ए अरियार का बरियार- लोकगीत के मर्म को समझने के लिए लोक को समझना जरुरी

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श्रीधर दूबे/

(गोरखपुर के रहने वाले श्रीधर दूबे अपने व्यक्तित्व में ही लोक कवि हैं . आजकल नोएडा में कार्यरत हैं. इन्होंने कुछ ऐसी कवितायेँ लिखी हैं जो हम सब के रोजमर्रा के संघर्ष को बयाँ करती हैं. भोजपुरी के लोक गीत संगीत पर इनकी पकड़ गजब है. जीवित्पुत्रिका  पर्व के बहाने वो ऐसे ही कुछ गीतों की पड़ताल कर रहे हैं.)

आज जिउतिया (जीवित्पुत्रिका) नामक एक देहाती पर्व है जिसमें माताएँ अपने सँतान की मँगलकामाना के लिए निराजल व्रत रहने के बाद दोपहर में चिचिहडा का दातून कर स्नान करती हैं, फिर बरियार नामक पौधे के चारों ओर बैठकर उसकी पूजा-अर्चना कर उसे सिन्दूर से टीककर जल चढाते हुए एक गीत के माध्यम से माता सीता के पास अपने सँतान की मँगल कामना का सँदेश भेजती हैं.

श्रीधर दुबे

ए अरियार का बरियार

सीता से कहिह भेंट अकवार

मोर पुत्र मारि आवें, मराय न आवे॥

(हे अरियार, का बरियार! तुम सीता को अपने अकवार में भरकर कहना कि मेरा पुत्र किसी भी विघ्न-वाधा को मारकर ही आवे खुद मर कर ना आवे.)

दरअसल मुझे यह गीत इसलिये भी याद रह गया क्योंकि भोजपूरी गीतों की गुरू रहीं बडी अम्मा हर साल जिउतिया के व्रत पर अपने और आस-पड़ोस की औरतों के लिये चिचिहडा का दातून जुटाने का काम मेरे जिम्में सौंपती थी. मैं सारा दिन बडी अम्मा के ही साथ रहता फिर घर के बगल में बरियार के पेड़ की पूजा के लिये पड़ोस की औरतें जुटतीं और फिर इसी गीत के साथ बरियार पूजतीं. मै वहीं चुप-चाप खड़ा बरियार पूजने का सारा उपक्रम देखता रहता और मन ही मन इस गीत को दोहराता भी रहता.

लोक को और लोक की कला को उपेक्षा के भाव से देखने वाले लोगों को जिउतिया के इस गीत का या किसी भी लोक गीत का मर्म नहीं खुलेगा (समझ नहीं आयेगा). इस गीत को या लोक के किसी भी गीत का मर्म उसी को खुलेगा जो अपनी पार्थिव वासना और अँहकार का त्यागकर खुद को जीवन के हर एक रेशे रेशे से जोड़कर देखेगा. और इसी दृष्टि से देखने का भाव ही विराट भाव कहलाता है और इसी भाव जगत की चेतना का जीवंत होना ही तीसरी आँख का खुलना है. यही वजह है कि कला के देव शँकर के ही एक रूप नटराज हैं. कला चाहे किसी भी तरह की हो उसका प्रयोजन मानव सँवेदना को बचाये रहना और मानव चेतना के स्तर को निरंतर उपर उठाना ही होता है.

बचपन से ही देखता आ रहा हूँ कि गाँव घर की स्त्रियाँ अपना हर काम गाते-बजाते हुए ही करती थीं इसिलिए हर मौके का एक गीत होता था. और उन्हीं गीतों में रमकर भले ही  कुछ  क्षणों के लिये क्यों न पर वो स्त्रियाँमुक्त हो उठती थीं और जीवन की जटिलताओं में भी जीने का सँक्ल्प नहीं छोडती थीं. वो अपनी हर बात को अपने हर दुख को इन्हीं गीतों में गा-गाकर गाहे-बे गाहे अपनी बात कहती रहतीं थीं.

मुझे आज भी याद है. पुराने वाले घर के भीतरी बारामदे में झीना आटा निकालने वाला जँतसार था. वहाँ आस-पड़ोस की काकी, दादी और भाभी लोग  इकठ्ठा होकर सुबह से ही अपनी सुरीली रागिनियों (गीतों) के साथ जाँते पर झीना आटा निकालने में जुट जाती थीं.

 

उन गीतों में अजीब सी वेदना और छटपटाहट थी. बहुतेरे गीत तो मुझे याद भी हो गये थे. उन्हीं गीतों में से किसी गीत की कड़ी यह भी थी.

“नौमन कुटली भैया नौमन पिसली ना।

अरे रामा नौमन सिझली रसोईया हो ना॥

पिछली टिकरिया भैया हमरी भोजनिया हो ना।

भैया ओहू में गोरू चरवहवा हो ना।

भैया ओहू में कुत्ता बिलरिया हो ना॥

(हे भैया! नौ मन कूटा और नौमन पीसा. और नौ मन रसोई भी पकाई. लेकिन मेरे हिस्से भोजन के तौर पर बची हुई आखिरी रोटी ही मिली. उस आखिरी रोटी में भी, घर के जानवरों, चरवाहे और कुत्ते-बिल्ली का भी हिस्सा था.)

 

ठीक ऐसे ही सौभाग्यवती कुलवधू के आगमन पर सँझा के आह्वान का एक गीत है जिसमें श्रृंगार की रात का मोहक वर्णन मिलता है. जिसके महाभाव को क्षणिक इन्द्रिय सुखों के लोभी शायद महसूस भी नही कर पाये.

“कथी कइ दियना कथी कइ बाती, कथी कइ तेलवा जरेला सारी-राती ।

सोने कइ दियना रूपै कइ बाती सरसो के तेलवा जरेला सारी राती ।

जरिउ दीप जरिउ दीप सरिउ राती जबले दुलहा दुलहिन खेलेलैं चौपर ।

जरि गइले तेलवा स्ंपूरन भइली बाती जंघिया लागलि दुलहिन देइ गइली अलसाई ।”

(किस चीज का दिया, किस चीज की बाती और कौन-सा तेल सारी रात जला करता है. सोने का दिया, रूप की बाती और सरसों का तेल सारी रात जला करता है. जलो दीप, सारी रात जलो, जब तक की दुलहा-दुलहिन का चौपर चलता रहे. चौपर खेल खतम होते-होते तेल जल गया, बाती समाप्त हो गई और दुल्हे की जांघ पर सिर लगा दुल्हन अलसा गयी.)

 

इस गीत में यौवंन के विषय भोग का मनोहर दृश्य उपस्थित है. जिसमें सोने का दिया कर्म के शाश्वत आधार का प्रतीक है. और रूप की बाती चँचल और भँगुर रूप का तथा सरसो का तेल स्नेह की तरलता का प्रतीक है.

भोजपुरी के लोक गीतों को केवल कैसट पर सुनने वाले लोग उन गीतों की आत्मा को क्या देह तक को भी पूरा पूरा नही छू पाते. भोजपुरी के लोक गीतों को उचित सन्दर्भ में रखकर सुनने पर ही उनका मर्म खुलता है. जिस तरह सँस्कृत के वैदिक या लौकिक साहित्य में सुबह उठने से लेकर सोने तक के क्रिया-कलापों के अनुरूप श्लोक हैं ठीक उसी प्रकार से भोजपुरी में भी क्रिया-कलापों के अनुरुप गीत हैं.

 

बचपन से ही जिनकी नीद अलार्म घड़ी की करकराहट सुनकर खुली हो, वो भला देहाती नाम की “ठाकुर चिराईया” (एक चिडिया जिसकी ठाकुर जी…ठाकुर जी…का अलाप सुनते ही लोग जान जाते थे कि सबह हो गई) के बोल में जागृति का उदबोध भला कहा सुन पायेंगे? उसी उदबोध से उद्बोधित भोर के आवाहन का एक गीत है जिसमें हलधर किसानों को खेतों की ओर और घर की बहुओं को जँतसार की ओर जाने के लिए चेताया जा रहा है. जिस गीत को सुनकर यह ज्ञात हो जाता है कि भारतीय कला बोध यांत्रिक नही आनुभविक है (अनुभव से उपजा हुआ). गीत के बोल कुछ ऐसे हैं.

“ए भोर रे भईले भिनुसार चिरइया एक बोलेले, मिरुग बन चूगेले एक भोरे खेतवन हर लेके चल हरवहवा त बहुवर जाँते॥

(मृग वन चुगने चलें, हलधर खेतों की ओर चलें, बहुएँ जातें पर चलें. उठो जागो और सोये हुए पितरों को जगाओं क्योकी महान मँगल की वेला आई है.)

 

इतना ही नहीं गाँव की गंवार, अनपढ़ औरतें भी विवाह के लिए दुल्हन लाने जाते दुल्हे को भी अपने मँगल गीतों से ही अशीषती है.

” अमवा के नाई बाबू मउरें, महुआ कुचलागें, पुरईन पात अस पसरें, कँवल अस विहसें”

(आम की तरह वर मँजरित हो, महुए की तरह पुष्पित हो, पुरई की तरह प्रसृत हो और कमल की तरह विहसित हो.)

 

 

 

 

 

 

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