कहानी: खूँटा में मोर दाल बा

1

विनीता परमार पेशे से शिक्षिका हैं और केंद्रीय विद्यालय, पतरातू (झारखंड) में  र्कायरत  हैं . विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इनके लेख और रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं-सौतुक 

विनीता परमार

कक्षा के सभी बच्चों का एक समवेत स्वर गूँज रहा था ।

“चुन – चुन करती आई चिड़िया

दाल का दाना लाई चिड़िया”

गाना थोड़ी देर के लिये रुका ही था कि –

“दीदी – दीदी ये चिड़िया कहाँ से दाल का दाना लायेगी “?

“देखो न हमारे क्लास के बाहर बेचारी चिड़िया मुंह खोलकर बैठी है” ।

मेरे पास भी तो दाल  भी नहीं इस भूखी चिड़िया को दे दूं ।

“हां ! कभी – कभी मेरे दादा जी चिड़िया को चावल के दाने दे देते हैं” ।

देखो न दीदी !  ये चिड़िया एक ही तरह का खाना खा कर उबती नहीं होगी ।

“अब मैं दादा जी को बोलूंगी चिड़िया को बदल – बदल कर खाने के लिए दिया करो” ।

मेरे पहली क्लास की नन्हीं पीहू लगातार बोले जा रही थी ।

चिड़िया की पीड़ा पीहू की आंखों में दिख रही थी ।

उसकी इस चिंता के साथ ही मैं कक्षा के बच्चों को छोड़  अपने अतीत में गोते लगाने लगी ।

मेरे गाँव का बड़ा सा आंगन जिसमें हर सप्ताह दादी खेतों में काम करने वाले सभी मजदूरों को मज़दूरी के बदले अनाज दे रही थी ।

मऊनी ( बांस की टोकरी ) से धान दिया जा रहा था दिन के हिसाब से मऊनी के अनाज सबको मिल रहे थे ।

बुधना सबका हिसाब बता रहा था

कुछ बच्चे वहीं आस – पास मंडरा रहे थे उन्हें भी दादी  एक – एक मऊनी अनाज खुश होकर दे रही थी ।

ये बच्चे अनाज के एवज में बूढ़ी के बाल , लकठो, मलाई बरफ खरीदेंगे ।

दादी को देखकर लगता था बाँटनेवाले को अक्सर सहेजनेवाला बनना पड़ता है ।

वो हरएक दाने को अक्षत का दाना समझती थीं । हर एक का मंगल हर एक का स्वास्थ्य सबका भरा रहे धन्यधान्य” ।

“दीदी वो चिड़िया उड़ गई”। उसकी आवाज़ सुन मैं फिर गाना सिखाने का ऊत्क्र्म करने लगी । तबतक पीहू और बच्चों  की आवाज़ स्कूल के पीछे चल रहे फ्लोर मिल की  फक – फक की आवाज़ में गुम हो गई  ।

क्या कहूं ? ऐसी आवाजें आजकल आम हैं लेकिन फ्लोर मिल ( आटा चक्की ) की आवाज़ कितना कुछ समेटी हुई थी उसकी आवाज़ में जाँता (चक्की ) चलाती दादी और उनकी सखियाँ  याद आ गई । दादी अपने जाँत में पिसती थी पिसान जिसमें पिस जाती थी दिन भर की थकान और घुटन ।

‘ए रे बुधना तू फेर अनाज के दाना छींट देहले, तोहरा ना बुझाला ई लछमी ह लछमी ! तोहार जऊन चाल बा एक दिन अन्न ना रही तब बुझाई’।

बुधना जल्दी – जल्दी बोरी में से बिखरे दानों को बीनने लगा ।

दूसरी तरफ दादी शुरू थी- “स्वस्थ बिया बोये के होखेला तब जाके अंकुरा ला खाद , पानी , रोशनी मिलला के बाद जाके कहीं दाना बन पावेला ।  तोरा इयाद नईखे परसाल नदी के कान्ही वाला खेतवा के हरियर – हरियर लामा- लामा बाल में एको दाना ना फूटल रहे ई सब बिया के गड़बड़ी से भईल रहे” ।

आउर सुन उ बड़का  लउका ( कद्दू ) जऊन छप्पड़ पर सुखल रहे ओकरा के ले आव !

लौकी आ गई थी बड़ी आराम से उसके अंदर की सारी चीजों को निकाल कर एक मटके का रूप तैयार कर दीं थी । खुला गुल्लक तैयार था  जिसमें सहेजे जायेंगे अगली पीढ़ी के बीज ।

दादी लाल कपड़े में हर किस्म के धान का बीज बाँधते जा रही थी ।‘ई लाल धान , ई कोदो , ई करिया , ई बासमती , ई मड़ुआ सब की पोटलियाँ तैयार हो रहीं थी ।

बसमतिया नेनुआ के बीज को खास तौर पर संभाल रहीं थीं ।

“केतना बढ़िया सुगंध बा ई नेनुआ के जइसे देहरादून वाला बासमती चाउर”

दादी ने सारी पोटलियों को कोई न कोई निशान दे डाला था । अब सारी पोटलियाँ थाती की तरह लउका के खोखे में रखी जा रही थी । गुल्लक भरा जा रहा था बीजों से जैसे कोई निश्चिंती हो भविष्य की ।

सारे तरह के बीजों को सहेजने की आश्वस्ति मिलने के बाद दादी ने बुधना  को निर्देश दिया – इसे मेरी कोठरी के छ्प्पड़ में लटका देना वहाँ पानी नहीं चूता है ।

दादी कितनी फुर्तीली थीं झक सफेद बाल वाली दादी घर की क्या पूरे जवार की ताकत थीं ।

मैं अक्सर सोचती हूँ अगर दादी जिंदा होती तो उन्हें अपने स्कूल में एकाध लेक्चर के लिए ले जाती सबकुछ कितना सिस्टमेटिक था  ।

अनाज के दानों को लेकर सचेत रहने वाली दादी के किस्सों की दलही चिड़िया जो निहायत ही सामाजिक न्याय की प्रतीक थी । एक दाल के दाने के लिए चिड़िया ने सारी बेड़ियों को तोड़ ख़ुद रास्ता बनाया था ।

कितनी कुहुक थी उस नन्ही चिड़िया की खूँटे में दाल के दाने को फँसने के बाद उस अन्याय के खिलाफ़ बढ़ई , राजा , रानी , साँप , लाठी , आग और गंगा सबके पास जाकर गुहार लगाई तब जाकर कहीं अंत में हहराती  गंगा ने उसके दर्द को सुना था और उस चिरई ने खूँटे को यह कहवाने पर मजबूर कर दिया था –

“हमरा के चिरऽऽ उर मत कोई हम अपने फाट जाईब लोई” ।

एक दाने का बचना यानि चिरई फिर जी सकती है वो नहीं टूट पाई थी ।

ये अन्न जिसके हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है कितनी तपस्यायों  का परिणाम हैं ये दाने । कितने बलिदानों के बाद मनुष्य ने इन्हें खाना शुरू किया होगा ।

फ्लोर मिल के  मशीन का पट्टा यूं घूम रहा था जैसे समय घूमता है जो सिर्फ़ सेकंड की पकड़ में थी । पापा की कंपनी के हिसाब – किताब के सिलसिले में अक्सर मुझे वहाँ आना पड़ता था । आज जिस मैनेजर से काम था वह कुछ देर के लिए बाहर गया हुआ था उसके इंतज़ार में मैं मिल के अंदर चली आई थी । जाने कितने मज़दूर लगे थे कोई अनाज की बोरी ला रहा था तो कोई आटे की बोरियों गोदाम में ला रहा था ।

हमारे कस्बे के आटा चक्की से बहुत बड़ा था यह फ्लोर मिल ।  कस्बे के आटा चक्की वाले भईया अकेले गेंहू डालते और गर्म – गर्म आटा बोरी में इकट्ठा करते जाते हर बोरी के आटे के वजन के आधार पर एक मुट्ठी , दो मुट्ठी आटा ग्राहक के सामने ही निकालकर दूसरी बोरी में जमा करते जाते ।

एक बार मैंने पूछा था – “आपने आटा क्यों निकाला” ?

बड़ी ही सहजता से कहा था – “जरती काट लिये” ।

आपने पिसाई के तो पूरे पैसे लिये फिर ये जरती क्यों ?

एक मैं ही प्रश्न कर रही थी एक या दो मुट्ठी आटा देने में किसी को ऐतराज नहीं था फिर मेरा बहस करना बेकार गया । तब के जमाने में ऐसे छोटे – छोटे जरती देने ने ही घूसख़ोरी की आदत डलवाई होगी ।

अपने अतीत के पन्नों से बाहर निकल मैं फ्लोर मिल के बोरियों के पास आ गई थी जहाँ मुख्य रूप से गेहूँ , जौ, मड़ुआ और बाजरे यानि मोटे अनाजों  की बोरियाँ रखी थी एक – एककर बोरे पीसे जायेंगे और आटे का पैकेट दुकानों में दिये जायेंगे। ये मोटे अनाज अब पतले और मजबूत होने के नुस्खे हैं । समय ने पलटी मारी  जो कभी गरीबों के भोजन थे अब अमीरों की शोभा हैं ।

इन विचारों में खोई मैं घूम रही थी  तभी मुझे लगा बाजरे की बोरी अपने लौटे हुए दिन पर इतरा रही थी हल्की फुसफुसाहट के साथ मड़ुआ अपने बगल वाली बोरी के बाजरे से कह रही थी –“ अरे जानती हो बहन जो गत तोरा सो गत मोरा” ।

‘जिस जमीन पर उगाई जाती हूँ वो जमीन का मालिक मेरी तरफ देखता नहीं ये शहर वाले वज़न कम करने में छोटे – छोटे पैकटों में हमारे आटे को खरीदते हैं । सच पूछो मुझे ये पिसान बनना बिल्कुल पसंद नहीं ये इंसानी फ़ितरत हमें पीसने के साथ जाने कितनी चीजों को पिसती है जैसे किसान, मज़दूर सब तो हमारे पीछे पागल हैं ।

जैसे लगा दोनों की बातें मेरे दिल के करीब मेरे उस गाँव के मेड़ों की बात हो जहाँ दादाजी की उँगली पकड़ मैं लहलहाते खेतों को देख जाने कितने सवालों से दादाजी को घायल कर देती थी । दादाजी के गुजरने के बाद दादी ने बड़ी मजबूती से सारा काम संभाला था । ये मड़ुआ और बाजरे की बात नहीं हो जैसे मेरे दिल की आवाज़ हो उनकी प्रतिध्वनि में मैं अपनी दादी की दुनिया के करीब आ गई थी । जिनकी रातों में मेरी कहानियाँ उनके दिन में मेरी मेहनत शामिल थी ।

भादों के महीने की बारिश हो रही थी  । लकड़ी के चूल्हे पर बनाई गई मड़ुआ की रोटी जिसे हम सब लहसुन की चटनी और धान के खेत की पोठिया मछली के साथ मजे लेकर खा रहे थे ।

तभी तो पिता का फरमान आया था – “गाँव के पोस्टऑफिस वाली नौकरी मैंने छोड़ दी है अब मैं शहर की एक एमएनसी ज्वाइन करूंगा वो मुझे बहुत अच्छा पैकेज दे रहे” ।

उस पैकेज के साथ हम सब बैग एंड बैगेज शहर आ गये थे । दादी अकेली रह गईं थीं अपने कोठरी मे टंगे लउका के खोखे के साथ । जिसमें लटके थे वंश वृक्ष जिन्हें अकेले छोड़ पापा निकल पड़े थे हमारे नवनिर्माण में । सृजन के साथ विध्वंस का ये तरीका हमारे हिस्से पड़ा था ।

छुट्टी एक ऐसी कड़ी थी जो हमारे और दादी के निर्वात को भरती थी । हमारे गाँव आते ही बूढ़ी दादी जवान हो जाती थी उनके पैरों में चक्री घूमने लगता ।

ए बुधना – ‘जो मड़ुआ पिसा लाओ ‘ ! खरिहान भिरी के खेत से छोटकी मच्छरी पकड़वा लिहे ।आउर सुन कुंमहइन के कहले रहीं ढकना लेले अइहे बबी के ढकनेसर (दूध – पुआ ) खूब निम्मन लागेला । लकड़ी के आँच पर मिट्टी के बरतन में सोंधी गंध हमारे नथुने में जाने कितने दिनों तक चिपकी रहती ।

हर बार हमसब आते और दादी की दुनिया के निर्वात को एकतरफ भरते और दूसरी तरफ तैयार रखते एक आलपीन जिसे चुभाकर हम धीरे से उस जगह पर फिर बिना हवा की जगह बन जाती । दादी की  नम आँखों वाली विदाई में एक अनजानी बेबसी और प्यार छुपा होता ।

उम्र थोड़े ही रुकती है वो भी नदी के धार की तरह हर क्षण बदलते रहती हैं । उम्र का पड़ाव ‘बुढ़ापा’ जहाँ यात्रा थोड़ी ठहरी सी महसूस होती है । दादी के इस पड़ाव में एक ठहराव आने लगा उनके खेतों की हरियाली अब बंट चुकी थी अब वो फसलों के एवज में कुछ पैसे लेने लगी थीं । लेकिन बंटी हरियाली में अपना सुकून अपनी शांति अपना खुलापन दादी पाती रहीं । अपनी माटी से लगाव हावी था  हमारी जिद पर ।

दादी कहाँ  शहर आने को तैयार थीं ? वो कहती – ‘ तुम्हारा शहर तुम्हें मुबारक हो दम घुटने लगता है हम खुश हैं अपन निशानी के साथ’ ।

हर साल नियम से  लाल मिरचा का आचार , तिलौरी , अदौरी हमारे पास शहर आता था ॰

दादी के खेत दूसरों के हाथों में चले गए थे फिर भी कोशिश करती कि कुछ प्लॉटों में उनकी पसंद के बीज लगाए जाएं । बुधना बेटा जैसा आगे – पीछे करता । अपना बेटा यानि हमारे पापा  तो बचपन से साहबों जैसे  पाले बढ़े खेती का ‘ ख ‘ नहीं जानते नाही उन्होने जानने की कोशिश की ।

बंटइया वाली व्यवस्था दो – तीन साल चला तब तक पापा को एक दिन बेस फोन पर बात करते हुआ सुना – ‘खेती में अब कोई फ़ायदा नहीं अबकी बार सारी जमीन कंपनी वाले को दे दूंगा ‘ ।

माँ ने पापा से पूछा था – ‘ये क्या करने जा रहे हैं  ? पुरखों की जमीन कंपनी के हाथ में चली जायेगी ।

“तुम्हें कुछ बात समझ में आती है उसके एवज में इकट्ठे पैसे मिलेंगे । मैं उन पैसों से हर बार कोई बड़ा काम कर लूँगा’ ।

दादी को कुछ पता ही नहीं चला और सारी खेत न्यूट्रीशनल ड्रिंक बनाने वाले कंपनी को दी जा चुकी थी ।

जुलाई का महीना था झमाझम बारिश, अंधेरी रात समाचारों में नदियों के उफान पर रहने की खबरें आ रहीं थीं ।  पसाह नदी हमारे गाँव की नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी । रात के दस बजे बुधना का फोन आया ‘मलकिनी नहीं रहीं’ ।

आनन- फानन में हमलोग गांव गए ।

बुधना बुका फारके रोए जा रहा था  ‘मलकिनी अभी आऊर जीती अपने पिछले महीने अपने  पसंद का बिचड़ा डालने बोल रहीं थीं ।

“मेरे मुंह से जैसे इ निकला कि अब खेत में अपना कुछ अधिकार नहीं है बाबूजी ने कोई कॉन्ट्रक्ट (अनुबंध) किया है । तभी से चुप रहने लगीं थीं उनके मन में कुछ चल रहा था । आज हमरा के टूअर करके चल गईली”।

सारे गांव के लोग दादी के जाने से दुःखी थे पापा भी सदमे में थे खाली यही बोल पा रहे थे दरवाजा के रोशनी थी अब दुआर पर अनहरिया हो जाई ।

भारी बारिश में दादी का क्रिया – कर्म कर दिया गया तेरह दिनों बाद सारे मेहमान चले गए थे ।

दादी के जाने का यह महीना हमारी आँखों से नहीं खत्म होनेवाली नमी के साथ बारिशों की सीलन को भी जाने नहीं दे रही थी । एक – दो दिन बाद हम सभी शहर चले जायेंगे दादी की कोठरी में से कीमती सामान निकाल ऐसा सोच मैं, बुधना और मां उनकी कोठरी से सामान निकाल बाँध लिया गया ।

लौकी का खोखा वहीं टंगा हुआ था वहीं रैक पर दादी की अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने के लिये रखीं हुईं थीं ।

कल सुबह निकलना है यह सोच हम सब सोने चले गये । अभी आँख लगी ही थी कि एक शोर ने मेरे साथ पूरे घर को जगा दिया था लोगों के भागो – भागो के शोर के साथ हहराती पसाह नदी की आवाज़ । काली रात एक – दो हाथों में लालटेन के साथ भागते लोग । बाँध टूट गया , बाँध टूट गया भागो – भागो !

भागते हुए पूरा परिवार दुआर वाले छत पर आ गया । इतनी दहशत और शोर किसी को कोई होश नहीं ।

मैंने अपने जीवन में पानी की इतनी आवाज़ नहीं सुनी थी । शहर में गर्मी के दिनों में पानी के लिए बेआवाज छटपटाहट देखी थी । अंधेरी रात में पानी नहीं आवाज़ । इस पानी की चोट अभी किसी को दिखाई नहीं दे रहा था । इतनी भयानक रात बेसब्री से सुबह का इंतज़ार  । झूलफूल उजाला होना शुरू हो गया था पानी का शोर उतना ही था बारिश थम चुकी थी । उजाले के साथ त्रासदी की दस्तक के बावजूद उस दिन के सूरज का इंतज़ार नीचे पानी भरा हुआ था । खपरैल घर में पानी भरा हुआ था सबकुछ बह चुका था ।

बुधना चिचिया रहा अरे ! मलकिनी के हड्डी पानी में बह गइल । बिया वाला खोखा देख – देख उहो बहत बा । बुधना बहती धार में कूदने चला अरे मलकिनी की अंतिम निशानी खत्म हो गईल।

बुधना छाती पीट – पीट कर रोने लगा आज मलकिनी हमेशा के लिये चली गईं । बाँध को तत्काल बाँधने का काम लोगों ने शुरू कर दिया था पानी की आवाज़ कम हो चुकी थी सारे के साथ मेरे खोखले पापा चुपचाप अस्थि – कलश के साथ बीजों के गुल्लक को बहते जाते हुए  देखते रह गए ।

***

कहानीकार से संपर्क उनके ईमेल  [email protected] पर किया जा सकता है.

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here