वीरू सोनकर की कहानी: उत्तरापेक्षी

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पाब्लो पिकासो के मशहूर पेंटिंग 'गर्ल बिफोर अ मिरर'

 

वीरू सोनकर युवा पीढ़ी के प्रतिबद्ध कवि-लेखकों  में शुमार हैं. इनकी कवितायें कई पत्रिकारों और वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुकी हैं. 

वीरू सोनकर (तस्वीर जानकी पुल वेबसाइट से साभार)

बड़े-बूढ़े यह बताते रहे हैं कि एक सी शक्ल वाले कम से कम सौ लोग एक ही समय पर इस धरती के अलग-अलग हिस्सों में घूमते-फिरते हैं. ऐसे में यह जानना कितना हैरतअंगेज है कि अलग-अलग भाषा मे एक ही शक्ल वाले लोग अपनी अलग- अलग चाहनाओ के साथ किसी उधेड़बुन में यहाँ वहाँ घूम रहे हैं. ऊब के कुएं में डूबे हुए रात-दिन, सोने-जागने और हँसने-रोने को अभिशप्त यह लोग एक साथ नहीं मरेंगे. इनकी हत्या एकदूसरे के हाथों नहीं लिखी हुई है. पर नियति? उसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है. वह कुछ अलग काम करती है. वह उनके मिलने की ‘एक जगह’ तय करती है.

***

– उसे कब से जानते हो ?

– पता नही, पर बहुत पहले से, उस जगह से जहाँ से स्मृति मुझे मेरे बारे में बताना शुरू करती है वहाँ से।

– तो फिर तुम्हे यह बात कैसे पता है कि उसने समुद्र नहीं देखा है?

– वह कहता था कि नहीं देखा है पर उसकी आँखें कहती थी कि वह उसकी जानी-पहचानी जगह है. वह आता जाता रहता था वहाँ.

– तुम्हे ले गया कभी वह वहाँ, समुद्र के किनारे ?

– वह सबसे बच कर जाता था वहाँ, और लौट कर हम सबसे झूठ बोलता था कि उसने आज तक समुद्र नहीं देखा है.

– कानपुर से सबसे नजदीकी समुद्र कितनी दूर है ?

– उसके लिए सब पास था! वह ऐसी बहुत सारी जगहों के बारे में यूँ बताता था मानो वह वहाँ रह कर आया हो. यह मैं नहीं मान सकता हूँ कि वह वहाँ कभी नहीं गया है. उसके जूते में नमकीन मिट्टी चिपकी रहती थी.

– उसकी कोई गंदी आदत तुम्हे याद है ?

– हाँ! हाँ! उसे बहुत ज्यादा नैतिक बने रहना पसंद था.

– यह गंदी आदत है ?

– हाँ यह बहुत गंदी आदत है लड़कियों के साथ सोने से भी ज्यादा गंदी बात है.

– शायद वह सच में नैतिक ही रहा हो?

– नहीं, मैंने उसे कई बार नंगे हो कर कुर्सी पर बैठे हुए देखा है

– नंगा! कुर्सी पर ?

– हाँ जब वह किताबें पढ़ता था तो कई बार नंगा ही होता था.

– कभी किसी और के सामने भी वह नंगा हुआ है ? या सिर्फ तुम्हारे ही सामने हुआ है.

– नहीं, बाकी सब के सामने वह अपना नैतिकता वाला लिहाफ ओढ़ लेता था.

– उसे और क्या बीमारी थी ?

– वह जो कुछ पढ़ता था उसे दिन भर बुदबुदाता था. उसे लगता था कि पढ़ी हुई चीजों के बारे में किसी न किसी से बात करना चाहिए वरना वह सब कुछ भूल जाएगा.

– और ?

– साला फिल्में देखते हुए रोने लगता था. उसे अश्लील साहित्य और गंभीर साहित्य दोनों ही पसंद थे. कई बार वह फिल्में म्यूट कर के देखता था और किताबें बोल-बोल कर पढ़ता था. एक बार जाड़े के दिनों में उसने गुरुदत्त की तस्वीर कमरे में लगा ली थी.

– गुरु की तस्वीर? तो क्या हुआ, उसमे क्या दिक्कत है ?

– दिक्कत! वह गुरुदत्त की तरह कमरे में अंधेरा करके शॉल ओढ़े रहता था. यह बहुत अजीब बात थी. एक बार मैंने उसे बताना चाहा कि गुरु बहुत पहले मर गया. वह नहीं माना, कहता रहा कि गुरु मरने के लिए नहीं पैदा हुआ.

– फिर?

– क्या फिर?

– मतलब वह गुरु बन कर कितने दिन तक रहा ?

– जाने से पहले तक वह गुरु ही बना रहा, बाद में उसे हर चीज एक उदास फ्रेम में दिखने लगी थी. वह हर चीज को फ़िल्म में घटते हुए देख रहा था.

– हर चीज को ?

– हाँ, सब कुछ, उसे लगता था यह सब पर्दे पर देखा जा रहा है. पर्दे के बाहर दर्शकों की बहुत भारी भीड़ है. तो वह बहुत सावधानी से अपना हर काम बड़े ही ड्रामेटिक तरीके से करने लगा था. वह कमरे की लाइट्स ऑफ कर देता और एक मोमबत्ती जला कर घण्टों अकेले बैठा रहता था. वह कहता था ट्यूब लाइट की रोशनी बहुत अश्लील है. मोमबत्ती की रोशनी को वह आध्यात्मिक रोशनी कहता था. वह दिन पर दिन अजीब होता जा रहा था. यह सब मेरी बर्दाश्त से बाहर था.

– कुछ और जो उसके व्यवहार में कुछ अजीब सा लगा हो ?

– वह वाक्यों को बार-बार दुहराने लगा था.

– जैसे?

– वह चाय पीते-पीते अचानक से मेरी ओर उंगली उठा कर बहुत कातर और कलापूर्ण वेदना के साथ कहता, “यू टू ब्रूटस!”

– ब्रूटस!

– हाँ महान रोमन सम्राट जूलियस सीजर का हत्यारा! जिसने तमाम सीनेटरों की मौजूदगी में सीजर को खंजर भोंका था.

– तो वह तुम्हे ब्रूटस मानने लगा था?

– नहीं, मुझे लगता है वह खुद को जूलियस सीजर की तरह समझने लगा था. पर जो भी हो, मेरे लिए उसका यूँ बार-बार इन वाक्यों को अचानक से दुहरा देना बहुत चिढ़ाने वाला लगने लगा था.

– यानी और भी वाक्य थे जिन्हें वह दुहराता था?

– हाँ, वह अपने सामने खड़े किसी भी आदमी का लिहाज किये बिना ही अपने टिंडे खुजाने लगता था!

– टिंडे? यह क्या होता है?

– कानपुर में टेस्टीज को टिंडे बोलते हैं.

– हम्म!..फिर?

– टिंडे खुजाने पर मैं उसे जब भी टोकता था तो वह बड़े ही फिल्मी अंदाज में कहता, “इट्स वेरी नेचुरल मैन!” और फिर बार-बार मौके बे-मौके इस वाक्य को दुहराता था. ऐसे ही एक बार उसने कवि शमशेर की एक कविता पंक्ति पढ़ ली. ‘काल तुझसे होड़ है मेरी’. फिर तो वह रात-दिन यही बड़बड़ाता रहता. वाह! मेरे शेर, शमशेर! वाह! मेरे शेर, शमशेर! अकेले में भी और, मेरे सामने भी. मुझे अच्छे से याद है एक-दो बार तो उसने नींद में भी इन वाक्यों को बोला था.

– हो सकता है वह सच में बहुत प्रभावित हो कर इन पंक्तियों को बोलता हो! हो सकता है तुम्हारे अनुमान झूठे हों!

– नहीं, यह एक तरह का पागलपन ही था. वह पंक्तियों के अर्थों से भाग कर उनके उच्चारण-रस का भोग लगाता था. पंक्तियों को खास तरह से एक रटे-रटाये ड्रामाई अंदाज बोलना उसे भाता था न कि वह, जो पंक्तियाँ कहती थी.

– तो क्या वह पागल हो रहा था?

– नहीं, मुझे लगता है वह पागल होने के अभिनय का मजा ले रहा था.

– तो, तुम्हे क्या लगता है. वह कहाँ गायब हो गया होगा?

– कुछ खास नहीं, पर वह कहता था कि उसे अपने गाँव जाना है वहीं गया होगा.

– सामने शीशा देख रहे हो?

– शीशा? …नहीं तो, मेरे सामने तो तुम हो!

– नहीं, तुम्हारे सामने शीशा ही है.

– असंभव!

– अच्छा, अगर तुम्हारे सामने शीशा नहीं है तो फिर मुझे छू कर देखो.

– नहीं.. कभी नहीं!

– क्यों डर गए क्या ?

– ………..!

– बोलते क्यों नहीं?

– हाँ! मुझे लगता है कि मैं जैसे ही तुम्हे छू लूँगा, तुम सचमुच एक शीशे में बदल जाओगे!

– और, और क्या डर है.

– फिर? …फिर मुझे लगेगा कि वह कहीं भागा नहीं है. वह यहीं है.

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(वीरू सोनकर से इनके मोबाईल नंबर -7275302077 या इनके ईमेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है)

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