राजनीतिक विमर्श से गायब मज़दूर

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आफाक हैदर /

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आफाक हैदर /

चुनावी मौसम का रंग पूरी तरह से चढ़ गया है। पहले चरण के मतदान समाप्त हो चुके हैं। ये चुनावी समर वायदों और नारों से पटा पड़ा है लेकिन मजदूर और उसके सवाल इस चुनावी विमर्श में कहां हैं?

तेलंगाना में दस मजदूरों के मिट्टी में जिंदा दफन होने और मेघालय के खदानों में मरने वाले मजदूरों से ही मजदूरों की बेबसी का अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन, किसी भी पार्टी के चुनावी अभियान और घोषणाओं में मजदूर और उसकी मजदूरी कहां है ?

किसी भी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में मजदूर को उचित मजदूरी का वायदा नहीं किया है। मजदूर जो खेत-खलियानों में, कारखानों में, घरों में काम करता है वह अब भी चुनावी मुद्दों में हाशिये पर ही दिख रहा है। मजदूरों की दुर्दशा चुनाव की गरमा-गर्म बहसों से गायब हैं जैसे मजूदरों को लेकर सरकार का कोई सरोकार ही नहीं है। सरकार की सबसे बड़ी ग्रामीण रोजगार योजना ‘मनरेगा‘ में मजदूरी और मजदूरों की आर्थिक स्थिति पर राजनीतिक गालियारों में कोई विमर्श नहीं हो रहा है।

कांग्रेस ने न्याय (न्यूनतम आय योजना) योजना के साथ ‘मनरेगा‘ में 100 दिन की जगह 150 दिन के रोजगार देने का वायदा अपने घोषणा पत्र में जरूर किया है लेकिन यथार्थ के धरातल पर इन घोषणाओं का टिक पाना मुश्किल है। ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही हकीकत बयां करती है। बीते 1 अप्रैल, 2019 को मनरेगा को पूरे देश में लागू किये हुए 11 साल गुजर चुके हैं। इस योजना की शुरूआत हुए भी 13 साल हो चुके हैं लेकिन मनरेगा में काम करने वाले मजदूर आज भी बदहाल हैं। न्यूनतम आय उनके लिए सुनहरे सपने जैसा है।

आज भी 33 राज्यों और केंद्र शाषित प्रदेशों में मनरेगा में मजदूरी ग्रामीण न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम है। कई राज्यों में ये आधा से थोड़ा ज्यादा है। अभी हाल ही में कृषि विकास मंत्रालय ने मनरेगा में प्रतिदिन मजदूरी को बढ़ाने के लिए एक अधिसूचना भी जारी की है जिसे चुनाव आयोग की भी मंजूरी मिल गयी है लेकिन इसकी दरें एक से दो फीसद में ही सिमट कर रह गयी हैं।

मनरेगा में देश में औसत मजदूरी केवल 210 रूपये ही है जो की आज के वक्त की महंगाई के हिसाब से मुनासिब नहीं है।सबसे अधिक मजदूरी हरियाणा में 284 रूपये है लेकिन ये भी न्यूनतम मजदूरी से 55 रूपये कम है

बिहार राज्य में जहां पहले मनरेगा में मजदूरी 168 रूपये प्रतिदिन थी वह बढ़कर मात्र 171 रूपये ही प्रतिदिन हो पायी है। जहां महंगाई बेतहाशा बढ़ रही है वहीं मजदूरों की कमाई सिर्फ 2 से 3 रूपये एक साल में बढ़ती है लेकिन ये काबिले गौर नहीं है। बिहार में आज न्यूनतम मजदूरी 268 रूपये है और मनरेगा की बढ़ी हुई मजदूरी न्यूनतम मजदूरी से अब भी 97 रूपये कम है। मनरेगा की मजदूरी न्यूनतम मजदूरी का केवल 63 प्रतिशत ही है।

यहां गौरतलब हो कि ये वही बिहार है जो कभी समाजवाद की प्रयोगशाला बना जिसका सिद्वांत था कि वेतन में अधिक असमानता नहीं होनी चाहिए लेकिन बिहार ने मजदूरों को कभी उसका सही मेहनाताना नहीं दिया। मजदूरों के श्रम का शोषण सबसे अधिक किया गया और ये बदस्तूर जारी है। आज भी मनरेगा में सबसे कम मजदूरी बिहार और झारखंड में ही दी जाती है। मजदूरों को उनका हक दिये बिना ही सामाजिक न्याय का दावा किया जा रहा है।

मनरेगा में देश में औसत मजदूरी केवल 210 रूपये ही है जो की आज के वक्त की महंगाई के हिसाब से मुनासिब नहीं है। नागालैंड एक मात्र राज्य है जहां मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी न्यूनतम मजदूरी से अधिक है।

सबसे अधिक मजदूरी हरियाणा में 284 रूपये है लेकिन ये भी न्यूनतम मजदूरी से 55 रूपये कम है। वहीं केरल में न्यूनतम मजदूरी 600 रूपये है लेकिन मनरेगा में केवल 271 रूपये प्रतिदिन मजदूरी है जो की न्यूनतम आय का आधा भी नहीं है।

देश के सबसे विकसित कहे जाने वाले गुजरात में भी मनरेगा की मजदूरी केवल 199 रूपये है जो कि ग्राम पंचायत में अधिकृत न्यूनतम मजदूरी 312 रूपये से बहुत कम है। दिलचस्प बात ये है कि ये राज्य माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कर्मभूमि भी है। सरकार यहां मजदूर को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दे रही है। फिर भी ये देश में विकास का मॉडल है जहां मजदूरों के शोषण की अधिकारिक पुष्टि खुद सरकारी आंकड़े कर रहे हैं।

कुछ महत्वपूर्ण राज्यों में मनरेग में मजदूरी और न्यूनतम मजदूरी

राज्य मनरेगा में मजदूरी प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी प्रतिदिन
बिहार 171 268
गुजरात 199 312
हरियाणा 284 339
झारखंड 171 205
केरल 271 600
मध्यप्रदेश 176 200
पंजाब 241 315
राजस्थान 199 213
पंश्चिमी बंगाल 192 245
उत्तर प्रदेश 182 255
महाराष्ट्र 206 349
नागालैंड 192 115

स्रोत : ग्रामीण विकास मंत्रालय

मजदूर न्यूनतम मजदूरी से वंचित क्यों हैं ? सरकार खुद अपने बनाये हुए कानून को नहीं लागा कर रही है। ऐसे में जो मजदूर असंघठित या निजी क्षेत्रों में काम कर रहें हैं उनका शोषण तो स्वाभाविक है, उनको कैसे न्यूनतम मजदूरी के लिए बाध्य किया जा सकता है। क्यों मजदूरों को डॉक्टरां, इंजीनियरों और बाबुओं की तरह उचित मजदूरी नहीं दी जाती है। यहां तो न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल रही है जैसे सरकार ने अधिकारिक रूप से मजदूरों के शोषण को मंजूरी दे दी है।

गौरतलब हो कि हिन्दुस्तान में अलग अलग तरह के आय निर्धारित की गयी है न्यूनतम आय (मिनिमम वेज), मामूली आय (नोमिनल वेज) और उचित आय (फेयर वेज)। न्यूनतम आय में ऐसी आय को परिभाषित किया गया है जो किसी भी व्यक्ति को जीवित रखने के लिए दी जाने वाली सबसे कम आय है। कई मजदूर नेताओं ने न्यूनतम आय के मानकों को ही सही नहीं माना है और इसमें कई खामियों को गिनाया है।

अभी हाल ही में ऑक्सफॉम की एक रिपोर्ट ने भी इसकी पुष्टि की है, जिसका दावा है कि केवल 10 प्रतिशत लोग भारत में 77 प्रतिशत राष्ट्रीय सम्पदा पर कबजा किए हैं

हिंद मजदूर सभा के महासचिव और ट्रेड युनियन लीडर हरभजन सिंह सिद्धू कहतें है कि हिन्दुस्तान में  राष्ट्रीय न्यूनतम आय जैसा कोई कानून या प्रावधान नहीं है। हर राज्य अपने हिसाब से न्यूनतम आय तय करता है लेकिन जो स्टैंडर्ड मापदंड है 2700 कैलोरी है। उसे कम करके विभिन्न राज्यों ने 2100 कैलोरी या 2200 कैलोरी के हिसाब से न्यूनतम आय को तय किया है। इसमें भी जो पैमाना तय किया गया है रोज-मर्रा की चीजों का वो भी ठीक नहीं है अगर ईमानदारी से सही पैमाने से न्यूनतम आय को सरकार तय करे तो कम से कम 28,000 रूपये प्रतिमाह होना चाहिए।

आगे सिद्धू कहतें हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मजदूर की न्यूनतम आय को 25 प्रतिशत बढ़ाकर तय करनी चाहिए क्योंकि मजदूर का परिवार होता है, जिम्मेदारियां होती है लेकिन सरकार ने कभी भी मजदूर को उचित मजदूरी के लायक नहीं समझा। पिछले पांच सालों में सरकार का रवैया मजदूरों के प्रति पहले की सरकारों से भी ज्यादा उदासीन रहा है। वायदें तो सरकार ने काफी किये लेकिन मजदूर को कुछ नहीं दिया। इसके अलावा ऐसे काननू बनाए और संशोधन किए गएं जो मजदूरों के हित के खिलाफ हैं।

न्यूनतम मजदूरी के अलावा मनरेगा में मजदूरी समय पर नहीं मिलना। मनरेगा में रोजगार मिलने के दिनों में लगातार कमी होना। ये सब भी चुनौतियां हैं जिससे आम मजदूर जूझ रहा है। कई अध्ययनों की रिपोर्ट है कि मनरेगा में औसत साल में 50 दिन का भी रोजगार नहीं मिल पाता है। बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में ये आंकड़ें और भी कम है।

देश में मजदूरों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। पिछलें कुछ दशकों में गरीबों और अमीरों की बीच की खाई और गहरी हुई है। अभी हाल ही में ऑक्सफॉम की एक रिपोर्ट ने भी इसकी पुष्टि की है, जिसका दावा है कि केवल 10 प्रतिशत लोग भारत में 77 प्रतिशत राष्ट्रीय सम्पदा पर कबजा किए हैं। भारत में संसाधन कुछ हाथों तक सीमित होता जा रहा है और बड़ी आबादी बुनियादी रोजमर्रा की चीजों से भी महरूम है। हाल ही के वर्षों में आए कृषि संकट ने इसे और ज्यादा भयावह बना दिया है।

देश का पेट पालने वाले, खेत-खलियानों में काम करने वाले मजदूर आज खुद भूखे हैं। उसके शोषण की अधिकारिक पुष्टि खुद सरकार कर रही है। जहां तय की गयी न्यून्तम मजदूरी को सरकार खुद नहीं मान रही है। किसी भी राष्ट्र के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा जहां करोड़ों मजदूरों की दुर्दशा राष्ट्रीय चेतना और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा ही नहीं है।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में रिसर्च स्कॉलर हैं और नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया के फेलो हैं। यह लेख नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया की सहायता से लिखा गया है।)

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