कानूनी पेंच में फंसी गर्भपात की समयसीमा; छोटी बच्चियां हो रहीं शिकार

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thenortheasttoday.com
फोटो: द नार्थईस्ट टुडे से साभार
उमंग कुमार/
 बृहस्पतिवार को एक बड़ा फैसला देते हुए देश के सर्वोच्च न्यायलय ने एक 13 साल की लड़की को गर्भपात कराने की अनुमति दे दी. यह लड़की 31 सप्ताह से गर्भवती थी.
सनद रहे कि भारतीय कानून 20 सप्ताह के बाद किसी को गर्भपात कराने की इजाज़त नहीं देता. लेकिन इस लड़की के मामले की गंभीरता को समझने के लिए डॉक्टर की जो टीम बनायी गयी थी उसने अपनी रिपोर्ट में गर्भपात की अनुशंसा की थी.  लेकिन इस टीम ने यह भी कहा था कि मुंबई की कक्षा सात की इस छात्रा पर इसके गंभीर परिणाम होंगे. और दूसरी तरफ अगर गर्भ को रोकने का निर्णय लिया गया तो बच्चा अपेक्षित समय से कम में पैदा होगा जिसकी गहन देखभाल की जरुरुत पड़ेगी. ऐसे में डॉक्टर की टीम ने कहा था कि किसी भी स्थिति में माँ और बच्चे पर बुरा असर देखने को मिलेगा.
इसपर अदालत ने फैसला देते हुए गर्भपात की अनुमति दे दी और कहा है कि चिकित्सा प्रक्रिया को प्राथमिकता से 8 सितंबर को मुंबई स्थित जेजे अस्पताल में ही किया जाय.
सुनवाई के दौरान पीड़िता के वकील स्नेहा मुखर्जी ने बताया था कि 27-हफ्ते के बाद ही इस बच्ची की गर्भावस्था का पता चला था वो भी तब जब बच्ची के माता-पिता उसे अस्पताल में मोटापा का इलाज कराने ले गए. वहाँ डॉक्टर ने पाया कि बच्ची गर्भवती है. जांच पड़ताल के बाद पाया गया कि उसके पिता के मित्र ने ही बच्ची का बलात्कार किया था.
गर्भपात को लेकर यह कोई पहली समस्या नहीं है. बल्कि हाल फिलहाल ढेर सारे ऐसे मामले आने लगे हैं जब लोगों को न्यायलय की शरण में जाना पड़ रहा है.
इसी साल 10 अगस्त को उच्चतम न्यायलय ने मुंबई की एक 26 हफ्ते की गर्भवती महिला को गर्भपात कराने  की अनुमति दी थी.  इस मामले में जांच के दौरान पाया गया था कि पेट में पल रहे बच्चे का सही विकास नहीं हो रहा है और उसे मष्तिष्क से जुड़े किसी रोग की सम्भावना है.
इसी तरह कुछ दिनों पहले एक मामला आया था जब एक दस साल की बलात्कार पीड़ित बच्ची ने एक बच्ची को जन्म दिया. यह मामला चंडीगढ़ का है. यह बच्ची भी 32 सप्ताह की गर्भवती थी, जब मामले का खुलासा हुआ. उसको गर्भपात कराने की इजाजत इसलिए नहीं मिली क्योंकि डॉक्टर की टीम ने कहा कि इससे बच्ची के स्वास्थय पर गहरा प्रभाव पड़ेगा.
मई में ऐसा ही एक मामला हरियाणा में आया था जहां एक दस साल की लड़की को गर्भपात कराने की इजाजत दे दी गयी. उस बच्ची का बलात्कार उसके सौतेले पिता ने ही किया था.
ऐसी बच्चियों का मामला इसलिए भी जटिल हो जाता है क्योंकि उनके गर्भवती होने का पता काफी देर से चलता है. अक्सर, सरकार द्वारा गर्भपात के लिए तय की गई समय सीमा के बाद.

कानूनी पेंच

बीबीसी से बात करते हुए पहले केस की लड़की का इलाज कर रहे डॉक्टर निखिल दतर ने सर्वोच्च न्यायलय के फैसले को ऐतिहासिक करार दिया.

इससे सीधे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस कानून की वजह से लोगों को परेशानी हो रही है.वर्तमान में स्थिति थोड़ी जटिल है. खासकर इन कम उम्र लड़कियों के मामले में. एक तो गर्भ के बारे में देर से पता चलता है. उसके बाद उन्हें इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए जिला अदालतों से उच्च न्यायालयों तक और अंततः उच्चतम न्यायालय तक के चक्कर लगाने की बोझिल प्रक्रिया शुरू करने को मजबूर किया जाता है.

सर्वोच्च न्यायलय ने हाल ही में कहा था कि गर्भापात की कानूनी समय सीमा बढ़ाई जानी चाहिए, ताकि महिलाएं भ्रूण की किसी गंभीर बीमारी का पता चलने या किसी और अनापेक्षित मामलों में सोच समझ कर निर्णय ले सकें.

उधर सरकार की लेटलतीफी  ने एक प्रस्तावित कानून को फाइलों में बंद कर रखा है. वर्ष 1971 के कानून में संशोधन के लिए एक प्रस्तावित बिल पिछले तीन साल से ठंढे बस्ते में पड़ा हुआ है. यह बिल गर्भपात कराने की समय सीमा को 20 से 24 सप्ताह करने की बात करता है. मतलब वे महिलाएं जिनका गर्भ 24 सप्ताह का है वो खुद गर्भपात का निर्णय ले सकती हैं.

कितनी बड़ी समस्या

– हर 155 मिनट में एक सोलह साल से कम उम्र की बच्ची का भारत में बाल्तकार होता है. हर तेरह घंटे में एक दस साल की बच्ची का इस देश में बलात्कार होता है.

– वर्ष 2015 में 10, 000 से अधिक बच्चों का बलात्कार होता है. (स्रोत-बीबीसी)

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