हरिदास: बघेली लोक कवि

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बाबूलाल दहिया/

(बाबूलाल दहिया बघेली भाषा के कवि हैं. साथ ही आप सर्जना सामजिक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक मंच, पिथौराबाद के अध्यक्ष भी हैं. बघेली कवियों पर आपका  काम शानदार  है)

बाबूलाल दहिया

बोली और भाषा का गहरा रिश्ता है. बोली में मनुष्यता प्रमाणित होती है जबकि भाषा के द्वारा मनुष्य अपने विकास की छवियाँ अंकित करता चलता है. बघेली बोली इसी अर्थ से इस देश के एक भूभाग के कोख से जन्मी और प्रवाहित होती चली आ रही बोली है, जो पुराने रीवा, सतना, सीधी, शहडोल सहित मण्डला, कटनी और बांदा जिला के कुछ हिस्सों में भी बोली जाती है. भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार यह बोली पूर्वी हिंदी की शाखा है जिसे पहले रेवा यानी नर्मदा के उदगम के आस-पास बोले जाने के कारण रिमही कहा जाता था. बाद में यह बघेल राजाओं के क्षेत्र में बोले जाने के कारण बघेली हो गई. बघेली में अनेक सुयोग्य कवि हुए हैं और हैं भी जिनके अनेक काव्य  संकलन भी प्रकाशित हैं. वर्तमान में बघेली कविता हिंदी काव्य मंचों में भी उसके समानान्तर प्रतिष्ठित है.

हम उन तमाम पुराने और नए कवियों में से किसी एक श्रेष्ठ कवि का परिचय और उनकी कविता की बानगी आपके सामने लाने का प्रयास करेंगे.

जहां तक बघेली कविता की बाचिक परम्परा का प्रश्न है यह लगभग 400 वर्ष पुरानी है. किंतु उसकी लिखित परम्परा डेढ़ सौ वर्ष से अधिक की नहीं है क्योंकि बाचिक परम्परा में तमाम चउबोलबा आज भी लोक कण्ठ से मुखर होते रहते हैं.

बघेली कविता आप पढ़ें गुनगुनायें और उसे ह्रदयंगम करें. इस क्रम में हम यह पुनीत कार्य अपने पुरोधा कवि पंडित हरिदास से शुरू कर रहे हैं.

हरिदास
पंडित हरिदास का जन्म सन 1777 में रीवा जिले के गुढ़ नामक गाँव में हुआ था. यह बघेली के पहले कवि माने जाते हैं. यूँ तो हरिदास की लिखी कवितायें पुस्तक रूप में नहीं हैं, पर जन श्रुति में बहुत सारी तुकबंदी उनके नाम से मौजूद हैं. हरिदास हास्य व्यंग्य के कवि थे. उन्हें जहाँ  तत्कालीन समाज के बने बनाये ढर्रे से थोड़ी भी विसङ्गति या विद्रूपता दिखी तो उनके मूंह से कविता फूट पड़ी.
कहते हैं कि एक बार वे किसी बुजुर्ग ब्राम्हण के साथ कही निमंत्रण खाने जा रहे थे. जाते समय वे रास्ते में अरहर के कटे ठूंठ वाले खेतों के बीच भटक गए. लीजिये वह बात भी उनके कविता में आये बिन नहीं रही

सकल दुपहरी भटकत बीता या अरहर के खुढ्ढा।
हरीदास का रगड़े डारय या महरजबा बुड्ढा ।।

इसी तरह कहते हैं कि जब तत्कालीन छुआछूत और जाति व्यवस्था से जकड़े सामाजिक स्थिति के चलते उन्होंने साधु-भेषधारी बेनी गर्ग को किसी दमडी नामक खटिक के यहाँ बरी अँचार खाते देख लिया तो वह पूरी घटना ही कविता में बदल गई. यथा

राम चन्द्र सेवरी का तारिन दमडी क तारिन बेनी।
जाति पाति कय खबर न राखिन दइगे सरग नसेनी ।।
हाथ कान मा मुद्रा बाधे ठाकुर गरे झुलामय।
बरी सेधान खटिक घर खाइन तऊ गरग कहबामय।।

कुछ कवितायें उन्होंने गरीबी, बेबसी और प्रकति के मार पर भी लिखी हैं. यथा,,

आजु आय रखिहाई पूनू काल्ह होई खजुलइया।
हरिदास का खरिच चुका हइ सुलगी नही रसइया।।

काहू क गिरिगा अगरा पगरा काहू केर ओसार।
हरिदास का मुड़हर गिरिगा रोमय धरे कपार ।।

कहते हैं कि हरिदास ने एक बार 10 रूपये, चाँदी के कलदार खर्च कर एक भैंस खरीदी. पर जब वह ब्याने पजाने के बजाय उन्हें परेशानी ही सिद्ध हुई तो वह भला उनकी कविता में आये बिना कैसे रह सकती थी. यथा

हरिदास एक भइसी लींहिंन।
दश रुपिया अंगरेजी दीन्हिन।।
लम्मी सीगे पूछ उटँग।
दूध बाध मा कुछू न ढंग।।
खाइस चारा पोकिस नीर।
हरिदास का भय उपचीर।।

इस तरह हरिदास की कविताओं की बानगी आज भी तुकबंदी के रूप में यदा-कदा लोक कंठ से मुखर हो उठती है.

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