भारतीय परिदृश्य में चिनुआ अचेबे की माँ और कोला की कहानी

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जितेन्द्र राजाराम/

एक बार की बात है, चिनुआ अचेबे की माँ ने कोला के वृक्ष से एक फल तोड़ लिया था. यह तब की बात है जब अचेबे  की उम्र काफी कम थी. हुआ यह कि एक पडोसी इनके घर के बगल से गुजर रहा था, उसने देखा कि चिनुआ अचेबे की माँ कोला के वृक्ष से पके फल तोड़ रहीं थीं. ये साहब जो कि चिनुआ अचेबे के चाचा जी भी थे खड़े होकर इस वाकये को देखते रहे. 

जीतेंद्र राजाराम

चिनुआ अचेबे से शायद आप वाकिफ हों, या भी हों. अगर नहीं वाकिफ हैं तो यह जान लीजिये कि चिनुआ अचेबे अफ्रीका से विश्व को एक साहित्यिक सौगात हैं जिसे पूरा मानव समुदाय एक धरोहर की तरह संभाल कर रखना चाहेगा.

खैर, चिनुआ अचेबे की माँ का कोला का फल तोड़ने वाली बात उस शख्स ने पूरे गाँव वालों को बताई. फिर क्या था गाँव वाले आग-बबूला हो गए. उस महिला का भारी विरोध शुरू हुआ और विरोध करने वालों में गाँव वालों के साथ-साथ अचेबे के चाचा भी थे जिन्होंने इस घटना को होते देखा था. ये सभी लोग चिनुआ अचेबे की माँ के कोला का फल तोड़ लेने से इतने आहत और क्रोधित थे कि बात उस महिला की हत्या करने तक  पहुँच गयी. खैर ऐसा हो नहीं पाया. 

इन गाँव वालों का आरोप था कि चिनुआ अचेबे की माँ ने इग्बो समुदाय की भावना को ठेस पहुंचाई है. इग्बो समुदाय में एक मान्यता यह थी कि कोई भी कोला के वृक्ष से फल नहीं तोड़ेगा. ये फल खुद-ब-खुद पकेंगे और जब टूट कर गिर जायेंगे तो उनको उठाया जायेगा. लेकिन उठाने वाला सिर्फ पुरुष होगा. किसी भी महिला को ऐसा करने की इजाजत नहीं थी. 

मान्यता यह थी कि कोई भी कोला के वृक्ष से फल नहीं तोड़ेगा. ये फल खुद खुद पकेंगे और जब टूट कर गिर जायेंगे तो उनको उठाया जायेगा. लेकिन उठाने वाला सिर्फ पुरुष होगा

लेकिन इस महान लेखक की माँ ने इस मान्यता को ख़ारिज कर दिया था. इस आरोप पर चिनुआ अचेबे की माँ का स्पष्ट तर्क था कि उनके अपने आँगन में लगे वृक्ष से फल तोड़ने  का उन्हें पूरा अधिकार है. दूसरे, इस फल को तोड़ते वक्त उन्होंने ऐसा कुछ नहीं लगा जिससे वो किसी समुदाय या ईश्वर का अपमान कर रहीं हों.

इस पूरी घटना का जिक्र चिनुआ अचेबे ने अपनी पुस्तकदेयर वाज कंट्री, पर्सनल हिस्ट्री ऑफ़ बियफ्रा में किया है. नाईजीरिया में इग्बो धर्म और ईसाई धर्म के बीच फंसे अफ़्रीकी समाज में ज्ञान और सम्मान पाने के खूनी संघर्ष की दास्तान पर आधारित इस पुस्तक में चिनुआ अचेबे लिखते हैं कि तब उनको अंदाजा नहीं था कि उनकी मां कितना बड़ा काम कर रही थी. अब पीछे पलटकर देखने से इस बात का एहसास होता है कि उनकी माँ उस समय ईसाई धर्म, महिलाओं के अधिकार और स्वतंत्रता के मद्देनजर एक अद्भूत संघर्ष कर रही थीं. जाहिर है कि स्थानीय समाज जो कि अतार्किक मान्यताओं में पूरी तरह लिपटा हुआ था वह उस महिला का विरोध कर रहा था.

 इस किताब को पढ़ते हुए मुझे भी एक पुरानी बात खटकने लगी. ऐसा कुछ मेरे गाँव में भी होता था. सुदूर अफ्रीका की ये घटना बिलकुल घर जैसी लगी. बार-बार मेरे जेहन में यही आता रहा कि हमारे भारत में आज भी महिलाओं के खिलाफ इसी तरह की कुरीतियां लदी हुई हैं .

इसको पढ़ते हुए जो बात मुझे परेशान कर रही थी वो ये कि हमारे गाँव में भी चिनुआ अचेबे के नाइजीरिया जैसी अनेकों गलत और अतार्किक मान्यताएं हैं. उदाहरण के लिए एक फल को ही लें. वैसे तो बॉलीवुड की वजह से यह कद्दू के नाम से मशहूर हो गया है लेकन मेरे यहाँ इसे रामफल कहते हैं.  मेरे यहाँ रामफल सीताफल से बिलकुल उलट है.  लेकिन देश के कई हिस्सों में इसे सीताफल भी कहते हैं जैसे दिल्ली. कई जगह पर इसे कुम्हड़ा, या कोहड़ा भी बुलाते हैं. ये कंद प्रजाति का नहीं बल्कि खरबूजे की प्रजाति का बेहद बड़ा फल है जो फल कहलाने के बावजूद सब्जी की तरह उपयोग में लिया जाता है. तो हमारे यहाँ मान्यता यह है कि इस फल को कोई पुरुष ही तोड़ सकता है औरत को इसकी इजाजत नहीं है.

मुझे याद आता है मैं तब छोटा था. रामफल को तोड़ने के लिए मेरा उपयोग किया जाता था. बच्चा ही सही, पर था तो मैं भी पुरुष ही. इसलिए मेरी माँ या चाची, बुआ लोग या पड़ोस कोई भी औरतें को जब भी रामफल को तोडना होता था और आसपास कोई पुरुष मौजूद नहीं होता था तो किसी लड़के से ही तोड़ने को कहा जाता था. अमूमन उन्हें मैं ही मिलता था. मेरे लिए इसे फोड़ना बड़ा रोचक काम था, वह समय बड़ा मजेदार हुआ करता था. बस इसे उठाओ और जोर से आँगन की ईंट से बनी सतह पर पटक दो. 

चूँकि मैं बहुत छोटा था तो कभी-कभी एक बार में फूटता भी नहीं था. और प्रयास करने होते थे, जिसके दरम्यान मेरे घर की महिलायें मेरे सुरक्षा को लेकर मुझे सचेत करती रहती थीं. अगर इसके बाद भी फुट पाए तो मुझे चाक़ू से उसमें दरार करने को कहा जाता था. इतने के बावजूद ये महिलायें खुद से आगे बढ़कर इसे तोड़ने से कतराती थीं.

मेरे लिए इसे फोड़ना बड़ा रोचक काम था, वह समय बड़ा मजेदार हुआ करता था. बस इसे उठाओ और जोर से आँगन की ईंट से बनी सतह पर पटक दो

चिनुआ अचेबे के लिखे ने औचक ही बचपन की उस याद को सामने ला खड़ा किया. अचेबे की तरह ही बचपन में मुझे यह बात बिलकुल किसी गलत सामाजिक मान्यता जैसी नहीं लगती थी. लेकिन आज सोचने पर एहसास हो रहा है कि कितने स्तर पर महिलाओं से भेद किया जाता था और कैसे अपने प्रति इस भेद में महिलायें भी शामिल हो गई थीं. यह सिर्फ भारत के एक क्षेत्र की कहानी नहीं है.  उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के रहने वाले एक मित्र बताते हैं कि उनके यहाँ भी महिलायें कोहड़ा फोड़ने से बचती हैं. और उनकी याद में भी इस परंपरा के तोड़े जाने का कोई एक भी उदहारण मौजूद नहीं है.

कोला

दोस्तों से बातचीत के दरम्यान मिथिलांचल के मधुबनी जिले की रहने वाली एक महिला पत्रकार ने भी कुछ ऐसी ही बात बतायी. साथ में उन्होंने इसके एक और कुरूप पक्ष की तरफ इशारा किया. उनके अनुसार भारत में चूँकि इन सब गलत मान्यताओं को ऐसी चीजों से जोड़ दिया गया है कि महिलायें चाहकर भी हिम्मत नहीं जुटा पातीं. अव्वल तो इसे गर्भ के फूटने से जोड़ दिया गया है जो किसी महिला के लिए बहुत भावुक मुद्दा है. ऐसी मान्यता है कि यदि महिला ने इस फल को तोड़ा तो भविष्य में वो गर्भवती तो होगी लेकिन माँ नहीं बन पाएगी. गर्भपात के डर से महिलायें इस गलत मान्यता को ढोती रहीं हैं. आज भी सुशिक्षित महिलाएं भी इस कुरीति का विरोध नहीं करती. दूसरे, एकदम इस मान्यता से उनको कोई शारीरिक या मानसिक नुकसान नहीं होता, इसलिए शायद महिलायें सामान्यतः खुद कोहड़ा फोड़ने से बचती ही रहती हैं.

ऐसी ढेरों गलत मान्यताएं है जो महिलाओं  के साथ हर छोटे-बड़े मौकों पर बड़े ही बारीकी से भेद बता जाती हैं. इस तरह के छोटे-छोटे दोयम दर्जे का व्यवहार कुल मिलाकर जो समाज में स्थिति पैदा करता है उसमे देश की आधी आबादी दोयम दर्जे की नागरिक बनती जाती है. लेकिन अपने समाज में इसका विरोध लगभग नहीं के बराबर दिखता है. जबकि एक साधारण सा दिमाग भी कोहड़े और गर्भ के इस रिश्ते की पोल खोल सकता है.

ये सारी बातें स्त्री को जकड़ने वाले उस तंत्र को समझने का मौका देती है जिसने महिला को  बड़ी चालाकी से बता और समझा दिया है कि वे पुरुषों के बराबर नहीं हैं. इस रामफल वाली बात से ऐसा लगता है कि यही वे छोटे-छोटे धागे हैं जिससे महिलाओं को जकड़ने के लिए एक मजबूत जाल बुना गया है और बिना ऐसे धागे को तोड़े महिलायें वास्तव में खुद को स्वतंत्र नहीं कर सकेंगी.

(जितेन्द्र राजाराम  इंदौर में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. आप उनसे उनके नम्बर 9009036633 पर संपर्क कर सकते हैं.)

9 COMMENTS

  1. हमारी तरफ सूरन के बारे में भी ऐसे ही चलता है कि पहले कोई पुरुष उसमें चीरा लगा देगा तभी उसे स्त्री काट सकती है। इस तरह के मामलों में हम किसी से कम थोड़े ही हैं।

  2. Sir, you remind me my childhood , when i was in school , i do remember whenever at home any Pooja happened first we need to find a boy or man to break the coconut , i never understood the fact why ? we all( my mother aunt , sisters ) were present and still we had to wait for male to come and break that coconut. never understood the logic behind this , why cant girl or any female from home who did the pooja can break the coconut ?,But current situation has been change anyone(female) who is present can break , myself have done this many times now .. so time is changing sir just we need to initiate from small things…:)

  3. But seriously my mother in law is always angry to me because breaking coconut , blowing in sankh r challenging work so we should do them and should show nothing happened ,we r equally capable r for all such deeds just don’t make us fool

  4. Some times we should be have dare to overcome such stupid rituals once or twice they will oppose after they will also accept.

  5. उत्तर प्रदेश मे महिलाये नारियल नही फोड़ सकती,शंख नही बजा सकती,ऐसी बहुत सी परम्पराये है जो स्त्री सम्मान के विरुद्ध है,चिनवा अचेबे की कहानी दिलचस्प,भारतीय समाज पर मौजू है।

  6. हमें औरतों की अजमातों का एहसास हैं ।

    अगर बचा तड़पता है तो माँ का दम निकलता है
    जब माँ तड़पती है तो फिर जमजम निकलता है

    मकान बेच के बेटी की शादी मत करना
    बेटी की शादी कर के उसे ही मकान दे देना

    गाफ़िल लोगों मत दौड़ो नापाक दिपट्टो की जानिब
    ऐसे दुपट्टा घर में है जिसके तुम नमाजें अदा कर सकते हो

    बहरहाल एक पहलू से देखूँ तो ऐसे आज़मातों के शेर किसी मर्द के लिए कभी नहीं देखे मैंने.
    इतनी इज़्ज़तदार शख़्सियत को मर्द के बराबर का दर्जा देना एक दुनियवि मामूल बन चुका है.
    (My point of view)

  7. Again it is a great piece of story by Jitendra Rajaram. He always surprises me by his list of reading of great books and the evidences he picks up from history while writing his stories.

  8. What is more disappointing is that women themselves don’t realise the need to fight for their self respect. And if at all a woman tries to fight against such rituals, the women around her will only pull her back.

  9. सर, आपने तो बचपन की याद ताजा कर दी.
    हमारे यहां इसे कुम्हाडा बोलते हैं. एक बार मेरी दादी
    के मना करने के बाद भी मैंने इसे फोड़ दिया था. तब
    मेरी खूब पिटाई हुई थी.
    समाज के सारे नियम, मान्यताएं, परंपराएं, संस्कार, पुरुष की अपनी सुविधा और स्वतंत्रता मे कोई हस्तक्षेप ना हो,
    इस बात को ध्यान मे रख कर बनाए गए हैं. और ऎसा हो
    भी क्यों ना. पुरुष प्रधान समाज जो है.
    जब तक स्त्री अपनी सामाजिक, आर्थिक, वैश्‍विक, और
    आत्मिक स्वतंत्रता की घोषणा नहीं करती, तब तक संस्कार के नाम पर स्त्री शोषण जारी रहेगा. बस ये हो सकता है कि
    यही मान्यताएं, परंपराए, और संस्कार आधुनिकता का नया
    जा मा पहन लें.

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