तितली

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शशिभूषण/

(‘फटा पैंट और एक दिन का प्रेम’ फेम शशिभूषण बेहतरीन कथाकार हैं। विराट जीवन की संभावनाओं के बीच एक किसी नुक्ते पर फँसा मनुष्य इनकी कहानियों में गरिमापूर्ण ढंग से वर्णित होता है। ये दूरदर्शी आलोचक हैं। सोशल मीडिया को जो कुछ लोग अपनी सामयिक और तीक्ष्ण टिपण्णी(यों) से मौजूँ बनाये रखते हैं, शशिभूषण उनमें से एक हैं। केंद्रीय विद्यालय, शाजापुर में बतौर स्नातकोत्तर शिक्षक कार्यरत शशिभूषण अपने स्वभाव से ही शिक्षक हैं। सौतुक उनका स्वागत करता है। आज उनकी कहानी प्रस्तुत है। )

 

दोपहर ढल गयी थी। धूप, सूरज की आँच से धीरे-धीरे उतर चली थी। माँ या पिताजी, दादा या दादी, बुआ या चाची, मामा या मामी घरों से निकलकर बस स्टॉप की ओर चल पड़े थे। गायें और कुत्ते छाँव छोड़कर सड़कों में आ जमे थे। यातायात घना और बेतरतीब होता जा रहा था। वाहनों की आवाज़ें शोर में बदलने लगी थीं। राम माधव की बेटी सीता स्कूल बस से उतरकर अकेली घर आयी। थकी-हारी लग रही थी। भोला चेहरा बैग, पढ़ाई और दिवस के भार से कुम्हला गया था। माँ बड़ी दया से गेट पर खड़ी सीता को आती देख रही थी। उसके दिल में मर्मस्पर्शी तरलता थी- ‘काश, ज़रा सी बच्ची को अकेली इतना चलना न पड़ता। मैं ठीक होती। चलकर जा पाती और ज़रा सी बच्ची को गोद में उठाकर घर लाती।’

शशिभूषण

रामकली ने गेट खोल दिया। भीतर घुसते ही सीता ने बैग पटका, जूते उछाले और माँ से लिपटकर झूल गयी। खिल उठी। चहककर मां को बताया- ‘अम्मा, आज दो-दो बातें बड़ी मज़ेदार हुईं।’ रामकली ने पूछा- ‘कौन-कौन सी बात मज़ेदार हुईं रानी !!!..’ सीता ने कहा- ‘बताती हूँ जरा ठहरो, थोड़ा सब्र करो न मेरी प्यारी अम्मा। माँ को सब्र कहाँ था? दिन भर का मौन तोड़ना था। बेटी की बातों की नरम कलियों से आत्मा सहलानी थी। झट बोली- ‘कर लिया सब्र। चल अब सुना।’ ‘हां, सुनो। एक बात तो यह हुई कि आज हमारी बस में प्यारी सी बड़ी क्यूट सी तितली घुस आई। बिल्कुल रंगीन। कितने तो रंग थे उसके। सच्चे कलर। सब बच्चों को बड़ा मजा आ गया। तितली भी बहुत बदमाश थी। ये उड़े, वो उड़े। जब बैठ जाती थी तब सबसे क्यूट लगती थी। लेकिन कुछ दुष्ट बच्चे तो उसे पकड़ने भी लगे। तब दीदी ने जोर से डाँटा- बैठो सब। केवल देखो। सेफ्टी रूल याद हैं न। बच्चे हँसने लगे। लेकिन मेरी अम्मा केवल देखने से थोड़े न होता है। पकड़ने का तो मज़ा ही और होता। काश मैं उसे पकड़ पाती। कितना मज़ा आता। मेरी तो जान ही निकल जाती।’ माँ आँखे फाड़ फाड़कर, अच्छा, फिर, वाउ आदि सहायक आवाज़ें निकाल निकालकर सुनने में मगन थी। ‘और दूसरी बात रानी?’ उसने पूछा। ‘दूसरी बात यह हुई कि आज मैंने न अपने भारत देश का यानी इंडिया का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ पूरा लर्न कर लिया। गाना भी सीख लिया।’ ‘वाह ! सीतू बातें तो दोनों बड़ी अच्छी हुईं। शाब्बाश बेट्टा !!!’  सीता का हौसला बढ़ गया-‘अच्छा मैं अभी सुनाऊं राष्ट्रगान? ’ ‘अभी नहीं। न बेटा अभी रहने दो। फिर सुनेंगे अच्छे तरह।’ ‘अभी सुन लो ना अम्मा। प्लीज़!!!’ नहीं, अभी मुझे बहुत काम है। तुम जल्दी से कपड़े बदल लो। हाथ मुंह धो लो। खाना खा लो। फिर थोड़ा सा सो लो। मैं काम निपटा लूँगी। फिर सुनेंगे बैठकर तसल्ली से।’ ‘पक्का अम्मा?’ ‘ प्रॉमिस ! ’ ‘ओके अम्माss… ठीssक हैsss…’

सीता, जगाते-जगाते देर रात सोकर उठी। ऊंघते हुए खाना खाने और होमवर्क करने के बाद कक्षा 2 की छात्रा, राम माधव की बेटी सीता ने मां से कहा- ‘अब तो सुन लो अम्मा राष्ट्रगान। फिर तो सो ही जाओगी। कब सुनोगी?’ मां ने कहा- ‘ठीक है सुनाओ।’ सीता बिस्तर पर ही खड़ी हो गयी। ‘सावधान, विश्राम, सावधान!’, ‘राष्ट्रगान शुरु कर’  कमांड बोली और ‘जन गण मन अधिनायक जय हे…’ गाने लगी। राष्ट्रगान खत्म कर जोर से बोली- ‘जय हिंद, भारत माता की जय…’ मां से कहा- ‘आप भी बोलो भारत माता की जय… और हाँ अगली बार मैं राष्ट्रगान गाऊँ तो खड़े ज़रूर हो जाना। अपनी कंट्री का अपमान मत करना ऐसे बैठे-बैठे। मेरा मतलब है यूं ही बैठे मत रहना राष्ट्रगान में। मां ने कहा-  ‘ठीक है देश भक्त अम्मा! जैसा तुम कहोगी वैसा ही करूंगी। लेकिन अब सो जाओ। रात बहुत हुई। सुबह नींद नहीं खुलेगी वरना।’

फिर सिलसिला चल निकला। जब देखो सीता कहती- ‘अम्मा राष्ट्रगान सुन लो। मैंने और अच्छा सीख लिया है। अब 52 सेकंड में गा लेती हूँ।‘ मां कभी सुन लेती। कभी मना कर देती। लेकिन हँस ज़रूर पड़ती। रामकली को देश भर में राष्ट्रगान, वंदे मातरम को लेकर चलनेवाली बहसें, घटनाएँ, दुर्घटनाएँ भी बरबस याद आ जातीं। ‘बच्चे तो आखिर बच्चे हैं। वो क्या जानें अभी राष्ट्रवादी मीडिया के प्रपंच। भगवान करे चरमपंथी सत्ता छल से बचे ही रहें तो ठीक’ वह सोचती।

एक दिन अजीब हो गया। सीता स्कूल से घर आई तो दोहरी हो रही थी। उसने दरवाज़े की चौकठ पर ही टिककर कहा- ‘पापा मुझे जोर से लेट्रिन आई है। करा दो।’ राम माधव ने कहा- ‘आ गयी ? अंदर आओ पहले। बैग रख दो। कपड़े उतार लो, और चले जाओ। लाइट जला लेना।‘ सीता ने कहा- ‘मुझे डर लगता है पापा। आप भी चलो।’ राम माधव ने कहा- ‘डरने की क्या बात है? जाओ।‘ ‘चलो न पापा’ ‘जाओ तुम’ राम माधव सख्त थे। सीता डरते-डरते चली गई। थोड़ी देर बाद उसने आवाज़ लगाई- ‘पापा हो गयी। पानी डाल दो’ राम माधव ने कहा- ‘माँ को बुला लो।’ सीता चिल्लाई- ‘आप ही डाल दो पानी।’ ‘आता हूं।’

राम माधव  झल्लाकर पहुंचे। लेकिन उन्हें धक्का लगा। बेटी सीता उसी हाल में खड़े होकर सावधान की मुद्रा में राष्ट्रगान गाने लगी थी। राम माधव ने जोर से कहा- ‘चुप !!! बिल्कुल चुप!!! बंद करो!!! यह क्या कर रही हो? ऐसी हालत में, यहां कोई राष्ट्रगान गाता है? बेवकूफ़ कहीं की।‘ बेटी ने कहा- ‘क्या हुआ पापा? राष्ट्रगान तो कहीं भी गा सकते हैं। आप देर लगाओगे इसलिए मैंने सोचा प्रैक्टिस कर लूँ।’ राम माधव उखड़ गए- ‘कहीं भी गा सकते हैं का क्या मतलब हुआ ? तुम्हें ज़रा अकल नहीं है?’ बेटी ने हंसकर कहा- ‘अरे पापा, हम लोगों ने टॉकीज में टॉयलेट वाली फिल्म से पहले गाया था कि नहीं? राम माधव चिढ़ गए- ‘चुप हो जा। दोबारा ऐसा जवाब मत देना। ना ऐसे गाना। बड़ी गंदी बात है।’

तस्वीर रेडिफ़.कॉम से साभार

राम माधव की टोन में पता नहीं कैसी आपत्ति, चेतावनी और हिकारत थी कि खूब मुंहलगी खुशमिजाज बेटी जोर-जोर से रोने लगी। चीख चीखकर रोना सुनकर रामकली दौड़कर आई। उसका दांया कंधा दीवार से टकरा गया। बुरी तरह चिढ़ गयी। ‘क्या हुआ? यह ऐसे क्यों रो रही है?’ राम माधव ने कहा- ‘कुछ नहीं। फालतू गला फाड़ रही।‘  ‘कुछ तो हुआ है। सीतू, रो क्यों रही है?’  राम माधव ने जवाब दिया- ‘रो नहीं रही है। राष्ट्रगान गा रही थी  टॉयलेट में।’ ‘तो क्या हुआ? तुमने कुछ कहा क्या??’  ‘मैंने मना किया दोबारा ऐसा मत करना।’ ‘किस तरह से मना कर दिया? अच्छे से समझाते। गा रही थी तो क्या हुआ? बच्ची है, तुम्हारे महान देश की दुश्मन नहीं।’ ‘बच्ची है तो क्या हुआ? राष्ट्रगान भी तो है। उसकी भी कोई मर्यादा है कि हर जगह बच्ची है ही चलेगा?’ ‘हटो, फालतू की बातें मत किया करो।’ ‘यह फालतू की बात है?’ ‘और क्या है ? बेमतलब रुला दिया। थोड़ा सा काम पड़ जाये तो हमेशा यही होता है। बस बहाना चाहिए। हाँ, नहीं तो।’

रामकली ने बेटी को शौच कराया। हाथ धुलाकर, चुप कराकर कमरे में ले गई। राम माधव पीछे-पीछे बेडरूम पहुंचे तो रामकली ने कहा- ‘ऐसे मत डांटा करो। बच्ची है।’ राम माधव ने सफ़ाई दी- ‘बच्ची तो है लेकिन इस तरह राष्ट्रगान का अपमान होता है। किसी दिन अपने ही सेवा दल का, सेना, संगठन का कोई बैठा रहा, सुन लिया तो क्या होगा सोचा है?’ ‘ क्या होगा?’ पत्नी ने उल्टे सवाल किया। राममाधव गहरी सांस खींचकर बोले- ‘कुछ भी हो सकता है। करियर तो चौपट हो ही जायेगा। तुम मेरी पोजीशन जानती हो। उस दिन सिनेमा हॉल में उस लड़के के राष्ट्रगान नहीं गाने पर हुई पिटाई के बाद मचे बवाल की सफाई में मंत्री जी का बयान मैंने तुम्हारे सामने ही बनाया था। बनाया था या नहीं? तुम्हीं ने बोला था टाईप के लिए। समय बड़ा खराब है। इस मुद्दे पर अपनी ओर से एक भी संदेश गलत गया तो सेफ़ कोई भी नहीं है। हम और भी नहीं।’ पत्नी ने तमककर कहा- ‘अब डर डरकर ही जीना बचा है। समय तुम्हीं लोगों ने मिलकर खराब कर रखा है। पहले बिगाड़ो फिर ठीक करने का नाटक करो। देशभक्ति का यह भूत तुम्हीं लोगों ने छोड़ रखा है। सब जगह दहशत फैल गयी है। स्कूलों में भी तुम जैसे ही लोग भरे पड़े हैं। किसी रोज़ जाकर सुना आऊंगी अच्छे से। दिखा आऊंगी देशभक्ति। अभी तक राष्ट्रवादी की बीवी की देशभक्ति न देखी होगी देश ने। दिखा दूँगी। राष्ट्रगान क्यों घरों में भेज रहे हैं बच्चों के साथ? देश में कोई आफ़त नहीं आई है। तुम लोगों की इस बेमतलब देशभक्ति के पहले भी देश ठीक-ठाक ही चल रहा था। एक बात ध्यान से सुन लो। बहुत दिन से कहना चाह रही थी। लेकिन आज कह ही देती हूँ। भले बुरा मान जाओ। तुम भी राष्ट्रवादियों के साथ उठना-बैठना जरा कम कर दो अब। सुबह-सुबह पार्क में जाना भी। पढ़ना-लिखना ठीक है। लेकिन पढ़ना-लिखना ही। संस्कृति की रक्षा तुम रहने ही दो। हमारे परिवार के लिए ठीक रहेगा। समझे कुछ?’ राम माधव ने कहा- ‘जैसा तुम समझ रही हो वैसी कोई बात नहीं है।‘ रामकली बोली- ‘वैसी ही बात है। मैं भी पढ़ी-लिखी हूँ। सब समझती हूँ। बीच में नहीं पड़ती तो इसका यह मतलब नहीं सब ठीक समझती हूँ। लेकिन अगर बेटी को दोबारा ऐसे डराकर रुलाया, घर में राष्ट्रवाद चलाया तो मैं भी अपना काम करने लगूँगी। चली जाऊंगी बेटी के साथ। जहां तुम्हारे राष्ट्रवादी आएंगे न सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। समझे कि नहीं?’ राम माधव ने हारकर कहा- ‘समझ गया। बात का बतंगड़ बनाना कोई तुमसे सीखे। मुझे भी ले चलना। हम तीनों ही चल चलेंगे। मुझे भी अब यहां थकान होने लगी है देश भक्ति और समाज सेवा से। किराए का ही घर तो है। किराया भी पूरा देते हैं। कहीं और ले लेंगे। नेता मकान मालिक के चक्कर में ऐसे फँसेंगे सोचा न था।’ ‘चुप भी करो। तुम्हारा नाटक मुझे पता है।  इतना सब बोलने की क्या बात है? जब देखो भागने की ही बात करने लगते हो। कभी सामना भी किया करो। बोल दो मकान मालिक से और चलो।’ पत्नी ने ताना दिया। ‘चलो’ राम माधव ने अभिनय का सहारा लेकर कहा। ‘नौटंकीबाज़…’ रामकली पीठ पर लगातार धौल मारने लगी।

बड़ी देर से सुन-देख रही सहमी सीता मां-पिता को सहज होता देख झट से बोली- ‘सुनाऊं एक बार और राष्ट्रगान?’ दोनों ने चौंककर शरारती बेटी को देखा। तीनों साथ हँस पड़े। माहौल में सहज खुशी घुल गई।

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