खारिज किया हुआ मोटा अनाज सुपरफ़ूड बनकर आया सामने

0

उमंग कुमार/

इसे ही कहते हैं कभी गाड़ी नाव पर तो कभी नाव गाड़ी पर. जिस मोटे अनाज को भारतीय समाज ने गरीबों का भोजन कहकर त्याग दिया था आज वही हमसब के स्वास्थ्य और किसानों को जलवायु परिवर्तन से बचाने के विकल्प के रूप में उभर रहा है.

जी हाँ. इसे अंग्रेजी में एक मुश्त मिलेट कहकर काम चला लेते हैं तो हिंदी में यह कई रूप में मौजूद है. बाजरा, जौ, जुआर, कोदो, रागी, कुटकी, सांवा इत्यादि के रूप में मौजूद है. ये भोज्य पदार्थ भारत के पारंपरिक खान-पान का हिस्सा रहे हैं लेकिन जब से हरित क्रांति का दौर आया लोग सब कुछ छोड़कर गेंहू (आटा) और धान (चावल) की खेती में लग गए और इन पारंपरिक भोज्य पदार्थों को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा.

आज आलम यह है कि अगर आप दिल्ली के बाज़ारों में सौ ग्राम भुना बाजरा खरीदते हैं तो आपको चालीस से पचास रूपया देना पड़ता है. दूसरी तरफ सरकार जिसने कभी हरित क्रान्ति को बढ़-चढ़कर आगे बढ़ाया था आज विश्व समुदाय से मिलेट वर्ष मनाने का आग्रह कर रही है.

केन्‍द्रीय कृषि और किसान कल्‍याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने बृहस्पतिवार को संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन के महानिदेशक जोस गाजियानो डी सिल्वा को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि आगामी वर्ष को अंतर्राष्ट्रीय मिलेट वर्ष के रूप में मनाया जाए.

विश्व स्वास्थय संगठन के हालिया रिपोर्ट के अनुसार हो रही कुल मौत में 75 प्रतिशत असंक्रामक बीमारियों की वजह से हो रहीं हैं

उन्होंने आगे लिखा है कि उच्च पोषक तत्वों के साथ-साथ जीवनशैली से जुड़े रोगों में इनके लाभ, जलवायु परिवर्तन के प्रति इनकी अनुकूलन क्षमता और छोटे और सीमांत किसानों के लिए जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से कुशल जोखिम प्रबंधन आदि विशेषताओं को देखते हुए, भारत 2018 को “राष्ट्रीय मिलेट वर्ष” के रूप में मना रहा है। साथ ही जो क्षेत्र विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के लिए अतिसंवेदनशील हैं, उन क्षेत्रों में फसल चक्र में संशोधन करके खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है.

इन मोटे अनाजों को ना केवल स्वास्थय के लिए लाभदायक माना जा रहा है बल्कि सरकार इसे जलवायु परिवर्तन से हो रहे कृषि की दिक्कतों से निपटने के लिए बढ़ावा दे रही है.

इस जलवायु परिवर्तन ने मौसम-चक्र को बदल दिया है. कभी सूखा, तो कभी बाढ़ किसानों का जीना मुहाल किये हुए हैं. ऐसे में कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि मिलेट की फसल सबसे सही है. इसे 350 मिमी की वर्ष में भी उगाया जा सकता है और एक किसान एक फसल 70 से 100 दिन के अन्दर काट सकता है. ऐसे में जलवायु परिवर्तन के बुरे असर के बावजूद भी किसान अपने और मवेशियों के लिए भोजन की तो व्यवस्था कर ही सकता है.

इससे भी महत्वपूर्ण है भारतीय समाज के लोगों का बिगड़ता स्वास्थय. विश्व स्वास्थय संगठन के हालिया रिपोर्ट के अनुसार हो रही कुल मौत में 75 प्रतिशत असंक्रामक बीमारियों की वजह से हो रहीं हैं. और इन बीमारियों को जीवनशैली के थोड़े बहुत बदलाव के साथ रोक जा सकता है. इस बदलाव में भोजन भी शामिल है.

दरकिनार कर दिए गए इन मोटे अनाज को अब सुपर फ़ूड कहकर आगे बढ़ाया जा रहा है जिसमें शरीर के लिए सभी जरुरी पोषक तत्व पाए जाते हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here