युवा कवि अंचित की कविताएँ

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अंचित अभी छात्र हैं और बीते दिनों मार्केस के अजर-अमर पात्रों पर लिखीं इनकी कविताओं ने सबका ध्यान खींचा था।  इनकी कविताएँ विश्वास जगाती हैं। सौतुक इस युवा कवि से उनके मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।

अंचित

लोर्का को याद करते हुए

सुबह पांच बजे
नीरवता लिए घूम रहा है जाड़ा.
जड़ है सब जो नज़र की ज़द में है.

सुबह पांच बजे
रात का कालापन अभी तक घटा नहीं
बिना चाँद का आसमान बिन अलाव
सिहर रहा है ख़ामोशी से.

सुबह पांच बजे
कोई धीमे धीमे बजा रहा है मंदिर की घंटियाँ.
वो बूढा मजदूर करता है शिव नाम जाप.

सुबह पांच बजे
सबसे अँधेरे समय में मैं सपना देख रहा हूँ.
चौराहे खा रहे हैं भवन और चौराहों को पी रही हैं गलियाँ.

मुझे याद आ रहे हैं
उस आदमी के ठहाके जो कहता है मुझसे
“मूर्तियों ने क्या किया. लोग ले डूबे.”

सुबह पांच बजे
मुझे चूमती हुई लड़की के होठ याद आ रहे हैं.
वो जा चुकी है मुझे छोड़ कर ऐसे
जैसे लोग घरों के बाहर कपड़े डाल कर भूल जाते हैं.

मैंने उँगलियों के कोने टिकाई हुई है
डिब्बे की आखिरी सिगरेट,
राख धीमे धीमे गिर रही है फर्श पर.

सुबह पांच बजे
सुबह के पांच बजे हैं
और पांच बजना वैसे ही है
जैसे छह बजना, सात बजना, आठ बजना
किसी भी दिन.किसी भी साल.

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अर्ध-विराम

मैं तुमसे इतना दूर आ गया हूँ
कि तुम्हारा नाम भूल गया हूँ,
बहुत अस्पष्ट सा ही तुम्हारा चेहरा याद है,
बहुत अस्फुट ही तुम्हारी आवाज़ याद कर पाता हूँ,
तुम चलती थी जैसे, उसका
एक बहुत हल्का ख़ाका ही मेरे पास बचा है
तुम जैसे कोई अजानी चीज़ हो गयी हो.

मेरे पास तुम जितनी बची हो,
उसमें से बहुत कुछ मैं अपने लिए
कभी चाहता ही नहीं था.

मुझे तुमसे पहचानते हैं लोग हर जगह,इतना
कि मेरा एकांत खो गया है,
वह जगह खो गयी है, जहाँ मुझे याद था कि
प्रेम करते हुए तुम क्या फुसफुसाती थी
मेरे होंठ काटने से पहले.

मैंने ऐसा क्या किया कि मैं तुम्हारी
हिंसा से भी दूर हो गया.

कभी कभी लगता है,
मेरा देश-निकाला पूर्व-निर्धारित था.
कौन अपने मन से छोड़ता है अपने प्रेम का घर.

भटकाव की ओर चला
मैं पहला कहाँ था जिसने मुड़ कर नहीं देखा.अपने घुटने ज़ख़्मी किए धूल फाँकते
पहाड़ तोड़ते, कीचड़ में तलवे सानते हुए –

मैं भी मारा जाऊँगा अपने भुलावों में उलझा हुआ.
जो  चाहिए था वह मिला ही नहीं कभी,
उसकी एक छाया भर है जो सिर्फ़ बेचैन करती है.

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और प्यार

तुम दूर ही रहती हो बारिश की तरह.
उमस का मौसम है ,मुझे समंदर याद आ रहे हैं,
उतने ही, जितना तुम्हारी ठंडी उँगलियाँ
याद आती हैं हर समय.

क्योंकि मैं अकेला हूँ
हर परिंदा ठुकराया हुआ होगा
और घर की ओर रेलगाड़ियाँ चल चुकी होंगी
और ख़ाली टिफ़िन उठा लिए होंगे मज़दूरों ने
और तफ़री करते हुए एक नौजवान लफ़ंगे ने एक
छत तलाश ली होगी, क्योंकि कहानियों में
एक लड़की, जब से छतें हैं, तब से मुस्कुराती है.

और क्या क्या होता है?मैं सोचता हूँ –
अमूमन तुम साथ होती हो, एक जलती हुई
फिर भी ठंडी लगती हुई सिगरेट, जहाज़ होता है
एक बोतल में बंद, और उसी में हम दोनों एक रेस
लगाते होते हैं. तुम्हारे साथ कुएँ की मुँडेर पर लगा
पत्थर हो जाता हूँ- भीतर तक नम, रोज़ निखरता हुआ.

यह समय जो है, तुमसे बार बार एक ही बात कहने का है,
कि जैसे जैसे और उमरदार हो रही है ज़मीन, उसके पेड़
घटते जा रहे है. जो यह समय है जब बीत जाएगा,
सूरज बुझ जाएगा और कुछ नज़र नहीं आएगा.

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हरिसभा,पटना का एक बहुत पुराना मंदिर था. मंदिर के साथ बने अहाते में कई पेड़ थे और हेरिटेज की दृष्टि से दो सौ साल पुराना मंदिर बहुत महत्वपूर्ण था. अहाते में एक ज़माने में कई साहित्यकार जुटे रहते. रामकृष्ण पांडेय, अरुण कमल, आलोक धनवा, हृशिकेश सुलभ जैसे लोग. पिछले कुछ दिनों में इस अहाते और मंदिर के ढाँचे के नब्बे प्रतिशत हिस्से को ध्वस्त कर वहाँ एक व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स बना दिया गया. विश्वजीत सेन ने हरिसभा पर एक लम्बी कविता बांग्ला में लिखी थी. कवि का जीवन भी इसी के आसपास बीता है.

1

नयी चारदीवारी के पास
पुराने दुकानदार आकर जम गए
यंत्रवत.

पुराने का जो भी अवशेष बचा है,
सब गहरे माँस में गड़ा हुआ.

दुःख कि ईंट उठता-रखता दिन भर मज़दूरी करता.
सुख कि रुकता क्षण भर फिर आगे बढ़ जाता.

ऐसे जीवन बीत रहा है,
जैसे जीवन बीत रहा था.

2

ज़मीन तो ज़मीन थी,
ईश्वर तो हमेशा क़ब्ज़े में
ही रहा है.

कुछ ग्लानि भीतर जमी,
समय बीता पिघल गयी.

जो खोया, भले ही खो गया
याद आता रहा, अविश्वास की तरह

जितनी बार तेज़ हँसे उसके बाद,
एक एक टूटा पत्ता जाने कहाँ से पुकारता रहा.

3

इतना ही हुआ इतने दिनों में, हम भूल गए
नाम फूलों के, बनाई कंदीलों के,
बूढ़ों के.

एक आधा दीवारें हार जाते थे हर साल
सिर्फ़ दीवारें बचीं अचानक एक साल.

हमारी स्मृति में इतनी जगहें बन गयीं,
उल्लू भी बसने लगे वहाँ.

और ख़ून भी बहा इतनी दूर, अपनी
मिट्टी तक नहीं मिल पायी.

4

कई हाथ थे जिन्होंने छुआ था चेहरे को, खो गए
कई आवाज़ें थीं जिनको आदत की तरह जानते थे,
खो गयीं.

दूब उगती थी मैदान के एक कोने में, मैदान ही नहीं रहा.
इतनी हिंसा बीती हृदय पर, आत्मा छलनी हो गयी.

कितनी जल्दी बीत गया समय.
कितना समय हो गया और अभी भी उतना ही गहरा है ज़ख़्म.

भीड़ थी जहाँ, वहाँ सुनसान है
जहाँ भींग जाते थे बारिश में, वहाँ अब रसोई है.

5

भागता रहा कितने दिन, भागता रहा और उसी जगह
धँसा रहा ज़मीन में, और फिर भी साँस  चलती रही,
बस बोझ बढ़ता गया.

दिमाग़ बार बार लौटता था उजाड़ से शहर की ओर
सपने बार बार चले जाते थे बेपरवाह नदियों की तरफ़

जानता था धँसा हूँ, फिर भी गिरता जाता था बिना थमे,
सब जानी पहचानी कीलें उखाड़ दी गयीं दीवार से.

दिल था जो मेरे भीतर खो गया जाने कहाँ
उसकी आँखों में सैकड़ों समंदर रोज़ पैदा होते थे.

6

बदल जाता है सब आख़िरकार,
खो जाते हैं लोग, पुरानी कहानियों
में यही था लिखा हुआ.

एक बरगद था कहीं, एक ख़ून की बूँद,
छिटकी कहीं से, जीवन शुरू हुआ, चिड़ियों

के घोंसले थे वहाँ और तब तक चलता रहा जीवन
जब तक एक चिड़िया उड़ ना गयी किसी दिन.

मई पटी रहती थी जामुनों से, जीवन से
उसी महीने उजाड़ शुरू हुआ और आकर बस गया वहीँ

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