मिताली राज की उंचाई ट्रोल की पकड़ में नहीं आने वाली

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द बेटर इंडिया से साभार

शिखा कौशिक/

विश्वकप ख़तम होने के बाद से यह दूसरी बार हुआ जब ट्वीटर पर कुछ लोग जिन्हें आजकल ट्रोल कहते हैं उन्होंने मिताली राज, भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान को ‘शिक्षा’ देने की कोशिश की. इस बार तो उनके कपड़े को लेकर कमेन्ट किया गया जब मिताली ने अपने दोस्तों को साथ एक तस्वीर ट्वीट की जिसमे उन्होंने काले रंग की एक स्लीवलेस टॉप पहनी थी.

इसके पहले उनकी तस्वीर में उनके बगलों से निकलते पसीने पर एक ट्रोल ने कमेन्ट किया था. मिताली ने सटीक जवाब दे दिया कि वो खेल के मैदान में पसीना बहाने से ही इस मुकाम पर पहुँच पाई हैं और उन्हें इस पसीने से शर्म नहीं आती. उस ट्रोल को शायद अंदाजा भी नहीं कि मिताली के पसीने का ही परिणाम है कि जब उन्होंने कहा कि ‘यह मेरा आखिरी विश्वकप था’ तो कई खेलप्रेमियों के दिल टूट गए.

दो बार विश्वकप में अपनी टीम को फाइनल तक पहुंचाने वाली मिताली  अपने करियर के इस पड़ाव पर आकर इतने बड़े मुकाम को हासिल करने से चूक तो गयीं पर देश के पुरुष प्रधान क्रिकेट में एक कील जरुर ठोंक दी.

मिताली के नेतृत्व में भारतीय महिला क्रिकेट का सफर काफी दिलचस्प रहा है. पिछले एक दशक में मिताली राज का नाम इस देश में इस महिला क्रिकेट का समानार्थी बन गया है.

यह सब ऐसे ही नहीं हो गया. इसका लिए ढेर सारा पसीना बहाना पड़ा होगा, जो उस ट्रोल को कभी नहीं समझ में आएगा जो मोबाइल पर दो लाइन टाइप कर किसी की बेइज्जती को ही देश निर्माण में अपनी सबसे बड़ी भूमिका समझते हैं.

 जोधपुर में एक तमिल परिवार में जन्मीं राज ने क्रिकेट के लिए अपने पहले प्यार डांस को छोड़ने का फैसला किया. क्रिकेट में उनकी शुरुवात तब हुई जब उनका परिवार हैदराबाद पलायन कर गया.

नृत्य को अपना पेशा बनाने का शौक रखने वाली मिताली के नियति को कुछ और ही मंजूर था. भारतीय वायु सेना में अधिकारी उनके पिता जिन्होंने बाद में आंध्र बैंक की नौकरी कर ली थी, के अपने तरीके थे. उनके पिता दोराई राज मिताली को सिकंदराबाद के सेंट जोन्स कोचिंग में ले जाने लगे. तब मिताली की उम्र महज दस थी.

देर से उठने वाली मिताली के भाई उसी कोचिंग में क्रिकेट सीख रहे थे. वहीँ पर उनके पिता के मित्र ज्योति प्रसाद ने मिताली की प्रतिभा पहचानी और यहाँ तक कह दिया कि बेटे पर नहीं बेटी पर ध्यान दो. यही से मिताली के क्रिकेट की यात्रा शुरू होती है.
 
चूँकि यह लड़को का कोचिंग था,तो मिताली को वहाँ से केएस स्कूल जाना पड़ा जहां उन्हें संपत कुमार की कोचिंग मिली. मिताली के प्रतिभा से अभिभूत संपत कुमार ने इस छोटे खिलाड़ी के बारे में वहीँ भविष्यवाणी कर दी कि यह न केवल भारत के लिए खेलेगी बल्कि विश्व के बहुतेरे रिकॉर्ड तोड़ेगी.
 
वर्ष 1997के विश्वकप के लिए एक संभावित खिलाड़ी थी पर उनकी उम्र (चौदह) को देखते हुए चयनकर्ताओं को खुद के निर्णय पर भरोसा नहीं हो रहा था सो आखिर में वह विश्वकप मिताली नहीं खेल पाई.
 
वर्ष 1982 में जन्मे मिताली के जीवन के 16 बसंत आते आते उनकी मेहनत रंग दिखाने लगी जब उनका चयन भारतीय टीम में हो गया. वर्ष 1999 में उन्होंने आयरलैंड के खिलाफ पहला एक दिवसीय मैच खेला और 114 रन की पारी खेली. वर्ष 2001-02 में मिताली ने अपना पहला अन्तराष्ट्रीय टेस्ट मैच इंग्लैण्ड के खिलाफ लखनऊ में खेला.
19 वर्ष की होते-होते उन्होंने बुलंदी के झंडे गाड़ने शुरू कर दिए. अपने तीसरे टेस्ट मैच में मिताली किरण रोल्टन के सर्वाधिक 209 रन का रिकॉर्ड तोड़ते हुए एक पारी में 214 रन बनाए. यह सफ़र आगे बढ़ता गया जब मिताली ने भारतीय टीम को 2005 के विश्वकप में पहुँचाया.
खैर उस वक्त तो लोग सचिन, सौरव इत्यादि में मशगुल थे पर हाल में ख़तम हुए विश्वकप में क्रिकेट प्रेमियों की नजर मिताली और उनकी टीम पर गई.
यूँ तो 34 साल की इस खिलाड़ी ने स्पष्ट कर दिया है कि अगला विश्वकप इसे नहीं खेलना है पर अभी भी इनके इरादे बुलंद है. मीडिया से बात करते हुए इस खिलाड़ी ने  महिला क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने के लिए महिला आईपीएल शुरू करने पर बल दिया. उनका कहना था कि इससे महिला खिलाडियों की प्रतिभा और निखरेगी और वो इस तरह के दबाव में खेलना सीख पाएंगी.
पर मिताली की यह दृष्टि या मैदान में बहाया उनका पसीना उस ट्रोल को क्यों दिखेगा जो गाली गलौज की भाषा में महिलाओं को कपड़ा पहनना सीखाना चाहते हैं.

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