महिला सुरक्षा और वर्तमान सरकार: राष्ट्रीय महिला आयोग बिना सदस्यों के काम कर रहा

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अनिमेष नाथ/

याद है देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वह चुनावी नारा ‘बहुत हुआ महिला पर अत्याचार, अबकी बार मोदी सरकार’. उसी मोदी सरकार में जब चारों तरफ #मीटू जैसे अभियान चल रहे हैं और ढेरों महिलायें अपने साथ हुए अनुभव को साझा कर रही हैं ऐसे में राष्ट्रीय महिला आयोग के सारे पद खाली हैं. सभी पांच सदस्यीय पद खाली होने की वजह से विभाग का पूरा ज़िम्मा आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा अकेले ही संभाल रहीं है.

राष्ट्रीय महिला आयोग जिसका काम है महिलाओं के मामलों पर नज़र रखना, यौन उत्पीड़न को लेकर बने अपर्याप्त कानून या पीड़ितों की शिकायत पर सुनवाई जैसे मुद्दों को हल करना.

आयोग के अंतिम सदस्य आलोक रावत थे जिनका कार्यकाल 19 अक्टूबर समाप्त हो गया. इस तरह आयोग के सभी पांच सदस्यों के पद वर्तमान में रिक्त हैं. पूरा आयोग अभी इसके अध्यक्ष के बूते चल रहा है. आयोग में पिछले तीन वर्षों से कोई नई नियुक्ति नहीं की गई है.

मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक आयोग के पांच सदस्यों में से दो पद आरक्षित हैं. एक अनुसूचित जाति (एससी) एवं एक अनुसूचित जनजाति(एसटी) की महिलाओं के लिए.

पूरा आयोग अभी इसके अध्यक्ष के बूते चल रहा है. आयोग में पिछले तीन वर्षों से कोई नई नियुक्ति नहीं की गई है

इन पदों को इसलिए आरक्षित किया गया है, जिससे कि हाशिये पर रहे समुदायों का प्रतिनिधित्व भी बेहतर ढंग से किया जा सके. हालाँकि  अप्रैल 2015 में अनुसूचित जाति की प्रतिनिधि और सितम्बर 2016 में अनुसूचित जनजाति की प्रतिनिधि की अवधि पूरी हो गई. तब से ये पद खाली पड़े हैं.

घरेलू हिंसा एवं अन्य नियमित मामलों के अलावा आयोगद्वारा#METOO आन्दोलन के दौरान पिछले महीने दर्ज हुई यौन उत्पीड़न की शिकायतों को सभालने के लिए एक ईमेल एड्रेस: [email protected] की भी घोषणा की गयी थी.

एक अधिकारी ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि कार्यभार में वृद्धि तो हुई है. क्योंकि पांचो पद रिक्त है इसलिए कार्य को किसी भी तरीके से बस संभाला जा रहा है.

इंडियन एक्सप्रेस अखबार सूत्रों के हवाले से लिखता है एनसीडब्लू में 2015 से लंबित नियुक्तियों के अलावा पीएमओ द्वारा महिला आयोग को मजबूती प्रदान करने के लिए बनाया गया विधेयक भी आज तक लंबित है. इस विधेयक को अरुण जेटली के प्रतिनिधित्व वाले मंत्रिमंडल की देखरेख में रखा गया था. यदि इस विधेयक को मंज़ूरी मिल जाती है तो आयोग को उत्पीड़कों को सजा देने में आसानी होगी. इस तरह आयोग एक सिविल कोर्ट के रूप में कार्य करेगा. इस विधेयक की सहायता से आयोग उत्पीड़कों के खिलाफ वारंट जारी करसकता है.

लेकिन देखने की बात है कि यह सब होता कब है. अब तो इस सरकार का कार्यकाल भी ख़त्म होने की कगार पर है.

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