जो काम सुपरमैन, स्पाइडरमैन नहीं कर पाए, वह काम पैडमैन कर रहा है

0

पाकिस्तान में पैडमैन को रिलीज़ नहीं होने देना मतलब तीर सही निशाने पर लगा है

शिखा कौशिक/

अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘पैडमैन’ की जो सबसे छोटी उपलब्धि होगी वह बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म का प्रदर्शन. भारत जैसे देश में इस फिल्म की बड़ी उपलब्धियां कुछ और ही हैं. इनमें से एक है लोगों की जुबान पर बार-बार पैड शब्द को लाना. इस शब्द को लोग इतनी बार दोहरा लेंगे कि यह शब्द ख़ास से आम हो जायेगा.

इस शब्द के आम होने की अहमियत कितनी बड़ी है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है. आंकड़े तो जो समझाते हैं उसके हिसाब से भारत में करीब 62 प्रतिशत महिलायें (15-24वर्ष) अभी भी माहवारी के समय में कपड़े का इस्तेमाल करती हैं. यह राष्ट्रीय परिवार स्वास्थय सर्वेक्षण का आंकड़ा है.

लेकिन इससे जुड़े झिझक और फिर सामाजिक अन्याय का आंकड़ा कोई सर्वेक्षण नहीं देता. भारत जैसे देश में बहुत छोटी उम्र से ही लड़के और लड़कियों के बीच अंतर किया जाना शुरू हो जाता है. शुरुआत बहुत मखमली होती है लेकिन इसकी परिणिति खौफनाक. आज के फैशन-परस्त दुनिया में भी अगर आप तीन महीने के बच्चे के लिए कपड़ा खरीदने जाएँ तो दूकानदार पूछता है कि लड़का है या लड़की. अगर लड़की बताएँगे तो वह गुलाबी रंग में कुछ दिखाता है. जबकि उस बच्चे को भी नहीं मालूम कि वो लड़का है या लड़की.

इस भेदभाव को विकराल बनाने में इस माहवारी का बड़ा रोल है. जब किसी लड़की को माहवारी शुरू होती है यह वही समय होता है जब उसकी उम्र के लड़के घरेलु बंधन से कुछ अधिक स्वतंत्रता महसूस कर रहे होते हैं. और वहीँ लडकियां थोड़ी और सहमी, दबी-कुचली महसूस करने लगती हैं.

इस सहम जाने में सिर्फ इन चार-पांच शब्दों जैसे पैड, माहवारी, महीना, साफ़-सफाई इत्यादि का खुलकर नहीं बोल पाना एक हथियार की तरह इस्तेमाल होता है.

एक तरफ जवान होता लड़का अपनी उड़ान के लिए पंख फैला रहा होता है तो दूसरी तरफ एक लड़की माहवारी  की वजह से सिमटती जाती है.

इन शब्दों को बोलने में न सिर्फ नई उम्र के लड़के और लडकियां झिझकती हैं बल्कि उनके माँ-बाप, दादा-दादी सभी. ऐसे में उस लड़की को किसी शर्माती माँ से ज्ञान लेकर चुप हो जाना पड़ता है. शर्माने वाली माँ का शर्माता ज्ञान.

यह झिझक और इसके पीछे के कारणों को नजरंदाज करना बेवकूफी होगी. इसको समझने के लिए ताजा उदाहरण पाकिस्तान का लिया जा सकता है. इस देश में धार्मिक उन्माद चरम पर है और बात-बात पर धर्म के नाम पर सौ लोगों को कोई गोली मार जाता है. इस देश ने पद्मावत जैसी फिल्म रिलीज़ होने दी. पद्मावत में अलाउद्दीन खिलजी को अशिष्ट, व्याभिचारी और विलेन के तौर पर दिखाया गया है.

लेकिन वही देश पैडमैन को रिलीज़ नहीं होने देता. वहाँ का मुस्लिम समाज इसका विरोध करने लगता है. जबकि एक सत्य यह भी है कि वहाँ 79 फीसदी महिलायें अपने मासिक धर्म के दौरान जरुरी साफ़ सफाई नहीं बरतती हैं.

तो इस तरह यह समझना होगा कि बिना किसी को विलेन बनाये यह फिल्म सही जगह पर निशाना लगाती है और वह है पुरुषवादी समाज की घटिया मानसिकता. जिसमें स्त्री चाहिए,  भोगबिलास चाहिए, उससे होने वाला बच्चा चाहिए लेकिन स्त्री का स्वास्थय मायने नहीं रखता है.

ऐसे में बार-बार पैड बोल देना भी अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है. इन सारी चीजों से जुड़ी झिझक का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि निरोध को लेकर जब जागरूकता की बात शुरू हुई तो बहुत दिनों तक तो प्रचार में लोगों को सिर्फ निरोध बोलने भर के लिए प्रेरित किया जाता रहा. खासकर पुरुषों को.

उसी तरह की झिझक महिलाओं से सम्बंधित रोजमर्रा के व्यवहार को लेकर है. और उम्मीद है कि यह फिल्म महिलाओं पर झिझक की जो बेड़ी लगाई गई है उसे तोड़ने में छोटा ही सही लेकिन जरुरी हस्तक्षेप करेगी.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here