आपने कभी सोचा है कि कंडोम को हिंदी में निरोध क्यों कहते हैं

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उमंग कुमार/

आपने कभी सोचा है कि कंडोम को हिंदी में निरोध क्यों कहते हैं. निरोध से जुड़े ऐसे तमाम दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य हैं जो परिवार नियोजन के इस तरीके की ऐतिहासिक यात्रा को बयाँ करते हैं.

इसकी कहानी शुरू होती है वर्ष 1963 से, जब सरकार ने लोगों के बीच निरोध या कहें कंडोम को सस्ते दरों पर उपलब्ध कराने की शुरुआत की. उस समय सबसे पहली और बड़ी चुनौती यही थी कि इसका नाम क्या हो. कामराज पर सहमति  बनती दिख रही थी. भारतीय संस्कृति में कामराज को प्रेम का देवता माना जाता है. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. मुश्किल यह थी कि उस समय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे के कामराज. सो यह नाम नहीं रखा जा सकता.

फिर दोबारा नाम की तलाश शुरू हुई. आईआईएम के एक छात्र ने तब निरोध नाम सुझाया और इस तरह भारतीय परिवार नियोजन कार्यक्रम की आधारशिला रखी गयी. यद्यपि आज भारत में महज पांच प्रतिशत युगल ही अपने परिवार नियोजन के लिए इस निरोध का इस्तेमाल करते हैं लेकिन यहाँ तक पहुँचने में भी कई लोगों की अहम भूमिका रही है.

भारत में निरोध का इतिहास बहुत पुराना है. चालीस के दशक में भी भारत में कंडोम मौजूद था पर इसकी कीमत कुछ इतनी थी कि सिर्फ अमीर लोग ही इसको इस्तेमाल कर सकते थे

इसी कड़ी में एक अधिकारी हुए थे एस कृष्ण कुमार जो बाद में केंद्र में मंत्री भी बने. बतौर अधिकारी, कुमार ने सत्तर के दशक में केरल में एक ऐसा अभियान चलाया कि उनका नाम ही निरोध कुमार (उपनाम) रख दिया गया. तब वह एर्नाकुलम जिले के कलक्टर हुआ करते थे.

Credit: Wellcome Library, London. Wellcome Images

भारत में निरोध का इतिहास बहुत पुराना है. चालीस के दशक में भी भारत में कंडोम मौजूद था पर इसकी कीमत कुछ इतनी थी कि सिर्फ अमीर लोग ही इसको इस्तेमाल कर सकते थे. साठ के दशक में जब भारत की जनसँख्या 47 करोड़ के आसपास थी और देश को जनसँख्या विस्फोट की भनक हो चुकी थी तब यह तय हुआ कि सरकार इसको सस्ते दामों पर उपलब्ध कराएगी.  उस समय भारत सरकार ने इसके लिए साढ़े पांच करोड़ के करीब राशि भी उपलब्ध कराई थी.

उस समय एक कंडोम की कीमत करीब 25 पैसे हुआ करती थी और भारत सरकार ने इसे पांच पैसे में उपलब्ध कराने का निर्णय लिया.

अब बात इसके प्रचार प्रसार की थी जिसके लिए सरकार ने कई अन्तराष्ट्रीय संस्थाओं से मदद मांगी जिसमें कई बड़े बड़े एनजीओ शामिल हुए.

वर्ष 1968 में भारत सरकार ने अमेरिका, जापान और कोरिया से करीब 40 करोड़ निरोध मंगाने का फैसला किया. शुरूआती कुछ सालों तक 75 प्रतिशत निरोध ऐसे ही पड़े रहे.

भारत में पहली बार 1969 में हिंदुस्तान लाटेकस लिमिटेड (HLL) के नाम से फैक्ट्री स्थापित हुई जिसे निरोध बनाना था. यह फैक्ट्री तिरुवंतपुरम में शुरू हुई जिसका सालाना लक्ष्य करीब 14.4 करोड़ निरोध बनाने का था. सात साल में करीब दोगुना निरोध बनने लगा. लेकिन भारत की जनसँख्या कहाँ रुकने वाली थी. इसी बीच आपातकाल और संजय गाँधी वाला जबरन नसबंदी का दौर गुजर चुका था. तब कर्नाटक के बेलगाम में दूसरी फैक्ट्री की स्थापना हुई.

वर्ष 1968 में भारत सरकार ने अमेरिका, जापान और कोरिया से करीब 40 करोड़ निरोध मंगाने का फैसला किया. शुरूआती कुछ सालों तक 75 प्रतिशत निरोध ऐसे ही पड़े रहे

जब सरकार निरोध के इस्तेमाल को बढ़ावा परिवार नियोजन को ध्यान में रखकर कर रही थी उसी समय मद्रास जो कि अब चेन्नई हो चुका है की एक महिला भारत की पहली एड्स के मरीज के बतौर खोजी गयी. तब तक इस बीमारी से निश्चिंत भारत के होश उड़ गए. उसके बाद सरकार ने निरोध को प्रोत्साहन न केवल परिवार नियोजन बल्कि एड्स के नियंत्रण के लिए भी करने का फैसला ले लिया.

सरकार के इस पूरे प्रयास में सबसे बड़ी बाधा रही लोगों के बीच जागरूकता की कमी. आज की तरह टीवी और रेडियो घर-घर में उपलब्ध नहीं थे. खैर जबसे निजी कम्पनियां इस क्षेत्र में शामिल हुईं, तबसे देश में इसको लेकर लोगों की समझ में इजाफा हुआ.

अब  वही एचएलएल नए रूप में एचएलएल लाइफ केयर में तब्दील होकर  निरोध बनाने वाली दुनिया की कुछ गिनी-चुनी कंपनियों में शामिल है जो बहुत बड़े पैमाने पर निरोध तैयार करती है. निरोध का उत्पादन भले बढ़ता चला गया पर उसके साथ देश की जनसँख्या भी बढती चली गयी.

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