भारतीय सिनेमा की स्टंट करने वाली पहली अभिनेत्री जिसे बॉलीवुड ने भुला दिया

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सौतुक डेस्क/

जब कंगना रानौत अभिनीत फिल्म रंगून आई थी तो इसकी बहुत चर्चा हुई कि कंगना जिस ‘जांबाज मिस जूलिया’ की भूमिका में हैं वह किरदार भारतीय सिनेमा की एक ऐसी ही महिला जिसे अंग्रेजी में फीयरलेस नाडिया बुलाया जाता है, से प्रेरित था . तीस और चालीस के दशक में बॉम्बे सिनेमा में मशहूर, उस जांबाज नाडिया का आज जन्मदिन है.

उस दौर में भी नाडिया अपने सारे स्टंट खुद करने के लिए जानी जाती थीं. और ऐसे वैसे स्टंट नहीं बल्कि रेलगाड़ी में मारपीट की शूटिंग, बड़े झरने में कूद जाना, शेर जैसे जंगली जानवरों से दोस्ती बढ़ाना, घोड़े की पीठ से हवाई जहाज की सीढ़ियों पर कूदना. एक बार नाडिया ने कहा था कि वह अपने जीवन में सबकुछ कम से कम एक बार जरुर करना चाहती हैं.

इतने के बावजूद बॉम्बे और अब मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में उनके योगदान पर कहीं बात होती नहीं दिखती.

इनका जन्म ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में 8 जनवरी, 1908 को हुआ था और इनके बचपन का नाम मैरी एन इवांस (Mary Ann Evans) था. एक अंग्रेज सिपाही और ग्रीक महिला की बेटी, मैरी अपने जन्म के पांच साल बाद ही बॉम्बे आ गईं. खेलकूद में पहले से रुझान था और इन्होंने उम्र के बीस-पच्चीस बसंत आते-आते कई कलाओं में महारत हासिल कर ली थी. इसमें घुड़सवारी, जिम्नास्टिक, टेनिस, विभिन्न प्रकार के नृत्य इत्यादि शामिल हैं.

इसके बाद आई नाडिया की पहली फिल्म जिसमें उन्होंने बतौर अभिनेत्री मुख्य भूमिका निभाई. फिल्म का नाम था हंटरवाली जो सन्1935 में रिलीज़ हुई

इसके साथ ही उन्होंने अपना एक नया नाम रखा और मैरी से नाडिया में तब्दील हो गईं. इन्हीं वर्षों में फिल्म निर्माता जमशेद बोमन होमी वाडिया की नज़र इनपर पर गई और उन्होंने एक जौहरी की तरह इस हीरे को पहचान लिया.

इस तरह उन्होंने नाडिया को देश दीपक  नाम की एक फिल्म में छोटी सी भूमिका उपलब्ध कराई जिसमें इन्हें एक गुलाम लड़की का रोल करना था. सन् 1933 में आई इस फिल्म की काफी सराहना हुई.

इसके बाद आई नाडिया की पहली फिल्म जिसमें उन्होंने बतौर अभिनेत्री मुख्य भूमिका निभाई. फिल्म का नाम था हंटरवाली जो 1935 में रिलीज़ हुई.

इस फिल्म की भी एक कहानी है. जमशेद बोमन होमी वाडिया और उनके छोटे भाई होमी वाडिया ने एक बड़ा दांव खेला. फिल्म की शूटिंग में छह महीने लगे और उस समय के हिसाब से बहुत अधिक रकम करीब 80,000 रुपये खर्च भी हुए. इसके साथ ही उस समय के हिसाब नया ‘स्टंट’ फार्मूला जिसपर अब तक फिल्म नहीं बनी थी. इतने सारे प्रयोग के बाद ऐसी स्थिति आई कि इस फिल्म के लिए वितरक ही नहीं मिले. इनदोनों भाईयों ने इसकी जिम्मेदारी खुद ली और यह फिल्म उस दशक के सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शुमार हो गई.

उस फिल्म में नाडिया ने एक राजकुमारी जिसका नाम माधुरी था, की भूमिका की थी और अपने पिता के प्रति हुए अन्याय के खिलाफ परदे के पीछे से जंग छेड़ती हैं. उस फिल्म में माधुरी के जोड़ीदार थे एक वफादार घोड़ा जिसका नाम था ‘पंजाब का बेटा’, एक कुत्ता जिसका नाम था ‘गनबोट’ और ‘रोल्स रॉयल्स की बेटी’ नाम की एक कार.

स्वतंत्रता आन्दोलन के चरम पर एक ऐसी फिल्म जिसमें एक अंग्रेज हंटरवाली भारतीय लोगों पर कोड़े बरसा रही हो, यह पचाना दर्शकों के लिए शायद मुश्किल था. यही सोचकर निर्देशक ने सावधानी से स्क्रिप्ट पर काम किया जिसमें नाडिया गरीब की रक्षा करनेवाली और जालिमों के दुश्मन के तौर पर दिखाई गई.

नाडिया की हिंदी कमजोर थी शायद इसीलिए होमी नाडिया के हिस्से में कम से कम डायलॉग रखा गया. फिल्मकारों को यह एहसास था कि नाडिया की वास्तविक भाषा उनके देश की भाषा थी जिसको इनलोगों ने अपनी फिल्मों में भरपूर इस्तेमाल किया. एक से बढ़कर एक एक्शन का सीन.

इनकी शुरुआत की कई फ़िल्में तो आज के हीरो के मुताबिक बस एक्शन दिखाने का प्लाट भर होता था. लेकिन धीरे-धीरे नाडिया का एक राजनितिक महत्व भी बढता गया. दमित के पक्ष में और अत्याचार के खिलाफ आवाज के बतौर.

जैसे सन् 1940 में उनकी एक फिल्म आई थी डायमंड क्वीन. इस फिल्म में इन्होने न केवल हीरे की खान के मालिक की कमजोर लोगों को दबाने के लिए न केवल पिटाई की बल्कि महिलाओं के अधिकार और शिक्षा के मद्देनजर एक लेक्चर भी दिया.

इनकी शुरुआत की कई फ़िल्में तो आज के हीरो के मुताबिक बस एक्शन दिखाने का प्लाट भर होता था. लेकिन धीरे-धीरे नाडिया का राजनितिक महत्व भी बढता गया. दमित के पक्ष में और अत्याचार के खिलाफ  एक नयी आवाज़  के तौर पर

उनकी फिल्में धीरे-धीरे स्वतंत्रता और बराबरी की बातें करने लगीं. दुखद तो यह है कि कहाँ तो आज हिंदी सिनेमा को इस परंपरा को आगे बढ़ाना चाहिए था लेकिन इसके उलट यह फिल्मोद्योग और पीछे जा चुका है.

उन दिनों में नाडिया बॉक्स ऑफिस की क्वीन थीं. लेकिन भारतीय सिनेमा की ‘पहली महिला’ का खिताब फिल्म के कर्ता-धर्ताओं ने देविका रानी को दिया. यद्यपि नाडिया भारतीय दर्शकों में जितनी मशहूर थीं, अमेरिका और यूरोप में लगभग दर्शकों के लिए अपरिचित थीं. धीरे-धीरे भारतीय पटल से भी नाडिया गायब होती गयीं. यह पहेली अबूझ है कि ऐसा कैसे होता गया. अलबत्ता पिछले कुछ सालों में जब से बायोपिक बनाने का सिलसिला शुरू हुआ, ज़रुर फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों का उनके प्रति रुझान बढ़ा है.

चालीस और पचास का दशक नाडिया के करियर के हिसाब से सबसे अहम है पर उनकी आखिरी फिल्म थी खिलाड़ी जो 1968 में आई थी. होमी वाडिया जो इनकी कई फिल्मों के निर्माता-निर्देशक थे, ने 1961 में इनसे शादी की. कहते हैं कि दोनों चालीस के दशक से ही प्रेम में थे पर शादी इसलिए नहीं हो पायी क्योंकि वाडिया की मां पुराने ख्याल की थीं. जब उनका स्वर्गवास हुआ तो दोनों ने शादी की.

नाडिया का 88 की उम्र में 9 जनवरी, 1996 में स्वर्गवास हो गया. इसके आठ साल के बाद इनके पति का भी देहांत हो गया.

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