सैनेटरी नैपकिंस पर सरकार के द्वारा कर लगाए जाने के विरोध के लिए लोग अपना रहे नए नए तरीके

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राजकमल अपने इस पेंटिंग के माध्यम से सवाल कर रहे हैं कि नैपकिन पर कर लगाना कितना जायज है.
सौतुक डेस्क/
इस साल जुलाई में जब केंद्र सरकार ने नए कर प्रणाली जीएसटी की शुरुआत की तब से कई मसलों पर जीएसटी का विरोध होता रहा है. लेकिन सेनेटरी नैपकिन्स को 12 प्रतिशत कर के दायरे में लाना लोगों को बहुत नागवार गुजरा है.  सरकार के इस कदम का विरोध करने के लिए लोग नए नए तरीके ईजाद  कर रहे हैं.
जैसे स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया, तिरुवनंतपुरम की करीब 300 छात्राओं ने कुछ उसी अंदाज़ में अपना विरोध प्रकट किया जैसे हाल ही में जामिया विश्वविद्यालय की छात्राओं ने माहवारी से जुड़े भ्रांतियों के विरोध में किया था. इन छात्राओं ने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के कार्यालय को ढेर सारी नैपकिन्स भेजी. इन नैपकिंस पर एक सन्देश लिखा था , ‘ब्लीड विदाउट फियर, ब्लीड विदाउट टैक्स’. ये नैपकिंस स्पीड पोस्ट के द्वारा भेजे गए. इन छात्राओं का उद्देश्य यह था कि मंत्री जी सन्देश देखकर एक बार सेनेटरी नैपकिन्स पर लगे कर पर पुनर्विचार  करें.  
 सरकार के इस कर थोपने का विरोध सिर्फ महिलाएं ही नहीं कर रही हैं बल्कि अब तो पुरुष भी सरकार की अनदेखी पर सवाल उठा रहे हैं. एक  प्रतिष्ठित मीडिया हाउस से जुड़े कलाकार राज कमल ने अपनी बात रखने के लिए एक बिलकुल अलग तरीका अपनाया है. अपने इस कलाकारी में उन्होंने असली सेनेटरी नैपकिन्स का प्रयोग कर इससे जुडी भ्रांतियों को हटाने के लिए माहवारी को बड़ी ही खूबसूरती से दिखाने का प्रयास किया है.  वे अपने कला के माध्यम से इस सन्देश को अधिक से अधिक लोगों के बीच पहुँचाना चाहते हैं. इस खबर के साथ प्रकाशित पेंटिंग राजकमल ने बनाई है.
सनद रहे कि सरकार ने इन नैपकिंस पर तो कर लगाया है पर सिन्दूर जैसी चीजों को कर-मुक्त श्रेणी  में रखा है.
इस मुद्दे के ज़ोर पकड़ने के बाद सरकार को 10 जुलाई को एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर सफाई तक देनी पड़ी थी. सरकार ने स्पष्ट करना चाहा कि नैपकिंस पर कर स्त्री-विरोधी नहीं है.  सरकार द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार जीएसटी से पहले सैनिटरी नैपकिन पर  13.68 प्रतिशत कर लगाया जाता था, जिसमे 6 प्रतिशत उत्पाद शुल्क और 5 प्रतिशत वैट शामिल था. नई कर प्रणाली में तो महज 12 प्रतिशत का कर लगाया गया है, सरकार ने इसे बिल्कुल उचित ठहराते हुए बताया था. सरकार के अन्य तर्क यह हैं कि मुख्य कच्चे माल पहले से ही उच्च जीएसटी दर के दायरे में हैं तो स्वाभाविक रूप से अंतिम उत्पाद पर भी उचित रूप से कर लगाया जाना चाहिए.
लेकिन द इकोनॉमिक टाइम्स की एक खबर के अनुसार, सैनिटरी  नैपकिन्स पर वैट पहले से भी बहुत सारे राज्यों में वैध नहीं था, इसीलिए जीएसटी लागू होने के बाद इन राज्यों में सैनिटरी नैपकिन्स पर कर लगभग दोगुना हो जाएगा. 

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