प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के जीवन का ये अनदेखा पहलु

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सौतुक डेस्क/

नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन अपनी प्रतिभा और सापेक्षता के सिद्धान्त के लिए जाने जाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वे अपने जीवनकाल में एक स्पष्ट राजनीतिक कार्यकर्ता भी थे।

उन्होंने अपनी प्रसिद्धि और प्रभावों का प्रयोग उन मुद्दों के लिए किया जिनपर वे सच में विश्वास करते थे. 14 मार्च सन् 1879 में जर्मनी में जन्मे इस महान वैज्ञानिक ने वहां की नाज़ी हुकूमत का खुलकर विरोधकिया था तथा इजराइल राज्य सरकार का प्रचार भी किया था। इतना ही नहीं, संयुक्त राज्य अमेरिका मेंफैले हुए नस्लवाद की भी उन्होंने कड़ी निंदा की थी।

अपने जीवन के अंतिम समय में उन्हें इजराइल का दूसरा राष्ट्रपति बनने का भी अवसर प्राप्त हुआ था परन्तु बहुत ही सम्मानपूर्वक उन्होंने इस अवसर को अस्वीकार कर दिया। इजराइल के पहले राष्ट्रपति चैम वेइज़्मन ने आइंस्टीन को “सबसे महान जीवित यहूदी” कहकर संबोधित किया था और तो और वह उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। हालाँकि आइंस्टीन उस समय 73 वर्ष के थे तथा वे राजनीति के क्षेत्र में एक अनुभवहीन व्यक्ति थे, सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि वह इजराइल के नागरिक भी नहीं थे।

राजनितिक और सामजिक कार्यों में आइंस्टीन शुरुआत से ही भाग लिया करते थे। सन्न 1919 में आये उनके सापेक्षता सिद्धांत ने उन्हें रातों-रात एक मशहूर हस्ती बना दिया था। सन्न 1921 में उन्हें भौतिकी के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए  नोबेल पुरस्कार दिया गया. अपने कई साक्षात्कारों में उन्होंने विज्ञान के बारे में अपने विचारों के साथ-साथ अपने राजनितिक विचारों को भी हमेशा स्पष्ट रूप से जाहिर किया। हालाँकि, स्मिथसोनियन (SMITHSONIAN) में छपी रिपोर्ट के अनुसार, उनके इस राजनितिक पक्ष को लेकर उनके दोस्तों ने उन्हें चेताया भी था कि, वे अभी मिली इस नयी-नयी प्रसिद्धि का बहुत ही सूझ-बूझ से इस्तेमाल करें।

अपने जीवन के अंतिम समय में उन्हें इजराइल का दूसरा राष्ट्रपति बनने का भी अवसर प्राप्त हुआ था परन्तु बहुत ही सम्मानपूर्वक उन्होंने इस अवसर को अस्वीकार कर दिया

आइंस्टीन बहुत ही अमनपसंद इंसान थे. उन्होंने अपनी खूबियों के कारण विभिन्न क्षेत्रों में महारत हासिल कर ली थी। हिटलर के सत्ता में आने से पहले ही, इस भौतिक विज्ञानी ने यूरोप में अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण और यूरोप में यहूदी-विरोधी ताकतों एवं नाज़ी पार्टी के आदर्शों के खिलाफ खुली चेतावनी दी थी।

उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में जाकर नस्लवाद जैसे मुद्दों पर भी बात की तथा नस्लवाद का जमकर विरोध किया था। जब वर्ष 1933 में हिटलर सत्ता में आया, उस समय आइंस्टीन संयुक्त राज्य अमेरिका मेंथे और जर्मनी में यहूदी होने के डर से पूर्णत: सुरक्षित थे, उन्होंने लगभग उसी समय से कैलिफ़ोर्निया मेंही नौकरी करना प्रारंभ कर दिया था। जिस प्रकार नाज़ी पार्टी का प्रसार तेज़ी से हो रहा था, इस प्रसार केसाथ आइंस्टीन के विचारों में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा था।

‘द अटलांटिक’ के अनुसार, आइंस्टीन ने उस समय यह मान लिया था कि शान्तिवाद कोई रास्ता नहीं है,उस समय का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा था कि ,हिटलर को सत्ता से कैसे हटाया जाये, आइंस्टीन की स्पष्टता और मुखर विरोध ने जर्मन सरकार को बहुत नाराज़ कर दिया था, जिस कारणवश उनके वैज्ञानिक खोजों और उनके यहूदी होने पर लगातार हमले हुए।

परन्तु इस सब से आइंस्टीन का हौसला कम नहीं हुआ. वे हिटलर के खिलाफ अब और उत्साह से बोलने लगे थे. वर्ष 1930 से 1940 के दौरान उन्होंने इजराइली राष्ट्रपति रूजवेल्ट को पत्र लिखकर उनसे परमाणु बम योजना का समर्थन करने का आग्रह किया था।

हालाँकि, हिरोशिमा पर हुए परमाणु हमले ने उन्हें परमाणु बम को लेकर बड़ी उदासी से भर दिया था।

जब वे स्थायी रूप से अमेरिका आये थे तब कैलिफ़ोर्निया में उनकी नौकरी अस्थायी थी, परन्तु वर्ष 1955 में प्रिंसटन के न्यू जर्सी में स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज में उन्हें स्थायी नौकरी मिल गयी जहाँ वे अपने जीवन के आखिरी क्षणों तक काम करते रहे।

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