आयुष्मान भारत: सरकार की ऐसी तैयारी कि सौ दिन के भीतर ही उच्चस्थ संस्था हुई भंग

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उमंग कुमार/

ऐसा ही होता है जब सरकारें उचित तैयारी किये बिना ही किसी योजना की शुरुआत कर देती हैं, जैसे प्रधानमंत्री-जन आरोग्‍य योजना (पीएमजेएवाई) या कहें आयुष्मान भारत के साथ हो रहा है. जिस योजना को सरकार ने ढिंढोरा पीटते हुए बमुश्किल सौ दिन पहले शुरु किया था, अब उसी योजना के क्रियान्वयन के लिए बनी उच्चस्थ संस्था को ही भंग करना पड़ रहा है. अब सरकार ने नई संस्था को मंजूरी दी है.

बुधवार को हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल के बैठक में सरकार ने राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य एजेंसी को समाप्त करने का निर्णय लिया. इसकी जगह अब राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य प्राधिकरण का गठन किया जायेगा जो इस योजना के क्रियान्वयन की देख-रेख करेगा. इस बैठक की अध्यक्षता देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कर रहे थे.

मंत्रिमंडल की इस मंजूरी के साथ राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य एजेंसी भंग कर दी गई है और इसके स्‍थान पर परिवार और कल्‍याण मंत्रालय से संबद्ध कार्यालय के रूप में राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य प्राधिकरण बनाया गया है.

वैसे तो सरकार इसके पक्ष में ढेर सारे तर्क दे रही है, जैसे – इस निर्णय से वर्तमान बहुस्‍तरीय ढांचे के स्‍थान पर गवर्निंग बोर्ड होगा. गवर्निंग बोर्ड योजना को सुगम्‍य तरीके से लागू करने के लिए आवश्‍यक गति से निर्णय लेने में सहायक होगा इत्यादि. लेकिन क्या इसे सरकार के दूरदृष्टि की कमी नहीं कहा जाएगा कि योजना के शुरूआती सौ दिन के अन्दर ही इसके क्रियान्वयन करने वाली संस्था को ही भंग करने की नौबत आ गयी.

तमाम विशेषज्ञ यह मानते हैं कि सरकार के पास 2019 में लोगों को दिखाने के लिए कुछ ख़ास नहीं था और इसलिए आनन-फानन में इसने अपने आखिरी बड़े बजट में इस योजना की घोषणा कर दी. चूंकि समय कम था  और चुनाव काफी पास था, इसलिए सरकार को हड़बड़ी में इसकी शुरुआत करनी पड़ी.

सनद रहे कि जब यह योजना शुरू हुई थी तभी कई सारे राज्य और स्वास्थ्य पर काम रहे विशेषज्ञों ने सरकार पर आरोप लगाया था कि सरकार बिना तैयारी के यह योजना ला रही है. सौतुक से बात करते हुए केरल के एक अधिकारी ने स्पष्ट कहा था कि जब इतनी बड़ी योजना लाई जा रही है और केंद्र सरकार, राज्यों से यह उम्मीद कर रही है कि इस योजना में भागीदारी करे तो क्या यह उचित नहीं होता कि इस योजना को शुरू करने के पहले स्वास्थय बीमा के मौजूदा मॉडल का अध्ययन किया गया रहता. याद रहे कि केरल, तमिलनाडू, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक जैसे कुछ राज्य हैं जहां पहले से ही सफल स्वास्थ्य बीमा योजनायें काम कर रही हैं. इन योजनाओं की भी कुछ कमियाँ हैं, जो शायद सही अध्ययन करने के बाद आयुष्मान भारत के सुचारू रूप से चलने में मदद करती. पर केंद्र सरकार ने किसी से राय मशविरा करने की ज़रूरत नहीं समझी.

नाम न बताने की शर्त पर केरल के उस अधिकारी ने कहा था कि सरकार के पास न तो पैसा है और न ही अध्ययन. ऐसे में देश की इतनी बड़ी आबादी को स्वास्थ्य बीमा का वादा करना एक मजाक है. लेकिन मोदी सरकार बार-बार अपनी इस योजना को सफल बताती रही. यहाँ तक कि मंगलवार को एएनआई को दिए अपने साक्षात्कार में भी प्रधानमंत्री ने इस ‘सफल’ योजना का जिक्र किया. जबकि आलम यह है कि अभी भी निजी अस्पताल इस योजना में शामिल नहीं हो रहे हैं. सरकार सरकारी अस्पतालों में प्रसव के लिए भी पैसा दे रही है. जबकि इस योजना के पहले सरकारी अस्पतालों में वैसे भी प्रसव इत्यादि का खर्चा नहीं लगता था.

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