जानिये भंवरी देवी केस ने कार्य स्थल पर होने वाले यौन शोषण को रोकने में क्या योगदान दिया

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अनिमेष नाथ/

यौन उत्पीड़न एक जघन्य अपराध है. आजकल यौन उत्पीड़न काफी चर्चा में हैं. बड़ी संख्या में महिलाएं अपने उत्पीड़क का नाम ले रही हैं. #metoo अभियान के तहत अब तक कई बड़े नाम इस आरोप के घेरे में आ चुके हैं. इसमें आलोक नाथ, एम जे अकबर, साजिद खान, सुहैल सेठ, विकास बहल इत्यादि का नाम शामिल हैं. यह सब कार्यस्थल पर शारीरिक शोषण के मामले हैं. जब भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं लोग कार्यस्थल या कहें ऑफिस में विशाखा गाईडलाइन के सख्ती से पालन की मांग कर रहे हैं.

वर्ष 1992 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए, कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न को लेकर कुछ गाइडलाइन्स बनायीं गयी थीं. राजस्थान सरकार और विशाखा एनजीओ के बीच यह एक ऐतिहासिक केस था, जिसने समाज में महिलाओं की स्थिति मज़बूत करने में काफी सहायता की .

असल में, राजस्थान सरकार ने बाल विवाह के विरोध में कैंपेन चलाया था जिसमें भंवरी देवी राजस्थान सरकार के महिला विकास प्रोजेक्ट से जुड़कर कार्य कर रहीं थीं. वह अपने क्षेत्र मे बहुत सुचारू रूप से कार्य कर रही थीं.

भंवरी देवी ने गाँव में हो रही एक एक साल की बच्ची की शादी को रोकने की कोशिश की थी जिसके परिणामस्वरूप पांच ग्रामीणों ने भंवरी के पति को बांधकर, उनकी आँखों के सामने भंवरी का बलात्कार किया था. जिला सत्र न्यायलय ने बाद में इन पाचों मुजरिमों को बाइज्ज़त बरी कर दिया.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने ‘विशाखा’ नाम के एनजीओ द्वारा डाली गई पीआईएल की वजह से आया. इसमें याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं के लिए कार्यस्थल को सुरक्षित बनाने में न्यायिक हस्तक्षेप की मांग रखी थी. सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि चूँकि भारत महिलाओं के प्रति किसी भी तरीके के भेदभाव के खिलाफ CEDAW (The Convention on the Elimination of all Forms of Discrimination Against Women) हस्थाक्षर्कर्ता है इसलिए महिलाओं के सुरक्षा के प्रति जवाबदेही बनती है.

इसलिए संविधान के अनुच्छेद 14,15,19 और 21 में CEDAW के प्रावधानों (1980 में भारत द्वारा हस्ताक्षरित) को पढ़ा गया तथा महिलाओं के सम्मान एवं सुरक्षा को लेकर दिशा-निर्देश दिए गए. इसके बाद इनका सार्वजानिक एवं निजी कार्यस्थलों में पालन अनिवार्य कर दिया गया.

ऐसा पहली बार हुआ था जबकि न्यायालय ने कार्यस्थलों में महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव को लेकर न सिर्फ अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किये बल्कि इसके लिए कानून भी बनाया

उच्चतम न्यायालय द्वारा उठाया गया यह एक ऐतिहासिक कदम था. ऐसा पहली बार हुआ था जबकि न्यायालय ने कार्यस्थलों में महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव को लेकर न सिर्फ अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किये बल्कि इसके लिए कानून भी बनाया.

इस मामले की खास बात यह है कि न्यायपालिका कानून नहीं बना सकती वह सिर्फ इन्हें समझा सकती है. परन्तु राजस्थान सरकार बनाम विशाखा के केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी शक्तियों का प्रयोग किया. और विधायिका में उपस्थित रिक्त स्थानों को भरने में संकोच न करते हुए और कानूनों का निर्माण कर न्यायपालिका में परिवर्तन किया. उच्चतम न्यायालय को अपने इस फैसले के लिए आलोचना भी झेलनी पड़ी.

हालाँकि, बीतते समय के साथ इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप सही साबित हुआ है. आज सोशल मीडिया और अन्य सूचना माध्यमों की शक्ति एवं  लोगों तक पहुँच के कारण यौन उत्पीडन, एक गंभीर समस्या के रूप में दुनिया के सामने आया है. लेकिन वर्ष 1992 में, समाज इस समस्या को लेकर इतना ही गंभीर नहीं था.

आज बहुत से ऐसे केस हैं जहाँ महिलाओं को उनके कार्यस्थल पर हो रहे यौन उत्पीड़न के खिलाफ न्याय मिला है. उदाहरणस्वरुप टेरी संस्था प्रमुख आरके पचौरी और तहलका के तरुण तेजपाल वाले मामले का जिक्र किया जा सकता है.

यह कहना गलत नहीं होगा कि इस विधेयक के फलस्वरूप महिलाओं की सुरक्षा एवं गरिमा को हल्के में लेने वाले दृष्टिकोण में परिवर्तन आया है. हालांकि अभी भी इसका असर वैसा नहीं हो रहा जैसा अपेक्षित था. वजह है इसको लेकर लोगों में जागरूकता का कम होना. दूसरे महिलाऐं अपने उत्पीड़न को न्यायपालिका के सामने लाने में डरती हैं. वर्ष 2012  में हुए निर्भया रेप केस के बाद सार्वजानिक रूप से हो रहे यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाने में महिलाओं को काफी समर्थन मिला है.

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