पहली बार एक महिला अधिवक्ता को प्रमोट कर सर्वोच्च न्यायालय का जज बनाया जाएगा

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इंदु मल्होत्रा

शिखा कौशिक/

सर्वोच्च न्यायालय के कोलेजियम ने बृहस्पतिवार को उत्तराखंड के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसफ और सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदु मल्होत्रा का नाम उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के पद के लिए अनुमोदित किया

नियुक्ति होने पर इंदु मल्होत्रा भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में वह पहली महिला वकील होंगी जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम सीधे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश के लिए चुना है. इंदु मल्होत्रा नियुक्ति के बाद सर्वोच्च न्यायालय की सातवीं महिला न्यायधीश होंगी.

वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति आर भानुमती ही एक मात्र महिला न्यायधीश हैं.

साल 1989 में न्यायमूर्ति एम फातिमा बीवी देश की पहली महिला बनीं जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय का न्यायधीश बनाया गया था. उनके बाद न्यायमूर्ति सुजाता वी मनोहर, न्यायमूर्ति रुमा पाल, न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई देश के सर्वोच्च अदालत में बतौर न्यायधीश नियुक्त हुईं.

इंदु वरिष्ठ अधिवक्ता हैं जो सर्वोच्च न्यायालय में पिछले तीस सालों से प्रैक्टिस कर रही हैं.  वह देश की दूसरी महिला थीं जिसे सर्वोच्च न्यायलय ने 2007 में वरिष्ठ अधिवक्ता बनाया

इंदु वरिष्ठ अधिवक्ता हैं जो सर्वोच्च न्यायालय में पिछले तीस सालों से प्रैक्टिस कर रही हैं.  वह देश की दूसरी महिला थीं जिसे सर्वोच्च न्यायलय ने 2007 में वरिष्ठ अधिवक्ता बनाया.

वर्ष 1956 में बंगलुरु (तब बैंगलोर) में पैदा हुई इंदु ने 1983 में वकालत करनी शुरू की. इन्होंने अपनी वकालत की शुरुआत दिल्ली के बार काउंसिल से की. इसके पांच साल बाद यानि सन् 1988 में इन्हें सर्वोच्च न्यायलय के अधिवक्ता के तौर पर चुना गया. यह इन्होंने परीक्षा में प्रथम स्थान लाकर हासिल किया जिसके लिए इन्हें मुकेश गोस्वामी मेमोरियल पुरस्कार से भी नवाजा गया.

इंदु केंद्र के द्वारा बनाई गई उच्च स्तरीय कमिटी की सदस्य भी रह चुकी हैं. इसके साथ ही इन्होने ‘दी लॉ एंड प्रैक्टिस ऑफ़ आर्बिट्रेशन एंड कांसिलेशन, 2014’ के तीसरे एडिशन का लेखन भी किया है. यह अप्रैल 2014 में प्रकाशित हुआ था.

इंदु के साथ साथ, सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश केएम जोसफ को भी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश के बतौर चुनाव किया है. जोसफ उस पीठ में थे जिसने 2016 में राज्य में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को ख़त्म करने का फैसला लिया था.

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