केशव की दौलत और अजगर जैसा सर्प

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विमल चंद्र पाण्डेय समाज में गहरे पैठे किंतु तथाकथित विमर्शों के दायरे से बाहर छूट गए विषयों को अपनी कहानियों का केंद्र बनाते हैं. जैसे आस्था. अपनी कहानी ‘एक शून्य शाश्वत..में उन्होंने एक बेहतरीन पात्र उकेरा है जो अव्वल तो धर्म का धंधा शुरु करता है लेकिन कहानी के विकास क्रम उस पात्र की विकसित होती आस्था उसे बेदोष बनाते चलती है. मनुष्य का असीम मन- मस्तिष्क वो अपनी अक्सर कहानियों में खंगालते हैं. डर, सोमनाथ का टाइम टेबल, उत्तर प्रदेश की खिड़की और प्रेम पखेरू इसके अनोखे उदाहरण हैं. उनके द्वारा निर्देशित फिल्म दी होली फिश‘, जिसकी स्क्रीनिंग कोलकाता इन्टरलेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में हुई थी, भी इसी भँवर को खोलने का एक सुदृढ प्रयास है.

इनका व्यक्तिगत जीवन प्रेरणास्रोत है. लिखने पढ़ने में नौकरी बाधा बनी तो नौकरी छोड़ दी. अनुवाद किया, दूसरे काम किए लेकिन लिखना जारी रखा.  इसी क्रम में भले दिनों की बात थीजैसा उपन्यास लिखा, ‘ई इलाहाबाद ह भईयालिखी, ‘उत्तर प्रदेश की खिड़कीतैयार किया. पहले कहानी संग्रह डर के लिए भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार मिला है. अब सिनेमा भी इनके रचनात्मक संसार का अंग हुआ है.

प्रस्तुत कहानी लोकप्रिय इनकरेक्टनेसवाली चौहद्दी से बाहर की दुनिया में खुलती है जहाँ हर क्षण एक पड़ताल है. विवाह नामक संस्था और उसके दुष्परिणामों की निस्संग विवेचना है. लेखक से उनके फोन – 9820813904 या उनके ईमेल – [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.- मॉडरेटर 

विमल चन्द्र पाण्डेय

दौलत कई गाँवों को मिला कर सबसे सुंदर लड़की हुआ करती थी और निर्लज्ज ग़रीबी की वजह से जीवन भर उसे यही लगता रहा कि ज़्यादा सुंदर होना बेहद दुर्भाग्य और डर वाली बात होती है। शादी से पहले उसकी सुंदरता के चर्चे कई गाँवों तक थे। इसका मतलब ये नहीं था कि कोई उससे बिना दहेज़ शादी करने को तैयार था, इसका अर्थ सिर्फ़ इतना था कि उसे शादी के पहले भोगने की इच्छा में गाँव के आवारा लड़कों के साथ रिश्तेदारी- नातेदारी के लड़के आदमी भी शामिल थे। उसकी शादी केशव से हुयी तो आसपास के कई गाँवों में शराब की दुकानों पर देसी दारू की कमी हो गयी।

दौलत को केशव का साथ अपनी ज़िंदगी का हासिल इसलिये लगता था कि क्योंकि गांव में प्रेम की परिभाषा का स्तर समय के औसत से भी काफी नीचे था। पत्नी पर हाथ न उठाने वाला बेहतर इंसान की श्रेणी में आता था और बिना गाली के जो अपनी पत्नियों से बात करते थे उनकी मिसालें जोरू के गुलाम के तौर पर दिया जाना आम था। कई बार अपने दोस्तों के समूह में मज़ाक का पात्र बन कर ऐसे पति अपनी पत्नियों को इसलिये रात भर एकमुश्त गालियां देते थे ताकि बाकी सबसे अलग होने का उनका अपराधबोध कम हो जाये। पूरे गांव में कोई एक ऐसा भी होता था जो कभी कभार पत्नी से प्रेम भरी बातें दिन में भी कर लिया करता था। दिन में पत्नी के करीब जाकर उसे पहचान लेना ऐसा जघन्य अपराध था जिसकी सज़ा अपने सबसे पुराने खू़न के रिश्तों से दूर हो जाना था, पिता की नज़रों में मउगा हो जाना था, मां की शिकायतों में दुल्हन का टोनहिन निकल जाना था और दोस्तों के उलाहनों में पेटीकोट में घुसा एक अजनबी हो जाना था। ऐसे में केशव ने कभी दौलत से उंची आवाज़ में बात तक नहीं की थी। दौलत कभी उसे ऐसा मौका देती भी नहीं थी। उसके जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता केशव था और जब सूर्यप्रताप जिं़दा था तब भी बेटे को खाना खिलाकर, सुला कर वह केशव के पांव सोते वक्त ज़रूर दबाती थी। ये नियम उसने कभी नहीं तोड़ा और शुरू में बहुत मना करने और असहज हो जाने वाले केशव ने भी सोते हुये इसकी आदत डाल ली थी। एकाध बार केशव ने उसके पांव दबाने की कोशिश की थी लेकिन उसने उसे नरक न भेजने की विनती करते हुये रोक दिया था। हालांकि अब भी कभी उसके पैरों में दर्द होता तो केशव एक बार ज़रूर उसके पांवों पर ‘हम दबा देते हैं’ की टेक लिये अपने हाथ ले जाता। दौलत अब नरक वरक जैसी कोई बात नहीं कहती बस चुपचाप उसका हाथ अपने पांवों से हटा देती और खुद के हाथों से दबाने लगती। उस समय उसकी आंखों में केशव के लिये दुनिया भर का प्यार होता और बेटी आसपास न हो तो वह केशव को पकड़ कर उसके गाल चूम लेती। उसे लगता पति के रूप में उसे दुनिया का सबसे अच्छा इंसान मिला है और वह चाहती कि काश, दिल चीर के दिखाने का कोई दस्तूर होता तो वह दिखा पाती कि इस वक्त केशव के लिये उसके दिल में प्यार के कई महासागर एक दूसरे से होड़ ले रहे हैं।

आँख खुलने से पहले केशव बचपन में था। जब उसकी आँख खुली तो बचपन से अब तक का समय कुछ ही क्षणों में पूरा सामने से गुज़र गया। अतीत पर वर्तमान हावी हुआ और चंद्रमा की शादी की चिंता को उसने फिर से बिल्कुल उसी तरह पहन लिया जैसे बीती रात को उतार कर सोया था। सामने वाली खाट पर चंद्रमा सोयी थी, वह उठ कर उसकी खाट तक गया और उसे ध्यान से देखने लगा। वह कितना औसत है और उसकी बेटी कितनी सुंदर। सुंदर से उसे दौलत का खयाल आया और वह जंगले के बाहर चूल्हे की लिपाई करती हुयी नज़र आयी। वह दोनों को बारी-बारी थोड़ी देर देखता रहा। बीस हज़ार की बाकी रकम का इंतज़ाम कहाँ से किया जाये, यह आज की सुबह का ही नहीं, इस महीने का नहीं, इस साल का नहीं, इस जन्म का सबसे बड़ा सवाल था।

जब वह नहा-धोकर बाहर जाने को तैयार हुआ तो दौलत ने उसे भीगे चने परोसे जिसे देते हुये उसकी आँखें भी भीगीं थी। वे भी चनों की तरह रात भर नमी में रही थीं। दौलत की नम आँखों में देख कर फिर एक बार केशव के मन में विचार गूंजा कि इस अनिन्द्य सुंदरी के जीवन में आकर उसने उसके संभावित सुखों की हत्या कर दी। साइकिल पर बैठने से पहले उसने दौलत की आँखें चूमीं और एक तेज़ का पैडल मारा।

बीस हज़ार की रकम कम पड़ रही थी और बाकी के पचीस का इंतज़ाम हो गया था तो इसमें भी दौलत का हाथ था जिससे वह बरसों से सिक्के इस तरह जमा करती आयी थी कि वे बड़ी रकम बन गये थे। तीस हज़ार दहेज में देना था और बाकी के पंद्रह हज़ार में शादी की व्यवस्था थी। उसके पास पचीस हज़ार हो चुके थे और बाकी के बीस हज़ार जुटाने की उसकी अचूक रणनीति ये थी कि जिन दोस्तों और अपेक्षाकृत कम गरीब दोस्तों की वह हमेशा से मदद करता आया है वे उसे पाँच पाँच हज़ार इसलिये दे देंगे कि वह उनसे पूरी रकम बीस हज़ार न माँग कर इसे चार हिस्सों में बाँट कर मांग रहा है। ऐसी बेसिरपैर की कई सारी बातें वह दिन भर सोचता रहता था और यह सोचना उसके व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा था। कुछ दोस्त इससे भली भांति परिचित थे, कुछ को इस बात का शक था और कुछ इस वजह से ही उसे शक की नज़र से देखते थे।

जिन तीन दोस्तों से उसे कायदन पंद्रह हज़ार की रकम जुटा लेनी थी, उन तीनों से वह दिन ढलते ढलते मिल चुका था और तीनों ने अदरक वाली चाय और पापड़ के साथ उसे कुरकुरे आश्वासन दिये थे।

आश्वासन मानवजाति के सबसे बड़े अविष्कारों में शामिल था। जब कोई चाह कर भी कुछ नहीं दे पाता था तो आश्वासन देने की परम्परा थी जिसका समय बीतने के साथ विस्तार हुआ था। प्यार में साथ निभाने के आश्वासन दिये जाते थे और दोस्ती में धोखा न देने के आश्वासन सबसे मूलभूत थे। शिक्षा दिये जाते हुये नौकरी का आश्वासन मुख्य था और पुत्र पैदा करने पर पिता को अपने आप मोक्ष का आश्वासन प्राप्त होता था। लड़कियाँ कौमार्य भंग होने पर कम से कम शादी का आश्वासन चाहती थीं और लड़के इसे अपना हथियार बनाकर चलते थे। सरकारें सपनों के आश्वासन देती थीं और यह तय था कि जो सरकार जितने सुंदर सपनों के आश्वासन देगी, उसकी उम्र उतनी लम्बी होगी। जुए जीत का आश्वासन देते थे तो कुंए तृप्ति का। आसमान बारिश के आश्वासन देता था और धरती अपनी कोख में हरियाली का आश्वासन देती थी जिसके सपने में भी लोग लम्बी ज़िंदगी जी जाते थे। धर्मग्रंथ और समाज पुरुष की श्रेष्ठता का आश्वासन इस तरह देते थे कि सिर्फ़ यही एक आश्वासन ही बड़ी संख्या में पुरुषों के संतोषजनक जीवन का रहस्य था। हर कोई अपने जीवन में आश्वासनों से घिरा था और जब केशव अपने तीसरे संभावित कर्ज़ देने वाले दोस्त के यहाँ से निकला तो उसका दिमाग पूरी तरह से निराश और हिंसक हो चला था। उसे कोई आश्वासन अब संभाल नहीं सकता था। आश्वासनों के विश्वास से बाहर निकल कर दुनिया का जो रंग दिखायी देता है वही असली होता है जिसके नंगेपन को अक्सर हम देखना पसंद नहीं करते।

दौलत को केशव का साथ अपनी ज़िंदगी का हासिल इसलिये लगता था कि क्योंकि गांव में प्रेम की परिभाषा का स्तर समय के औसत से भी काफी नीचे था

मिथिलेश उसके बचपन का दोस्त था लेकिन पिछले कुछ सालों से गुमनाम जैसा जीवन जी रहा था। मिथिलेश, मानिक और एक दो और दोस्त उसके बचपन के राज़दार थे और वह उनसे कभी भी मिल सकता था। मिथिलेश अक्सर गांँव से बाहर रहता और कई कई दिनों हफ्तों तक जंगलों में गुम हो जाता। वह पुराने दोस्तों से भी कम ही मिलता और गांँव से अक्सर उसका दूर रहना बहुत सी लोककथाओं को जन्म देता था। मिथिलेश ने उसे चाय की जगह डांट पिलायी। उसने कहा कि जिस तरह अधिकार मांगने पर नहीं छीनने पर मिलते हैं उसी तरह पैसे कमाने के लिये भी हिम्मत दिखानी पड़ती है। बिना हिम्मत दिखाये भीख मिल सकती है लेकिन ज़रूरत के पैसों के लिये कोई कदम उठाना पड़ता है और ऐसा कदम अब तक की ज़िंदगी को फलांग कर उठाना पड़ता है। उसने एक वारदात में शामिल होने की कीमत दस हज़ार दिलवाने की बात कही तो केशव ऐसी बातों पर ख़ासा डरने के बावजूद कुछ देर के लिये उत्साहित हो गया।

कुछ गांव बाद चंदाडीह गांव था जिसकी जनसंख्या करीब 1500 थी और वह कड़सर के डेढ़ दो सौ की जनसंख्या वाले गाँव से अधिक समृद्ध और सम्पन्न था। चंदाडीह गाँव के ज़मींदार के घर आधी रात के बाद डाका डालना था। गैंग के कई लोगों के इनकांउटर में मर जाने और आत्मसमर्पण करने के बाद गैंग सदस्यों की कमी से जूझ रहा था। मिथिलेश ने बताया कि अब बीहड़ में कुछ ही गैंग सक्रिय बचे हैं और बाकी ने खुद को किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से जोड़ लिया है। उनमें भी किसी वारदात के समय कुछ अस्थायी सदस्यों की भर्ती की जाती है जो डाके के बाद अपने हिस्से की रकम लेकर अपनी राह पकड़ते हैं। केशव ने सोचने में वक्त लिया और उस वक्त के दौरान मिथिलेश जोशीली बातें करता रहा। काम में बकौल उसके कोई ख़तरा नहीं था और यही बात गैंग के उप-सरदार ने भी दोहरायी जब शाम ढलते-ढलते मिथिलेश उसे बीहड़ के एक अस्थायी अड्डे पर उससे मिलवाने ले गया।

ज़रूरत बीस हज़ार की थी लेकिन मिथिलेश ने ज़ोर दिया कि पहले दस हज़ार सामने आ रहे हैं, उन्हें सुरक्षित किया जाये और बाकी रक़म का भी कुछ न कुछ इंतज़ाम करने की कोशिश की जायेगी।

आधी रात के बाद ज़मींदार के घर को चारों ओर से क़रीब पंद्रह लोगों ने घेर लिया जिसमें से छह को बाहर रह कर नज़र रखनी थी। सबके चेहरों पर नक़ाब थे और हाथों में हथियार। अंदर की रणनीति ये थी कि दो-दो के समूह में बंट कर हर कमरे में जा कर बिस्तरों पर आराम से सो रहे सदस्यों को बंदूक की नोक पर लेकर रस्सियों से बांध देना था। शुरुआती दो कमरों में इस योजना को बखूबी अंजाम दिया गया जहां ज़मींदार के भाई और ख़ुद ज़मींदार के परिवार को रस्सियों में जकड़ा जा चुका था। आख़िरी कमरे में ज़मींदार का शहर से आया बेटा अपने एक दोस्त के साथ सोया था। केशव के साथ खड़े साथी ने केशव को बंदूक तानने का इशारा किया और झटके से ज़मींदार के बेटे की चादर खींच दी। ज़मींदार का बेटा चौंक कर जागा तो अपने सामने दो नकाबपोशों को हथियार लिये देखा। उसने फुर्ती से लात घुमायी और केशव के साथ वाला नकाबपोश एक तरफ धक्का खाकर गिर गया। उसकी बंदूक दूसरी तरफ गिर गयी। उसने केशव को बंदूक चलाने की पुकार लगायी लेकिन केशव हाथ में बंदूक लिये जड़ हो चुका था। गिरे हुये नकाबपोश ने अपनी बंदूक पर छलांग लगानी चाही लेकिन तब तक बिस्तर पर सोया दोस्त भी जाग चुका था और वह माहौल का ख़तरा भांप चुका था। उसने छलांग लगाकर बंदूक हथियानी चाही लेकिन नकाबपोश ने उसे लात मार कर दूर कर दिया और इसके साथ ही वह दूसरी बार पूरी ताकत से गाली देता हुआ केशव पर चिल्लाया कि वह ज़मींदार के बेटे पर बंदूक से प्रहार करे लेकिन केशव अपने सामने उस नौजवान का चेहरा देख कर काठ बन चुका था। ज़मींदार के बेटे की शक्ल छह साल पहले मरे उसके बेटे सूर्यप्रताप से इतनी मिलती जुलती थी कि वह कुछ पलों के लिये भूल गया कि वह कहां और क्यों खड़ा है। सोलह साल की उम्र में साँप काटने से मरा उसका बेटा अगर ज़िंदा होता तो आज उसकी उम्र इस नौजवान इतनी ही होती और उसके कोमल चेहरे पर दाढ़ी मूंछें उगी होतीं तो वह बिल्कुल ऐसा ही दिखायी देता। तभी केशव के सीने पर एक ज़ोर का प्रहार हुआ और वह अपनी बंदूक लिये ही नीचे गिर गया। केशव के साथ वाला नकाबपोश समझ चुका था कि अब मामला हाथ से निकल चुका है। उसने एक ख़ास अंदाज़ से ज़ोर की सीटी बजायी जिसका मतलब था ख़तरा है और काम को बीच में रोक कर अपनी जान बचाने का वक्त है। उसने अपनी बंदूक उठायी लेकिन तब तक ज़मींदार का बेटा केशव की छाती पर चढ़ कर उसकी बंदूक कब्ज़े में कर चुका था। केशव अब भी अपने छाती पर चढ़े नौजवान को ममता और उलझन के साथ देख रहा था। साथी नकाबपोश ने एक ज़ोर का कुंंदा ज़मींदार के बेटे के सिर पर मारा और उसके साथी से जूझता हुआ केशव को लेकर बाहर निकलने की कोशिश करने लगा। तभी बाहर के कमरे से हल्ला उठा कि ज़मींदार ने भी ख़ुद को आज़ाद करा लिया है और अब ख़तरा और बढ़ गया है।

कई बरसों के बाद यह ऐसी वारदात थी जो असफल हुयी थी वरना गाँव के मुखबिरों के नेटवर्क और पहले से घर के सदस्यों की संख्या, घर का जुगराफिया वग़ैरह जानने, शोध करने में ख़ासा समय दिया जाता था जिसकी वजह से असफलता की संभावना नगण्य हो जाती थी। इस असफलता का सेहरा केशव के सिर बंधा था और एक संक्षिप्त मीटिंग के बाद जंगल के एक अंधेरे कोने में चार लोग मिल कर एक आदमी को बुरी तरह पीट रहे थे। केशव जैसे नाकारा आदमी को गैंग में बुलाने की वजह से मिथिलेश को भी कड़वी बातें सुननी पड़ी थीं लेकिन वह गैंग का पुराना और काबिल साथी था इसलिये उसे चेतावनी से न सिर्फ़ छोड़ दिया गया बल्कि उसके निवेदन पर ही उसके साथी की जान बख़्श दी गयी।

रात पूरी बीत जाने के बाद केशव को जब होश आया तो वह जंगल के लगभग बाहर किसी गांव के सीमाने पर पड़ा था। सुबह होने वाली थी और इस समय की हवा रात भर की मेहनत के बाद अब काफी ठंडी हो गयी थी जो हल्की सिहरन पैदा कर रही थी। केशव ने सिर घुमा कर जगह को समझने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहा। पिछले दिन सारी घटनाएं आँखों के सामने घूम गयी और उसका दिमाग फिर से उसी विचार पर स्थिर हो गया जिस पर स्थिर होने की वजह से बुरी तरह से पिटते हुये भी उसे पिटाई का एहसास नहीं हो रहा था। ज़मींदार के बेटे की शक्ल फिर से उस पर हावी हो गयी थी और उसे लग रहा था कि यह घटना उसके अब तक के जीवन की सबसे आश्चर्यजनक घटना है। उठने पर पूरे शरीर से दर्द की लहरें उठने लगीं और पास ही उसे अपनी टूटी फूटी सायकिल दिखायी दी। सायकिल की स्थिति देखकर साफ़ ज़ाहिर था कि उसका गुस्सा सायकिल पर उतारा गया है। उसने सोचा बाद में गाँव में से किसी को भेज कर सायकिल वापस मंगवा लेगा और लंगड़ाते कदमों से चाँद की ओर बढ़ने लगा।

पत्नी और बेटी दोनों ने शुरुआती रूदन के बाद उसकी सुश्रुषा की और लगातार घटना की वजह जानने की कोशिश करती रहीं। सुबह की आवाज़ों के साथ जब वह देह पर कई जगह हल्दी और चूने का लेप लगा कर लेटा था, अचानक उठ कर बैठ गया। ऐसी बेचैनी उसने जीवन में कभी महसूस नहीं की थी और उसका मन कर रहा था कि वह किसी भी तरह इस गुत्थी को सुलझा सके। वह धीरे-धीरे उठा और खूंटी पर टंगा अपना कुर्ता पहनने लगा। पत्नी ने कई बार रोकने की कोशिश की तो पहले तो उसने कहा कि वह पास वाले गाँव में अपने डॉक्टर मित्र से परामर्श लेने जा रहा है जिसके पास कई झोले होने की वजह से उसे झोलाछाप डॉक्टर कहा जाता है फिर पत्नी की लगातार हिदायतों से तंग आकर उसने बरसों बाद इस अंदाज़ में लताड़ा कि वह सहम कर चुप हो गयी।

वह किसी तरह चलता-चलता करीब सवा घंटे में चंदाडीह पहुंचा जहां कल की रात वह और उसके साथ नकाबों में छिपकर पहुंचे थे। ज़मींदार के घर के पास पहुंच कर उसके शरीर में डर की एक लहर उठी क्योंकि वहाँ पुलिस की वर्दियों के कई सारे लोग यहाँ से वहाँ टहल रहे थे। एक तम्बू लगाकर अस्थायी चौकी का निर्माण किया गया था और पुलिस के कुछ लोग अंदर महिलाओं के बयान ले रहे थे तो कुछ बाहर लोगों से बातचीत कर रहे थे। कुछ खलिहर बुज़ुर्गों का समूह अपने-अपने ज़माने की डकैतियों का बखान कर रहा था जिसमें कुछेक बुजु़र्गों का कहना था कि आजकल के डाकुओं का स्तर बिल्कुल गिर गया है। असली डाकू उनके ज़माने में हुआ करते थे जो चिट्ठी लिखकर वारदात करने की तारीख पहले ही बता दिया करते थे। डकैती के गिरते स्तर की वजह एक बुज़ुर्ग ने राजनीति बतायी तो दूसरे ने इस पर सहमति देते हुये टिप्पणी की कि जब कम ख़तरे में ज़्यादा फ़ायदा उठाने का विकल्प है तो डकैती जैसा जानलेवा काम कोई क्यों करेगा। उन्होंने डकैती और डकैतों के कम होती जा रही संख्या के लिये राजनीति को ज़िम्मेदार बताया और उसी वक़्त उनसे सहमत होता हुआ केशव उनके समूह में शामिल हो गया। गाँव में अपनी एक दूर की रिश्तेदारी बताने और वहांँ अपने डॉक्टर मित्र से पेट खराब होने का इलाज़ कराने का उद्देश्य बता कर उसने भीड़ का सबब पूछा तो गाँव वालों ने बताया कि रात को पचास सशस्त्र डकैतों ने ज़मींदार को मारने और लूट की नीयत से हमला किया था लेकिन उसके छोटे बेटे की बहादुरी की वजह से वारदात पूरी तरह सफल नहीं हो पायी और डकैत सिर्फ घर में मौजूद कुछेक लाख के आभूषण ही ले जा सकने में कामयाब हुये थे।

केशव का ध्यान इस पर नहीं था कि ज़मींदार का बड़ा बेटा रिपोर्ट में अपनी पत्नी के दो लाख के गहने लूटे जाने की रिपोर्ट लिखा रहा था, उसका पूरा ध्यान ज़मींदार के छोटे बेटे की तरफ था जो कहीं दिखायी नहीं पड़ रहा था। उसने गाँव वालों से उसके बारे में पूछताछ शुरू की तभी छोटा बेटा अपने उसी दोस्त के साथ गमछा बनियान पहने बाहर आया और नीम के नीचे लगे सरकारी हैण्ड पम्प पर पहुँच गया। हैण्ड पम्प यूँ तो सरकारी था और इसे गाँव वालों की प्यास बुझाने के लिये लगाया गया था लेकिन ज़मींदार साहब ख़ुद को सरकार से कम नहीं समझते थे और ऐसा समझने पर प्यास इतनी ज़्यादा लगती थी कि उन्होंने सरकारी नल को अपनी सरपरस्ती में जगह देना ठीक समझा था। अब ज़ाहिर बात था कि जिस चापाकल का नाम सरकारी चापाकल होना चाहिये था उसे जमीदरवा के नल के नाम से जाना जाता था। दोनों दोस्त शहर की सुविधाओं से कुछ दिनों के लिये ऊब जाने का अभिनय कर रहे थे और गाँव पर कुंएं और चापाकल के पानी को दुनिया का सबसे शुद्ध पानी बता रहे थे। दोनों सहज भाव से बातें कर रहे थे और पुलिस की मौजूदगी से कतई प्रभावित हुये बिना नहा रहे थे। केशव अपनी उत्सुकता को दबा नहीं पाया और उसके बारे में गाँव वालों से जानकारी लेने की कोशिश इस अंदाज़ से की ताकि किसी को उस पर शक न हो। इसलिये उसने ज़मींदार के बेटे के दोस्त की ओर इशारा करते हुये पूछा, ‘‘वो है क्या जमींदार साहब का छोटा बेटा ? हमने कभी उसको देखा नहीं है न, बड़े वाले को तो पहचानते हैं।’’

केशव एक तालाब के किनारे यूंँ तो चुपचाप बैठा था लेकिन उसके भीतर विचार उठ रहे थे कि उसे पानी के भीतर गहरे उतर कर साँस लेनी चाहिये

‘‘अरे वो तो लड़के का दोस्त है, शहर में दोनों साथ पढ़ते हैं। ज़मींदार साहब के बेटे की निशानी तो एकदम आसान है, उनका खानदानी निशान, कंधे पर काला लक्षन।’’ एक बुजु़र्ग ने इशारा किया और केशव को लगा जैसे उसके सीने में जो धकधक चल रही थी वो अचानक बंद को हो गयी है। एक हल्की सी दर्द की लहर आकर चली गयी और अचानक कुछ क्षणों के लिये सांँस लेने में तकलीफ़ हुयी जिसे नये मित्रों ने चिंता के साथ देखा।

‘‘क्या हो गया बिरादर, लीजिये पानी पीजिये। डाक्टर साहब को पेट के साथ छाती भी दिखा लीजियेगा, बलगम ज्यादा हो जाता है बीड़ी पीने से तो कभी-कभी दर्द उठता है।’’ एक अधेड़ ने सलाह दी।

केशव एक तालाब के किनारे यूंँ तो चुपचाप बैठा था लेकिन उसके भीतर विचार उठ रहे थे कि उसे पानी के भीतर गहरे उतर कर साँस लेनी चाहिये। वह पानी में साँस ले सकता है, ऐसा उसे महसूस हो रहा था। अगर जो कुछ वह देख और समझ रहा है उसके बावजूद उसकी साँस रुकी नहीं और वह ज़िंदा है तो इसका मतलब यही है कि वह अमर है। वह अगर इस तालाब में उतर जाये तो इसके भीतर साँस ले सकता है और अगर सामने वाली पहाड़ी से गिर पड़े तो हवा में तैरता हुआ आराम से नीचे उतर सकता है। वह मर नहीं सकता क्योंकि अगर मरना होता तो वह उसी क्षण मर गया होता जब उसने ज़मींदार के पहले छोटे फिर किसी काम से बाहर आये बड़े बेटे के कंधे पर वैसा ही काला निशान देखा था जो उसके दिवंगत हो चुके पुत्र के कंधे पर था। बिल्कुल वही जगह और बिल्कुल वही आकार। यह आख़िर कैसे संभव है ? दुनिया में किसी भी तर्क से इस संयोग की क्या व्याख्या हो सकती है ? उसके पेट में हज़ारों भंवर बन रहे थे जो सामने के जल में उठ रहे भंवर से कई गुना गहरे और बेचैन करने वाले थे। उसकी आँखों के सामने अचानक दृश्य कुछ धुंधला सा होने लगा। केशव ने अनुभव किया कि उसे दो आँखों के बीच की कोई चीज़ दिख नहीं रही है, शायद उसकी दृष्टि धुंधली हो रही है। उसने एक आँख बंद कर सामने देखा तो चीज़ें साफ दिखीं, फिर उस आँख को बंद कर दूसरी आँख से भी सब कुछ स्पष्ट दिख रहा था लेकिन दोनों आँखें खोलने पर उसे सामने के दृश्य में बीच का हिस्सा कुछ अस्पष्ट और धुंधला दिख रहा था जैसे किसी पुरानी तस्वीर के बीच में तेल लग जाने से दृश्य ओझल हो गये हों। उसे उस समय अपनी दोनों आँखों के बीच एक तीसरी आँख की ज़रूरत बहुत शिद्दत से महसूस हो रही थी ताकि कम से एक आँख ऐसी हो जिससे वह सिर्फ़ देखने का काम ले सके। वह उतरा और तालाब के पानी से आँखें धोने लगा।

दौलत चंद्रमा के बालों में तेल लगा रही थी और अपने पुराने दिनों के बारे में सोच रही थी जब उसकी शादी केशव के साथ तय की गयी थी। शादी तय होने के बाद अचानक चंद्रमा के भीतर उग आयी चुप्पी का सबब वह समझ रही थी। वह ख़ुद अपनी शादी तय होने पर गाँव की बाकी लड़कियों की तरह उत्साह में नहीं आ पायी थी, तब भी जब उसने केशव को गाँव के किसी कार्यक्रम में देखा था और वह उसे बुरा नहीं लगा था। उसकी शादी की हर याद से पिता की पैसे जुटाने के लिये मर जाने की हद तक की गयी भागदौड़ याद आती थी और वह उदास हो जाती थी। दौलत की सबसे अच्छी सहेली बेबी थी जो उससे अपनी हर छोटी बड़ी बात बताया करती थी। बेबी के पिता गाँव के मज़बूत व्यक्तियों में थे और जिस महीने बेबी की शादी तय हुयी थी, बेबी ने उसे बताया था कि वह शादी के एक हफ्ते पहले गाँव छोड़ कर भाग जायेगी। दौलत ने बेबी को समझाने की कोशिश की थी कि पिता की पगड़ी उछाल कर इस तरह जाना ठीक नहीं है लेकिन बेबी का कहना था कि किसी की ज़िंदगी के आगे किसी की पगड़ी की कोई क़ीमत नहीं होनी चाहिये। बेबी उसे करुणापति के बहुत सारे किस्से बताया करती थी कि वह बहुत स्नेहिल है, कस्बे के मोटर गैराज में काम करता है और पढ़ाई पूरी करके कस्बे या शहर में उसकी नौकरी पक्की है। उसके बारे में बताते हुये बेबी की आँखों में ऐसी चमक आती थी जो स्पष्ट देखने के बावजूद दौलत कभी समझ नहीं सकी। भागने के कुछ दिन पहले बेबी ने दौलत को करुणापति से मिलवाया था। करुणापति उसे किसी बच्चे जैसा मासूम लगा था और उसके मन में एक पल के लिये विचार कौंधा था कि उसका पति जब भी होगा, कैसा होगा। बेबी ने तब उसे एक बात बतायी थी जो बहुत बाद में दौलत की समझ में आयी थी। बेबी ने मात महारानी के मंदिर में दर्शन के समय दौलत से कहा कि उसे शादी के लिये कोई लड़का चाहिये था आदमी नहीं। लड़के और आदमी के बीच का फ़र्क़ उसके ख़ुद के दिमाग़ की उपज था। लड़का यानि जिसको देखकर पहले दोस्ती का मन करे फिर प्यार करने का। आदमी मतलब जिसे शादी के लिये घर के बड़े बूढ़े पसंद करते हैं। दोस्त जिसके साथ घर परिवार प्यार मोहब्बत के अलावा देस दुनिया में किसी भी चीज़ पर बात की जा सके। वह दिखने में कैसा भी हो, फ़र्क नहीं पड़ता लेकिन उसके साथ इतनी सुरक्षा इतना अपनापन महसूस हो कि कोई भी बात बिना अच्छा बुरा सोचे कही जा सके।

दौलत की शादी के कुछ सालों बाद उसकी मुलाक़ात मेले में बेबी से हो गयी थी। चार साल का बेटा बेबी की उंगली पकड़े था और छह महीने की बेटी करुणापति की गोद में थी। दोनों सखियों ने देर तक बातचीत की थी और बेबी ने बताया था कि नातिन के पैदा होने के बाद उसके पिता और माँ ने दोनों को माफ़ कर दिया है और वे दोनों उन्हीं के यहाँ से आ रहे हैं। दौलत को ज़िंदगी में पहली बार कुछ खला था। उसे लगा जैसे अपने मन का कोई ऐसा फैसला जिसका परिणाम दूर-दूर तक पता न हो, जिसे सिर्फ़ अंदर की कोई आवाज़ सुन कर लिया जाता हो, उसके जोखिम में डूबने उतराने का नशा कैसा होता होगा, वह अब कभी महसूस नहीं कर सकेगी। उसे याद आया कि केशव ने कभी अपने बच्चों को गोद में लेकर नहीं खिलाया। गाँव के दस्तूर के हिसाब से वह कभी जब बहुत मूड में हुआ तो दौलत की गोद में बच्चों को देखकर दूर से ही अलेलेलेलेले अलेलेलेलेले कर देता था। बच्चा अगर उसकी गोद में आने के लिये हाथ उठाये और दौलत उसे उसकी गोद में देने की कोशिश करे, उसके पहले ही वह कह उठता था, अम्मा के पाछ रहो, दुद्धू पिओ, मजबूत बनो। बस, ये उसके दुलार की इंतेहा थी जो छठे छमाहे कभी जागती थी। दौलत कुछ दिन इधर उधर की इससे मिलती जुलती बातें सोचती कि अचानक उसके पड़ोस या गाँव में कोई आदमी अपनी औरत को किसी मामूली बात पर धर के कूट देता और दौलत के सोचने का ढर्रा बदल जाता। हाथ में हल्दी चूना छापे और चेहरे का निशान घूंघट से छिपाये कोई पड़ोसन उसके घर या अड़ोस पड़ोस में आती और कल की रात की पूरी घटना सुनाती हुयी पति को गंदी गंदी गालियाँ देती, उसके लिये कुछ अपशकुनी बातें कहती, कुछ बद्दुआएं देती जिसके बाद अपनी जीभ काटते हुये कहती, हे काली माई, मत सुनना कुछ, हम मन से नहीं कह रहे थे, उनकी उमिर बढ़ाना काली माई नहीं तो हम कहाँ जायेंगे। दौलत कुछ भी कहती, पति के पक्ष में या विपक्ष में, उसे पीड़ित महिला के साथ आसपास की महिलाओं की भी एक ही बात सुनने को मिलती कि वो बहुत भाग्यशाली है। उसका पति उससे इतना प्रेम करता है कि कभी उस पर हाथ नहीं उठाता। दौलत को केशव के लिये सोची गयी सारी ग़लत बातों का बेहद अफ़सोस होता और वह मन ही मन उससे माफ़ी मांग लेती। हर इंसान अलग होता है, किसी से किसी की तुलना नहीं करनी चाहिये, वह ख़ुद को बार-बार समझाती।

चंद्रमा की शादी तय होने के बाद उसने कई बार उससे पूछना जानना चाहा था कि वो शादी के लिये पूरे मन से तैयार है ना। अगर उसे कोई समस्या हो तो वह बेझिझक अपनी माँ से पूछ सकती है लेकिन चंद्रमा ने शादी तय होने पर हामी भर कर चुप्पी साध ली थी। माँ के सवालों का जवाब वह सिर्फ़ इतना दिया करती थी कि माँ जो हो रहा है ठीक हो रहा है। दौलत समझती थी कि चंद्रमा ने अपनी ज़िंदगी का फै़सला समय पर छोड़ रखा है लेकिन कभी-कभी उसके मन में एक कसक सी उठती थी कि काश ! कोई उसे पसंद होता। अगर चंद्रमा गाँव के या बाहर के भी किसी लड़के को पसंद करती, लड़का भी उसे पसंद करता तो वह कैसे भी कर के दोनों को मिला देती। वह ख़ुद को ज़िम्मेदार मानती कि उसके भीतर ऐसा कोई सपना कभी नहीं उगा इसलिये उसकी बेटी भी ज़िंदगी को बिना किसी उम्मीद के जी कर किसी तरह ख़त्म कर देना चाहती है। उसकी बेटी के भीतर अपनी ज़िंदगी को लेकर कोई सपना कोई उम्मीद कोई उत्साह नहीं है, यह महसूस कर अक्सर दौलत की आँखें भर आती थीं कि माँ बाप का कहना मानना चाहिये, कहना मानना चाहिये बोल-बोल कर कैसे उसे लड़की से लकड़ी के लट्ठे में बदल दिया गया है। उसकी बेटी उसकी ही तरह बेहद सुंदर है और उसका चेहरा, उसकी चाल सब कुछ बिल्कुल अपनी माँ जैसी है। इतनी रूपवती, इतनी गुणवान और इतनी प्यारी लड़की को कम से कम केशव जितना प्रेम करने वाला पति ज़रूर मिले, वह सोचती और यह सोचते ही उसे अपने भीतर न जाने कैसा ख़ालीपन सा महसूस होता।

केशव अपने ही घर में किसी दुश्मन के जासूस जैसा महसूस कर रहा था। वह चाह रहा था कि दौलत के चेहरे को बहुत देर तक ध्यान से देखे लेकिन जैसे ही वह उसकी ओर घूरने लगता, वह तरकारी काटना छोड़ उसकी ओर देखने लगती थी। उसकी ओर देखने से दोनों की आँखें मिल जाती थीं और दौलत की आँखों में केशव की चोटों के लिये सुहानुभूति और कैसे लगी चोट वाला सवाल कौंधने लगता। केशव फिर से चेहरा दूसरी ओर हटा लेता। बेटी बाहर इकलौती बूढ़ी गाय को चारा दे रही थी। केशव चाहता था उसके मन के भीतर जो बवंडर चल रहा है उसकी वजह उसे जल्दी से जल्दी पता चल जाये लेकिन इस बात को कैसे पूछा जा सकता है, इसका कोई सिरा उसे पकड़ में ही नहीं आ रहा था। ज़मींदार के बारे में जो-जो जानकारियाँ वह जुटा पाया था उसमें एक यह भी था कि जवानी की आम आदत की तरह ज़मींदार साहब का नाता गाँव की कई जवान होती लड़कियों से कम और अधिक समय के लिये रहा था। इसके आगे सोचते हुये उसके भीतर से कोई उसे रोक देता था। जो रोकता था उसका पुराना दुश्मन अगली बात यही याद कराता था कि ज़मींदार के गाँव के उत्तर की तरफ अगला गाँव दौलत का गाँव था।

सुबह उठने से लेकर रात सोने तक केशव के दिमाग और आँखों में सिर्फ़ दौलत थी। अपनी आदत अनुसार जब दौलत भोर में चार बजे उठी और खेत में दिशा मैदान के लिये निकली तो केशव की आँख कुंडी की आवाज़ से खुल गयी। उसे अपनी ही पत्नी के पीछे जाने का विचार एक तो गंदा लग रहा था दूसरे सुबह की अलसायी नींद उसे बिस्तर छोड़ने से रोक रही थी लेकिन न जाने कैसा कुत्सित उत्साह उसके भीतर पैर पसार रहा था कि मन में जैसे ही किसी बात के लिये बुरा होने जैसी भावना उठती, मन उसकी ओर खिंचने लगता। वह धीरे से उठा और बेआवाज़ बाहर निकल गया।

पूरी सावधानी से जब वह खेत में पहुँचा और पत्नी और गाँव की कुछेक औरतों से एक निश्चित दूरी बनाता हुआ उनकी बातें सुनने बैठा तो उसके भीतर तीन दिन पहले वाली खोयी हुयी गति फिर से हासिल हो गयी। दौलत गाँव की औरतों के पूछने पर बता रही थी कि उसका पति आजकल बहुत खोया-खोया रहता है और परसों उसकी साइकिल की शायद किसी गाड़ी से टक्कर हो गयी थी जिससे उसे काफी चोटें लगी हैं, काश वह इस चोट को अपने ऊपर ले सकती तो कहीं किसी जगह अपने पति की चिंता बांट पाती। औरतों ने उसको हिम्मत बंधायी और कहा कि वह ख़ुशकिस्मत है कि उसका पति इतना अच्छा आदमी है। दौलत ने इस बात से पूरी सहमति जताते हुये कहा कि उसकी बदकिस्मती है कि न तो वह अपने पति के दुःखों को कम कर पा रही है न उसकी चिंताओं को। केशव से ज़्यादा सुना नहीं गया और वह ख़ुद को धिक्कारता हुआ वापस आकर अपनी गुदड़़ी पर गिर गया। उसने लेटे-लेटे चंद्रमा की ओर देखा और उसकी आँखों में आँसू भर आये। वह अपने ही हाथों से अपने छोटे लेकिन शांत घर की शांति भंग नहीं कर सकता, यह उसके भीतर से किसी ने चेतावनी दी। उसने अंदाज़ा लगाया कि शादी की तैयारी करने के लिये उसके पास अभी तक़रीबन एक महीने हैं, वह प्रधान जी की सलाह पर अमल करने की सोचने लगा कि अपने मुट्ठी भर खेत को बेच देना ही सही उपाय है। वैसे भी उसमें ज़्यादा नहीं उपजता जिसकी वजह से एकाध फसल में दूसरे के खेतों पर काम करना ही पड़़ता है।

उसकी आँख दुबारा खुली तो दौलत नहा कर अपने खुले बालों में अंदर आयी। बेटी आँगन लीपने के बाद लकड़ियाँ बीनने गयी थी। केशव ने ध्यान से दौलत के खुले कंधे पर पानी की बूंदे देखीं। दौलत ने दर्पण में अपने पति का चेहरा देखा जो ध्यान से उसकी पीठ पर कुछ खोज रहा था। उसने दौलत के कंधे पर देर से टिका एक बूँद पानी अपने होंठों से खींच लिया। दौलत की आँख एक पल के लिये बंद हो गयी। लम्बे समय से उसके भीतर जैसे कुछ बड़ी मेहनत से रोक कर रखा हुआ था जो बह कर बाहर आने को तैयार था और वह ऐसा नहीं चाहती थी। एक और बूँद का शिकार जब केशव ने अपने होंठों से किया तो दौलत पलट कर उससे लिपट गयी। शायद दसियों साल बाद यह एक ऐसा पल था जब दिन में केशव ने दौलत को छुआ था, वो भी ऐसी प्रत्यक्ष नीयत से। दौलत ने अधखुली आँखों से जंगले से बाहर देखकर बेटी के घर से दूर होने को आश्वस्ति की। केशव उसे गले से लगाये हुये उसकी पीठ पर अपनी उँगलियां फिरा रहा था। दौलत की आँखों में भारीपन आ रहा था। उसने बिना देखे अपना हाथ ऊपर किया और पति का खुरदुरा चेहरा सहलाया।

उसे अपनी ही पत्नी के पीछे जाने का विचार गंदा लग रहा था पर वह धीरे से उठा और बेआवाज़ बाहर निकल गया

‘‘चिंता मत करो, सब इंतजाम हो जायेगा।’’ उसके हाथों का ठण्डा स्पर्श केशव को ऐसा लगा जैसे बेहोश काया को अचानक बर्फीले जल का स्पर्श मिले और वह जागृत हो जाये। उसकी आँखें भर आयीं।

‘‘तुमको हमारे साथ कोई सुख नहीं मिला ना ?’’ केशव की आवाज़ भर्रायी हुयी थी। उसकी आँख से एक आँसू दौलत के कंधे पर गिरा जिसे उसने जल्दी से पी लिया और जिसे दौलत ने पानी की बूंद समझा। उसकी हथेली केशव की आँख तक पहुँची तो तुरंत उसने चेहरा उठा कर अपने थके हुये पति को देखा और आँखों में नमी देखकर उसके वो आँसू भी पोंछने लगी जो अभी बहने वाले थे। दोनों ने एक दूसरे को कस कर जकड़ लिया। केशव ने उसे गोद में उठाया और खाट तक गया। दौलत अपनी आँखें बंद किये उससे लिपटी थी। केशव उसके गले के पास चूमते हुये उसकी आँखों में सहमति और उसकी मर्ज़ी पूछ रहा था, उसकी आँखों में ये सवाल देखकर दौलत को उस पर बेतहाशा प्यार आया और उसने अपने होंठ केशव के होंठों पर रख दिये। केशव हैरान रह गया, शादी के पचीस साल बाद पहली बार दौलत ने उसके बिना चूमे ख़ुद पहल कर के उसके होंठ चूमे थे। दिन में इतने उजाले में वह इतने क़रीब से दौलत का चेहरा एक लम्बे अंतराल के बाद देख रहा था। वह एक हल्के नशे में गिरफ्तार लग रही थी और उसका यह चेहरा केशव को बहुत सारे सुखों का द्वार लग रहा था। उसने चुम्बन को फिर से शुरू करने के लिये दौलत के होंठों को अपने होंठों में भरा और उसी पल उसके भीतर से एक ख़ुशनुमा ख़याल आया कि इन होंठों को पूरी दुनिया में सिर्फ़ मैंने चूमा है। उसे पता नहीं था कि यह रूमानी ख़याल उसके भीतर बैठे उसी दुश्मन ने भेजा है जिस पर रुकते ही उसके दिमाग में यह दूसरा ख़याल जन्म लेगा कि क्या इन होंठों को सिर्फ़ मैंने ही चूमा है। केशव ने मन में उठ रहे इन ख़यालों को परे झटकते हुये फिर से दौलत को और क़रीब किया लेकिन उसी पल ज़मींदार के बेटे का चेहरा उसके सामने घूम गया। उसके दोस्त मिथिलेश और मानिक उसके बेटे के जन्म से ही इस बात की खिंचाई किया करते थे कि वो तो इतना साँवला है कि उसे काला भी कहा जा सकता है लेकिन बेटा इतना सुंदर और गोरा कैसे हो गया। दोस्तों के मज़ाक का जवाब केशव मुस्करा कर देता कि दोनों बच्चे माँ में पड़े हैं और ये उसके लिये बहुत ख़ुशी की बात है। दौलत की साँसें तेज़ चलने लगी थीं और केशव की पीठ पर उसकी पकड़ बढ़ती जा रही थी लेकिन केशव अपने भीतर बैठे दुश्मन की बात पर कान दे चुका था। उसने दौलत के कानों के पास चूमते हुये फुसफुसाती आवाज़ में पूछा, ‘‘मेरे अलावा….और कौन….तुमको….?’’

दौलत किसी झूठे सपने से जागी और केशव का चेहरा देखने लगी। केशव के चेहरे पर जो भाव थे वो दौलत के लिये नितांत अजनबी और डर का बायस थे। उसकी भंगिमा बिगड़ने लगी, पहले उसके चेहरे पर दुःख आया, फिर शोक और आख़िर में आँसू आ गये। केशव लम्बे समय से इस बात को किसी तरह से पूछना चाहता था लेकिन उसके पास इतनी ही भाषा थी और इसे पूछने के बाद केशव को भी अपने ऊपर गुस्सा आया था। थोड़ी ही देर में वह दौलत से आँखें चुरा रहा था लेकिन दौलत अब ख़ुद को संभाल रही थी और नीचे उतरने लगी। केशव ने उसे रोक कर फिर से एक बार भींच लिया। उसकी आवाज़ भर्रा गयी थी। ‘‘तुम कितनी सुंदर हो, अगर तुमसे कभी कोई गलती हो गयी हो तो भी दोष हम खुद को देंगे। बताओ।’’ केशव की आवाज़ कई टुकड़ों में दौलत तक पहुँची थी लेकिन उसकी तासीर उस तक पहले ही पहुँच गयी थी और उसके भीतर की चिढ़ एक पल के लिये घृणा में बदल गयी थी। दौलत ने उस पल से झटके से ख़ुद को चारपाई से उठाया और बाहर चली गयी। केशव के दिमाग में थोड़ी देर पहले का दौलत का आँखें बंद किया नशे में डूबा चेहरा देख रहा था। उसने देखा कि एक दूसरा आदमी, जिसकी पीठ केशव की तरफ है, दौलत के कंधे और फिर सीने पर ढुलक आयी बूंदों को पी रहा है और दौलत मदभरी आँखों से उस आदमी की पीठ सहला रही है और उसे प्रेम से लबालब भरे चेहरे से देख रही है। उसके भीतर बैठा दुश्मन सक्रिय हो गया था जिसे वह बिल्कुल पसंद नहीं करता था और उसे ख़ामोश रखना चाहता था लेकिन उसने पाया कि इधर बीच वह ऐसी बातें करने लगा है जिन्हें सुनने का मन करता है और सोचने की ज़रूरत महसूस होती है। क्या किसी और की बाँहों में भी यही मदभरा नशे में उन्मत्त चेहरा बेसुध हुआ होगा और जब हुआ होगा तो सामने वाले चेहरे के भीतर क्या उसकी तरह यही गूंजा होगा कि ओह ! यह चेहरा कितना ख़ूबसूरत है ! पता नहीं मैं इसके लायक हूंँ भी या नहीं। या फिर वह कोई सुदर्शन और रोबीला चेहरा रहा होगा जो उसकी सुंदरता का मुकाबला अपनी ताब से कर रहा होगा और दोनों बराबर एक प्रेमी की तरह एक दूसरे से टकराये होंगे जिसमें न शादी जैसी किसी मजबूरी का धागा होगा न समाज जैसा कोई काल्पनिक बंधन। केशव का दिमाग भन्नाने लगा तो वह पैदल ही तेज़ क़दमों से जंगल की ओर निकल गया।

उसके भीतर बोल रहे दुश्मन से उसका बचपन का साथ था। एक बार रिश्ते में बुआ लगने वाली एक महिला उसके घर आकर रुकी थी जब वह सोलह या सत्रह साल का रहा होगा। बुआ के बारे में उसे सिर्फ़ इतना पता चला कि वो पिता की चचेरी बहन थीं। वह कुछ दिनों के लिये आयी थीं ताकि बगल के गाँव में ठहरे एक सिद्ध बाबा से घर परिवार छोड़ कर छह महीने पहले भागे अपने पति के बारे में जानकारी ले सकें। माँ बीमार थी इसलिये उन्होंने पिता को उन्हें बुलाने की इजाज़त दे दी ताकि उनकी बीमारी के दौरान घर का ध्यान रखा जा सके। माँ अंदर वाले कमरे में सोती थीं क्योंकि उन्हें बाहर की हवा से समस्या थी। उनके शरीर पर दाने उग आये थे और उन्हें वैद्य का दिया लेप लगा कर भीतर के कमरे में लेटे रहना था। पूरे शरीर के साथ मुँह में भी दाने होने की वजह से वह बहुत मुश्किल से खा पी पाती थीं। वह बेहद कमज़ोर हो गयी थीं और बड़ी मुश्किल से चल फिर पाती थीं। पिता ने बुआ को ले जाकर उस बाबा से मिलवाया था जिसने बताया था कि उनके पति को दक्षिण दिशा में रहने वाली एक जादूगरनी ने अपनी चोटी में कैद कर लिया है। बाद में पता चला था कि फूफा जी एक गाना गाने वाली के साथ कस्बे में रहने लगे थे। उनके गाँव से गया कोई आदमी उनसे अचानक मिल गया और उनकी पहली पत्नी के बारे में बताया तो उन्होंने उसे दबाव में की गयी शादी बता कर उस आदमी को दुत्कार दिया था। बुआ बाबा की बात सुनकर बहुत सदमें में थीं। आधी रात को वह घर से बाहर जा कर कुंए के पास बैठी रोने लगी थीं। उसकी और उसके पिता दोनों की नींद साथ खुली थी। पिता बिना आवाज़ बाहर निकले तो वह भी उनके पीछे निकल आया। कुंएं की जगत पर ही एक पेड़ था जिसकी कुछ जड़ें जगत पर और बाकी नीचे थीं। बुआ उस पेड़ की आड़ में बैठी सिसक रही थीं। वह उन्हें वहीं से देखता रहा। पिता ने पहले बुआ को दूर से समझाने की कोशिश की, फिर उनके हाथ पकड़ कर समझाया और फिर वहीं कुंए की दूसरी तरफ उन्हें अपनी गोद में बिठा कर चूमते सहलाते हुये समझाने लगे थे। दोनों थोड़ा खिसक कर पेड़ की आड़ में हो गये थे जिसे चाँदनी रात की रोशनी ने उजागर किया था। वह थोड़ा और आगे बढ़ा और पेड़ के दूसरी तरफ़ से पेड़ के काफी क़रीब हो गया। पिता ने रोती हुयी बुआ को अपनी गोद में बिठा लिया था और बराबर उन्हें पुचकारने व चुप कराने की कोशिश कर रहे थे। अचानक रोती-रोती बुआ दोनों पैर दो तरफ़ कर पिता की गोद में छोटी बच्ची की तरह बैठ गयीं और ज़ोर से पिता को भींच लिया। उनका सिसकना कम हो गया था। पिता उनके गालों और गरदन पर चूमने लगे थे और बुआ भी उन्हें बार-बार ख़ुद से कसने लगी थीं। उसे दोनों की साँसों की सम्मिलित आवाज़ सुनायी दे रही थी लेकिन स्पष्ट कुछ दिख नहीं रहा था। उसने दो कदम और आगे बढ़ाया और पेड़ के पीछे देखा। सबसे पहले उसे बुआ का चेहरा ही नज़र आया था जो लाल हो चुका था। वह उसके पिता की गोद में बैठी हिल रही थीं और उनकी आँखें आधी बंद थीं। अचानक बुआ की उनींदी आँखें खुली और एक पल के लिये बुआ ने उसे देख लिया हालाँकि उसने फुर्ती से ख़ुद को छिपाया और जल्दी से आकर बिस्तर पर सोचने लगा कि क्या उसे सचमुच बुआ ने देखा है या फिर वह बच गया है। बुआ के चेहरे का वह रंग और भाव हमेशा के लिये उसके मन पर दर्ज हो चुका था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि उसने जो देखा वह सच था। वह कम से कम एक और बार इस अविश्वसनीय दृश्य को फिर से देखना चाहता था ताकि उसका मन उसके असली होने की तस्दीक कर सके। उसे अपने पिता से नफ़रत सी हुयी लेकिन नफ़रत से ज़्यादा बुआ के प्रति अजीब सा आकर्षण उसे खींच रहा था। उसे हर समय बुआ का वही चेहरा याद आता और वह पिता के साथ बुआ की नज़दीकी वाले पल खोजता लेकिन अगले दो दिनों तक उसे कामयाबी नहीं मिली। तीसरे दिन पिता को बगल के गाँव में शादी का न्यौता खाने जाना था। वह अब तक बुआ के बारे में इतना सोच चुका था कि उसकी सोच बीमार होने की हद तक जा चुकी थी। उसने किशोरावस्था से एक पैर जवानी में रख दिया था और हर पल उसकी पूरी कोशिश दोनों पैरों समेत जवानी के बग़ीचे में कूद जाने की थी। उसे नहीं पता था कि जवानी की नाज़ुक डगर पर क़दम रखने से पहले ही उसके पाँवों में समय ने ऐसा कीचड़ लगा दिया है कि वह अब और लोगों की तरह सामान्य जवानी नहीं बिता सकेगा। उसके अँधेरे बाकी लोगों के अँधेरों से अधिक ख़ौफ़नाक और गहरे हुआ करेंगे।

उसके भीतर जो चल रहा था उसमें हर दृश्य का कोई और ही अप्रत्यक्ष अर्थ था जिसे उसका दिमाग़ बिना किसी मेहनत के सुलझाने लगा था। जैसे पिता के जाने के बाद बुआ नहाने चली गयी तो उसके दिमाग ने उसे छिप कर देखने की सलाह दी कि आख़िर इतनी रात को कोई जवान औरत क्यों नहाने जायेगी। ज़रूर वह चाहती है कि वह उन्हें नहाता हुआ देखे। उसने बुआ को छिप कर नहाता देखा और जब बुआ ने हल्के अंधेरे में अपना ऊपरी वस्त्र उतारा तो बात उसके बर्दाश्त से बाहर चली गयी। वह अपने हाथों से ख़ुद को संभाल नहीं सका, दोनों हाथों में अपनी लाश उठाये बिस्तर तक पहुंचा और उस लाश को बिस्तर पर फेंक दिया। बुआ अंदर आयीं, उन्होंने माँ के बिस्तर के सिरहाने पानी रखा और ढिबरी बुझा कर अपनी चारपाई पर बिना खाये लेट गयीं। केशव भी अंधेरा होने पर चुपचाप जाकर बुआ के बिस्तर पर सो गया। पहले तो बुआ ने फुसफुसा कर उसे अपने बिस्तर पर जाने को कहा लेकिन जब केशव ने कहा कि उसे अकेले डर लग रहा है तो बुआ चुपचाप उसकी ओर पीठ कर के उंघने लगीं। केशव आधे घंटे से कुछ अधिक समय तक बुआ के सो जाने का इंतज़ार करता रहा और फिर सोने का नाटक करते हुये उनकी कमर पर हाथ और टांग पर टांग चढ़ा दी। बुआ हल्की सी कुनमुनायी तो उसने अपना शरीर स्थिर कर दिया जैसे गहरी नींद में हो। बुआ के फिर से शिथिल हो जाने के बाद उसने अपना चेहरा बुआ की पीठ पर सटाया। उनके तुरंत के नहाये शरीर से साबुन और उनकी अपनी देहगंध मिल कर ऐसी सुगंध पैदा कर रहे थे कि केशव के हाथ से उसके दिमागी घोड़ों की लगाम छूट गयी। उसके सामने पेड़ के पीछे से देखा बुआ का लाल और अधखुली आँखों वाला चेहरा आया और उसने तेज़ी से बुआ को लपेट लिया। बुआ उसी वक्त पलटीं और उन्होंने केशव को ज़ोर से ख़ुद से चिपका लिया। केशव के भीतर फैक्टरी की मशीनों जैसी तेज़ आवाज़ आ रही थी और बाहर साँसों को सुने जाने लायक सन्नाटा था। उसने उस थोड़े से अंतराल में बुआ को पूरी तरह से सभी इंद्रियों से महसूस किया। बुआ भी उसे कुछ देर तक महसूस करती रहीं और जैसे ही वह उनके गालों पर होंठ रखने वाला था, उन्होंने उसे अचानक धकेल दिया। उसने अंधेरे में फिर से उन्हें कसना चाहा तो उनकी कड़क आवाज़ उसके कान में पड़ी, ‘‘अपनी खटिया पर जा केसु।’’ वह चुपचाप गया और अपनी खटिया पर जाकर लेट गया। उसकी नींद उसके पिता के आने तक नहीं आयी और जैसे ही आधी रात बाद पिता ने दरवाजे़ पर हल्की दस्तक दी, केशव अंधेरे में देखने और सुनने के लिये मुस्तैद हो गया। बुआ ने ढिबरी जलायी और दुआर पर पिता का बिस्तर लगा दिया। पिता एक बार माँ को देखने भीतर के कमरे में गये और फिर बाहर जाकर सो गये। वह इंतज़ार करता रहा कि वह रात में कोठरी के भीतर आएंगे या बुआ बाहर उनके पास जायेंगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस इंतज़ार में वह रात में काफी देर से सोया जिससे उसकी आँख भी सुबह देर से खुली। घर का माहौल रोज़ जैसा ही था लेकिन पिता उसे कुंएं पर नहाता देख आये और बिना कुछ कहे-पूछे कुछ बातें समझायीं थीं जिनमें से ज़्यादातर उसे उस समय समझ में नहीं आयी थीं। उनमें से कुछ-कुछ बातें कभी दस तो कभी पन्द्रह साल बाद उसे अचानक समझ में आती रही हैं।

‘‘तुम्हारा दोस्त और तुम्हारा दुश्मन दोनों तुम्हारे भीतर हैं। जिसको तुम अपने ज़्यादा क़रीब रखोगे, वैसे बनोगे। दुश्मन हमेशा तुम्हें ऐसी बातें बतायेगा जिनमें तुम्हें लगेगा कि ज़्यादा आनंद आ रहा है लेकिन उसकी बातें मान कर तुमने उसे ज़्यादा सिर चढ़ाया तो वह तुम्हें ऐसी जगह ले जायेगा जहाँ से वापस आना नामुमकिन होगा। अपने भीतर के दुश्मन को पहचानना हमेशा और उससे दूर रहना नहीं तो वह पहले तुम्हें पागल करेगा फिर बरबाद कर देगा। मैं भी उससे दूर रहने की कोशिश कर रहा हूं।’’

बुआ इसके बाद चली गयी थीं और बाद में पता चला था कि फूफाजी उनके पास आकर माफ़ी मांग कर साथ रहने लगे थे। बुआ के लिये रिक्शा लाने के बाद पिताजी चुपचाप एक कोने में खड़े थे। जब बुआ माँ के पैर छूकर रिक्शे पर चढ़ी थीं तो उन्होंने आने के विपरीत पिता के पैर नहीं छुये थे। उसने देखा पिता बुआ के सामने आँखें झुकाये खड़े थे और बुआ से आँखें मिलते ही उनकी आंखें झुक गयी थीं। बुआ की आँखें फिर से भर आयी थीं और रिक्शा चल पड़ा था। केशव को अपने किये पर भारी पछतावा हुआ था और उसने रोकर अपने आप को इस शर्त पर माफ़ किया था कि दुश्मन की बात कभी नहीं सुनेगा लेकिन इधर जब से उसने ज़मींदार के बेटे का चेहरा देखा था, उसके मन में ऐसे-ऐसे सवाल उठ रहे थे जिसका जवाब उसके दोस्त के पास नहीं था। उसे अपने भीतर के दुश्मन की मदद लेनी पड़ी थी और दुश्मन ने उसे जो दिशा दिखायी थी उस पर वह पूरी गंभीरता से उतर आया था। बीच-बीच में उसका दोस्त अपनी पुरानी दोस्ती का वास्ता देकर कुछ समझाने की कोशिश करता लेकिन वह ऐसे सवाल सामने कर देता जिससे उसे चुप रह जाना पड़ता। वह समझ नहीं पा रहा था कि उसके आसपास क्या हो रहा है और उसे अपने दिल का बोझ हल्का करने के लिये क्या करना चाहिये।

बेटी ने शाम को पिता को गुड़ का रस देते हुये पिता के चेहरे पर बेचैनी और माँ के चेहरे पर तनाव देखा। वह चुपचाप खाना बनाने चली गयी। केशव कुछ देर तक चारपाई पर बैठा रहा फिर टहलने की नीयत से बाहर निकल गया।

केशव अंधेरा होने तक गाँव की पगडंडियों पर बिना मतलब गुज़रता रहा। आसमान में बादल बारिश के आगमन की सूचना दे रहे थे और पंछी इस बात से बेहद ख़ुश थे। उसे कभी अपने बेटे का चेहरा याद आता, कभी ज़मींदार के बेटे का, कभी दौलत का, कभी अपनी बुआ का, कभी अपने पिता का तो कभी अपने दोस्तों का। सोलह साल का सूर्यप्रताप एक दिन बरम बाबा के मंदिर में पूजा करने गया था और वहीं उसे सर्प ने काट लिया। गाँव वाले उसे लादपाथ कर वैद्य के पास ले गये थे जिसने पीठ से थाली चिपका कर सर्प का विष उतारने का मंत्र पढ़ना शुरू ही किया था कि सूर्यप्रताप के मुँह से झाग निकलने लगा था। गाँव का वैद्य जिस मरीज़ को ले लेता था उसे हमेशा ठीक कर देता था और जिसका चेहरा देखकर ही उसे शहर ले जाने की सलाह देता था वह अक्सर नहीं बचता था। ठीक करने के विश्वास से लिया गया उसका पहला व्यक्ति उसके मंत्र से बच नहीं सका था और मर गया था। वैद्य ने उस दिन से साँप का विष झाड़ने का मंत्र पढ़ना बंद कर दिया था। केशव और उसका परिवार कई महीनों तक ठीक से सो नहीं सके थे। हर किसी को नींद में सूर्यप्रताप दिखायी देता था। दबी ज़बान से दौलत बरम बाबा वाले सर्प का नाम ले कर कोई वृहद पूजा कराने की बात करती थी लेकिन केशव ने कभी इन बातों पर विश्वास नहीं किया। पुराने वक़्त की बातें उसके भीतर पसरती जा रही थीं जैसे कभी क़ीमती न दिखने वाली ये चीज़ें कितनी मूल्यवान हैं। उसे लग रहा था कि जितनी देर तक बाहर है उतनी ही देर तक उसको थोड़ी राहत मिल रही है। भीतर जाते ही वह फिर से अपने दुश्मन से जूझने में लग जायेगा जो लगातार अपनी बेसिर-पैर की बातें लेकर उसके पीछे पड़ा है। चलता-चलता वह कई गाँवों और साप्ताहिक बाज़ारों को पार करता कब पास के कस्बे तक पहुँच गया, उसे पता नहीं चला। वह बस अड्डे तक पहुँचा था कि अचानक ज़ोर की बारिश आ गयी। वह छोटे से बस अड्डे के शेड में चला गया और चुपचाप एक पत्थर की बेंच पर बैठ गया। यहाँ से आसपास सौ-पचास किलोमीटर के लिये बसें मिलती थीं और बसों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक थीं। शाम आठ बजे के बाद ये बस अड्डा सुनसान हो जाता था क्योंकि उसके बाद नौ और दस बजे की सिर्फ़ दो आख़िरी बसें वहाँ से छूटती थीं। केशव घण्टे भर से ऊपर बैठा रहा लेकिन बारिश ने थमने का नाम नहीं लिया। सामने देसी दारू की दुकान पर लगी भीड़ मौसम की अति से कतई अप्रभावित थी। केशव काफ़ी देर से अपने ख़यालों को संतुलित करने की कोशिश में लगा था लेकिन जब बस अड्डे का आख़िरी यात्री भी वहाँ से भीगने का जोखिम लेकर निकल गया तो केशव उठ कर दुकान में भीड़ के पीछे खड़ा हो गया। वहाँ से उसने रंगीन बयालिस डिग्री वाला ठर्रा खरीदा और बस अड्डे पर वापस आकर बैठ गया। सामने एक छोटी सी दुकान थी जहाँ बिस्किट नमकीन और पानी का कोई लोकल ब्राण्ड बिक रहा था। उसने एक नमकीन का छोटा पैकेट खरीदा और एक अपेक्षाकृत अँधेरी बेंच पर बैठ कर अपना ठर्रा पीने लगा। पूरी बोतल ख़त्म होने से पहले वहाँ दो लड़के पहुँचे जिन्होंने अभी-अभी जवानी में क़दम रखा था। उनकी उत्साह भरी बातें सुन कर स्पष्ट था कि दोनों अभी उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ उन्हें महसूस हो रहा था कि जहाँ से वे गुज़र रहे हैं, जो वे महसूस कर रहे हैं, वैसा पहले किसी और ने कहीं महसूस नहीं किया होगा। दोनों बुजु़र्गों की तरह दुनिया की हर चीज़ पर बात कर रहे थे कि लेकिन उनकी उम्र की सहूलियत के अनुसार बातचीत घूम फिर कर लड़कियों और उनके शरीर, उनके आकर्षण, प्यार और वासना के इर्दगिर्द घूम रही थी। केशव ने जब अपनी बोतल खत्म की और उसे बेंच के नीचे लुढ़काया तो उसके दिमाग में लड़कों की बातें अधिक स्पष्ट होने लगी थीं। उनमें से जो लम्बाई में थोड़ा अधिक था और इस वजह से अपनी उम्र से दो चार साल अधिक का लगता था, लड़कियों की बात आने पर उनके आकर्षण को ख़ारिज कर रहा था। दूसरा दोस्त थोड़ी कम लम्बाई का लेकिन अधिक तगड़ा था। लम्बे लड़के का अपने दोस्त से कहना था कि वह अधिक उम्र की औरतों में दिलचस्पी रखता है और अपनी माँ की एक सहेली उसे बहुत पसंद है। वह अपनी उम्र की लड़कियों की बजाय औरतों से रिश्ता रखना और उन पर अपनी जवानी को निसार करना पसंद करेगा। उसने दावा किया कि वह औरतों के मन को पढ़ सकता है और ऐसी कोई औरत नहीं जिसके लिये वह अपना जादू चलाये और उसका असर न हो। दूसरा लड़का उसे अय्याश बता रहा था और दोनों किसी लड़की और उसकी माँ की बात करते हुये हँस रहे थे। केशव के दिमाग पर शराब और बारिश दोनों का असर इस तरह हुआ था कि पहले से दिमाग में छाये सहमे ख़्याल अब पूरी स्पष्टता के साथ आ रहे थे। भीतर के दृश्य बारिश में भीगे से आ रहे थे और अचानक पहले बुआ का लाल चेहरा फिर दौलत का मदमाता चेहरा उसके मन में गूंजने लगा। उसने देखा दौलत के ऊपर कोई झुका हुआ है और दौलत का नशीला चेहरा पीछे की ओर देखकर किसी के न होने की तस्दीक कर रहा है।

दोनों लड़कों को जानकर निराशा हुयी कि रात नौ बजे जाने वाली आख़िरी बस तेज़ बारिश और जलजमाव की वजह से कैंसिल हो गयी थी। दोनों बातें करने लगे कि इस बार की छुट्टी की शुरुआत अच्छी नहीं हुयी है। लम्बा लड़का निराश हो गया कि उसे सुबह अगली बस का इंतज़ार करना पड़ेगा और दोस्त ज़ोर देने लगा कि वह फिर से उसके घर पर चला चले जहाँ वह पिछले चार दिन से ठहरा था। लम्बे लड़के ने कहा कि रास्ता बहुत ख़राब है और सुबह पाँच बजे की बस के लिये उसके घर से आने में दो घण्टे लग जायेंगे। उसने अपने दोस्त को वापस घर जाने की सलाह दी क्योंकि पानी बरसना रुक नहीं रहा था। काफ़ी समझाने के बाद तगड़ा लड़का अपने दोस्त को छोड़ कर जाने को तैयार हुआ। केशव ध्यान से उनकी बातें सुन रहा था। लम्बे लड़के के अकेले रह जाने के बाद वह उसके पास पहुँचा और उससे बातें करने लगा। पहले तो लड़के ने उसे अनदेखा करने की कोशिशें कीं लेकिन उसने बार-बार समझाया कि बेटा तुम मेरे घर ठहर जाओ क्योंकि बारिश रात भर होगी तो बस सुबह भी नहीं आयेगी और जब आयेगी नहीं तो जायेगी भी नहीं। लड़के ने अपना नाम जयदीप बताया और कस्बे के आवासीय कॉलेज का छात्र होने की बात बतायी। जब केशव को पता चला कि उसकी महीने भर की छुट्टी हो गयी है तो उसने अपने दुश्मन की बात पर ध्यान दिया जो काफ़ी देर से एक घिनौने ख़याल को उसके भीतर उतार रहा था। केशव ने जयदीप से धीमी आवाज़ में कहा कि उसकी पत्नी की उम्र बयालिस साल है और वह बहुत सुंदर है। जयदीप के कान खड़े हो गये। उसे किसी ख़तरे का एहसास हुआ और वह चौकन्ना नज़र आने लगा। उसने केशव को पागल कह कर झिड़का और दूर जाकर खड़ा हो गया जैसे केशव से आ रही बदबू उसे बर्दाश्त नहीं हो रही हो। केशव एक हत्यारे की तरह चपलता से खड़ा हो गया और उसके पास पहुँच गया। उस समय उसके चेहरे पर जो भाव थे अगर उन्हें किसी चित्र में हूबहू उतार कर उसे दिखाया जाता तो वह उसे अपना चेहरा मानने से इंकार कर देता।

केशव ने कहा कि उसकी पत्नी उससे ख़ुश नहीं रहती और वह अपनी पत्नी के चेहरे पर ख़ुशी देखना चाहता है

जयदीप ने उससे दुत्कारते हुये पूछा कि वह ऐसा घिनौना काम क्यों करना चाहता है। केशव ने कहा कि उसकी पत्नी उससे ख़ुश नहीं रहती और वह अपनी पत्नी के चेहरे पर ख़ुशी देखना चाहता है। जयदीप ने कहा कि उसने अपने दोस्त के सामने डींग हांकने के लिये वो सब फालतू बातें कही थीं और उसका कभी किसी औरत से कोई वैसा रिश्ता नहीं रहा, उसकी एक दोस्त है जिसे वह कभी चाहता था लेकिन अब वह उसके एक दूसरे बा-रोज़गार दोस्त को चाहती है इसलिये फिलहाल उसके जीवन में सिर्फ़ बैंक में अधिकारी बनने का सपना ही मुख्य है। केशव ने दौलत की सुंदरता का बखान शुरू किया और उसे बहुत आनंद आ रहा था कि वह एक अनजान लड़के के सामने अपनी पत्नी के हुस्न और उसकी जवानी का बखान कर रहा है। उसके भीतर से एक हल्की आवाज़ ये भी आ रही थी कि ये सब बंद करो और घर जाओ, तुम्हारी पत्नी और बेटी तुम्हारा इंतज़ार कर रही होंगी। वह बराबर उस आवाज़ को दबाये हुये उस आवाज़ को सुन रहा था जो कह रही थी इस लड़को को प्रेमी बना कर अपनी पत्नी को तोहफ़ा दे दो। अगर तुम्हारे अलावा उसे जीवन में ज़मींदार या किसी और की भी ज़रूरत कभी पड़ी हो तो इसका मतलब तुम्हारे अलावा कोई और भी है। जब कोई और भी है तो फिर कोई और भी हो, क्या फ़र्क पड़ता है। उसे सब कुछ खुल कर करना चाहिये। वह उसे मना थोड़ी करेगा। आज तक वह उस पर आँखें मूंद कर भरोसा करता रहा है। अगर उसे प्रेमी की ज़रूरत नहीं होगी तो इस लड़के या किसी भी आदमी से उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। अगर ज़रूरत होगी तो उसे अपनी प्रिया की यह ज़रूरत पूरी करनी चाहिये। उसके चेहरे पर एक क्रूरता ने जन्म लिया जो जल्दी ही उसका स्थायी भाव बन जाने वाली थी।

जयदीप के पास चारा भी कोई नहीं था और जैसी अजीब स्थिति सामने थी वैसी फिर कभी जन्म में पड़ेगी या नहीं, ये जयदीप के लिये विकट प्रश्न भी था। जैसा यह अधपागल दिखने वाला आदमी कह रहा है इसका मतलब है कि इससे कोई चोरी या लड़केबाज़ी वाला डर नहीं है, अगर और कोई ख़तरा होगा तो देखा जायेगा लेकिन बारिश रुकने तक का जुगाड़ तो हो ही गया। कल की कल देखी जायेगी, ये मन में सोचकर जयदीप केशव की बातों को चुपचाप सुनने लगा और केशव इसे जीत समझ कर जहाँ खड़ा था, वहाँ से और नीचे गिरने की कोशिश करने लगा।

केशव के पीछे रास्ते में लगे पानी से यथासंभव बचने की कोशिश करते हुये चल रहा जयदीप रास्ते भर ये सोच रहा था कि अगर इस आदमी से या किसी और से कोई ख़तरा हुआ तो वह उनका मुकाबला अपने बैग में रखे नेलकटर से करेगा। केशव के क़दमों में वैसी सुस्ती नहीं थी जैसी जाते वक़्त थी। वह तेज़ और उत्साहित क़दमों से जल्दी से जल्दी घर पहुँच जाना चाहता था। पीछे पलट कर उसने जयदीप को समझाया कि वह दौलत को चाची मौसी जैसा कोई संबोधन नहीं देगा और पहली मुलाकात से ही उसे अपने वश में करने की कोशिश करेगा। केशव ने उसे आश्वस्त किया कि इसमें वह उसकी पूरी मदद करेगा। जयदीप ने सहमति देते हुये सोचा कि कल सुबह नहीं तो दोपहर में वहांँ से भाग लेगा। बस रात में बारिश रुक जाये, उसने मन में प्रार्थना की।

दौलत और चंद्रमा दोनों खाना बना कर केशव का इंतज़ार कर रही थीं और घबरायी दौलत बगल वाले घर में गुहार लगा आयी थी। केशव जब घर पहुँचा तो उसका पड़ोसी अपनी साइकिल निकाल कर उसे खोजने जाने वाला था। उसने पड़ोसी का धन्यवाद किया और जयदीप को लेकर घर में पहुंँचा। उसने दौलत और चंद्रमा से उसका परिचय दो गाँव दूर रिश्ते के भाई के लड़के के रूप में कराया। दौलत को देख कर जयदीप देखता ही रह गया। एक तो रास्ते भर केशव के मुँह से सुनी तारीफ़, उम्र और मौसम की विवशताओं का कोलाज और रात का अँधेरापन, जयदीप जब दौलत के पाँव छूने झुका तो उसके गोरे और नरम पाँवों को हाथों से सहला दिया।

‘‘आपको चाची कहना पड़ेगा क्या ?’’ यह कह कर उसके केशव की ओर देखा जो कपड़े बदल रहा था और जयदीप के लिये अपने कपड़़ों में से चुन रहा था।

‘‘लगेंगी तो चाची ही बाकी तुम्हारी इच्छा।’’ केशव ने हँसते हुये कहा तो दौलत को अजीब सा महसूस हुआ। उसने एक बार केशव को देखा फिर जयदीप को जो उसे ऐसे देख रहा था जैसे आँखों में भर लेना चाहता हो, फिर जाकर दोनों के लिये खाना निकालने लगी।

उसने महसूस किया था कि केशव अचानक उससे खिंचा खिंचा सा रहने लगा है। वह केशव के पास जाने की कोशिश करती तो उसकी आँखों में कभी अजनबीपन और कभी चिंगारियाँ देखकर सहम जाती। कुछ तो ऐसा हुआ था बीते दिनों में जिसने केशव को भीतर से पूरी तरह बदल दिया था। पहले दौलत ने इसे बेटी की शादी के दबाव से जोड़ा था लेकिन अब पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से वह शादी के लिये पैसे जुटाने के इंतज़ाम से उदासीन हुआ था, दौलत समझ गयी थी कि केशव अपने खेत बेचने को मन ही मन तैयार हो चुका है जिसका ग्राहक उसकी पट्टीदारी का एक भाई है जो कई सालों से इस सौदे के लिये तैयार है। वह केशव के सो जाने के बाद बहुत ध्यान से उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश करती। कभी दुलार में भर उसके चेहरे पर अपनी हथेली रखती तो केशव जाग जाता और उसका हाथ झटक देता।

दौलत ने जयदीप का बिस्तर बाहर लगाया तो काफ़ी रात गुज़र चुकी थी। रात में उसने केशव के सीने पर हाथ रखा तो केशव ने चुपचाप उसका हाथ हटाया और आँखें बंद कर सोने का अभिनय करने लगा। दौलत की आँखें भर आयीं और उसे लगने लगा कि बीच-बीच में वह जिस तरह अपने पति की तुलना दूसरों से करती है या फिर कभी-कभी ख़ुद को सब कुछ होते हुये भी किसी अनजानी सी कैद में महसूस करती है, यह उसी अशुभ सोच का फल है जो उसे भुगतना पड़ रहा है।

मानिक ने आशंका व्यक्त की कि अगर ऐसी ही बारिश अगर तीन से चार दिन और हुयी तो बूढ़ा अजगर फिर से बाहर आ सकता है

बारिश सुबह भी नहीं रुकी थी, थोड़ी कम ज़रूर हो गयी थी। दौलत की आँख खुली तो उसने केशव को बिना छतरी लिये घर से निकलते देखा था। उसके आवाज़ लगाने पर उसने यही कहा कि बारिश आज भी रुकने के आसार नहीं हैं इसलिये वह कुछ खाने पीने की सामग्री लेकर आयेगा ताकि जयदीप यहाँ हफ्ते दस दिन रुके तो उसको कोई तकलीफ़ न हो। दौलत ने उससे कुछ और भी कहना चाहा लेकिन वह नहीं रुका। रात भर की बारिश से रास्तों में घुटनों से थोड़ा नीचे तक पानी भर गया था। केशव के दिमाग में जो अवरोध था उसके सामने यह कुछ भी नहीं था इसलिये वह पूरी सहजता से चलता हुआ गाँव के बाहरी सीमाने पर अपने बचपन के दोस्त मानिक के घर पहुंचा जो छोटे से घर में अकेला रहता था। उसके घर के सामने थोड़ी दूरी पर बरम बाबा का मंदिर और गाँव का सबसे बूढ़ा नीम था जिस पर बचपन में केशव और मानिक ओल्हापाती और तमाम तरह के खेल खेला करते थे। मानिक ने एक लड़की के प्रेम में विवाह नहीं किया था और दिन भर नशा करने और कड़वी ज़बान की वजह से पूरे गाँव और मित्रों रिश्तेदारों से कट गया था। केशव का शादी के बाद तक उसके साथ बराबर उठना बैठना था लेकिन दौलत के रोकने टोकने, समझाने और बात का बतंगड़ बनाने पर उसने मानिक के साथ मिलना जुलना कम कर दिया था। दोस्त से मिलने जाना तो हर रात ठर्रा पी के आना उसे ज़रा भी पसंद नहीं था और बेटी के हो जाने के बाद उसके जीवन में वैसी भी कई और ज़िम्मेदारियाँ चुपके से चली आयी थीं तो दोस्तों से मिलना जुलना औपचारिक ही रह गया था। मानिक के घर फुर्सत से मिलने केशव सालों बाद आया था। इसके पहले वह अपने बेटे की मौत पर कुछ दिन बाद आया था तो उसे पता चला था कि मानिक ने पैसों की तंगी की वजह से शराब छोड़ कर चिलम को अपना साथी बना लिया है। वह प्रायः दिन भर एक ही जगह पड़ा रहता था और गाँव के कुछके नये पुराने दोस्तों के साथ पासे या ताश खेलता रहता था। केशव उसके घर पहुँचा तो वह कहीं बाहर गया था मगर उसकी चिलम गरम थी। इसका मतलब केशव ने लगाया कि वह अभी थोड़ी देर पहले वहीं था। वह उसकी कोठरी में बैठ कर इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर बाद मानिक आया और बताया कि निपटने जाने की गाँव में बहुत समस्या है और वह एक पेड़ की सोर पर बैठ के हाजतमुक्त होकर आ रहा है। उसने खिलखिलाते हुये कहा कि अगर दो दिन और बारिश होती रह गयी तो गाँव में पिछले के पिछले साल की तरह नाव चलेगी और हगने के लिये नाव पर बैठ कर जाना पड़ेगा। यह कह कर मानिक ज़ोर से हँसा तो केशव को याद आया कि बचपन में वे और उसके दोस्त मनाया करते थे कि इस साल बाढ़ आये ताकि नाव का मज़ा लेने को मिले लेकिन बाढ़ इस क्षेत्र में प्रायः तीन-चार साल के अंतराल के बाद ही आया करती थी। वह भी मुस्कराया।

मानिक ने नयी चिलम भरी और चिलम जगाने के बाद उसे केशव की ओर बढ़ाया। केशव ने हिचकिचाते हुये चिलम थामा। उसने एक ज़ोरदार दम लगाया और ढेर सारा धुँआ उगला। मानिक की दृष्टि में पुराने दोस्त के लिये तारीफ थी और तारीफ़ स्वरूप उसने दूसरी चिलम भी जल्दी ही भर दी। केशव की आँखें लाल हुयीं तो उसे दुनिया की गति थोड़ी अपने साथ मिलती सी महसूस हुयी। उसकी अकड़ी हुयी देह और सभी इंद्रियाँ थोड़ी सहज लगने लगीं और वह वहीं लेट गया।

उसने मानिक से बिना लाग लपेट सीधा पूछा कि क्या उसे कभी महसूस नहीं होता कि उसने बिना शादी ब्याह किये अकेला रहने का जो फैसला किया था वो गलत था। मानिक से कुछ भी पूछने के लिये उसे कभी किसी भूमिका की ज़़रूरत नहीं रही थी। उसे लेकर उसके मन में हमेशा एक अपराधबोध रहता था कि अपनी ज़िंदगी का ढर्रा बदलने के बाद सभी दोस्तों ने एक समय के बाद मानिक को अपनी परिधि से काट दिया था। मानिक ने कभी कोई शिकायत नहीं की। बाप के छोड़े मुट्ठी भर खेत अधिया पर भी उसके जीने खाने भर का दे देते थे और इससे ज़्यादा उसे चाहिये भी नहीं था। मानिक अपने दोस्त के सवाल पर पहले हँसा, फिर थोड़ी देर मुस्कराया फिर संजीदा हो गया।

‘‘पहले कभी लग भी जाता था तो अब क्या लगेगा, अब तो आखिरी आश्रम है।’’ उसकी बात केशव नहीं समझा तो उसने केशव के लिये फिर से चिलम भरी ताकि केशव अपने घर परिवार की चिंता से दूर होकर पहले उसके धरातल पर आकर उसकी बात तो समझ ले।

‘‘पहले जैसे सौ साल का जीवन मान कर चार आश्रम बताये गये थे पचीस पचीस साल के, अब साठ से अधिक तो जल्दी कोई जाता नहीं तो पंद्रह-पंद्रह साल के वही चार आश्रम हो गये हैं। पहला पंद्रह बचपन खेलने और जानने वाला, दूसरा पंद्रह पढ़ाई फिर नौकरी कर के जीवन व्यवस्थित करने की कोशिश करने वाला, फिर तीसरा पंद्रह शादी ब्याह और बच्चे का सुख लेने का और आखिरी पंद्रह इन सबके पीछे भाग के या इन सबसे दूर भाग के रोने वाला। तो हांँ, इसके पहले वाले पंद्रह में कभी-कभी लगता था कि अकेला रहके गलत किये या ठीक लेकिन इस आखिरी पंद्रह में तो हमेशा यही लगता है कि एकदम ठीक किये। मरना ही है तो अकेला मरे आदमी, किसी को मार के या किसी को रुला के क्यों मरना।’’

ऐसी बातें केशव को बेहद बचकानी और ध्यान न देने योग्य लगती थीं लेकिन उस समय की बारिश और हवा में न जाने क्या था, केशव को उसकी बातें बिल्कुल ठीक लगीं। बारिश अब तेज़ होती जा रही थी और मानिक ने आशंका व्यक्त की कि अगर ऐसी ही बारिश अगर तीन से चार दिन और हुयी तो बूढ़ा अजगर फिर से बाहर आ सकता है। अजगर की बात सुनकर केशव के होंठों पर मुस्कराहट आ गयी।

गाँव का सबसे बूढ़ा नीम बरम बाबा के मंदिर के पास था और उसके तीन अत्यंत मोटे तने उसकी आकृति को रहस्यमयी और डरावना बनाते थे। बीच वाला तना अजीब आकृति में था और तने के बीच का हिस्सा बहुत बड़े आकार में फूला हुआ था और उसमें एक कोटरनुमा भीतर जाने का रास्ता था। गाँव के बच्चों में ये बात उनकी पिछली पीढ़ियों से फैली थी कि इस कोटर में एक विशालकाय सर्प रहता है जो बरम बाबा का रखवाला है। कई बच्चों को उनके बाबाओं और पिताओं ने अपनी आँखों से उस सर्प को देखने की कथा सुनायी थी और फिर बाद में उस परम्परा को कायम रखते हुये कई बच्चों ने भी उस सर्प को देखने का दावा किया था। एक शाम मानिक को बुखार हुआ था और उसने काँपते स्वर में अपने दोस्तों को उसे देखने की कथा सुनायी थी। कुछ समय बाद जब एक दो और दोस्तों ने भी अलग-अलग घटनाओं में उस अजगर को देखने की बात की थी तो केशव ने भी एक दिन पूरी पटकथा तैयार कर अपने दोस्तों में शोर मचाया था कि उसने अजगर देखा था। उसने दोस्तों को बताया कि वह बरम बाबा के मंदिर की तरफ से आ रहा था और तेज़ पेशाब लगने की वजह से वह मंदिर से थोड़ी ही दूरी पर पेशाब करने लगा था कि नीम के पेड़ से वो सर्प उसकी ओर झपटा था। उसने किसी तरह भाग कर अपनी जान बचायी थी। बचपन में केशव को हमेशा लगता था कि उसने भले ही सर्प के बारे में झूठ बोला था लेकिन उसके बाकी दोस्तों, ख़ासकर मानिक ने ज़रूर वो अजगर देखा होगा क्योंकि उसकी बातें सुनते हुये कभी नहीं लगता था कि वो झूठ बोल रहा है। हालांकि उम्र होने के साथ-साथ केशव को इन सब बातों पर हँसी आती थी और वो समझ गया था कि ये अजगर सिर्फ़ कहानियों में साँस लेता है और गाँव के लोग इसे पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी कथाओं में ज़िंदा रखते हैं। दिमाग में हल्की हवा महसूस करता केशव दीवार की टेक लेकर टेढ़ा हुआ और हँसता हुआ मानिक का मज़ाक उड़ाने लगा। मानिक ने सर्प की बात को हल्के में न लेने का आग्रह किया तो केशव ने इन सब अफ़वाहों पर उम्र का झाड़ू फेरते हुये बताया कि कहीं कोई सर्प नहीं है और सबकी तरह उसने भी सर्प देखने की झूठी कहानी फैलायी थी। उसकी बात सुनकर मानिक गंभीर हो गया और ज़रूरत न होने पर भी तीसरी चिलम भरने लगा। उसने ख़ुद माचिस दिखा कर अपनी चिलम जगायी और गंभीर मुद्रा में दरवाजे़ की तरफ देखता रहा। केशव ने माहौल को हल्का करने के लिये कहा कि बचपन ऐसा ख़ूबसूरत गाँव था जहाँ कोई भी कहानी सच्ची लगती थी। मानिक ने फिर से ज़ोर दिया और कहा कि उसने सर्प सच में देखा था। केशव मुस्कराता रहा और इस बार उसने दोस्त की बात को काटा नहीं बल्कि मन ही मन सोचने लगा कि विवाह और बच्चे होने के बाद आदमी बहुत प्रेक्टिकल हो जाता है लेकिन जो अपने पुराने वक़्त में ही रुका रहे, वो नयी तरह से सोचने पर ख़ुद को बूढ़ा महसूस कर सकता है। मानिक अपने बचपन और किशोरावस्था को झुठलाना नही चाहता क्योंकि उसके पास सबसे सुंदर यादें उसी समय की हैं, यह सोचकर केशव ने कुछ भी टिप्पणी करने से आगे खु़द को बचाये रखा और मानिक के हाथ से चिलम लेकर दम लगाने लगा।

जयदीप का बिस्तर ओसारे में लगता था और आज बहुत लम्बे समय बाद केशव ने दौलत को अपनी कोठरी के अंधियारे में निर्वस्त्र किया था। उत्तेजना की गलियों में भटक कर लौटने के बाद जब दोनों एक दूसरे के पास होकर भी मीलों दूर थे, अचानक दौलत ने करवट बदली और अपनी हथेली केशव की छाती पर रख दी।

‘‘अगर कुछ पूछना चाहते हो तो खुल कर पूछो। हम बुरा नहीं मानेंगे।’’ दौलत की इस बात पर किसी बीहड़ में गुम हो चुका केशव अचानक अपने बिस्तर पर वापस लौटा। उसे दौलत से कुछ पूछना नहीं था लेकिन वह सब कुछ जानना चाहता था। दौलत ने उसे ख़ुद ये मौका दिया था इसलिये वह कुछ न कुछ तो उससे पूछना चाहता ही था। उसने कुछ इस तरह भूमिका बनानी शुरू की ताकि दौलत को उसके जाल का एहसास भी न हो और वो उसमें फंस भी जाये।

दौलत ने जितना समझा उतने में यही पाया कि उसका पति उससे ये जानना चाहता है कि क्या कभी उससे दूर होने पर उसने किसी और तरीके से अपनी देह की ज़रूरत को शांत करने की कोशिश की है। बदले में केशव उसे कई तरह के उदाहरण देता रहा जिसमें बुआ का उदाहरण सबसे स्पष्ट था। उसने दौलत को शुरुआती कुछ सालों के बाद धीरे-धीरे विश्वास में लेने के बाद बुआ वाले वृत्तांत के बारे में बताया था। इस बात पर दौलत के कुछ सहज होने के बाद जोश भरे पलों में उसने उसे यह भी बताया था कि कभी-कभी उसे यह अपने जीवन की सबसे बड़ी कमी की तरह लगता है कि वह उस रात पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाया था। दौलत यह बात और उसके भीतर की कुंठा को समझती थी और इस बात पर केशव दौलत पर निसार हो गया था कि अंतरंगता के नाज़ुक पलों में वह अक्सर बुआ और उस रात के बारे में पूछने लगती थी और केशव के अंदर जैसे कोई सोया हुआ जानवर जाग जाता था। सामान्य तरीके से देहाचार करता केशव किसी जंगली जानवर की तरह दौलत पर नये जोश के साथ टूट पड़ता था और तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद ये बोल कर दौलत के सामने अपनी शर्मिंदगी दूर करता था कि सही हो या गलत, पागलपन के इस दौरे का आनंद उसके साथ दौलत को भी मिलता ही है। दौलत इस पर सिर्फ़ मुस्कराती थी और केशव कभी जान नहीं पाया कि दौलत को उस समय अच्छा लगता है या बुरा क्योंकि उन पलों के पहले और बाद कभी दौलत इसके बारे में एक शब्द न बात करती थी न उसकी बातों का मुस्कराहट के अलावा कोई जवाब देती थी। उसने दौलत को बताया था कि जब एक बार वह बाकी दोस्तों की तरह मंदिर आंदोलन में गया था और पहली बार पत्नी से इतने दिनों के लिये दूर हुआ था तो एक रात आख़िर मजबूर होकर उसने अपनी पत्नी की निर्वस्त्र देह को याद करते हुये अपनी आग को अपने हाथों से शांत किया था। उसने उदाहरण देने के लिये दौलत को ये भी समझाया कि कई बार शुरू में वह बुआ और उनके लाल चेहरे को याद करता हुआ बहुत दूर निकल जाया करता था और अपने हाथों से ख़ुद के साथ ऐसा व्यवहार कर बैठता था जिस पर उसे बाद में बहुत पछतावा हुआ करता था। उसने ये नहीं बताया कि उसकी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा इस पछतावे में बीतता रहा है जिसे वह पूरी तरह किसी से नहीं बांट सकता। कुछ अंधेरे ऐसे होते हैं जिनमें कोई आपका हाथ पकड़ कर रास्ता नहीं दिखा सकता। वो आपके जीवन में आ गया तो हमेशा रहेगा और वक़्त के साथ उसका गाढ़ापन और बढ़ता जायेगा।

केशव गाँव के कई दोस्तों के साथ मंदिर आंदोलन में अयोध्या गया था और मस्जिद का ढाँचा टूटने के बाद उसने गाँव के सरपंच के यहाँ फोन किया था

दौलत ने शर्माते हुये उन्हीं दिनों की याद की जब केशव गाँव के कई दोस्तों के साथ मंदिर आंदोलन में अयोध्या गया था और मस्जिद का ढाँचा टूटने के बाद उसने गाँव के सरपंच के यहाँ फोन किया था। दौलत ने उसकी आवाज़ में बहुत जोश महसूस किया था और रात को सोते हुये उसे केशव की हँसी के साथ उसका खिलखिलाता चेहरा दिखता रहा था। ऐसी हँसी के साथ केशव की बदमाशियाँ उसे याद आती रही थीं और उसका मन चंचल हो गया था। केशव इस नयी जानकारी से थोड़ा हैरान हुआ और फिर उत्साहित। दौलत ने बताया कि उस रात उसने ख़ुद को हाथ लगाया था।

‘‘किसे याद किया था वैसा करते हुये ?’’

दौलत केशव का सवाल नहीं समझ सकी थी।

‘‘आपको और किसे ?’’

‘‘अरे वैसे नहीं, हमें याद करके शुरू किया होगा लेकिन बीच में कोई और चेहरा भी तो याद आया होगा? जो कभी तुम्हारे गाँव में तुम्हें पसंद रहा हो, या कोई ऐसा जिसको तुमने वैसे देखना चाहा हो ?’’

दौलत थोड़ी देर चुप रह कुछ सोचती रही। पति के अंदर के बदलावों को वह काफ़ी दिनों से देख रही थी और समझ चुकी थी कि इससे भागने की बजाय इसे समझने से ही बात बन सकती है। उसने सोच कर कहा कि वह सिर्फ़ केशव को ही याद कर रही थी तो केशव का चेहरा बुझ सा गया। दौलत उस चेहरे को ध्यान से पढ़ती रही। केशव ने फिर से हौसला जुटाया और दौलत को अपनी शादी की शुरुआती रातें याद दिलाने लगा जब दोनो रात भर एक दूसरे से गुत्थमगुत्था रहते थे और एक दो से आगे तीन बार भी एक दूसरे में उतरते रहते थे। दौलत केशव के मन को समझने की कोशिश में चुपचाप मुस्कराती रही। केशव ने दूसरी बार दौलत को चूमना और सहलाना शुरू किया और पैंतरा बदलते हुये कहा कि दोनों के मन उतने ही जवान आज भी हैं लेकिन बात उम्र की होती है। अगर उसकी उम्र जयदीप इतनी होती तो वह तुरंत दूसरी बार के लिये तैयार हो चुका होता। यह कहते हुये उसने चोर नज़रों से दौलत के भाव पढ़ना जारी रखा भले प्रत्यक्षतः वह उसे पूरे जोश से चूमने में लगा था। उसने ग़ौर किया कि जयदीप का नाम सामने आते ही दौलत कुछ परेशान सी हुयी फिर उसने अपने आपको संभाल लिया। केशव ने दूसरी बार कोशिश की लेकिन दौलत के भीतर कोई हलचल नहीं हुयी तो वह भी आख़िर थोड़ी देर बाद दौलत का चेहरा अपने सीने पर रख सहलाता हुआ सो गया। उसके सोने के बाद दौलत देर तक उसके चेहरे को घूरती रही कि आख़िर उसके मन में क्या चल रहा है।

हमारे आगे और पीछे समय के दो दर्पण होते हैं जिनमें हम अपने चेहरे को देखते और समय की गति को पहचानने की कोशिश करते हैं। हमारे सामने रखे दर्पण में हमारा वो चेहरा हमें दिखायी देता है जैसा हम ख़ुद को, अपने समय को और अपने जीवन को समझना चाहते हैं, जैसा हमें ऊपर-ऊपर दिखायी देता है, जैसा हमें लोग बताते हैं या फिर हम चाहते हैं कि जैसा लोग हमें बतायें या समझें। दूसरा दर्पण हमारे पीछे रखा होता है जिसमें देखने के लिये पीछे की ओर झुकना पड़ता है। इसमें हम अपना असली चेहरा देख सकते हैं लेकिन यह पीछे देखना कुछ ऐसा तकलीफ़ भरा होता है कि हम आख़िरी-आख़िरी तक इस दर्पण में देखना टाले रहते हैं। हम जानते हैं कि हमारा असली चेहरा और हमारे असली जीवन की तस्वीर इस वाले दर्पण में ही स्पष्ट देखी जा सकती है लेकिन हम इसमें देखकर अपने जीवन की असली और उदास कर देने वाली सच्चाई को देखना अपने जीवन के आख़िरी काम की तरह भूले रहते हैं। दौलत भी अपने जीवन की सच्चाई को देखने से इनकार किये आँखें मूंदे रहती थी लेकिन इधर कुछ दिनों से इस दर्पण और उसके बीच की दूरी क्रमशः कम होती जा रही थी।

जयदीप अगले ही दिन निकलने का इच्छुक था लेकिन घर में घुसते ही उसे जिस चीज़ ने रोक लिया था वो चंद्रमा की आँखें थीं जिन्हें देखकर जयदीप को ऐसा लगा था जैसे उसे कोई बहुत ही मुश्किल, कोई अबूझ सी पहेली समझने के लिये दे दी गयी है। इतनी सुंदर लड़की की आँखों में आख़िर ऐसा ख़ालीपन कैसे आ सकता है, ये बात उसकी समझ से परे थी। उसे यहाँ तीन दिन हो गये थे और उसने देखा था कि चंद्रमा घर को अपनी उपस्थिति से अनभिज्ञ रखती है। वह इस धरती पर किसी की ग़लती की तरह जी रही है और वह अपने व्यक्तित्व से इस कदर सहमी नज़र आती थी कि जयदीप को अपनी उम्र और अपने उत्साह पर अफ़सोस होने लगा। उसने बात बढ़ाने के क्रम में एक दो बार चंद्रमा से कुछ पूछने जानने की कोशिश की थी लेकिन चंद्रमा हूँ हाँ में जवाब देकर किसी संभावना को आगे बढ़ने नहीं दे रही थी। जयदीप को वह ख़ुद से जितना दूर रखने की कोशिश करती, जयदीप उतना बेचैन होता गया। वह भूल गया कि उसे अपने घर भी जाना है और उसे महसूस होने लगा कि उसे समय ने किसी ख़ास मकसद से इस घर में भेजा है। चंद्रमा का आकर्षण उसके मन में हर क्षण पहले से अधिक सघन तरीके से बढ़ता जा रहा था। वह केशव से घबराता था क्योंकि केशव उसे अकेला पाते ही ऐसी बातें करने लगता था जिससे उसे अपनी साँस घुटती सी महसूस होती थी।

तीसरे दिन कुछ देर के लिये बारिश रुकी थी और आसमान साफ़ हो गया था। ऐसा लग रहा था कि आसमान अपने बचे खुचे बादलों को समेट कर अब बहुत दूर जा रहा है और अब काफी दिनों तक इधर का रुख़ नहीं करेगा। गाँव वाले बादलों के इस छल को जानते थे इसलिये कुछ और वक़्त उनकी नीयत जानने का इंतजार कर रहे थे। कुछ बच्चे पानी हेलते हुये अपने दोस्तों से मिलने उनके घर चले गये थे और कुछ चंचल औरतें दो दिन की बातें व अनुभव अपनी सखियों से बाँटने के लिये साड़ी घुटनों तक उठाये बाहर निकली थीं। जयदीप अब किसी बहाने की ओट नहीं ले सकता था। उसने अपना बैग ठीक कर लिया था। दौलत पड़ोस के घर में नमक या चीनी लेने गयी थी और चंद्रमा हमेशा की तरह चूल्हे के पास बैठी चूल्हे से बातें कर रही थी। जयदीप ने चूल्हे को सुनाते हुये कहा कि वह जा रहा है। चूल्हे ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने चूल्हे से कहा कि उसका बनाया खाना उसे अगले कई जन्मों तक याद रहेगा। चूल्हा धीमे-धीमे सुलगता रहा और जयदीप को महसूस हुआ कि अगर वह तुरंत नहीं निकला तो उसके जीवन में कुछ ऐसा होने वाला है जिसे संभालने के लिये अभी वह शायद बहुत छोटा हो या बहुत नादान। वह अपना बैग लेकर निकला ही था कि बाहर से आता केशव उसका हाथ पकड़ कर भीतर ले गया।

केशव जयदीप को किसी दूसरी दुनिया का प्राणी लग रहा था। एक सुंदर और पर्याप्त सुखी परिवार में कोई एक आदमी इतना बीमार कैसे हो सकता है ? और अगर घर का यह मुखिया ही इतना बीमार था तो यह घर अभी तक बचा कैसे है ? उसने केशव के प्रस्ताव पर थूक दिया और नफ़रत से उसका चेहरा देखने लगा। केशव के चेहरे पर किसी बीमार जैसे भाव थे जिसे पता हो कि उसकी उम्र सिर्फ़ कुछ घण्टों की बची है और वह अपनी आख़िरी इच्छा बता रहा हो। जयदीप ने वापस अपना बैग कंधे पर लिया और निकलने लगा तो केशव ने उसका बैग पकड़ लिया। उसी पल जयदीप की नज़र चंद्रमा पर पड़ी जो चूल्हे से निकल कर ओसारे तक आयी थी और अपनी ख़ाली आँखों से सिर्फ़ जयदीप को देखे जा रही थी। जयदीप ने बैग कंधे से उतारा ही था कि हल्की बूंदाबांदी के भेष में बादल फिर से अपनी रौ में वापस आते दिखे।

केशव दौलत के ऊपर झुका हुआ था और दौलत के ऊपर का हिस्सा निर्वस्त्र था। वह लगातार अपनी बढ़ती जा रही उम्र की बातें कर रहा था और अपनी कम उम्र को याद करने के लिये जयदीप के नाम का सहारा ले रहा था। दौलत समझ चुकी थी कि वह एक ऐसी अनबूझ पहेली में उलझ चुकी है जिसे पूरी कोशिश कर के भी सुलझाना शायद उसके बस का नहीं है। पुरुष की कल्पनाएं बेलगाम होती हैं और वो जिस भी दिशा में जाने लगीं, उसका अतिक्रमण करना ही उनकी नियति होती है। हर पुरुष के भीतर एक बेलगाम जानवर होता है जिससे बचे रहना और जिसे बचाये रखना उसके जीवन के ज़रूरी कामों में से एक होता है। दौलत समझ चुकी थी कि आज तक वो जिसके साथ रहती आयी थी, ये वो पुरुष नहीं है। ये कोई और है जो अपने भीतर के जानवर की पीठ पर सवार है। हालाँकि इतना तो वो भी नहीं समझ पायी थी कि वो जानवर अब बाहर आकर केशव के ऊपर सवार हो चुका था और अब केशव उसे नहीं बल्कि वो केशव को संचालित कर रहा था। केशव अपने मन में एक से एक कुत्सित कल्पनाएं ला रहा था और जब वह दौलत के भीतर उतर रहा था तो उसके मन में कल्पना थी कि ज़मींदार दौलत के ऊपर झुका हुआ है और दौलत उसके भीतर उतरने का इंतज़ार कर रही है। दो तीन बार प्रयास करने के बाद भी केशव अपनी उस उम्र में नहीं जा पाया था जहाँ दौलत के भीतर उतरने के लिये उसे किसी अतिरिक्त प्रयास की ज़रूरत नहीं होती थी। उसकी शिथिलता उसे झुंझला रही थी और तभी उसने चोर नज़र से खिड़की की ओर देखा। खिड़की उसने जान बूझ कर आधी खुली छोड़ रखी थी और जब उसने जयदीप के चेहरे की झलक वहाँ देखी तो उसे अपने भीतर एक अनोखा और अबूझ तनाव महसूस हुआ। एक ऐसा तनाव जिससे वह अब तक अनभिज्ञ था, एक ऐसा भाव जिसके बारे में कोई अगर उसे एक महीने पहले बताता तो वह घृणा से सामने वाले के चेहरे पर थूक देता लेकिन इस समय यह भाव उसे उत्तेजित कर रहा था। इस कदर उत्तेजित कि जब वह दौलत के भीतर उतरा तो दौलत के मुँह से वो कराह निकली जो सुख में हैरानी मिलने से अपने आप निकल पड़़ती है। इस कराह ने केशव के भीतर और बिजली भरी और तेज़ी से धक्कों की बढ़ती आवृत्ति में भी अचानक उसकी निगाहों का अनुसरण करने की कोशिश में दौलत ने भी कनखियों से खिड़की पर देख लिया। वहाँ जयदीप का चेहरा था जो आँसुओं में भीगा हुआ था। शायद आँसू न भी हों क्योंकि बारिश लगातार हो रही थी और अब बारिश के साथ बिजली भी कड़कने लगी थी।

चंद्रमा ने बिजली के एक बार कड़कने में जयदीप का चेहरा खिड़की पर देखा था जो रो रहा था और भीतर देख रहा था। चंद्रमा को अपनी ओर देखते हुये निमिष भर में जयदीप ने उसकी आँखें पढ़ीं और आकर ओसारे में उसके पास बैठ गया। चंद्रमा खाट पर बैठी थी और जयदीप उसके पाँवों के पास उसके पाँव पकड़ कर बैठा था। जयदीप की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे और वह जैसे किसी ऐसे अपराध के बोझ तले जलता जा रहा था जो वो करना तो नहीं चाहता था लेकिन जिसे रोकने के लिये भी उसने कुछ नहीं किया था। चंद्रमा से आँखें मिलाने में उसे डर लग रहा था लेकिन अचानक वह किसी नींद से जागा जब उसने चंद्रमा की हथेली अपने गालों पर महसूस की। उसने चेहरा उठाया तो देखा चंद्रमा की आँखों से भी लगातार आँसू गिर रहे थे।

उसने दौलत के पल्लू को उसके पैरों से उठा कर उसके सीने पर रखा और फिर खड़ा होकर एक हाथ पीछे सरक गया

चंद्रमा ने उसके आँसू पोंछे और जब उसने बोलना शुरू किया तो उसे अपनी ही आवाज़ किसी और की आवाज़ लगी। होश संभालने के बाद इतनी देर तक कभी वह नहीं बोली थी और आज जयदीप की आँखें और उसके कान उसके लिये सबसे अच्छे साथी बने बैठे थे। जयदीप को समय ने उसके यहाँ अचानक और विचित्र तरीके से आने का उद्देश्य अच्छी तरह समझा दिया था। चंद्रमा ने उसे अपने घर, जीवन और अतीत के सभी चित्र दिखाने के साथ अपने छोटे भाई के बारे में भी बताया जो उसका दुनिया में सबसे प्रिय था। उसका हँसता खेलता भाई अचानक एक सुबह उठ कर कहीं चला गया था और तीन दिनों तक वापस नहीं आया था। उसे तीन दिन बाद खोजते-खोजते पास के कस्बे में पाया गया था लेकिन वापस आने पर वह कोई और ही लगने लगा था। चंद्रमा के पास वह भूल कर भी नहीं बैठता था और माँ पिता के किसी सवाल का जवाब नहीं देता था। दिन भर जंगल में या बरम बाबा के मंदिर पर गुमसुम बैठा रहता था। उसे क्या हुआ है, ये जानने की पूरी कोशिश के बाद भी न चंद्रमा कामयाब हो पायी थी न उसकी माँ और ऐसे ही एक दिन बरम बाबा के मंदिर से शाम को लौटते हुये उसे सर्प ने डंस लिया था और उसकी मृत्यु हो गयी थी। जयदीप उस रात सिर्फ़ सुनता रहा। वह सिर से पाँव तक सिर्फ़ कान हो गया था।

सुबह जागने पर कोई दूसरा ही जयदीप था। जीवन को जय करने का दीप उसके भीतर जल चुका था। वह पूरी गंभीरता से उठा और अपने खर-खानदान में दादाओं परदादाओं और उनके पुत्रों, सहोदरों को याद किया जिनका विवाह सोलह से अठारह होते कर दिया गया था। उसे अपने पिता का संवाद याद आया जिसमें वह समय की गति नापते हुये बताते थे कि जब इक्कीस साल की उम्र में वह बारात लेकर गये तो पूरे गाँव में हल्ला हो गया था कि लड़कवा बुढ़ाय गवा है। उसने अपनी उम्र के उन्नीस में जाने पर पहली बार गर्व किया और उसे अचानक अपने घर वाले बेहद समझदार और शुभचिंतक प्रतीत हुये जो पिछले साल भर से उसकी शादी के लिये घेरेबंदी कर रहे हैं। कितना सही कहते हैं वे, उसने सोचा। सही समय पर शादी करने से बाद में सब सही रहता है, उसकी माँ अक्सर कहती। माँ बहुत सही कहती है लेकिन अब तक वह शादी से इसलिये भागता रहा क्योंकि उसे लगता था कि वो इसके लिये अभी छोटा है। कोई ऐसा चेहरा तो हो जो उम्र के पक जाने को महसूस कराये। कोई भी उम्र ये कहाँ लगने देती है कि मन अब इस नयी ज़िम्मेदारी के लिये तैयार हो चुका है। संसार के युद्धक्षेत्र में अगर स्वयं को अचानक न फेंक दिया जाये तो क्या अपने आप अंदर से आवाज़ आयेगी कि मैं अब पिता या माँ बनने के लिये तैयार हो चुका हूं, मैं विवाह करने को मानसिक रूप से तैयार हो चुका हूँ, मैं अब मरने के लिये पूरी तरह तैयार हो चुका हूँ। हर कद़म पर कोई होता है जो उम्र की आहट को महसूस कराता है। जवानी में यह किसी आकर्षक चेहरे के रूप में आता है तो ढलती उम्र में किसी दोस्त की मौत में। पहली बार जयदीप के दिल में कुछ ऐसा अंकुरित हुआ था जिसने उसे यह महसूस कराया था कि अब जीवन में जानने को कोई बहुत बड़ी बात नहीं बची। ये नींद कुछ अलग महसूस कर सोने की नींद थी जिससे उठने के बाद दुनिया को देखने की नज़र बदल चुकी होती है। प्रकृति कल से ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती है और पूरी दुनिया को उसके पुराने नये गुनाहों के लिये माफ़ कर देने का मन होता है।

नज़रें दौलत की भी बदली थीं लेकिन जयदीप की नज़रों में प्रेम तत्व कहे जाने वाले रस का रंग था तो दौलत अपने पति को समझने के लिये ख़ुद को उसके साथ खाई में गिराने को तैयार थी। उसने नज़र भर जयदीप को देखा और काफ़ी देर तक देखती रही। उसी देखने में उसने ये भी देखा कि जयदीप खाना बनाने और घर के काम करने में चंद्रमा की मदद इस तरह कर रहा है कि उसके सारे भारी और बोझ वाले काम वो आगे बढ़ कर ख़ुद कर रहा है। उसके न्यून अनुभवों भरे जीवन में ये एक दुर्लभ दृश्य था और यह दृश्य गाँव भर के मानकों पर मापा जाता तो घर के कामों में एक औरत की मदद एक मर्द द्वारा किया जाना अब भी ऐसी स्वपनिल लोककथा की बात थी जिसके बारे में किसी औरत ने किसी दूसरी औरत से सुना होता था, उसने किसी तीसरी औरत से लेकिन देखा किसी ने नहीं था।

दौलत अपनी आँखों में केशव से कुछ मैले रंग उधार माँग लायी थी और उसका स्वार्थ यही था कि आख़िर वह महसूस कर देखे कि उसका पति चाहता क्या है। उसके जवाबों पर उसकी प्रतिक्रियाएं एक जैसी होती जा रही थीं जिनके बाद वह चुप हो जाता था और दौलत के बहुत पूछने पर भी कुछ बोलता नहीं था। दौलत अब अपने जवाबों में दूसरे विकल्पों को आज़माना चाहती थी कि उसका पति कुछ बोले। उसकी अंँधेरी गहराइयों में क्या छिपा है, वो ख़ुल कर दिखा पाये। शायद वो खुल के कह पाये जो बात वह अपनी पत्नी से बिस्तर पर कहना चाहता है लेकिन किसी झिझक से खुल कर नहीं कह पाता। अगली शाम होते-होते तक दौलत ने कुछ इस तरह से जयदीप के सामने ख़ुद को प्रस्तुत किया था कि जयदीप की आँखें उसे देखते-देखते दौलतमय हो गयी थीं। नशे से भरी उन आँखों के साथ जयदीप के युवा मन ने कुछ देर के लिये कुछ बातें सोची थीं। उसे लगा बस अड्डे पर जो बातें वह अपने दोस्त से कह रहा था, वह यूँ ही नहीं थीं। अपने से बड़ी उम्र की औरतों के साथ अनुभव के जो तथ्य उसने बताये थे वे भले झूठ हों, उसकी भावनाओं को उसने ग़़लत नहीं पहचाना था। उसका आकर्षण कोई लडकी नहीं हो सकती। और लड़की में क्या आकर्षण होता है ? जैसा अनजाना, मासूम और अनाड़ी वो है, उसकी उम्र की लड़की की भी तो उस जैसी ही होगी। जीवन के अनुभव से पकी एक औरत, जिसे पता है सुख लेना कैसे है, सुख देना कैसे है, उसके नशे का मुक़ाबला भला कोई भी लड़की कैसे कर सकती है ? हालाँकि ये ख़याल जयदीप के मन में बदबूदार हवा के झोंके की तरह आये लेकिन इस झोंके ने उसके प्यार का दिया बुझने नहीं दिया। उसने मन में चंद्रमा का चेहरा सामने किया और उसे देखते ही उसके मन का अदृश्य मैल जहाँ भी था, धुल गया।

शाम होने पर गाँव का एक लड़का भागता हुआ आया और केशव को बताया कि मानिक बीमार है और बेहोश हो गया है। वह उसके एक-दो पुराने दोस्तों के पास सहायता के लिये गया था लेकिन कोई ख़ाली नहीं है। केशव बिजली की तरह घर से निकल गया और दौलत को हिदायत देता गया कि अगर उसे देर हो जाये तो वे लोग रात्रि-भोजन कर के आराम करें। उसने जाते हुये पलट कर ख़ास हिदायत जयदीप की ओर इशारा कर के दी कि दौलत उसे पेट भर खिलाये। वो बच्चा है और उसे ख़ुद माँग कर खाने में संकोच होता है। दौलत ने आँखों से आत्मविश्वास भरा इशारा किया कि वो जाये और घर की बिल्कुल चिंता न करे। वो जो चाहता है, उसकी प्रियतमा वही करेगी। भले वो ये बात बोलने के लिये उचित उपयुक्त शब्द न खोज पा रहा हो, उसकी साथी उसकी अनकही बात न समझे तो वो साथी कैसी। दौलत ने सबके खाना खाने के बाद चंद्रमा को भीतर के कमरे में सोने जाने को कहा। उसके जाने के बाद जयदीप ने दौलत से कहा कि वो उससे अकेले में कुछ बात करना चाहता है। दौलत को अपने भीतर कुछ नशीली अंगड़ाइयों जैसा महसूस हुआ और साथ ही उसे ये भी लगा कि वह अपने क़दम दुःख के किसी ऐसे सागर की ओर बढ़ा रही है जिससे वापस आने का रास्ता सिर्फ़ मृत्यु ही होगी। उससे इस समय अगर उसकी आख़िरी इच्छा पूछी जाती तो वह निसंकोच कहती कि अपने पति अपने प्रियतम के लिये वह कोई आख़िरी पाप करना चाहती है और उसके बाद मर जाना चाहती है।

भीतर के कमरे में जाने पर दौलत ने भीतर के किवाड़ लगा दिये और खाट पर लेट गयी। सीने से पल्लू को उठाकर उसने अपने पैरों पर रख लिया। जयदीप यह देखकर पहली बार किंकत्तर्व्यविमूढ़ शब्द का अर्थ इस स्पष्टता के साथ समझ पाया था। वह खाट के पास पड़ी किसी ऊँची चीज़ पर बैठने वाला था और बीच हवा में रुक गया था। वह न उठ पाया था न ही बैठ पाया था। वह उसी पोज़ में देख रहा था जहाँ उसके उन्नीस साला जीवन का सबसे विहंगम दृश्य उपस्थित होना चाहता था। दौलत की साड़ी कमर में बंधी थी और बाकी का हिस्सा कमर के नीचे। ऊपर के हिस्से में जो देह से बाहरी चीज़ें थीं उन्हें ब्लाउज़, कुंडल, नथनी, सिंदूर और बिंदी वगैरह नामों से जाना जाता था। जयदीप ने इस दृश्य को बाहरी चीज़ों से अलग देखा। उसकी आँखें भारी होने लगीं। उसे अपने कुछ दोस्त और स्त्री देह से नज़दीकी के उनके दावे याद आये। सबने झूठ बोला है, वो समझ चुका था। किसी ने कुछ नहीं देखा। अगर देखा होता तो उसे जीवन की सबसे बड़ी याद, सबसे विराट अनुभव की तरह बताते। सारे दोस्त झूठ बोलते हैं, इसका मतलब उन्होंने अपने-अपने प्रेम की जो कहानियाँ सुनायी हैं वे भी झूठी हैं। प्रेम याद आते ही उसके मन में चंद्रमा का चेहरा आया जो इस समय दूसरे कमरे में अपनी गुदड़ी पर सोयी उसे ही याद कर रही होगी। दौलत ने जयदीप का हाथ पकड़ा और अपने पेट पर रख दिया। जयदीप बैठा या पास रखी उस ऊंची वस्तु पर धम्म से गिरा, ये दौलत को समझ नहीं आया क्योंकि वो उसकी आँखों में देख रही थी।

जयदीप ने क्षण भर के लिये अपनी आँखें बंद कीं और एक लम्बी साँस ली। इसके बाद उसने दौलत के पल्लू को उसके पैरों से उठा कर उसके सीने पर रखा और फिर खड़ा होकर एक हाथ पीछे सरक गया। उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लिये, उसके होंठ थरथराने लगे और आँखें भर आयीं। दौलत एक पल के लिये गद्दे पर गद्दे की ही तरह बेजान लेटी रही फिर उठ कर अपनी साड़ी ठीक करने लगी। जयदीप आकर उसके पाँवों के पास बैठा और उसने अपनी ज़बान से चंद्रमा का नाम लिया तो दौलत को महसूस हुआ वह किसी कुंएं में तेज़ी से गिरती जा रही है।

केशव जब मानिक की झोपड़ी पहुँचा तो वह शायद गाँव की किसी सहृदय भौजाई का बनाया काढ़ा पीकर सो चुका था और उसका ताप कुछ उतर रहा था। गाँव की वह औरत मानिक के माथे पर चापाकल से लाये शीतल जल की पट्टियाँ रखने को कह कर चली गयी। केशव जगह-जगह अपने दोस्त की सूख चुकी उल्टी को साफ़ करने लगा। जब वह उसके माथे पर पट्टी रखने लगा तो उसे मानिक के बड़बड़ाने की हल्की-हल्की आवाज़ सुनायी दी। वह कुछ साँप साँप जैसा बुदबुदा रहा था और थरथरा रहा था। केशव ने सोचा वह साँप नहीं काँप कह रहा होगा। उसने उसका हाथ पकड़ कर गर्माहट दी कि सब ठीक हो जायेगा। उसका दोस्त उसके साथ है, वह अकेला नहीं है। मानिक ने भोर में थोड़ा बेहतर महसूस करने पर बताया कि जिस पदार्थ का उसने चिलम में सेवन किया है वो नयी गुणवत्ता का था और उसने अनजाने में थोड़ा ज़्यादा ले लिया था। उसने बताया कि आज उसका एक और पुराना दोस्त उससे मिलने आने वाला है जो बहुत बड़ा नशेड़ी है और उसके पास हिमालय के एक बाबा से प्राप्त किया ऐसा पदार्थ है जो एकदम ज़हर है। बाबा ने उसे हिदायत दी है कि छोटे-मोटे नशेड़ी इसका सेवन न करें अन्यथा पछताना पड़ेगा। केशव मुस्कराया और उसने दोस्त को कुछ दिनों तक हर तरह के नशे से दूर रहने और स्वास्थ्यवर्धक पदार्थों का सेवन करने की सलाह दी। मानिक का ताप उतर जाने के बाद भोर की पहली हवा के साथ वह अपने घर वापस आया और चोरों की तरह घर में दाखिल हुआ। उसने ओसारे में जयदीप की खाट के पास जाकर उसका चेहरा देखा। उस पर एक मुस्कान और अपूर्व शांति थी। वह ख़ुश हुआ, उसे लगा कल रात नियति ने उसे अपने घर, अपनी पत्नी से दूर रखा जिसका पूरा फ़ायदा उसकी पत्नी ने उठाया ही होगा। उसने पास जाकर दौलत का चेहरा देखा। उसे दौलत के चेहरे पर पहली बार एक अनोखी शांति और एक भरापूरा सुख दिखायी दिया जो उसने कभी नहीं देखा था। उसे हैरानी और जलन दोनों एक साथ हुयी। वह थोड़ा नीचे झुका और उसी समय नींद में किसी सपने के मैदान में विचर रही दौलत के होंठों पर एक मुस्कान आयी। केशव दहल गया और चुपचाप अपनी खाट पर जाकर बाढ़ में बहती जा रही किसी लाश की तरह निःचेष्ट लेट गया।

अगला दिन ऐसा उगा कि उसे दिन कहे जाने में संकोच होता था और रात अभी दूर थी। दोपहर तक सूरज नहीं दिखा और एक सीलापन माहौल में इस तरह रचा बसा था कि संसार सुस्त और उदास जान पड़ता था। कोई अपने घर से नहीं निकला था, इस शिथिल मौसम में हर कोई अपनी जगह पड़ा आसमान को देख रहा था और अपने बपचन की यादों में खोया था। ये ऐसा मौसम था जिसमें कोई काम ज़रूरी नहीं जान पड़ता और अक्सर अपनी मृत्यु का ख़्याल आता रहता है। जिनके भीतर ऐसे ख़्याल आ रहे थे वे सोच रहे थे कि अपनों के बीच अपने घर में मरना सबसे बेहतर होता है। गाँव की पगडंडियाँ सूनी थीं और बस अड्डे से आख़िरी बस को निकले कई दिन हो चुके थे। जो इक्के दुक्के लोग बाहर दिख रहे थे वे भी कहीं जा नहीं रहे थे बल्कि अपने-अपने घरों की ओर वापस आ रहे थे। ये ऐसा सुहाना मौसम था जो सुहाना होते हुये थी अच्छे से अच्छे मन को बीमार कर देता है। केशव को इस मौसम का पता इसीलिये शायद नहीं चला कि वो इधर बीच बाहर कम भीतर अधिक रह रहा था। सुबह कलेवा करने के बाद वह अपने दुआर की सफ़ाई में लगा था और इसके बाद मानिक की तबीयत देखने जाने की योजना बना रहा था। उसने सुबह से ध्यान दिया था कि जयदीप के होंठों पर एक मंद मुस्कान अपने आप चली आती थी और दौलत अपने आप में बेहद खोयी सी दिख रही थी। केशव के चेहरे पर भीतर की नफ़रत का रंग फैलना शुरू ही हुआ था कि कल वाला लड़का दौड़ता हुआ आया और कल वाली ही बात दोहरायी। केशव दोस्त के घर की तरफ भागता हुआ निकला। काफ़ी आगे जाकर जब केशव ने पीछे पलट कर देखा तो जयदीप, चंद्रमा और दौलत अपनी देहरी पर इस तरह खड़े थे जैसे इससे ये इनका आख़िरी नाता हो। केशव पल भर के लिये चौंका लेकिन लड़के की आवाज़ की लड़खड़ाहट ने उसे वापस मुड़ा दिया।

‘‘डाक्टर आइल रहल, कहलस अब आखिरी बा।’’ केशव के कदम तेज़ चलने के बजाय भागने लगे।

मानिक की आँखें भयानक लाल थीं। पूरे कमरे में धुंआँ ही धुंआँ पसरा था और मानिक की आँखें आश्चर्य से फैली हुयी थीं। बाहर तीन-चार आसपास के पुराने परिचित मित्र वगै़रह थे जो मानिक के भगाने पर वापस जा रहे थे। दो गाँव दूर से पुराने रिश्तों का वास्ता देकर बुलाया गया डॉक्टर कुछ बुदबुदाता हुआ दूर जा रहा था। लड़का डर के मारे बाहर ही रह गया। मानिक चीख रहा था और चीखते हुये कह रहा था कि उसे बड़े नीम वाले साँप ने काट लिया है। उसे किसी की ज़रूरत नहीं है और कोई अंदर घुसा तो वह उसका सिर फोड़ देगा। केशव चुपचाप भीतर चला गया। उसने देखा ढेर सारे धुएं के बीच घिरा मानिक एक लम्बी नवलगढ़ी चिलम से दम लगा रहा है। केशव को देख कर वह और तेज़ी से चिलम खींचने लगा। चिलम खींचते हुये किसी अनाड़ी की तरह मानिक ने साँस का एक टुकड़ा छोड़ दिया। चिलम से कुछ राख मानिक की जाँघों पर गिरी जिसमें आग की भी हिस्सेदारी थी। मानिक चीखा और चिलम उसके हाथ से छूट गयी। केशव उसकी ये हालत देखकर घबरा गया।

केशव ने सुस्त हो चुके मानिक के हाथों से चिलम ले ली और मानिक को सहारा देकर एक ओर लिटा दिया। मानिक ने उसे भी चिलम खींचने का इशारा किया। वह इस समय कोई बाहरी नशा नहीं चाहता था क्योंकि रात से उसके भीतर का नशा चरम पर आ रहा था। मानिक की आँखें इतनी लाल थीं कि उनमें ख़ून भरा होने का भ्रम हो रहा था। मानिक का माथा और आँखें चढ़ी हुयी थीं जिससे वह कोई दूसरा ही आदमी लग रहा था। केशव ने मानिक के बार-बार इशारा करने पर दो तीन दम लगाये और उसे महसूस हुआ चिलम में कोई अलौकिक वस्तु भरी हुयी है। उसका माथा घूमने लगा और जो नशा उसकी आँखों और मन पर तारी होने लगा वो अब तक के अनुभव किये गये नशे से बिल्कुल अलग था। उसके होंठों पर मुस्कराहट आने लगी और जीवन मृत्यु जैसी बातें उसे उस क्षण बेहद बेहूदी और अनर्गल जान पड़ीं। मानिक की ओर देखकर वह हँसा और इशारे से इस तत्व के अलौकिक होने का संकेत किया। बदले में मानिक ने अट्टाहास किया और उसे इशारे से अपने पास बुलाया। वह चढ़े माथे और आँखों को दोस्त की ओर केंद्रित करता हुआ उसकी ओर बढ़ा। मानिक ने उसे पास खींचकर उसके कान में कहा, ‘‘साँप का जहर मिला है इसमें।’’ और ठठा कर हँसने लगा। इसके बाद मानिक कुछ ऐसे-ऐसे दृश्य बताने लगा जिन पर सामान्य अवस्था में केशव हंस दिया करता था।

मानिक ने बताया कि सर्प उसके घर के भीतर आ गया था और अपने विशालकाय फन को कोठरी में डाल कर उसने मानव वाणी में उसकी आख़िरी इच्छा के बारे में पूछा था। उसका शरीर अब इतना बड़ा हो चुका है कि पूँछ और बाकी का हिस्सा उसके घर में समा नहीं सके, सिर्फ़ उसका फन ही भीतर घुस पाया था। उसने कहा कि उसकी कोई इच्छा नहीं और वह हंसते हुये दुनिया से विदा लेना चाहता है। सर्प ने मानिक के चेहरे पर अपने विष की एक फूंक मारी थी और फिर पास रखी चिलम में। इसके बाद सर्प चुपचाप अपने कोटर में जाकर घुस गया था। अभी थोड़ी देर पहले तक सर्प की पूंछ का आख़िरी हिस्सा कोटर से बाहर लटका दिखायी पड़ रहा था। जो लोग उसका हालचाल पूछने आये थे वे सब उस पूंछ के हिस्से को देखकर ही भागे हैं।

केशव ने कहना चाहा कि वे पड़ोसी और उसे देखने आया डॉक्टर उसकी गालियों से क्रोधित होकर गये हैं न कि कुछ डरावनी चीज़ देखकर लेकिन उसके मन में सर्प की लटक रही पूंछ को देखने की इच्छा ने जन्म ले लिया था। वह वहीं से दरवाज़े की तरफ थोड़ा खिसका और नीम के पेड़ की ओर देखने लगा। तीसरा कोटर सीधी तरफ से देखने के लिये बाहर निकलने की ज़रूरत थी और थोड़ी देर वहीं से झांकने के बाद केशव बाहर निकलने के लिये उठने लगा। मानिक अपनी जगह पर बैठा उस सर्प के बारे में अब भी बड़बड़ा रहा था। बारिश फिर से हल्की हल्की गिरने लगी थी और यह बारिश सुबह से मातम जैसे बने मौसम का जवाब लग रही थी।

रास्ते में उसे एक भी चिड़िया, मवेशी या इंसान दिखायी नहीं दिया जैसे सभी किसी अनिष्ट की आशंका से गाँव छोड़कर मिनटों में गायब हो गये हों

केशव नीम के पेड़ के सामने खड़ा था। बीच वाला विशाल कोटर उसी तरह था और वहाँ किसी सर्प का कोई निशान नहीं था। केशव का दिमाग घूम रहा था। जो धुँआ उसके फेफड़ों में घुसा था वह अब भी उसे डगमगा रहा था और उसकी दृष्टि बार-बार दूर से पास और पास से दूर जा रही थी। नज़रों की इस यात्रा में उसने गाँव की सड़क पर दूर दो आकृतियाँ देखीं जिनमें एक पुरुष की और एक किसी लड़की की थीं। बरसती बूँदों के बीच उसने आँखों को ध्यान से केंद्रित करना चाहा तो लड़की की चाल उसे जानी पहचानी लगी। चाल को पहचानते ही उसके दिमाग में कौंधा कि उसके साथ चल रहा पुरुष जयदीप है। जयदीप के कंधे पर जो उभरा हुआ था वह उसका बैग था। इस दृश्य ने केशव के भीतर एक तेज़ी को जन्म दिया और वह लड़खड़ाता हुआ मानिक की झोपड़ी की ओर भागा। उसे लगा दौलत को लेकर उसने जो खेल शुरू किया था उसे जयदीप ने अंजाम तक पहुँचा दिया है। उसकी पत्नी एक जवान लड़के के साथ घर छोड़ कर भाग रही है, यह सोचते ही उसकी आँखों के सामने पहले एक बार अँधेरा छाया और फिर पूरे शरीर में एक झुरझुरी हुयी। यानि जो-जो गंदी बातें वह अपनी पत्नी के बारे में सोच रहा था सब सच थीं। उसके शरीर में क्रोध और नफ़रत का ऐसा ताप पैदा होने लगा जैसे बारिश की बूँदें उसके शरीर पर नहीं किसी जलते तवे पर गिर रही हों। मानिक ज़मीन पर एक ओर लेट चुका था और उसके मुँह से हल्का सा फेन बाहर निकला था। उसे देखकर अचानक केशव को भयानक डर लगा। उसे लगा उसके अतिरिक्त जितने दोस्तों ने सर्प को देखने की घटनाएं सुनायी थी सब सच थीं। मानिक उसे अपनी उलटी हुयी आँखों से देख रहा था और केशव ने उसकी आँखों में कोई याचना पढ़ी लेकिन उसके भीतर कई विचारों की आँधी एक साथ चल रही थी और वह सिर्फ़ उन्हें देख पा रहा था। वह तेज़ कदमों से अपने घर की ओर भागा। बारिश उसके कदमों की गति से होड़ लगा रही थी।

रास्ते में उसे एक भी चिड़िया, मवेशी या इंसान दिखायी नहीं दिया जैसे सभी किसी अनिष्ट की आशंका से गाँव छोड़कर मिनटों में गायब हो गये हों या फिर इस गाँव में कभी कोई रहता ही न हो। केशव के कदम और तेज़ हो गये और वह बरसों पीछे छोड़ आयी उम्र की गति में दौड़ने लगा।

बाहर ऐसा सन्नाटा था जो केशव ने इस घर में कभी महसूस नहीं किया था। जयदीप का सामान कहीं नहीं था और न ही घर में चंद्रमा का कोई निशान बचा था। उसने जैसे ही भीतर कदम रखे उसका कलेजा उसके मुँह से बाहर निकल आया जिसे बड़ी मुश्किल से उसने सीने पर हाथ दबा कर वापस भीतर डालने की कोशिश की। ओसारे में एक विशालकाय पूंछ थी जिसका अगला सिरा उसके कमरे में जा रहा था। वह डर के मारे दो कदम पीछे हट गया। उसकी साँसे तेज़ चलने लगी थीं और हृदय की गति को ख़ासी दूरी से भी नापा जा सकता था। उसने अपने सिर को तेज़ का झटका दिया और अपने दोनों गालों पर दो थप्पड़ मारे। जो वो देख रहा था वह उसके किसी दोस्त की सुनायी कहानी नहीं थी और न ही उसका बनाया कोई दृश्य। जो था उसके सामने था और इस स्थिति में क्या किया जाता है, क्या करना चाहिये, इसके बारे में आज तक उसने कहीं कभी न किसी दोस्त से सुना न किसी धार्मिक किताब में पढ़ा था। भूत के डर से सामना होने पर हनुमान चालीसा पढ़़ने का रिवाज़ था लेकिन अजगर घर के भीतर घुस जाने पर अगले कदम के बारे में संपूर्ण वांग्मय मौन था और जीवन के सभी अनुभव अपूर्ण थे। आख़िरकार केशव ने अपने सामान्य मानव मन से फैसला लिया और पूंछ के बगल से जो थोड़ी जगह थी वहाँ से अपने कमरे की ओर बढ़ा। पहले तो उसने दोनों आँखें भींच रखी थीं और ज़रूरत के लिये हल्की आँखें खोलकर सिर्फ़ उनकी झिरी से काम चला रहा था। लेकिन जैसे ही उसने कमरे में कदम रखा, उसकी दोनों आँखें खुल कर पहले से बड़े आकार में आ गयीं। ऐसा दृश्य उसकी आँखों ने पहली बार देखा था जहाँ आशंकाएं और सत्य एकाकार हो रहे थे। बचपने में बतायी गयी उसकी कहानियाँ एक भयानक रूप धरे उसके सामने थीं और वह इसके सत्य और असत्य होने से दूर सिर्फ़ एक गहरे भय में और गहरे डूबता जा रहा था। दौलत की पूरी देह अजगर के मुँह में थी और सिर्फ उसका धड़़ बाहर था। अजगर उसे धीरे-धीरे निगल रहा था और वह अपनी सूनी आँखों से केशव की ओर देख रही थी। केशव काँप रहा था और अजगर ने धीरे-धीरे केशव के सामने ही दौलत को लगभग पूरा निगल लिया, अब सिर्फ़ उसका सिर बाहर था। दौलत की आँखें लगातार केशव पर टिकी हुयी थीं जिससे केशव बुरी तरह भयभीत था और ख़ुद को असहाय महसूस कर रहा था। अचानक दौलत ज़ोर से हंसी। केशव को लग रहा था कि इस विशालकाय सर्प के डर से बड़ा डर अब उसके जीवन में नहीं आ सकता और तुरंत ही यह बात झूठ हो गयी थी। दौलत के चेहरे पर जो हंसी उसने देखी थी वो इतनी डरावनी थी कि डर के उसके नथुने बहुत चौड़े हो गये और उनमें से रक्त की धार गिरने लगी। उसकी हंसी में दुनिया भर की हिकारत और नफ़रत शामिल थी। इसके अलावा कई भाव ऐसे भी थे जिन्हें समझने के लिये केशव को औरत के रूप में जन्म लेने की ज़रूरत थी। उसने देखा दौलत के चेहरे पर हंसी बढ़ती जा रही थी और उसका हंसता चेहरा धीरे-धीरे अजगर के खुले मुख में समाता जा रहा था। वह आगे देख नहीं सका और तेज़ कदमों से बाहर की ओर भागा।

वह जैसे ही बाहर पहुँचा, ज़ोर की बिजली कड़की। आसपास को पल भर के लिये दिन की रोशनी हो गयी और एक तेज़ की गड़गड़ाहट हुयी। केशव ने पलट कर देखा तो बिजली उसके ही घर पर गिरी थी। उसका घर जलने लगा था और वह असहाय खड़ा इसे जलता हुआ देख रहा था। वह घनघोर बारिश में खड़ा काँपता रहा।

उसे इस बात की हैरानी थी कि लगातार तेज़ बारिश में भी आख़िर आग बुझने की बजाय बढ़ती क्यों जा रही है।

 

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