अचानक क्यों बढ़ने लगी है देश में कुष्ठ रोगियों की संख्या?

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शिखा कौशिक/

लगभग डेढ़ दशक पहले ही भारत से कुष्ठ रोग के ख़त्म होने की घोषणा हो चुकी थी पर हाल में यह बीमारी फिर बहुत तेजी से उभरी है और किसी एक राज्य में नहीं बल्कि कई राज्यों में इसके मामले आ रहे हैं.  सबसे अधिक नए कुष्ठ रोग के मामले भारत में ही पाए जाते हैं. इसके बाद ब्राजील और इंडोनेशिया का नंबर आता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, हर साल 2,00,000 से अधिक कुष्ठ रोगियों का पता चलता है और इनमे आधे से अधिक भारत में पाए जाते हैं.

पिछले दो-ढाई वर्षों में आए नए मामलों में से 60 प्रतिशत से अधिक भारत में पाए गए हैं. एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, केवल 2017 में 13,485 नए कुष्ठ रोगियों का पता चला. यह आंकड़ा केंद्रीय कुष्ठ रोग प्रभाग ने जारी किया जो केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आता है.

अचानक से आई इस समस्या से निपटने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय अन्य संस्थानों के साथ मिलकर नई नीति बनाने की बात कर रहा है.

पर कोई भी नई नीति बनाने के पहले यह समझना होगा कि हमारे पुराने प्रयास जो इस बीमारी को मिटाने के लिए किये जा रहे थे उनमे कहाँ चूँक हुई.

पिछले दो-ढाई वर्षों में आए नए मामलों में से 60 प्रतिशत से अधिक भारत में पाए गए हैं. एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, केवल 2017 में 13,485 नए कुष्ठ रोगियों का पता चला

इसकी शुरुआत 2005 के बाद हुई जब कुष्ठ रोग के भारत से ख़त्म होने की घोषणा कर दी गई. इसके बाद भी नए मामले आते रहे. दरअसल, नेशनल लेप्रोसी एलिमिनेशन प्रोग्राम (NLEP) और ग्लोबल लेप्रोसी प्रोग्राम में बड़े बदलाव के कारण नए मामले बढ़े  क्योंकि उन्हें खोजने के हमारे प्रयास और पुख्ता हुए. इन कार्यक्रमों के तहत किए गए प्रयासों से बच्चों में पनप रहे कुष्ठ रोग सामने आने लगे और कई अन्य तरह के भी मामले सामने आने लगे. इसके पीछे वजह यह थी कई मामले की पहचान देर से होती थी.

भारत में कुष्ठ उन्मूलन की घोषणा के बाद, कुष्ठ नियंत्रण कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन में स्थानांतरित कर दिया गया. महानिदेशक कुष्ठ रोग (भारत) ने भी वर्ष 2016 में कुछ खतरनाक रुझानों की ओर ध्यान आकर्षित किया. उन्होंने कुछ ऐसे इलाकों को चिन्हित किया था जहां बड़े पैमाने पर बीमारी फ़ैल रही थी. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने भी एक अध्ययन में पाया कि कुछ मामले अभी भी छिपे हुए हैं और इस बीमारी से प्रभावित लोग शर्म से बाहर नहीं आना चाहते हैं.

इसके अलावा, नए मामलों के संज्ञान में आने का दर अभी भी 2005 की तुलना में समान ही है. यह भी पाया गया है कि निदान में देरी के कारण नए मामलों में विकलांगता दर बढ़ रही है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने महसूस किया कि घटना की तीव्रता की तुलना में कुष्ठ कार्यक्रमों ने नए मामले पहचाने की क्षमता लगभग समाप्त हो चुकी थी.

छिपे हुए मामलों का प्रमुख कारण जागरूकता की कमी के साथ-साथ सामाजिक शर्म और भेदभाव भी मुख्य कारण हैं. कलंक और भेदभाव की सीमा को इस बात से समझा जा सकता है कि लगभग 750 कुष्ठ कॉलोनियों में 2,00,000 लोग निवास कर रहे हैं.

सरकार को यह समझना होगा कि बिना इन तथ्यों को समझे कोई भी नई नीति, सदियों से चली आ रही इस समस्या का समाधान नहीं कर सकेगी.

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