क्या सरकार निजी अस्पतालों में होने वाले सी-सेक्शन डिलीवरी दर पर रोक लगा पाएगी

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सौतुक डेस्क/

आजकल गर्भवती महिलाओं और उनके परिवार वालों  की सबसे बड़ी चिंता यही रहती है कि वे प्रसव के लिए ऐसे अस्पताल में जाएं जहां बेवजह सी सेक्शन सर्जरी न किया जाय.

यह चिंता वाजिब भी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों के अनुसार कुल प्रसवों में से सी सेक्शन के माध्यम से प्रसव की औसत दर सामान्यतः 10-15 प्रतिशत तक होनी चाहिए, लेकिन निजी अस्पतालों में यह करीब दर 75 प्रतिशत है. सामान्यतः वे लोग जो निजी अस्पताल का खर्चा उठा सकते हैं वे  निगरानी और प्रसव के लिए  निजी अस्पताल में ही जाना पसंद करते हैं.

निजी अस्पतालों बारे में तो समझा भी जा सकता है कि वो मुनाफे के लिए ये सब करते हैं. सनद रहे कि सी-सेक्शन की कीमत सामान्य से करीब दो गुना तक अधिक चार्ज किया जाता है.  पर सरकारी अस्पतालों में भी स्थिति सही नहीं दिखती. जैसे तमिलनाडु में इसका प्रतिशत 34 प्रतिशत और तेलंगाना में इसका 54 प्रतिशत है. इन राज्यों में निजी अस्पतालों और नर्सिग होम में यह स्थिति चिंताजनक रूप से बहुत अधिक है.  तेलंगाना में, निजी अस्पतालों में सी-सेक्शन डिलिवरी करवाने वाली महिलाओं की संख्या कुल डिलिवरी की 75 प्रतिशत है.

यह समस्या सरकार की भी चिंताओं में शामिल है. जैसे महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने फ़रवरी महीने में  स्वास्थ्य मंत्रालय को इस विषय पर लिखकर ज़रूरी कदम उठाने के निर्देश दिए थे.

जवाब में स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने कहा है कि इस बढ़ती हुई सी सेक्शन सर्जरी पर जांच की जा सके इसके लिए सरकार ने बहुत से कदम उठाए हैं. नड्डा ने कहा कि जो चिन्ताएं व्यक्त की गई हैं वे तथ्यों पर आधारित हैं और स्वास्थ्य मंत्रालय इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए बहुत से उपाय कर रहा है.

इनके अनुसार  सी जी एच एस के पैनल के अन्तर्गत आने वाले सभी निजी अस्पतालों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने स्वागत कक्ष क्षेत्र में सामान्य प्रसव के मुकाबले सी सेक्शन से हुए प्रसवों के आंकड़ों को प्रमुखता से प्रदर्शित करें.

स्वास्थय मंत्री ने ऐसे ऐसे कदम गिनाये हैं कि सुनने वाला हंस दे. उनके अनुसार, “सी-सेक्शन के बढ़ने की पहचान और प्रभाव की व्याख्या और उसके सम्भावित समाधान का प्रसार” सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में किया गया, जिससे कि केवल उन्हीं महिलाओं का सी-सेक्शन किया जाए, जिन्हें उसकी वास्तव में आवश्यकता है. फेडरेशन ऑफ ऑवसटेरिक एण्ड गायनोकोजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया ने भी अवांछनीय सी-सेक्शन के बुरे प्रभावों के बारे में अपने विचार व्यक्त किए हैं. मामला इतना सरल तो बिलकुल भी नहीं है.

ऐसे कदम से तो पैसे के लिए किसी हद तक जाने वाले नर्सिंग होम तो मानने से रहे. जहां मुनाफा इस सबसे बड़ा लक्ष्य हो वहाँ ऐसे छोटे-मोटे नैतिक प्रवचन नहीं काम करते. इन्होने यह भी कहा है कि राज्यों को निर्देश दिए गए हैं कि वे समय-समय पर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी दवाओं की पर्चियों को लेखापरीक्षा करवाएं और विशेष रूप से इस मामले की ओर ध्यान दें.

पाठकों को मालूम होना चाहिए कि यह सरकार जनता को  स्वास्थ्य सुविधा देने के एक ही तरीका जानती है और वह है स्वास्थय बीमा. जिसमे आप अस्पताल में जाए, और डॉक्टर आपके छोटे से इलाज का वो सबसे बड़ा तरीका खोजेगा जिसमे अधिक से अधिक पैसा निकला जा सकता है. सरकार अगर सच में ईमानदार रहती तो कम से कम स्वास्थय और इलाज के मामले में पब्लिक प्राइवेट नहीं खेलती और अपने सालों से बनाए अस्पताल को प्राइवेट पार्टी को देने के लिए उतावली नहीं दिखती.

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