों पुरानी हिंसक और बेतुके प्रथाओं की 21वीं सदी में उपयोग कर रहे हैं? जैसे जैसे धार्मिक राष्ट्रवाद का उन्माद पूरे विश्व में बढ़ रहा है वैसे-वैसे पूरी दुनिया में अतीत की कुरीतियों की वपिसी होने लगी है। भारत में भी उच्च-न्यायालय के न्यायधीश ने ये विश्वास जताया था कि “मोरनी मोर के आँसुओं से गर्भवती हो जाती है” और उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री तो मंच से आदेश जारी करते हैं की हिंदू औरतों को 10-10 बच्चे पैदा करना चाहिए।

नाइजीरिया की एक पब्लिक फ़ोरम वाली वेबसाइट पर एक बहस  जारी है। इसका शीर्षक है “पुरुष ही परिवार का मुखिया क्यों होता है?” में मानव जाति का सबसे संगीन जुर्म की परत खुलती है। इस वेबलिंक में लगभग सभी महिला-पुरुष ये साबित करने में लगे हैं कि पुरुष ईश्वर का सेवक है और महिला पुरुष की सेवक है। यहाँ तक की जेनेसिस 3:16 में ईश्वर कहता है कि “मैं तेरे प्रसव पीड़ा को कई गुना बढ़ाऊँगा जिसके बाद तू बच्चे को जन्म देगी, लेकिन फिर भी तेरा धर्म तेरे पति की सेवा ही होनी चाहिए”।

ऐसी ही एक भ्रामक कथा है कि ईश्वर ने स्त्री का निर्माण पुरुष के सीने से एक हड्डी निकाल कर किया था, इस लिए स्त्री का जन्म पुरुष से हुआ है और पुरुष का जन्म ईश्वर से। कहानी की इसी कड़ी में ऐडम और ईव का ज़िक्र आता है जिसमें ईव की ज़िद ने ऐडम को स्वर्ग में सेव के बाग़ानों से एक सेव तोड़ने पर मजबूर कर दिया गया था इस लिए ईश्वर ने मानवों को स्वर्ग से धरती पर भेज दिया। चूँकि ऐडम ने ये ग़लती ईव के कहने से की थी इसलिए दुनिया को यह मानने के लिए कहा गया कि औरतों में निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती है। और इस लिए पुरुषों को दुनिया का प्रतिनिधित्व करना चाहिए।

कहानियां चाहें जो भी हो पर उद्देश्य एक है। स्त्री को दोयम बनाकर रखना। अन्यथा यह हास्यास्पद नहीं है कि लोग मानें कि पुरुष ने औरत को जन्म दिया इसलिए पुरुष मुखिया होगा औरत नहीं! जबकि अनंतकाल से आज तक तो यही सत्य उजागर हुआ है कि औरत ही पुरुष और स्त्री दोनो को जन्म देती आयी है।

दरसल, मानव जाति का सबसे बड़ा कलंक यही है कि हम औरतों यानी पचास फ़ीसदी मानव समुदाय को दोयम दर्जे का मानते हैं।

पूरे विश्व में, हर समुदाय में, धर्म में और हर देश में महिलाओं का स्वामित्तव पुरुषों के पास रहा है। जिन महिलाओं का कोई पुरुष स्वामी नहीं होता है उन्हें वेश्या या नगर वधु जैसे शब्दों से तिरस्कृत किया जाता है। बुद्ध ने एक बार नगर-वधुओं के हाथों पानी पिया था, उस रोज़ बुद्ध ने सवाल किए थे कैसे आपको भोगने वाला पवित्र है और आप अपवित्र? यदि भोग अपवित्र है तो भक्षक कैसे पवित्र बचा रह गया? और यदि भक्षक अपवित्र है तो भोग कैसे अपवित्र हुआ? बुद्ध के इस सवाल के हज़ारों साल बाद 20वीं सदी के ख़त्म होने तक ये उम्मीद जागने लगी थी महिला पुरुषों में बराबरी होने लगेगी लेकिन विश्व समुदाय फिर औंधे मुँह गिर गया है। लंदन से आ रही इस ख़बर से तो यही लगता है।

(जितेन्द्र राजाराम आजकल मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं.)

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