जान बचाने के लिए चढ़ाया गया खून भी सरकारी लापरवाही से खतरनाक हो जा रहा है

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शिखा कौशिक/

तमिलनाडु में एक गर्भवती महिला को खून चढ़ाया गया और बाद में पता चला कि वह महिला एचआईवी से पीड़ित हो गई है.

सत्तूर क्षेत्र के एक सरकारी अस्पताल में महिला का इलाज चल रहा था. चूँकि महिला एनीमिया से पीड़ित थी तो डॉक्टरों ने निर्णय लिया कि इसे खून चढाने की जरुरत है. खून चढ़ा दिया गया. बाद में उस महिला को ढेर सारी दिक्कतें होने लगी. जब डॉक्टरों ने जांच की तो पाया कि उस महिला के रक्त में एचआईवी वायरस है. जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि जो रक्त उसे चढ़ाया गया था वह एड्स के वायरसजनित था. वह रक्त सिवकाशी क्षेत्र से 3 दिसम्बर को लाया गया था. जिस इंसान ने यह रक्तदान किया था उसे भी नहीं मालूम था कि वह इस जानलेवा बीमारी से पीड़ित है. रक्तदान करने वाले ने 30 नवम्बर को दान किया था. उसने 2016 में एक बार और रक्तदान किया था और वहीँ गलत सिरिंज का इस्तेमाल किया गया और इस शख्स के शरीर में भी इस खतरनाक बीमारी का वायरस प्रवेश कर गया. इस मामले में जांच हो रही है और प्रशासन यह पता करने की कोशिश कर रहा है कि चूक कहाँ हुई. उधर रक्तदान करने वाला  एक बार आत्महत्या करने की कोशिश कर चुका है.महिला की भी कोउन्सिल्लिंग की जा रही है.

इस कहानी का सबसे दुखद पहलू यह है कि इस महिला के जैसे करीब दो हज़ार से अधिक लोग इस देश में सिर्फ रक्तदान जैसी वजहों से एचआईवी के शिकार हो जाते हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2007 से 2017 के बीच 20,592 ऐसे मामले हैं जो दूसरे की लापरवाही की वजह से एचआईवी के शिकार हो गए. इसमें गुजरात सबसे ऊपर है. अन्य राज्य जहां ऐसी समस्या विकराल रूप लिए हुए है, वे हैं महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक इत्यादि. यह सिर्फ एचआईवी का आंकड़ा है. अन्य बीमारी जैसे हेपेटाइटिस बी और सी का तो आंकड़ा ही नहीं मौजूद है.

2007 से 2017 के बीच 20,592 ऐसे मामले हैं जो दूसरे की लापरवाही की वजह से एचआईवी के शिकार हो गए

यह तब है जब देश में रक्त देने-लेने, तथा इसको संग्रहित करने के लिए पुख्ता कानून हैं जिसके तहत पहले जैसे रक्तदान नहीं होता. जैसे फिल्मों में दिखाया जाता था. अब सरकार के द्वारा लाइसेंस प्राप्त  बैंक होते हैं जहां रक्तदान किया जाता है और वे ही रक्त का संग्रहण करते हैं. फिर यह रक्त जरूरतमंद को दिया जाता है.

मौजूदा नियमों के अनुसार, रक्तदान के पहले दाता के खून की जांच होती है. इस जांच में देखा जाता है कि रक्तदाता कहीं एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, सी या मलेरिया इत्यादि से पीड़ित तो नहीं है. एक बार यह सुनिश्चित करने के बाद ही रक्तदान करवाया जाता है. ऐसे में इतने बड़े स्तर पर इस तरह की समस्या उत्पन्न होना चिंताजनक है.

दूसरी तरफ इस सख्ती की वजह से ढेरों लोग ऐसे हैं जिन्हें समय रहते खून नहीं मिल पता और कभी-कभी इस कमी की वजह से उनको अपनी जान तक गंवानी पड़ती है. क्योंकि सरकार ने अब पुराने रक्तदान के तरीके जिसमें एक डॉक्टर जांचकर रक्तदान करवा लेता था और जरुरतमंद को यह खून चढ़ा दिया जाता था, में बदलाव कर दिया है. अब बैंक होना जरुरी है और दूर-दराज इलाकों में यह ब्लडबैंक मौजूद नहीं होता है, जिससे लोगों को काफी परेशानी होती है. कई सालों से दूर दराज इलाकों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे लोग सरकार से इस प्रतिबन्ध को हटाने की मांग कर रहे हैं, ताकि हज़ारों लोगों की जान बचाई जा सके.

एक तरफ तो इतनी सख्त पाबंदी है और दूसरी तरफ अपने बनाए कानून का इस्तेमाल न करना, दोनों  ही लोगों के खिलाफ जा रहा है. ऐसे में सरकार से ये उम्मीद करना बेमानी नहीं होगा कि इस समस्या पर तत्परता से काम करे.

एचआईवी एक जानलेवा बिमारी है, वैसे नई दवाओं के खोज के बाद इसका इलाज तो संभव है पर मरीजों के लिए जीवन भर इलाज कराना मजबूरी है.  सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ देश में 2017 में कुल 21.40 लाख लोग इस बीमारी से पीड़ित थे. पिछले साल इस बीमारी के 87.58 हज़ार नए केस आये तो वहीँ 69.11 हज़ार लोगों की इस बीमारी से जान चली गई.

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