महिलाओं के पीरियड में इस्तेमाल होने वाले सेनेटरी नैपकिन पर लगाया कर, अब सरकार दे रही सफाई

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सौतुक डेस्क/

देश में क्रन्तिकारी आर्थिक सुधार के नाम पर जीएसटी लागू हो चुका है पर इसके अबूझ होने की चर्चा अभी रुकने के नाम नहीं ले रही है. इसमें एक है कुछ जरुरी चीजों पर लगाया जाने वाला कर.  जैसे पेंसिल और बच्चों के अन्य पढ़ने-लिखने की चीजों पर. खासकर तब जब सरकार शुरू में यह बताते नहीं थक रही थी कि जीएसटी लागू होने पर जरुरी सामान की कीमत कम होगी.  वैसे सरकार ने कुछ सामान को पूर्ण रूप से कर मुक्त कर दिया है वहीँ कुछ को कम कर-सीमा के अंदर रखा है. लेकिन बहुतों को इस विभाजन का आधार समझ नहीं आ रहा . खासकर सेनेटरी नैपकिन्स पर 12 प्रतिशत का कर थोपना.

पीरियड, एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे महिलाओं को आधी से अधिक उम्र तक गुजरना पड़ता है. देश में करीब 35.5 करोड़ महिलायें अभी हर महीने इस शारीरिक प्रक्रिया से गुजरती हैं जिसमे से महज 12 प्रतिशत ही सेनेटरी नैपकिंस का इस्तेमाल करती हैं. शेष 88 प्रतिशत महिलायें आज भी परंपरागत तरीके जैसे कपड़े, राख  या अन्य ऐसे तरीकों से ही अपना काम चलाती हैं. सनद रहे कि अपने पीरियड के समय में साफ़ सफाई नहीं बरतने की वजह से ये महिलायें बड़ी मात्रा में स्त्री-जनित रोगों को झेलने के लिए विवश  हैं. उनमे से एक खतरनाक रोग कैंसर भी है.

एक सर्वे में दिए गए आंकड़ों कि मानें तो 97  प्रतिशत डॉक्टर ऐसा मानते हैं कि सेनेटरी नैपकिन्स महिलाओं में इन बीमारियों को रोकने में बड़ी भूमिका अदा कर सकता है लेकिन इस नैपकिन के इस्तेमाल नहीं होने में सबसे बड़ी वजह है इन महिलाओं और उनके परिवार की क्रय शक्ति. लगभग 70 प्रतिशत महिलाओं का कहना है कि उनके परिवार वाले यह खर्च नहीं उठा सकते.

महिलाओं के इस पक्ष को समझते हुए देश भर में कई छोटे छोटे प्रयास भी होते रहे हैं, जिसमे सस्ते नैपकिन बनाना, इसके इस्तेमाल को लेकर जागरूकता फैलाना इत्यादि शामिल है.

ऐसे में सरकार से क्या उम्मीद होनी चाहिए! बजाय कि सरकार इसको कम से कम कर के क्षेत्र में रखे और महिलाओं को अधिक से अधिक इस्तेमाल के लिए जागरुक करे, सरकार ने इसको अधिक कर सीमा में रखकर इसे महिलाओं कि पहुँच से और भी दूर कर दिया है. पहले भी इसपर कर लगता था लेकिन सरकार के पास अभी यह मौका था कि इस नए कर प्रणाली में इस नैपकिन के सामाजिक फायदे को देखते हुए कर मुक्त कर दे. पर ऐसा नहीं हुआ.  ऐसे में जो कुछ गरीब महिलायें साफ़-सुथरे नैपकिन के इस्तेमाल के बारे में सोच भी रही होंगी, वे भी शायद वापस असुरखित तरीकों को ही अपनाने लग जाएँ.

जब जीएसटी पर बात चल रही थी और वस्तुओं पर कर तय किये जा रहे थे तो सेनेटरी नैपकिन्स को कर मुक्त करने के लिए सोशल मीडिया पर ‘लहू पर लगान’ नाम का एक अभियान भी चला. पर सरकार के कान पर जू नहीं रेंगी. सामाजिक कार्यकर्ता इसे महिलाओं के प्रति सरकार की उपेक्षा के तौर पर देख रहे हैं. सरकार भले इसे देसी उत्पादकों को नुकसान से बचाने के लिये उठाया गया कदम बता रही हो. पर ये बात किसी के गले नहीं उतर रही.

आज सरकार ने विज्ञप्ति देकर अपना पक्ष रखा है जिसमे तमाम अर्थ शास्त्र समझाए गए हैं लेकिन उस आखिरी सत्य पर कोई बात नहीं कही गई है कि जो महिलायें ये नैपकिन नहीं इस्तेमाल करती उनके यह सब कैसे सुलभ कराया जाए.

सरकार ने कहा कि सैनिटरी नैपकिन शीर्षक 9619 के तहत वर्गीकृत हैं. जीएसटी से पहले सैनिटरी नैपकिन पर 6 प्रतिशत का रियायती उत्‍पाद शुल्‍क एवं 5 प्रतिशत वैट लगता था और सैनिटरी नैपकिन पर जीएसटी पूर्व अनुमानित कुल टैक्‍स देनदारी 13.68 प्रतिशत थी. अत: 12 प्रतिशत की जीएसटी दर सैनिटरी नैपकिन के लिए निर्धारित की गई है.

सरकार ने इसमें इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर लगने वाले कर की भी बात कही.  जैसे  सैनिटरी नैपकिन बनाने में इस्‍तेमाल होने वाले प्रमुख कच्‍चे माल और उन पर लागू जीएसटी दर बताई गई है. मसलन, 18 प्रतिशत जीएसटी दर के दायरे में आने वाला सुपर अवशोषक पॉलीमर, पॉली एथिलीन फिल्म, गोंद, एलएलडीपीई- पैकिंग कवर. वहीँ 12 प्रतिशत जीएसटी दरके दायरे में आने वाला र्मो बांडेड नॉन-वूवन, रिलीज पेपर, लकड़ी की लुगदी.

सरकार ने अपनी सफाई में कहा है, “चूंकि सैनिटरी नैपकिन बनाने में उपयोग होने वाले कच्‍चे माल पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगता है, अत: सैनिटरी नैपकिन पर यदि 12 प्रतिशत जीएसटी लगता है, तो भी यह जीएसटी ढांचे में ‘विलोम (इन्‍वर्टेड)’ को दर्शाता है. वैसे तो मौजूदा जीएसटी कानून के तहत इस तरह के संचित आईटीसी को रिफंड कर दिया जाएगा, लेकिन इसमें संबंधित वित्‍तीय लागत (ब्‍याज बोझ) और प्रशासनिक लागत शामिल होगी, जिससे आयात के मुकाबले यह अलाभ की स्थिति में रहेगा. इसके आयात पर 12 प्रतिशत आईजीएसटी भी लगेगा. हालांकि, फंड की रुकावट के कारण कोई अतिरिक्‍त वित्‍तीय लागत और रिफंड की संबंधित प्रशासनिक लागत शामिल नहीं होगी.”

यदि सैनिटरी नैपकिन पर जीएसटी दर 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दी जाती है, तो ‘टैक्‍स विलोम (इन्‍वर्टेड)’ और ज्‍यादा बढ़ जाएगा तथा ऐसे में आईटीसी का संचयन भी और ज्‍यादा हो जाएगा। इसके अलावा फंड की रुकावट के कारण वित्‍तीय लागत तथा रिफंड की संबंधित प्रशासनिक लागत भी बढ़ जाएगी तथा वैसी स्थिति में आयात के मुकाबले घरेलू निर्माता और भी ज्‍यादा अलाभ की स्थिति में आ जाएंगे.

सरकार ने फिर आयात और निर्यात का तर्क दिया जिसमे कहा गया है कि  हालांकि, सैनिटरी नैपकिन पर जीएसटी दर को घटाकर शून्‍य कर देने पर सैनिटरी नैपकिन के घरेलू निर्माताओं को कुछ भी आईटीसी देने की जरूरत नहीं पड़ेगी तथा शून्य रेटिंग आयात की स्थिति बन जाएगी. शून्य रेटिंग आयात के कारण देश में तैयार सैनिटरी नैपकिन इसके आयात माल के मुकाबले बेहद ज्‍यादा अलाभ की स्थिति में आ जाएंगे.

पर सरकार को यह कौन समझाये कि ये सारे जटिल पक्ष समझने का काम लोगों का नहीं है. अगर एक फैसले से इतने बड़े स्तर पर फायदे की उम्मीद है तो सरकार को चाहिए था कि वो सेनेटरी नैपकिन को कर मुक्त करे जिससे अधिक से अधिक महिलायें उसका उस्तेमाल करें.

सनद रहे कि यही सरकार स्वच्छता कार्यक्रम और रसोई के ईंधन जैसे उज्जवला योजना पर अपने कार्यक्रम को  लोगों को होने स्वास्थय लाभ से जोड़कर देखती है. तो वही तर्क और वही अर्थ-शास्त्र यहाँ क्यों नहीं लागू होता.

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