कामकाजी महिलाओं की लिस्ट में भारत नेपाल से भी पीछे

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शिखा कौशिक/

देश में कामकाजी महिलाओं की संख्या लगातार गिरती जा रही है. जो कि वैश्विक परिदृश्य में देखा जाय तो काफी खतरनाक है.

वर्तमान में भारत में महज 27.4 प्रतिशत महिलायें ही काम कर पा रही हैं. एक दशक पहले यह आंकड़ा 43 प्रतिशत था.

विश्व बैंक के द्वारा जारी की गयी एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब पूरे विश्व में कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, तो भारत में  यह संख्या नीचे आ रही है.भारत में काम करने वाली उम्र-समूह में से  मात्र 27  प्रतिशत ही 2015-2016 में कार्यरत थीं. नेपाल में महिला भागीदारी 79.9 प्रतिशत है. जबकि बांग्लादेश भी हमसे इस मामले में काफी आगे है. यहाँ यह लगभग 57.4 प्रतिशत है. सिर्फ़ पाकिस्तान 24.6 प्रतिशत महिला भागीदारी के साथ हमसे पीछे है.

मई में आये इस रिपोर्ट में विश्व बैंक ने भारत को कुल 131 देशों की रैंकिंग में 120वाँ स्थान दिया था. यद्यपि कुल नौकरी की जगह ही कम तैयार हो रही है पर जो भी उपलब्ध हो पा रही है उसको पुरुष हथिया ले रहे हैं. इसके पीछे सामाजिक वजहें ही हैं.

अब आप सोचेंगे कि दूसरे देशों में स्थिति कैसी है? तो इस रिपोर्ट के मुताबिक अरब देशों को यदि छोड़ दें तो विश्व के बांकी सभी हिस्सों में अधिक महिलाएं नौकरी कर रही हैं. चीन की तेज रफ़्तार से बढ़ती अर्थव्यवस्था में लगभग यहाँ की 64 प्रतिशत कामकाजी महिलाएं शामिल हैं, जो कि विश्व के अधिकतम में से एक है. अमेरिका में यह 56 प्रतिशत से ऊपर है.

विश्व बैंक की इस रिपोर्ट में पता चला है, विवाहित या अविवाहित, दलित, आदिवासी या ऊँची जाति से, शिक्षित या अशिक्षित सभी तरह की महिलाओं की काम में भागीदारी घटती जा रही है.

कुछ लोगों का मानना है की महिलाओं में बेकारी की मुख्य वजह है नौकरियों का कम होना. बताते चलें कि कम तनख्वाह, असुरक्षा की भावना और बढ़ती घरेलु ज़िम्मेदारियाँ आदि इस घटती भागीदारी के पीछे के मुख्य कारण हैं. लेकिन सबसे बड़ा कारण महिलाओं के लिए शादी और बच्चे होने के बाद की ज़िम्मेदारियाँ हैं.

हमारे देश में कंपनियां महिलाओं को अनुकूल वातावरण नहीं देतीं या यूँ कहें उन्हें अधिक से अधिक संख्या में काम करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करतीं. वैसे हाल ही में सरकार द्वारा सभी निजी संस्थानों को मैटरनिटी लीव को 12 हफ्ते से बढाकर 26 हफ्ते करने और नई माताओं के लिए क्रेच की सुविधा के निर्देश ने महिलाओं में एक उम्मीद की किरण जगाई है. यदि ये सुविधायें ठीक तरीके से लागू हो पायें तो उन्हें बीच में घरेलु जिम्मेदारियों की वजह से अपने करियर से समझौता नहीं करना पड़ेगा. आपको बता दें सरकारी नौकरियों में काफी पहले से 6 महीने कि मैटरनिटी लीव का प्रावधान रहा है.

वैसे अब कुछेक निजी कम्पनियां भी महिलाओं को काम करने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं, और उनके लिए नए नियम लेकर आ रहीं हैं. महिलाओं के शारीरिक समस्याओं को देखते हुए, अधिक से अधिक महिलाओं को अपने साथ जोड़ने के लिए कुछ कम्पनियाँ वर्क फ्रॉम होम, या क्रेच वगैरह कि सुविधायें शुरू कर रही हैं.

ऐसी ही एक पहल हाल ही में मुंबई की एक कम्पनी कल्चर मशीन ने अपनी महिला कर्मचारियों के लिए की. इस कंपनी ने महिलाओं के लिए एक ऐसी छुट्टी का प्रावधान किया है  जिसका उपयोग महिलाएं अपने पीरियड के पहले दिन छुट्टी लेकर कर सकती हैं. ये उनकी बांकी की छुट्टियों से अलग होगा. इसके बाद कई और कम्पनियों ने ऐसे नियम लागू किये हैं, जो महिलाओं की भागीदारी को इस पार भी बढ़ा सकें.

 

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