जब चोट दिल पर लगे तो कैसे लगाएं उस पर मरहम?

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सीखिए कैसे किया जाना चाहिए भावनाओं का प्राथमिक उपचार 

विवेक/

अगर आप किसी छोटे से बच्चे से भी पूछें की अपने दांतों का ख्याल कैसे रखना है तो वह तुरंत कहेगा कि इनको साफ़ रखा जाना चाहिए.  लेकिन आप किसी भी व्यस्क व्यक्ति से पूछ लें की भावनाओं को ठेस पहुचने से कैसे बचाए तो शायद बहुत आत्मविश्वास भरा जवाब न मिले. तो क्या हम अपने शरीर का ख्याल रखने के बारे में जितना अधिक जानते हैं, अपने मन का ख्याल रखना उतना ही कम?

यही सवाल पूछते हुए मनोवैज्ञानिक गाय विन्च’ हमें भावनाओं की प्राथमिक चिकित्सा और स्वास्थ्य के बारे में बताते हैं. विन्च एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक होने के साथ-साथ बहुत मशहूर लेखक और वक्ता भी हैं. उनकी किताब इमोशनल फर्स्ट-एड’ बहुत चर्चित रही है और उनके विडियो को लाखों लोग देख चुके हैं. आइये जानते हैं गाय विन्च का आखिर क्या कहना है:

मैं जब एक मनोवैज्ञानिक बना तो मैंने महसूस किया की हम कैसे अपने शरीर को मन से जादा महत्व देते हैं, पक्षपात करते हैं. हम बच्चो को छोटी उम्र से ही शरीर का ख्याल रखना सिखाते हैं पर उन्हें मन का ख्याल रखना नहीं सिखाते. आखिर शारीरिक स्वास्थ्य हमारे मानसिक स्वास्थ्य से अधिक महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है ? इस पक्षपात का आगे चलकर लोगों को बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ता है.

हमारे मन को हमारे शरीर की तुलना में कही अधिक चोट लगती है. जैसे – असफलता, अस्वीकृति और अकेलापन. इन सबसे जीवन भर सामना होता रहता है. हम इनकी अनदेखी करते हैं तो ये घाव और भी गंभीर होकर नाटकीय ढंग से हमारी जिंदगी को प्रभावित करते हैं. इन सारे घावों को भरने के तरीके हैं लेकिन हम बस इन्हें नज़रंदाज़ करते हैं. अगर कोई कहे – “मैं बहुत निराश हूँ, उदास हूँ”, तो हम कहते हैं “अरे कुछ नहीं, ये सब सिर्फ दिमाग में हैं, भूल जाओ”. अगर किसी का पैर टूटा हो तो क्या आप उससे कह सकते हैं – “अरे कुछ नहीं, ये सब सिर्फ तुम्हारे पैर में है, चलना शुरू करो”. समय आ गया है कि हम अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच की खाई को भरें और उन्हें जुड़वाँ भाई की तरह देखें.

अकेलेपन से बचें:

 मेरा एक जुड़वाँ भाई है और वो भी मनोवैज्ञानिक है. हम दोनों के बीच बहुत ज्यादा प्यार है. पर पढ़ाई के लिये हम दोनों को एक दूसरे से दूर होना पड़ा. हमलोगों के लिए वह बहुत कठिन समय था. उसके जाने के बाद जब मेरा जन्मदिन आया. मैं सारी रात परेशान रहा और उसके फोन का इंतज़ार करता रहा. कमरे के अन्दर बेचैनी से चलते हुए मैंने गलती से फोन का हुक भी हटा दिया. हम दोनों के लिए वह बड़ी मुश्किल रात थी. उसका भी यही हाल था और अगली सुबह उसने बड़े गुस्से में मुझसे पुछा की अगर उसका फोन नहीं आ रहा था तो मैंने उसे फोन क्यों नहीं मिलाया. मुझे लगता है इसका कारण था –अकेलापन !

अकेलेपन से उतना ही नुकसान होता है जितना की सिगरेट पीने से. सिगरेट की डिब्बी पर तो चेतावनी लिख कर आती है. लेकिन अकेलापन ऐसी चेतावनी देकर नहीं आता.

अकेलापन इतना गहरा मानसिक आघात पहुंचाता है कि हम अपनी पूरी क्षमता से सोच विचार नहीं कर सकते. हमे लगने लगता है कि हमारे आस-पास के लोग हमारी परवाह नहीं करते. हम किसी के पास मदद के लिए भी नहीं जाते क्योकि हमें लगता है कोई हमें अस्वीकार कर देगा तो और ज्यादा दुःख होगा. अकेलापन तब भी हो सकता है जब आप लोगों से घिरे हों. अकेलेपन के ऊपर बहुत से शोध किये गये हैं और नतीजे बहुत डरावने हैं. अकेलापन आपको मार देता है, अकेलेपन के कारण आपकी जल्दी मृत्यु होने के सम्भावना 14 प्रतिशत बढ़ जाती है. अकेलेपन के कारण आपका ब्लडप्रेशर, कोलेस्ट्रोल बढ़ता है, आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और आप कई रोगों के शिकार हो जाते हैं. वैज्ञानिक अब इस नतीजे पर पहुचें हैं कि अकेलेपन से उतना ही नुकसान होता है जितना की सिगरेट पीने से. सिगरेट की डिब्बी पर तो चेतावनी लिख कर आती है. लेकिन अकेलापन ऐसी चेतावनी देकर नहीं आता.

असफलता को हावी न होने दें:

एक बार मैंने तीन नन्हे बच्चो को एक जैसे प्लास्टिक के खिलौने से खेलते हुए देखा. उस खिलौने में एक लाल बटन था जिसे खींचने से एक प्यारा सा कुत्ता बाहर निकल आता था. एक छोटी बच्ची ने बैंगनी बटन खींचा पर कुत्ता बाहर नहीं आया. उस लड़की ने इसे फिर खींचा और बार बार खींचती रही. वह बच्ची बार बार ऐसा करने के बाद थक कर बैठ गई और उस खिलौने को देखती रही. उसके नीचे वाले होंठ काँप रहे थे. उसके बगल वाले बच्चे ने ये सब होते हुए देखा और अपने खिलौने को बिना छुए ही जोर-जोर से रोने लगा. उसी समय एक और छोटी बच्ची ने उस खिलौने के साथ बड़ी कोशिश की और आखिरकार वो लाल बटन खींच दिया और प्यारा कुत्ता बाहर निकला, फिर उसकी आँखें ख़ुशी से चमकने लगी. तीनो बच्चो की प्रतिक्रिया अपनी असफलता को लेकर अलग-अलग थी. पहले दोनों बच्चे लाल बटन खींचने में उतने ही काबिल थे लेकिन वो सफल नहीं हुए क्योकि उनके दिमाग ने उन्हें धोखा दिया और यकीन दिला दिया की वो ऐसा नहीं कर सकते.

हम बड़े लोग भी हर समय इसी तरह धोखा खाते हैं. यहाँ तक की हमारे अन्दर कुछ तयशुदा भावनाएं और धारणा होती है जो निराशा और असफलता दिखते ही बाहर आने लगती है. क्या आपको पता है कि आपका दिमाग कोई भी असफलता मिलने पर कैसे प्रतिक्रिया करता है? आपको पता होना चाहिए.

यहाँ तक की हमारे अन्दर कुछ तयशुदा भावनाएं और धारणाएं होती हैं  जो निराशा और असफलता दिखते ही बाहर आने लगती हैं.

क्योकि अगर आपका दिमाग आपको ये मनाने की कोशिश कर रहा है कि आप कुछ नहीं कर सकते और आप मान लेते हैं, तो फिर आप असहाय महसूस करने लगेंगे और कोशिश करना छोड़ देंगे. ऐसे में आपका भ्रम बढ़ता जाएगा कि आप आप सफल नहीं हो सकते.

यही कारण है कि बहुत से लोग अपनी क्षमता और प्रतिभा से बहुत कम काम कर पाते हैं. क्योंकि कभी किसी एक असफलता ने उन्हें ये विश्वास दिला दिया की वो अब सफल नहीं हो सकते और वो ये मान बैठे.

एक बार आपके दिमाग ने किसी चीज पर विश्वास कर लिया तो फिर उसे बदलना मुश्किल है. इसलिए असफलता के बाद हारा हुआ, हतोत्साहित महसूस करना सामान्य है लेकिन ये कभी न मानिये कि अब आप सफल नहीं हो सकते. आपको इस हताशा से लड़ कर जीतना होगा. इससे पहले कि विचारों का वो नकारात्मक चक्र शुरू हो, उसे तोड़ डालिए.

भावनाओं का खून बहाना बंद करें:

हमारी भावनाएं और हमारा दिमाग, ये इतने भरोसेमंद दोस्त नहीं है हम इनपर जितना भरोसा करते हैं. ये बड़े ही बदमिजाज़ दोस्त हैं जो एक पल में साथ देते हैं तो अगले पल बुरे बन जाते हैं. एक बार मैं एक ऐसी स्त्री से मिला जिसका शादी के 20 साल बाद तलाक हुआ था. वह परेशान थी. बात आगे बढ़ी और एक दिन वह एक लड़के से मिलने वाली थी. उसदिन वह बहुत खुश थी. उसने नयी ड्रेस भी खरीदी थी. दोनों न्यूयार्क के एक बड़े रेस्टोरेंट में मिले और 10 मिनट बाद ही लड़का उठा और बोला – “मुझे तुम में कोई दिलचस्पी नहीं है.” यह कहकर लड़का वहाँ से चला गया. स्त्री इतनी दुखी हुई कि वो वहां से हिल भी नहीं पाई. उसने अपने एक दोस्त से बात की और उसके दोस्त ने कहा – “ तुम और क्या उम्मीद करती हो? तुम इतनी मोटी हो, तुम्हारी बातें उबाऊ हैं. कोई भी सुन्दर और सफल आदमी तुम्हारे जैसी बेकार औरत से क्यों मिलेगा !!!!”

आपको लग रहा होगा कि कोई दोस्त इतना क्रूर कैसे हो सकता है! मैं आपको बताऊँ कि ये बाते किसी दोस्त ने नहीं बल्कि उस स्त्री ने खुद आपने आप को कही थी. हम सब अपने साथ यही तो करते हैं किसी भी अस्वीकृति के बाद. हम सोचने लग जाते हैं कि हमारी ही गलती है. कमियां हमारे में ही है.

 जब आपकी बांह में चोट लग जाये तो आप चाक़ू निकाल के घाव को और अधिक गहरा तो नहीं करने लगते! फिर अपने मन के घावों के साथ हम हमेशा यही क्यों करते हैं

एक तो हमारे आत्म-सम्मान को पहले से ही ठेस लगी होती है और हम उसको और अधिक नुकसान पहुंचाने लग जाते हैं.  जब आपकी बांह में चोट लग जाये तो आप चाक़ू निकाल के घाव को और अधिक गहरा तो नहीं करने लगते! फिर अपने मन के घावों के साथ हम हमेशा यही क्यों करते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि  मानसिक स्वास्थ्य हमारी प्राथमिकता ही नहीं है. दुनिया भर में दर्जनों शोध इस बात पर हैं कि जब आपका आत्म-सम्मान कम हो जाता है तो तनाव और चिंता बढ़ने के साथ-साथ असफलता और अस्वीकृति से चोट अधिक पहुंचती है. इस तरह उबरने में भी अधिक समय लगता है.

ऐसे में यह याद रखना जरुरी है कि जब भी आपको अस्वीकृति मिले तो सबसे पहले अपने आत्म-सम्मान को गिरने से बचाइए. जब भी दिल दुखे, अपने साथ उतने ही प्यार से व्यवहार कीजिये जैसे की एक सच्चे दोस्त को करना चाहिए.

नकारात्मक जुगाली करना बंद करें:

हमें अपनी बुरी आदतों को बदलना होगा. एक सबसे हानिकारक और सामान्य आदत है – नकारत्मक सोच विचार करना. मतलब घटना हो जाने बाद मन ही मन उसकी जुगाली करना. आपको कुछ बुरा लगा या किसी से लड़ाई हो गई और उसी दृश्य को हफ्तों-महीनो आप अपने मन में दोहराए चले जा रहे हैं. बुरी घटनाओं का इस तरह चिंतन करना बहुत आसानी से
एक आदत बनते जाता है और ये इतनी खतरनाक आदत है कि इससे आपको अवसाद, तनाव, खाने का विकार या ह्रदयरोग जैसी बीमारियाँ भी हो सकती हैं.

समस्या ये है की नकारात्मक चिंतन करने की इच्छा इतनी तीव्र होती है कि रोकना मुश्किल हो जाता है. मुझे ये पता है क्योकि मुझे खुद ये आदत थी. मेरे जुड़वाँ भाई को तीसरे स्टेज का कैंसर हो गया. उसके सारे शरीर में ट्यूमर दिखाई दे रहे थे और कीमोथेरपी शुरू होने वाली थी. उसने मुझसे एक बार भी नहीं कहा लेकिन मैं सिर्फ यही सोचता रहता था कि उसपर क्या बीत रही है. वो बड़ा ही सकारात्मक था और उसका मानसिक स्वास्थ्य कमाल का था. और मैं शरीर से स्वस्थ होकर भी मन से बीमार था.

समस्या ये है की नकारात्मक चिंतन करने की इच्छा इतनी तीव्र होती है कि रोकना मुश्किल हो जाता है

शोध से ये पता चला है कि अगर आप अपने मन को नकरात्मक चिंतन से दो मिनट के लिए भी विचलित कर दे तो काफी होगा. तो जब भी मेरे मन में परेशानी भरा कोई बुरा ख्याल शुरू होता था मैं अपना ध्यान किसी और चीज पर लगा देता. एक हफ्ते के अन्दर मेरा पूरा नजरिया ही बदल गया और मैं बहुत सकारात्मक और आशावादी हो गया. कीमोथेरपी के कुछ समय बाद जब जांच हुई तो मेरे भाई के सारे ट्यूमर ख़त्म हो चुके थे. अभी और इलाज़ बाकी था लेकिन हम जान चुके थे कि वो ठीक हो जायेगा.

अगर हम अपनी भावनाये और मन को साफ़ रखें तो हमारी जिंदगी बहुत ही बेहतर हो जाएगी. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मानसिक रूप से स्वस्थ दुनिया कैसी होगी? ऐसी दुनिया जहां अकेलापन और अवसाद कम हो साथ ही लोगों को पता हो कि असफलता को जीतना कैसे है. मैं कल्पना कर सकता हूँ क्योकि मैं ऐसी ही दुनिया में जीना चाहता हूँ. और हम सब अगर थोड़ी जानकारी रखें और कुछ आदतें बदल दे तो हम ऐसी दुनिया बना सकते हैं.

(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शिक्षा पूरी कर विवेक बोधिसत्व आजकल दिल्ली में रहते हैं. विवेक एम्स में कार्यरत है और नॉन वायलेंट कम्युनिकेशन पर कार्य कर रहे हैं. आप सामजिक मुद्दों से गहरे जुड़े हैं.)

7 COMMENTS

  1. Jiwan me Etna chunautiya h ki use puri Kane ki koshish karata h Lekin Sabhi puri nahi hoti aur dhire dhire Etna mansik dabav oj leta h aur pata b Nahi chlta

  2. बेहद ज़रूरी बात है जिसका हम बिल्कुल ध्यान नहीं रखते, इसका सबूत अभी इसी बात से मिल जाता कि मानसिक स्वास्थ्य हेडिंग में पढ़ के लोग उतने क्लिक नहीं करेंगे जितना पेट कम करने की हेडिंग लगाने पे करते। बढ़िया सहज भाषा में समझाया गया बेहद ज़रूरी लेख

  3. Bahut hi sundar shabdon ka prayog karke ek bahut hi achhi or mahatvapurna baat samjhayi gayi hai. Agar is chiz ko hum apne jeevan me sammilit kr lein to bade se bade dukh ka saamna hum aasaani se kar sakte hain or jeevan k har samay me apne apko sakaraatmak bana sakte hain…. Or ek aur bahut achhi baat k jeevan me har pareshani ka samaadhaan hum swayam kar sakte hain.
    Bahut hi prerna dayak or khud me aatma vishwas jagane wala lekh hai…..????

  4. a nice blog, loved the metaphors/allegories mentioned to further the message. We rarely talk about this aspect of our health, we hide it from our family and mostly ignore it ourselves as well and when we are finally & actually ready to face it and improve, we are not equipped with the methods and practices to use! Important article.

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