ये बॉम्बे ब्लड क्या है?

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शिखा कौशिक/

सन 2015 की बात है. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के परिवार में एक बच्चा पैदा हुआ. उस बच्चे को मां के पेट से ही दिल की कोई बिमारी थी. सर्जरी करके उसे बचाया जा सकता था. बच्चे के माता-पिता उसे इलाज के लिए दिल्ली ले गए. जब डॉक्टर ऑपरेशन की तैयारी करने लगे तो पता चला कि इस बच्चे का खून एक दुर्लभ समूह से है.

सामान्यतः हमलोगों से पुछा जाता है कि आपका ब्लड कौन से ग्रुप का है. जवाब भी ए, एबी, बी और ओ जैसा ही कुछ होता है. लेकिन इस बच्चे का ब्लड जिस श्रेणी में आता था उसे बॉम्बे ब्लड ग्रुप कहते हैं.

अब माता-पिता के लिए नई समस्या आ गई. ऐसे किसी व्यक्ति को कैसे खोजा जाए जिसका ब्लड ग्रुप बॉम्बे हो. लेकिन कहते हैं न कि ‘जाको राखे साइयां मार सके न कोय’, बच्चे के किसी रिश्तेदार ने इसे इन्टरनेट पर डाल दिया और खबर वायरल होते ही दस के करीब लोग सामने आ गए.

पर ये दसो लोग किसी अन्य शहर में रहते थे. तब दी थिंक फाउंडेशन नाम की एक स्वयंसेवी संस्था आगे आई. इस संस्था ने लोगों से अपील की कि मुम्बई में आकर ये रक्तदान कर सकते हैं. एक पुणे से और दो लोग मुम्बई से आगे आये. उन्होंने रक्तदान किया. हवा के रास्ते उस रक्त को दिल्ली लाया गया तब जाकर उस बच्चे का इलाज हुआ.

तो कहने का तात्पर्य है कि ब्लड ग्रुप के कुछ ऐसे भी समूह है जिन्हें जुगाड़ करना दुर्लभ है. हाल तक भारत में ऐसे दो दुर्लभ समूह के रक्त पाए जाते थे. एक तो यही बॉम्बे समूह और दूसरा इंडिया आरए (INRA).

ऐसा माना जाता है कि पूरी दुनिया में करीब चालीस लाख लोग का खून इस समूह का है. पर मुंबई में ऐसे लोगों की संख्या थोड़ी अधिक है

आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि आखिर इसका नाम बॉम्बे समूह क्यों रखा गया? क्योंकि इसको पहली बार पहचाना तब के बॉम्बे में गया था. 1952 की बात है. एक चोटिल रेल के कर्मचारी और एक चाकूबाजी के शिकार व्यक्ति का इलाज चल रहा था. उन्हें खून की आवश्यकता थी. सेठ गोर्धनदास मेडिकल कॉलेज में इलाज कर रहे डॉक्टरों ने करीब 120 लोगों के खून से इनके खून का मिलान किया. लेकिन बात नहीं बनी. खैर शहर में काफी प्रयास के बाद एक शख्स मिला जिसके रक्तदान से इन लोगों को बचाया जा सका.

ऐसा माना जाता है कि पूरी दुनिया में करीब चालीस लाख लोग का खून इस समूह का है. पर मुंबई में ऐसे लोगों की संख्या थोड़ी अधिक है. यानी हर दस हज़ार में एक शख्स इस समूह के रक्त वाला मिलेगा. यही सब देखते हुए इसे बॉम्बे ब्लड ग्रुप कहा गया. इसके दुर्लभ होने का एक उदाहरण और है. 2017 में श्रीलंका के एक सत्तर वर्षीय पुरुष का इलाज चल रहा था. इस व्यक्ति का खून भी इसी समूह का था और उसे खून की सख्त जरुरत थी. इस समूह का खून पूरे श्रीलंका में नहीं मिला. फिर भारत से दो दफे इस समूह का रक्त वहाँ भेजवाया गया.

अभी हाल ही में मई महीने में बैंगलोर के कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज में एक मरीज आया. उसको खून की जरुरत थी. जब जांच हुआ तो पता चला कि यह कोई नया ही समूह का रक्त है. 80 लोगों के खून से मिलान करने के बाद डॉक्टर हार मान गए और आखिरकार उन्होंने दवा से खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ाई. दो जून को मरीज की छुट्टी हुई और जुलाई में जाकर स्पष्ट हुआ कि उस मरीज का रक्त एक नए समूह का है जिसे   पीपी समूह नाम दिया गया. पूरी दुनिया में कुल 200 तरह के ऐसे दुर्लभ रक्त समूह हैं. दुर्लभ इसलिए कि ये हज़ार में किसी एक के शरीर में पाए जाते हैं.

 

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