क्या नरेन्द्र मोदी की सरकार वाकई महिला हितैषी है? जानिये.

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शिखा कौशिक/

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राजस्थान के अज़मेर में बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार महिलाओं के भले के लिए काम कर रही है और करती रहेगी. उदाहरण के लिए उन्होंने 26 सप्ताह के मातृत्व अवकाश का हवाला दिया जो कि अब निजी क्षेत्र में कार्य कर रही महिलाओं को दिया जा रहा है.

मोदी के महिला-हितैषी होने के इस दावे पर सहसा कई सारे सवाल जेहन में आते हैं. क्या यह सरकार सच में महिलाओं की पक्षधर है! या यह भी तमाम जुमलों की तरह एक चुनावी जुमला भर है!

इसको समझने के लिए हमने महिलाओं को लेकर मोदी सरकार की अबतक की सबसे बड़ी घोषणा को लिया और पड़ताल की कि उस योजना का क्रियान्वन कैसा हो रहा है. जो निकल कर आया वह सरकार के ‘महिला-हितैशी’ होने की दावे की पोल खोलता है.

आप सबको याद होगा 2016 का दिसंबर. देश नोटबंदी से उपजी समस्या से जूझ रहा था. पैसे के लिए लोग एटीएम के सामने लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े रहते थे. कई लोगों के मरने की खबरें आ रही थीं. शादी-ब्याह में व्यवधान आ रहा था. लोगों के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे.

उसी समय देश के प्रधानमंत्री मोदी टीवी पर प्रकट हुए. दिन था 31 दिसम्बर. उन्होंने ढेरों घोषणाएं की जिसमें सबसे प्रमुख था कि अब महिलाओं को गर्भवती होने की स्थिति में सरकार 6,000 रुपये की आर्थिक मदद करेगी. मोदी ने इसकी घोषणा बहुत आत्मविश्वास के साथ महिलाओं का हितैषी बनते हुए की थी.

दो साल से ऊपर हो गए पर अभी भी अधिकतर महिलाओं को यह आर्थिक मदद नहीं मिल पा रही है.

इसकी सबसे प्रमुख वजह रही मोदी सरकार द्वारा कानून में पेंच लगा देना. मोदी ने घोषणा भले 31 दिसम्बर को किया पर उनके कैबिनेट ने इसपर सहमति देने में पांच और महीने लगा दिए यानि मई महीने में जाकर कैबिनेट ने इस योजना को मंजूरी दी.

सरकार ने न केवल देरी की बल्कि खेल भी कर दिया. मोदी के घोषणा के विपरीत जाकर कैबिनेट ने इस आर्थिक मदद को 6,000 रुपये से घटाकर 5,000 रुपये कर दिया. दूसरे, सभी गर्भवती महिलाओं की जगह, इसे पहले बच्चे तक सीमित कर दिया गया.

मतलब ये कि महिला को यह आर्थिक मदद उसके पहले गर्भ पर ही मिलेगी. इसके अतिरिक्त, इस सरकार ने ऐसे ऐसे नियम लगाए कि अधिकतर महिलाएं इस योजना के लाभ से वंचित रह गईं. जैसे कि अगर महिला अपने पहले गर्भ के समय अठारह साल से कम है तो उसे इसका लाभ नहीं मिलेगा. इस योजना के लाभ के लिए अव्वल तो गर्भवती महिला को अस्पताल जाना पड़ेगा और दूसरे बहुत सारे नियम मानने होंगे.

पहले इस पर बात करते हैं कि इस योजना के लाभ को पहले बच्चे तक सीमित करने से क्या हुआ? सरकारी आंकड़े कहते हैं कि देश में एक साल में जितने बच्चे पैदा होते हैं उनमें से महज 43 प्रतिशत ही पहला बच्चा होता है. यानि कि बाकी के 57 प्रतिशत बच्चों और उनकी माताओं  को इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा.

सामान्यतः आजकल ऐसा होता है कि कुछ लोग सरकार के बचाव के लिए अनर्गल तर्क देने लगते हैं इसलिए यहाँ स्पष्ट करना जरुरी है कि यह योजना नरेन्द्र मोदी की नहीं थी जिसको उन्होंने 31 दिसम्बर को अपना बताकर घोषणा की.

बल्कि यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का एक हिस्सा है. इस कानून के तहत देश के हर नागरिक को भोजन पाने का अधिकार है और सरकार इसे उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है. इस नियम के तहत नवजात शिशु का शुरूआती भोजन मां का दूध होता है. नियम से बच्चा छः महीने तक इसी पर निर्भर करता है. ऐसे में यह सरकार की जिम्मेदारी है कि नवजात को उसका भोजन मिले. बच्चे की मां को वो सारी मदद कानून सरकार की जिम्मेदारी है, जिसे बच्चा अपना भोजन पा सके. सामान्यतः कमजोर तबके की महिलायें मजदूरी करने के लिए घर से बाहर निकल जाती हैं और इस तरह बच्चा अपना भोजन नहीं ले पाता है.

इसके लिए कानूनी प्रावधान यह है कि सरकार हर मां को आर्थिक मदद करे ताकि वह भोजन इत्यादि की जरुरत पर काम करने के लिए मजबूर न हो. अपने बच्चे को छः महीना समय दे सके.

संसद ने यह कानून वर्ष 2013 में बनाया और उसके अगले साल नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए. लेकिन यह कानून लागू नहीं हुआ. देश का सर्वोच्च न्यायालय सरकार को फटकार लगाता रहा और और यह सरकार इसे लागू करने में देरी करती रही.

इसी योजना को अपना बताकर मोदी ने नोटबंदी के समय नई घोषणा कर दी. खैर, अपना बताकर लागू करने के बावजूद भी सरकार ने पूरी कोशिश की है कि महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिले और महिलाएं बड़ी संख्या में इस सुविधा से वंचित रह जाएँ.

पहले बच्चे के थोपे गए नियम का सबसे अधिक प्रभाव गरीब राज्यों में वंचित समुदाय पर हो रहा है

इस योजना के फायदे पर सरकार के पहले बच्चे के थोपे गए नियम का सबसे अधिक प्रभाव गरीब राज्यों में वंचित समुदाय पर हो रहा है. वजह है वहां का अधिक प्रजनन दर. जैसे बिहार में करीब 66 प्रतिशत गर्भवती महिलायें इस योजना का लाभ नहीं ले पातीं क्योंकि वहाँ पहले बच्चे का अनुपात और कम है. उत्तर प्रदेश में इस योजना का लाभ नहीं पाने वाली महिलाओं का प्रतिशत 55 है.

अब अगर गरीब महिला को दो या दो से अधिक बच्चे हो रहे हैं उसकी सजा महिला को मिल रही है जबकि यह निर्णय परिवार और पति का होता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के गर्भ पर उनका नियंत्रण नहीं है. खासकर भारतीय समुदाय में यह परिवार, और खासकर पति का निर्णय होता है. ऐसे में परिवार की गलती की सजा महिला को देने का कोइ तुक नहीं बनता.

इसी तरह बाल विवाह की भी बात है. इस योजना का लाभ उन महिलाओं को नहीं मिलता जो 18 साल से पहले गर्भवती हो जाती हैं. यह कोई भी बता सकता है कि लड़की अपनी इच्छा से बाल विवाह नहीं करती. यह उसपर थोपा जाता है. उस लड़की को तरह-तरह से इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. शरीर के पूरी तरह तैयार नहीं होने पर भी बच्चा पैदा करना होता है जिससे उसे तरह तरह की बीमारियाँ होती हैं. ऐसे में सरकार ने भी उन महिलाओं को अपनी योजना के लाभ से वंचित कर एक और सजा दी है.

इक्कसवीं सदी में भी भारत में हर साल करीब 15 लाख लडकियां 18 साल की उम्र से पहले ब्याह दी जाती हैं और इसकी तो वे तो कत्तई दोषी नहीं हैं. उनका परिवार दोषी है, समाज दोषी है पर यह सरकार इस बाल विवाह की सजा इन लड़कियों को दे रही है.

इसके बाद यह दावा कि ‘सरकार महिलाओं की हितैषी है’ एक भद्दे मजाक जैसा लगता है.

(तस्वीर इन्टरनेट से साभार)

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