मोदी का आयुष्मान भारत नहीं बचा पाया मुज़्ज़फरपुर के बच्चों को

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उमंग कुमार/

बिहार के मुज़्ज़फरपुर में सौ से अधिक बच्चे दिमागी बुखार से अपनी जान गंवा चुके हैं. इस बीमारी को एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम कहा जा रहा है. विशेषज्ञ कहते हैं कि इनमें अधिकतर बच्चों को बचाया जा सकता था अगर शुरूआती चार घंटे में इन बच्चों को ग्लूकोज चढ़ाया गया रहता. लेकिन देश और राज्य के प्रशासन से इतना भी नहीं हो सका.

टी जैकब जॉन जो सीएमसी, वेल्लोर से रिटायर्ड डॉक्टर हैं और मुजफ्फरपुर के इस जानलेवा बीमारी पर अच्छा ख़ासा अध्ययन किया है. इनके अध्ययन के बाद 2015 में मुजफ्फरपुर जिले के सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों को ग्लूकोमीटर दिया गया था ताकि बीमार बच्चों के आते ही उनका ग्लूकोस स्तर का पता लगाया जा सके. साथ ही इन केन्द्रों पर मौजूद डॉक्टरों को निर्देश दिया गया था कि ऐसे बच्चों के आते ही बिना जांच ही कम से दस प्रतिशत ग्लूकोज चढ़ाया जाना चाहिए. इसी वजह से 2016 और उसके बाद के कुछ सालों तक इस बीमारी पर लगाम लगाई जा सकी.

इस साल शायद यह भी नहीं हो पा रहा है क्योंकि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बदहाल स्थिति में है. न वहाँ समुचित अस्पताल हैं, और न ही डॉक्टर जो बच्चों को तुरंत इलाज कर सकें.

यह वही समय है जब देश के प्रधानमंत्री को सारी स्वास्थ्य समस्याओं का हल बीमा उपलब्ध कराने में दिखता है. प्रधानमंत्री ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान बड़े धूम-धड़ाके के साथ आयुष्मान भारत नाम की एक स्वास्थ्य बीमा की घोषणा की थी जिसमें दस करोड़ से अधिक परिवारों को पांच लाख का बीमा उपलब्ध होना था. प्रधानमंत्री के अनुसार देश की गिरती स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए यह राम बाण जैसा काम करेगा.

मरे हुए 103 बच्चों में से सिर्फ एक को इस आयुष्मान भारत योजना का लाभ मिल पाया है. बाकी के बच्चों का भी इलाज हो ही रहा है और अगर समुचित मात्रा में अस्पताल और डॉक्टर उपलब्ध होते तो सारे बच्चों को बचाया जा सकता था

लेकिन सोचने की बात है कि अभी वह बीमा योजना काम क्यों नहीं कर रही है! क्यों नहीं उस पांच लाख के बीमे से इन बच्चों की जान बचाई गई है? क्या प्रधानमंत्री इन सवालों के जवाब देंगे?

पुख्ता सूत्रों के हवाले से खबर है कि मरे हुए 103 बच्चों में से सिर्फ एक को इस आयुष्मान भारत योजना का लाभ मिल पाया है. बाकी के बच्चों का भी इलाज हो ही रहा है और अगर समुचित मात्रा में अस्पताल और डॉक्टर उपलब्ध होते तो सारे बच्चों को बचाया जा सकता था.

इसके उलट ये नेता येन केन प्रकारेण चाहते हैं कि स्वास्थ्य व्यवस्था निजी हाथों में जाए. और इसके लिए तमाम ऐसी नीतियाँ बनाते रहे हैं जो स्वास्थय में निजीकरण को बढ़ावा देता रहा है. वह चाहे केंद्र सरकार की बीमा नीति हो या राज्य सरकार का स्वास्थ्य सुविधाओं को निजी क्षेत्र को आउटसोर्स करने का निर्णय हो.

देश के नीति-निर्माता गरीब लोगों को निजी अस्पतालों के रहम-ओ-करम पर छोड़ देना चाहते हैं जिसकी ज़रूरी शर्त है कि सरकारी अस्पतालों की स्थिति बद् से बदतर हो और लोग इलाके के लिए निजी अस्पतालों का रुख करें. लेकिन विपरीत स्थिति में यही खस्ताहाल वाले अस्पताल काम आते हैं.

सरकारें जितनी जल्दी ये बातें समझ ले उतना ही अच्छा, नहीं तो बच्चे ऐसे ही मरते रहेंगे और मीडिया से घिरने पर नेता लोग अस्पताल में विस्तर बढाने का बयान देकर आगे बढ़ जायेंगे.

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