‘असली मसाले सच सच, एमडीएच एमडीएच’- के पीछे की कहानी

0

उमंग कुमार/

‘असली मसाले सच सच, एमडीएच एमडीएच.’ टीवी देखते हुए जाने कितनी बार आपने यह लाइन सुनी होगी. इसी के साथ आपने एक बुजुर्ग की तस्वीर भी देखी होगी. कई लोग तो यह कहते हुए मिल जाते हैं कि जब से वह यह प्रचार देख रहे हैं तब से उनको एमडीएच के प्रचार में आने वाला यह शख्स इसी तरह बूढ़ा दिखता है.

लेकिन यह सच नहीं है. यह शख्स जिसका नाम धरमपाल गुलाटी है के भी जवानी के किस्से हैं और कुछ ऐसे कि आज के बहुत सारे युवाओं को इनकी कहानी जानकार जीवन में संघर्ष करने की प्रेरणा मिलेगी और इसी में मजा आने लगेगा.

आज ‘आंत्रप्रेनुएर’ एक रोमांटिक शब्द हो आया है और बहुत सारे युवा इसे जीना चाहते हैं. लेकिन गुलाटी ने अपने जीवन के उस संघर्षपूर्ण समय में आंत्रप्रेनुएर बनाने की सोची जब उनके आगे पीछे कोई नहीं था और यह शब्द उस समय इतना आकर्षित भी नहीं करता था. आजादी के समय में इन्होंने जिस महाशिया डी हट्टी यानी एमडीएच मसाले की नींव डाली वह आज करोडों रसोईघरों का हिस्सा है.

गुलाटी ने अपने जीवन के उस संघर्षपूर्ण समय में आंत्रप्रेनुएर बनाने की सोची जब उनके आगे पीछे कोई नहीं था और यह शब्द उस समय इतना आकर्षित भी नहीं करता था

लेकिन यह सफ़र इतना आसान नहीं था. अब पकिस्तान में मौजूद सियालकोट में इनका जन्म 27 मार्च 1923 में हुआ था. दस साल की उम्र आते-आते इनकी स्कूली शिक्षा रुक गई. यद्यपि इनके पिता का मसाले बनाने का व्यवसाय था पर इनका मन इसमें नहीं लगता था. इसलिए धरमपाल ने कई धंधो में अपने हाथ आजमाए. उस समय साबुन एक नयी चीज थी, इसलिए इन्होंने अपना पहला व्यवसाय साबुन बेचने का ही शुरू किया. यह बीसवीं सदी के तीसवें दशक की बात है. इनका मन विचलित होता रहा और इन्होंने चावल और कपड़े कपडे के व्यवसाय में भी अपने हाथ आजमाए. कई सारी नौकरियाँ की. लेकिन नियति ने तो इनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था.

इन सब में बात नहीं बनता देख इन्होंने पिता के व्यवसाय में ही मन लगाने की कोशिश शुरू की लेकिन तभी बहुत बड़ी आफ़त आ गई. भारत-पकिस्तान का बंटवारा हो गया. विभाजन का साल था और उन्हें पता चला कि उनका अपना शहर सियालकोट पकिस्तान का हिस्सा बनने जा रहा है. इसके बाद ये कई सिक्खों, हिन्दुओं के जत्थे का हिस्सा हो लिए और भारत में पड़ने वाले शहर अमृतसर आ गए. यह आजादी के बाद तीसरा सप्ताह था और तारीख थी 7 सितम्बर, 1947.

धरमपाल गुलाटी अपनी पत्नी के साथ

कुछ दिनों तक धरमपाल अमृतसर के रिफ्यूजी कैम्प में रहे और फिर यह सोचकर कि दिल्ली रहने के लिए सस्ती जगह है नए देश की राजधानी आ गए. पकिस्तान से रुखसती के वक्त इनके पिताजी ने इन्हें पंद्रह सौ रुपये दिए थे. उसी में से कुछ पैसे खर्च कर इन्होंने एक तांगा खरीद लिया और कनौट प्लेस से करोलबाग़ के बीच चलाने लगे. उन दिनों एक सवारी से यह दो आना पैसे लिया करते थे.

वो तंगी के दिन थे. दिन भर तांगा चलाने के बाद भी इनको कुछ ख़ास आमदनी नहीं हो पा रही थी और उसके ऊपर से लोगों का रूखा व्यवहार. परेशान होकर इन्होने अपना तांगा बेच दिया और किराए पर एक दूकान ले ली. इस दूकान में इन्होंने वही पुश्तैनी काम शुरू किया जिसपर इनके पिता का भरोसा था. पिता के साथ कुछ काम करने की वजह से धरमपाल को भी मसाला बनाने की अच्छी खासी समझ थी.

दिन भर तांगा चलाने के बाद भी इनको कुछ ख़ास आमदनी नहीं हो पा रही थी और उसपर से लोगों का रूखा व्यवहार. परेशान होकर  इन्होंने अपना तांगा बेच दिया और किराए पर एक दूकान ले ली

मसाले बेचने का इनका काम शुरू हुआ. पाकिस्तानी समझ से उपजी इस मसाले के व्यवसाय ने धीरे-धीरे लोगों पर अपना असर ज़माना शुरू किया. बात फैलने लगी और इनका व्यवसाय चल निकला. मुनाफे ने इनका हौसला बढ़ाया और कुछ पूँजी जमा होने पर इन्होंने सन् 1953 में चांदनी चौक पर एक और दुकान किराए पर ले ली. धंधे का विस्तार हुआ और मुनाफा भी बढ़ा. कुछ ऐसे कि छः साल के भीतर, धरमपाल ने कीर्ति नगर में जमीन खरीद ली. वे यहाँ मसाले बनाने का काम शुरू करना चाहते थे.

इसके आगे की कहानी तो यही है कि आज धरमपाल गुलाटी टीवी पर एमडीएच का चेहरा हैं बन चुके हैं और उनकी कंपनी के बनाए मसाले भारतीय रसोई का अभिन्न हिस्सा. आज एमडीएच 60 तरह के मसाले बनाता है और करीब सौ देशों में इनका मसाला बिकता है.

कभी तांगा चलाने वाले धरमपाल जी 1,500 करोड़ रुपये की कंपनी के मालिक है और इनकी अपनी तन्खवाह 21 करोड़ रुपये सालाना है. धरमपाल जी सामाजिक जिम्मेदारी भी नहीं भूले हैं और अभी एमडीएच ने करीब 20 स्कूल खोल रखे हैं. एक लड़का और छः लड़कियों के पिता धरमपाल गुलाटी की बतौर व्यवसायी, सफल यात्रा कई लोगों के लिए प्रेरणा की स्रोत बन सकती हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here