विश्व कैंसर दिवस: यह महिला आपसे कुछ कहना चाहती है!

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नलिनी सत्यनारायण: फेसबुक से साभार

सिगरेट पीने वालों को तो कैंसर जैसी बीमारी से खतरा है और वो शायद सिगरेट से मिलने वाली तात्कालिक मजे के लिए उस खतरे को धुंऍ में उड़ा देते हैं. पर अगर आप ऐसे लोगों के साथ रहते हैं तो सचेत हो जाईये. आपके पास वो तात्कालिक मजा भी नहीं है जिसमें आप अपने भविष्य के खतरे को उड़ा सकें. और आपके इर्द-गिर्द यह धुंआ आपके साथ क्या कर सकता है इसके लिए पढ़िए नलिनी सत्यनारायण की यह कहानी जिन्होंने पूरे जीवन में कभी सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया.

मैंने अपने पूरे जीवन में कभी सिगरेट नहीं पी फिर भी आज मेरे आवाज की नली (voice box) अब नहीं है.

वर्ष 1972 में मेरी शादी मेरे ही एक दूर के रिश्तेदार से हुई. वह इंजिनीयर थे और लगातार यात्रा करते रहते थे. अंग्रेजी में जिसे परफेक्शनिस्ट कहा जाता है, वह वैसे ही थे. सारे काम एकदम सलीके से करने वाले, अक्षरशः नियम कानून मानने वाले पर बहुत सिगरेट पिया करते थे. उनको सिगरेट पीने से कोई नहीं रोक पाता था. लेकिन महज 45 साल की अवस्था में उनको आघात लगा जिसे अंग्रेजी में स्ट्रोक कहते हैं. उन्होंने सिगरेट पीने में कुछ कमी की. अलबत्ता, उन्होंने धूम्रपान करना छोड़ा नहीं. इसके पांच साल बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा जिसका मतलब उन्हें सिगरेट से एकदम तौबा करना पड़ा. उसके नौ साल बाद यानी 2005 में वे सोये हुए थे और नींद में ही उनकी मृत्यु हो गई.

उसके चार साल बाद, 2009 में मेरी आवाज में कुछ भारीपन आने लगा और डॉक्टरों ने कुछ सामान्य दवाइयां लिख दी. एक साल बाद स्थिति ऐसी हुई कि मैं कुछ बोल नहीं पा रही थी. मेरे बच्चे मुझे लेकर अस्पताल भागे. डॉक्टरों ने बताया कि मुझे अल्सर हो गया है. यह मेरे आवाज की नली में है. लेकिन मुझे लग रहा था कि यह कुछ और ही है. आखिर, मेरा डर सही साबित हुआ. डॉक्टरों ने बताया कि मुझे गले का कैंसर हो गया है.

मेरे गले में एक बड़ा छेद था जिसे अंग्रेजी में स्टोमा कहते हैं. खिलाने-पिलाने के लिए एक कृत्रिम नली का इस्तेमाल किया जाता था जो सीधे मेरे पेट से जोड़ा गया था

मैं तो जैसे टूट ही गई. मैंने पूरे जीवन में कभी सिगरेट नहीं पी, कभी किसी का दिल नहीं दुखाया पर मेरे ही नसीब में यह सब होना तय था. उनलोगों ने बताया कि मैं पैसिव स्मोकिंग की शिकार हो गई हूँ. सिगरेट न पीकर भी पीने वालों के साथ रहने पर जो धुंआ शरीर के अन्दर जाता है उसे अंग्रेजी में पैसिव स्मोकिंग कहते हैं.

आखिर 19 अप्रैल 2010 को व्हीलचेयर पर बैठकर मुझे ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया. डॉक्टरों ने चीर-फाड़ कर के मेरे गले से आवाज की नली निकाल दी. साथ में थाइरोइड ग्रंथि भी. मेरे गले में एक बड़ा छेद था जिसे अंग्रेजी में स्टोमा कहते हैं. खिलाने-पिलाने के लिए एक कृत्रिम नली का इस्तेमाल किया जाता था जो सीधे मेरे पेट से जोड़ा गया था. डॉक्टरों ने एक आवाज प्रोस्थेसिस जोड़ा और मैं धीरे-धीरे अपनी बात कहने की कोशिश करने लगी. मैं तो लगभग हार चुकी थी पर मेरे बच्चे लगातार मेरे साथ खड़े रहे और मुझे हौसला देते रहे. चौंसठ साल की उम्र में मैंने कंप्यूटर चलाना सीखा.

जब डॉक्टर ने बताया कि उन्होंने एक ऐसे छोटे मशीन का इजाद किया है जिसकी मदद से मैं बिना स्टोमा को संभाले बातचीत कर सकती हूँ, मैं बता नहीं सकती मुझे कितनी ख़ुशी हुई

मैंने फिर से बात करना सीखा. सारे अक्षर और साथ में विंड पाइप को थामे रखना ताकि मैं अपनी बात सामने वाले तक पहुंचा सकूँ. मैं अपने गले के इस सुराख के बावजूद बोल रही हूँ और अब तो इसी सुराख से बांसुरी बजाना भी सीख रही हूँ. मैंने अपने तमाम साड़ियों से मैच करने वाला रुमाल जैसा तैयार किया है जिसे मैं अपने गले के इस सुराख को ढँक सकूं.

आज मैं कैंसर के खिलाफ मुहीम में शामिल हूँ. मैं तम्बाकू और धूम्रपान के खिलाफ अभियान में शामिल हूँ और उन संस्थाओं से जुडी हूँ जो इसके लिए काम करते हैं. कैंसर के मरीजों को हौसला देती हूँ. जब डॉक्टर ने बताया कि उन्होंने एक ऐसे छोटे मशीन का इजाद किया है जिसकी मदद से मैं बिना स्टोमा को संभाले बातचीत कर सकती हूँ, मैं बता नहीं सकती मुझे कितनी ख़ुशी हुई. मैं एक बच्चे की तरह चहक रही थी.

अगर कोई मुझसे पूछे कि मैं लोगों को क्या सन्देश देना चाहूंगी तो मेरा यही कहना होगा कि कृपया पैसिव स्मोकिंग के खतरे को कमतर न आंके. अपने लोगों को सिगरेट पीने से मना करने में हिचके नहीं. यह उनके लिए भी फायदेमंद होगा और आपके लिए भी.

(नलिनी सत्यनारायण की यह कहानी फेसबुक पर अंग्रेजी में लिखे उनके पोस्ट से अनुवादित है)

 

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