सेनेटरी नैपकिन्स को बढ़ावा दीजिये, पर एक यह पहलु भी जान लीजिये

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उमंग कुमार/

भारत में मासिक धर्म यानि पीरियड को लेकर जागरूकता का बहुत अभाव है. इसका सबसे बड़ा कारण है, इस प्रक्रिया को शर्म से जोड़ देना. सुविधाओं के अभाव में महिलाएं कई तरह की बीमारियों की शिकार भी होती हैं. मेंस्ट्रुअल हाइजीन बनाये रखने में सेनेटरी नैपकिन्स की बड़ी भूमिका है क्योंकि यह पीरियड से जुड़ी बीमारियों से महिलाओं को बचाये रखता है. लेकिन उपयोग किये हुए सेनेटरी नैपकिन्स के उचित निष्पादन की व्यवस्था नहीं होने की वजह से यह कूड़ा स्वास्थ्य के लिए बहुत ही नुकसानदेह साबित हो सकता है.

भारत में 33.6 करोड़ महिलायें हैं जिन्हें मासिक धर्म से गुजरना होता है. इनमें से 36 प्रतिशत महिलायें सेनेटरी नैपकिन का उपयोग करती हैं. मेंस्ट्रुअल हाइजीन अलायंस ऑफ़ इंडिया के अनुमान के अनुसार देश में करीब 12.1 करोड़ महिलायें इस सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं. एक मासिक धर्म या मेंस्ट्रुअल साइकिल में कम से कम आठ नैपकिंस इस्तेमाल होता है. अगर पूरे साल में जोड़ा जाए तो प्रत्येक साल देश में 1,200 करोड़ के करीब इस्तेमाल हुआ सेनेटरी नैपकिन्स कचरे के ढेर में जाता है.

इसको दूसरे शब्दों में देखें. एक प्रोजेक्ट है पीरियड ऑफ़ चेंज. इसके अनुसार एक महिला एक साल में करीब डेढ़ सौ किलो वजन के बराबर सेनेटरी नैपकिन कूड़े पर फेंकती है.

आपको नहीं लगता जब देश में महिलाओं को तमाम बीमारियों से बचाने के लिए सेनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है उसी समय इन मुद्दों पर भी बात हो कि आखिर इन सेनेटरी नैपकिंस से निकलने वाले कूड़े का निपटान कैसे हो?

एक मासिक धर्म या मेंस्ट्रुअल साइकिल में कम से कम आठ नैपकिंस इस्तेमाल होता है. अगर पूरे साल में जोड़ा जाए तो प्रत्येक साल देश में 1,200 करोड़ के करीब इस्तेमाल हुआ सेनेटरी नैपकिन्स कचरे के ढेर में जाता है

ऐसा इसलिए भी जरुरी है क्योंकि इन नैपकिंस का कूड़ा सामान्य कूड़े की तरह नहीं होता और ये सालो साल लैंडफील या कूड़े के ढेर पर पड़ा रहता है. अगर जला दिया जाए तो इससे हानिकारक धुएं निकलते हैं जिससे लोगों के सेहत पर भी असर होता है.

सैनिटरी नैपकिन से निकलने वाले कूड़े के साथ सबसे बड़ी समस्या है यह जानना कि आखिर ये किस किस्म का कूड़ा है. यह प्लास्टिक जनित कूड़ा है या बायोमेडिकल.

म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग) 2000 के अनुसार नैपकिंस, डायपर, कंडोम या खून से सने रुई, ऐसे कचड़े में गिने जाते हैं जिसका निवारण बायोडिग्रेडेबल और नॉन-बायोडिग्रेडेबल कूड़े के तौर पर अलग कर के किया जाता है. दूसरी तरफ बायो-मेडिकल वेस्ट (मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग) रूल्स, 1998 के अनुसार ऐसे कूड़े जो खून इत्यादि से सने हों उन्हें माइक्रोवेव में जलाना होता है. ताकि नुकसानदायक रोगजनित अंश ख़त्म किया जा सके. इनमें रुई, डॉक्टरों के यहाँ बाँधी गई पट्टी, प्लास्टर, इत्यादि सब आते हैं.

अब दूसरी समस्या आती है. विश्व स्वास्थय संगठन (WHO)के अनुसार ऐसे रोगजनित कूड़े को 800 डिग्री तापमान पर जलाना होता है. भारत में ऐसा करना बहुत मुश्किल है इस स्तर पर तामपान को सँभालने की व्यवस्था देश में मौजूद नहीं है.

कहा जाता है कि ये नॉन-बायोडिग्रेडेबल नैपकिन, कूड़े के ढेर पर 800 साल तक यूँहीं पड़े रहेंगे, अगर सही से इनका निष्पादन न किया जाए.

इस विकराल समस्या को देखते हुए यह जरुरी हो जाता है कि भारत सरकार और इससे जुड़े हुए अन्य विशेषज्ञ मिल-बैठकर इस समस्या का निदान खोजें.

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