सांप, गरीबी और सरकार की भूमिका

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उमंग कुमार/

कोफ़ी अन्नान सयुंक्त राष्ट्र के महासचिव रहे इसलिए लगभग सारी दुनिया उनसे वाकिफ है. इसके अतिरिक्त अन्नान के कुछ ऐसे योगदान हैं जो मानवता के लिए काफी अहम् हैं. इन्होने HIV/AIDS के इलाज को सबके लिए सुलभ बनाने की कोशिश की. विश्व समुदाय से इस बीमारी को मानवाधिकार के तौर पर देखने की गुजारिश की. इस मामले में अन्नान काफी हद तक सफल भी हुए. साथ ही इन्होंने सर्प दंश या सांप काटने की समस्या को भी मुद्दा बनाया. सामान्यतः गरीब लोग ही सांप काटने जैसी समस्या से जूझते हैं. यही वजह है कि मल्टी-नेशनल कम्पनियाँ इसके लिए दवा बनने में दिलचस्पी नहीं दिखातीं क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनके निवेश करने पर भी इन ग्राहकों से अधिक मुनाफा नहीं कमाया जा सकता.

खैर कोफ़ी अन्नान जैसे लोगों ने इस समस्या को लागातार विश्व-पटल पर रखा और उनके लागातार संघर्ष की वजह से ही 19 सितम्बर को विश्व सर्प-दंश दिवस के तौर पर मनाया गया. इसकी शुरुआत इसी साल से हुई है. हालांकि अब कोफ़ी अन्नान इसको देखने के लिए मौजूद नहीं हैं क्योंकि पिछले महीने (अगस्त) में ही इनकी मृत्यु हो गई.

सर्प-दंश दुनिया के लिए बड़ी समस्या है. हर साल दुनिया भर में 18 लाख से 27 लाख लोग जहरीले साँपों के शिकार बनते हैं. विश्व स्वास्थय संगठन के अनुसार इनमे से 81,000 से लेकर 1,38,000 के करीब लोग हर साल अपनी जान गंवा देते हैं. भारत में हर साल मरने वालों का आंकड़ा 50,000 के करीब है. वैसे WHO का मानना है कि यह आंकड़ा वास्तविक आंकड़े के दस प्रतिशत के करीब ही होगा. क्योंकि सांप काटने के सारे मामले सरकार के संज्ञान में नहीं आ पाते. इस तरह सही आंकड़े भी सामने नहीं आ पाते. वर्ष 2017-18 में, सांप काटने के 1.96 लाख मामले सामने आये थे.

सरकारी आंकड़ो के अनुसार देश में सांप काटने के सबसे अधिक मामले पश्चिम बंगाल में सामने आये. इस मामले में महाराष्ट्र और तमिलनाडु  भी दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे.

सांप काटने के ज़िक्र भर से हमारे ज़ेहन में मृत्यु जैसे शब्द ही आते हैं. लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है. अगर सांप काटे मरीज की जान बच भी जाये, तो इलाज में पैसा इतना लग जाता है कि परिवार की कमर टूट जाती है. क्रिस्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर के प्रोफेसर आनंद ज़कारिया ने बुधवार को एक कार्यक्रम में बोलते हुए बताया कि तमिल नाडू में 70% मरीज निजी क्षेत्र के अस्पतालों में इलाज कराने जाते हैं. कुछेक मामलों में तो इलाज का खर्चा साढ़े तीन लाख रुपये तक आता है. गरीब परिवारों के लिए ये रकम बड़ी है और उनका कर्जे में चला जाना एकदम स्वाभाविक है.

जकारिया ने कहा कि सरकार को सांप काटने से प्रभावित लोगों के इलाज में आ रही समस्या को दूर करना चाहिए. उन्होंने इन चुनौतियों का भी जिक्र किया. उनके अनुसार ऐसे मरीज के इलाज के लिए दक्ष डॉक्टर बहुत सीमित हैं. जहर काटने की दवा की उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है.

सांप काटने की स्थिति में मरीजों को बचाने के लिए गोल्डन ऑवर काफी महत्वपूर्ण है और इसकी समझ ना केवल डॉक्टर बल्कि परिजन और सरकार को भी होनी चाहिए

देश में कुछ गिनी-चुनी फार्मा कंपनी ही ये दवा बनाती हैं. जैसे बायोलॉजिकल ई लिमिटेड, वीआईएनएस बायोप्रोडक्ट्स लिमिटेड, भारत सीरम और वैक्सीन लिमिटेड. सरकारी कंपनियों में देखें तो सिर्फ एक है, हफ्फ्किन बायो-फार्मास्यूटिकल कारपोरेशन लिमिटेड. साल 2015 में सनोफी जैसी बड़ी कंपनी ने यह दवा बनाना बंद कर दिया.

इसी तरह इस अकस्मात् आई समस्या से निपटने में डॉक्टरों की दक्षता भी सवालों के घेरे में हैं. उदाहरण के लिए महाराष्ट्र के पालघर जिले में 2013 से 2016 तक अध्ययन हुआ. कुल 1,686 सांप काटने के केस आये. इस अध्ययन में पाया गया कि अधिकतर केस में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र में मौजूद डॉक्टरों ने, मरीज को बड़े अस्पताल में रेफेर कर दिया. इनका नुकसान यह हुआ कि इलाज के लिए कीमती समय जिसे ‘गोल्डन आवर’ कहते हैं, गंवा दिया गया. अगर रेफेर करने की बजाय उनका इलाज शुरू हो जाता तो जहर का असर कम होता और बहुतों की जान बच जाती.

कहने का तात्पर्य यह है कि इन सारे मामलों में सरकारी हस्तक्षेप से ही समाधान लाया जा सकता है. सरकार को जल्द से जल्द इन चुनौतियों पर गौर करना चाहिए. सरकार के साथ लोगों को भी कुछ चीजों को समझना होगा जैसे अगर सांप काटे तो जितना जल्दी हो सके नजदीक के अस्पताल में पहुंचें. तांत्रिक और झाड़-फूक का सहारा न लें. सांप काटने की स्थिति में उस अंग को एकदम स्थिर कर दे जहां सांप ने काटा है. मरीज को चलने-फिरने की इजाजत ना दे. जख्म पर घरेलु दवाई ना इस्तेमाल करें और घाव को चूसने की कोशिश ना करें. जहां सांप आने की सम्भावना हों वहाँ नीचे ना सोयें और बिस्तर पर भी मच्छरदानी लगाकर ही सोयें.

दुनिया के कुछ देश ऐसे हैं जिन्होंने सांप काटने की समस्या से निपटने में सफलता पाई है. जैसे ऑस्ट्रलिया. वहाँ अधिक जहरीले सांप पाए जाते हैं पर साल भर में महज 3,000 सांप काटने के केस सामने आते हैं. प्रत्येक पांच सौ केस जिनमें मरीज़ अस्पताल में भर्ती होते हैं उनमे से दो या तीन ही की मौत होती है बांकी को बचा लिया जाता है. ऐसा इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने ना केवल लोगों में जागरूकता फैलाई है बल्कि इलाज के लिए समुचित व्यवस्था भी की है.

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