कैंसर देकर अब ‘कैंसर कवर’ लाई है LIC

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उमंग कुमार/

यह दर्द देकर दवा बेचने का मामला है. मतलब पहले बीमार करो और फिर उन्हें कहो कि इस बीमारी की दवा मेरे पास है. ऐसा करने वाला कोई और नहीं बल्कि अपने देश की सरकार से सम्बंधित एक बीमा कंपनी है.

भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC), भारत सरकार से सम्बंधित यह कंपनी करीब दो महीने पहले यानि नवम्बर में कैंसर से जूझ रहे लोगों की आर्थिक मदद के लिए एक पालिसी लेकर आई है. कंपनी ने घोषणा की कि कैंसर के इलाज के लिए यह एक पालिसी ला रही है जिसमें बीमा कराने वाले को 10 लाख से 50 लाख रुपये तक की मदद मिलेगी. LIC की यह ‘कैंसर कवर’ पालिसी 20 से 65 तक के उम्र के लोग ले सकेंगे.

दूसरी तरफ इस बीमा कंपनी ने तम्बाकू बेचने वाली बड़ी कम्पनियों में सबसे अधिक पैसा भी लगा रखा है.  इसके इस कदम पर कुछ लोगों ने न्यायालय में याचिका भी दायर कर रखी है. लेकिन यह तब का मामला है जब इस कंपनी ने कैंसर के इलाज के नाम पर कोई पालिसी बाज़ार में नहीं उतारी थी.

इस बीमा कंपनी ने तम्बाकू बेचने वाली बड़ी कम्पनियों में सबसे अधिक पैसा भी लगा रखा है.  इसके इस कदम पर कुछ लोगों ने न्यायालय में याचिका भी दायर कर रखी है

इसको समझने के लिए पहले यह समझें कि कैंसर आज के समय में सबसे खतरनाक रोग बनकर उभरा है और बड़े पैमाने पर लोगों को अपने चपेट में ले रहा है. और भारतीय पुरुषों में सबसे अधिक कैंसर मुंह से सम्बंधित होता है. यह भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद (ICMR) की 2016 में आई रिपोर्ट से पता चलता है. इस मुंह के कैंसर की सबसे बड़ी वजह है, तम्बाकू का सेवन. ICMR की यह रिपोर्ट बताती है कि भारत में होने वाले कुल कैंसर का 30 प्रतिशत तम्बाकू की वजह से होता है.

लेकिन दुखद यह है कि जीवन बचाने और संभालने के नाम पर अपना बाज़ार खड़ा करने वाली कंपनियों ने भी तम्बाकू बनाने वाली कंपनियों में निवेश कर रखा है. और यह कोई और नहीं बल्कि LIC है.

पिछले साल यानी 2017 के अप्रैल महीने में मुम्बई हाईकोर्ट ने एक याचिका स्वीकार की. इस याचिका को दाखिल करने वालों में टाटा ट्रस्ट से जुड़े लोग शामिल हैं, कैंसर की वजह से विधवा हुई महिलायें हैं, तीन डॉक्टर और भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक भी शामिल हैं. इस याचिका में मांग भी यही की गयी है कि एक सरकारी कंपनी को तम्बाकू जैसी चीजों में निवेश करने से रोका जाए.

इस मामले की शुरुआत वर्ष 2011 में होती है जब टाटा मेमोरियल अस्पताल से जुड़े पंकज चतुर्वेदी ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत कुछ जानकारियाँ इकठ्ठा कीं. जो जवाब मिला वह बहुत चौंकाने वाला था. अपने मरीजों में कैंसर के वीभत्स रूप को देख चुके चतुर्वेदी ने जवाब माँगा था कि LIC ने तम्बाकू बनाने वाली किन-किन कंपनियों में पैसा निवेश कर रखा है.

जवाब में पता चला कि इसने न केवल मशहूर कंपनी ITC बल्कि VST इंडस्ट्रीज जो चारमिनार सिगरेट बनाती है और साथ ही धरमपाल सत्यपाल लिमिटेड जिसे सामान्यतः बाबा च्युइंग कंपनी भी कहते हैं, में भी निवेश कर रखा है. अलबत्ता ITC अब बहुत सारी चीजें बनाने लगी हैं पर याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय को बताया है कि इस कंपनी का मुख्य यानि 85 प्रतिशत फायदा अभी भी सिगरेट से ही है.

इन्होंने यह भी पूछा था कि क्या LIC धूम्रपान करने वालों से ज्यादा ज्यादा प्रीमियम वसूलती है तो कंपनी ने स्वीकार किया था कि हाँ कुछ मामलों में ऐसा होता है.

अलबत्ता ITC अब बहुत सारी चीजें बनाने लगी हैं पर याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय को बताया है कि इस कंपनी का मुख्य यानि 85 प्रतिशत फायदा अभी भी सिगरेट से ही है

यह किसी भी भारतीय नागरिक के लिए चौंकाने वाला मामला है कि एक तरफ तो भारत सरकार धूम्रपान रोकने पर हजारों करोड़ रुपये हर साल खर्च कर रही है. दूसरी तरफ उसी की एक कंपनी ऐसी कंपनियों में निवेश करती है जिनका मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को धूम्रपान कराना है.

और अब उसके बाद एक और खेल, कि यही कंपनी आपको कैंसर का डर दिखाकर अपनी पालिसी बेचे. यह कहते हुए कि अगर आप कैंसर से पीड़ित हो गए तो या भविष्य में ऐसे किसी खतरे से निपटने के लिए यह पालिसी खरीदिये.

पाकिस्तानी शायर अहमद फ़राज़ की ये पंक्तियाँ कि ‘मेरा इलाज मेरे चारागर के पास नहीं’ यहाँ सटीक हैं. जब देश कैंसर जैसी घातक बीमारी के खौफ में जी रहा है और हमारे आस-पास हर एक दो महीने में किसी न किसी के इस बीमारी से पीड़ित होने की खबर आ रही है तब भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) ऐसे लोगों के लिए चारागर की भूमिका में उपस्थित होता है और जाहिर है कि किसी बीमारी के लिए बीमा करा लेना उस बीमारी से मुक्त होने का सबसे बेहतर तरीका तो नहीं ही है.

 

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