राजनेताओं के विज्ञान को लेकर उल-जुलूल बयानबाजी पर वैज्ञानिक हुए मुखर

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सौतुक डेस्क/

जब से वर्तमान सरकार सत्ता में आई है, आये दिन इसके मंत्री और पार्टी के नेता वैज्ञानिक समझ का मखौल उड़ाते दिखते हैं. वह नासमझी की वजह से हो या इरादतन पर अपनी संस्कृति और परंपरा को स्थापित करने के लिए सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता कुछ भी बोलते दिखते हैं. यहाँ तक कि देश के प्रधानमंत्री भी.

सामान्यतः ऐसे उलजुलूल बयानों पर वैज्ञानिक समुदाय चुप्पी साध लेता था पर इस बार लगता है पानी सर से ऊपर चला गया है. देश के बड़े वैज्ञानिकों ने हाल ही में आये मानव संसाधन राज्य मंत्री के डार्विन को लेकर दिए गए बयान पर सरकार को पत्र लिखने का फैसला किया है.

समाचार लिखे जाने तक देश के करीब 1,800 वैज्ञानिक, शिक्षाविद, अध्यापकों ने इस पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया था जिसमें आईएफआर, मुंबई, एचबीसीएसई (टीआईएफआर), आईयुसीएए (पुणे), आईआईएसईआर (मोहाली), आईआईटी (बेंगलुरु), मुम्बई यूनिवर्सिटी, सावित्रीबाई फूले पुणे विश्वविद्यालय इत्यादि के विद्वान शामिल हैं.

सीधे केंद्रीय राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह को संबोधित पत्र में इन विद्वानों ने कहा है कि मंत्री का यह बयान कि डार्विन का सिद्धांत तीस-पैंतीस सालों पहले ही  वैज्ञानिकों ने गलत साबित कर दिया था. इसके जवाब में भारत का वैज्ञानिक समाज अपने ख़त में कहता है कि यह सरासर गलत है. बल्कि इसके विपरीत दिन-प्रतिदिन डार्विन का सिद्धांत सही साबित होता जा रहा है.

इस मंत्री ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद में बोलते हुए कहा था कि डार्विन का यह सिद्धांत कि मानव की उत्पत्ति बन्दर से हुई है यह गलत है. इसको विज्ञान और कोर्स की किताबों से हटा दिया जाना चाहिए. इस मामले पर वैज्ञानिकों का कहना था कि एक दो नहीं बल्कि अब तो अनगिनत अध्ययन हैं जो इशारा करते हैं कि इंसान, बन्दर और ऐसे कई जानवरों के पूर्वज एक ही रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी एक बार कहा था कि कर्ण और गणेश ऐसे उदाहरण हैं जिससे इतिहास में भारतीय  ज्ञान-विज्ञान की समृधि झलकती है

सनद रहे कि वैज्ञानिक समाज इन नेताओं के इस तरह के बयान पर सामान्यतः चुप ही रहता रहा है.

जैसे इसी 8 जनवरी को राजस्थान विश्वविद्यालय में बोलते हुए राज्य के शिक्षामंत्री वासुदेव देवनानी ने कह दिया कि गुरुत्वाकर्षण का सिद्दांत न्यूटन के पहले ब्रह्मगुप्त द्वितीय ने दिया था. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर इसका विरोध जरुर हुआ पर वैज्ञानिक समुदाय चुप ही रहा.

पाठकों को याद होगा कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी एक बार कहा था कि कर्ण और गणेश ऐसे उदाहरण हैं जिससे इतिहास में भारतीय  ज्ञान-विज्ञान की समृधि झलकती है. उन्होंने कहा था कि कर्ण एक तरफ प्रजनन जेनेटिक्स तो दूसरी तरफ गणेश कॉस्मेटिक सर्जरी के ज्ञान के उदाहरण हैं.

प्रधानमंत्री ने कहा था कि हमें एक ख़ास समय में भारत के वैज्ञानिक समझ की ऊँचाई पर गर्व महसूस करना चाहिए. उन्होंने कहा था कि हम सबलोग पढ़ते हैं कि कर्ण मां की कोख से पैदा नहीं हुआ था. जरा और सोचें तो पता चलता है कि उस समय जेनेटिक विज्ञान मौजूद था. उसी तरह मोदी ने कहा था कि हमलोग भगवान गणेश की पूजा करते हैं. जरुर उस समय में भी कोई प्लास्टिक सर्जन रहा होगा जिसने इंसान के शरीर पर हाथी का शरीर लगा दिया.

लेकिन इस तरह के सारे बयानों पर वैज्ञानिक शांत रहे. ऐसा पहली बार हो रहा है कि एक नेता के अतार्किक और गलत बयानबाजी पर ये पूरा समाज एक साथ मिलकर विरोध कर रहा है.

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