सुनील श्रीवास्तव की कविताएं

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सुनील श्रीवास्तव

बिहार के आरा में जन्में सुनील अपनी कविताओं में आदमी के संघर्षबोध और उसके विद्रोह को एक अलग तेवर से साधते हैं. अपनी जमीन से आस्थावान होने के लिए वो कोई गुहार नहीं करते बल्कि सावधान करते है और आस्था अनास्था के खेल में जो जीवन छूट रहा है उस पर से पर्दा हटाते हैं . वर्तमान में ये जनपथ के सहायक संपादक है और पटना में रहते हैं.

 

 

जादूगर

जादूगर जादू दिखा रहा था
रूमाल को तोता
तोते को खरगोश बना रहा था

लोग ताली बजा रहे थे
लोग पैसे लुटा रहे थे

तभी एक आदमी
चढ़ आया मंच पर
मारा तमाचा जादूगर को खींचकर

बोला-
साले, बेवकूफ बनाते हो !
हाथ की सफाई दिखा
जनता को फुसलाते हो !
मेहनत मजूरी का पैसा
ठगकर ले जाते हो !

जाओ भागो
यहाँ से जाओ
सही जगह पसीना बहाओ
पहले उपजाओ, फिर खाओ

कथा सुनने वालो,
अब तुम बताओ
अनुमान लगाओ
आखिर क्या हुआ होगा
क्या रोनी सूरत बना
जादूगर चल दिया होगा
या माँग ली होगी माफ़ी
खाई होगी कसम
फिर न किसी को ठगने की

नहीं, साहब, नहीं

ऐसा कुछ ना हुआ
आखिर जादूगर ने फिर
एक जादू किया
उसने गायब कर दिया आदमी को

वह आदमी अभी तक लापता है
और कारोबार जारी है
जादूगर का.

***

खुदकुशी

एक नीलगाय ने आज
ख़ुदकुशी कर ली
कूदकर सामने
जनता एक्सप्रेस के

कमबख्त ऐसे मरी
कि खड़ी हो गई सरपट भागती गाड़ी
गाड़ी दो घंटे से खड़ी है बियाबान जंगल में
दूर दस किलोमीटर है स्टेशन
पीछे गाड़ियों की कतार
चमचमाती ‘राजधानी’ भी खड़ी है बेबस
एक अँधेरे स्टेशन पर

कुढ़ रहे यात्री
धड़ाधड़ लगा रहे फोन प्रियजनों को
दे रहे सूचना देर से पहुँचने की
चहलकदमी कर रहे ट्रैक के किनारे
मोबाइल की रौशनी में
जा-जा कर सूचना ले आते ड्राइवर-गार्ड से
कुछ बैठे-बैठे अंदाजा लगाते
कोई कहता इंजन में फँस गया लोथड़ा
निकलता ही नहीं
कोई कहता पाइप फट गया वैक्युम का
सब बेचैन
बैठे पकड़कर माथा
साली को यहीं मरना था!
पिछली गाड़ियों के यात्री
तो होंगे परेशान ज्यादा
उन्हें तो पता ही नहीं
क्यों रुक गई अचानक
शुभयात्रा उनकी

कुछ तो खलबली मची होगी
विभाग में भी
कुछ तो परेशान हुए होंगे
बाबू रेलवे के

डिब्बे में चुपचाप बैठे अख़बार उलटता
पढता आत्महत्या की खबरें
सोचता हूँ मैं –
मरो तो इसी नीलगाय की तरह
दो घंटे के लिए ही सही
ठप्प कर दो देश का यातायात
बकने दो गाली कामकाजू यात्रियों को
(वे बेचारे तो चल नहीं सकते पैदल
दस किलोमीटर भी)
कुछ तो खलल डालो
व्यवस्था की सुखनिद्रा में
इस तरह मत करो ख़ुदकुशी
कि बस अख़बार में छपकर रह जाओ.

***

जरूरी काम

पानी तो ठीक वक़्त पर आया था नल में
साढ़े तीन बजे
बीस मिनट के लिए
उसे धोने थे दोपहर के जूठे बरतन
दो-चार कपड़े बच्चों के
और फिर दो बड़ी-बड़ी बाल्टियों को भरकर
रख देना था
सुबह चार बजे तक के लिए

अभी किसका फोन?
चौंकी वह देख भाई का नंबर
अरे, उसे तो जाना था घर आज
बितानी थी एक रात और आधा दिन
पुश्तैनी घर में
फिर लौट जाना था महानगर
पत्नी-बच्चों के पास
अभी कल ही तो हुई थी बात

“क्या हुआ”- पूछा फोन उठाते ही
“कुछ नहीं, इसी तरह
बिजी हो क्या” -भाई बोला
“हाँ, थोड़ी हूँ
बात करेंगे शाम को”

पर पूछ ही लिया फोन रखते-रखते-
“कैसा लग रहा घर में”
“महक रहा घर सारा” -उत्तर मिला
“बरसात का मौसम है न
बंद पड़ा घर महकेगा ही”
– लगा उसे फोन रखते वक़्त

बरतन धोते हुए उसे याद आया
यादें भी तो महक रही होंगी घर में

हाते में घुसते ही पहले
उसे गेंदे के फूल महके होंगे
पके अमरूद महके होंगे
हालाँकि होंगी वहाँ सिर्फ घासें ही
बड़ी-बड़ी घासें

कमरे में आकर वह
देर तक देखता रहा होगा
माँ की तस्वीर
माँ की महक भी तो होगी घर में

ओसारे से गुजरते हुए
उसे चूहानी महकी होगी
मोटी लाल सिंकीं मकुनियाँ महकी होंगी

छत पर वह जरूर गया होगा
उसे नौ अदृश्य चौखट्टे महके होंगे
छिती तिती महकी होगा
शाम को लालटेन जलाकर
पढना पढ़ाना महका होगा

बिस्तर पर लेटते हुए
एक जिद महकी होगी
ईया के पास सोने की
लड़ाई भी महकी होगी

अंतहीन कहानियाँ महकी होंगी
तुतले गीत महके होंगे
नसीहतें महकी होंगी
दोनो तरफ देखकर सड़क पार करने की
घर जल्दी लौटने की
हिदायतें महकी होंगी

और फिर बेचैन हो गई
यह सोचकर वह
कहीं शाम तक बंद न हो जाए
भाई को महकना यह सब
उसे भी तो निपटाने हैं जरूरी काम।

***

रोजमर्रा

बड़ी ख़बर है
जैसलमेर में बारिश होना किसी दिन
या चेरापूँजी में बारिश न होना

ख़बरें हमेशा
शहर की जलवायु के विपरीत होती हैं

मेरे साहब ने बनाया मुझे ख़बर एक दिन
-‘कितनी अच्छी अंग्रेजी लिख लेता है यह किरानी’
मैं बड़े चाव से पढ़ा गया दफ़्तर में उस रोज़

समय के बवण्डर में घिरनी बनी तुम
कभी ख़बर नहीं बन पाई
किसी ने पढ़ा नहीं तुम्हें
क्या अब भी सोचती हो
मेरे सीने पर सिर रखकर सोने की
मैंने चाहा था इधर एक दिन
तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेने को
और एक ख़बर बनते-बनते रह गई

एक दारोग़ा ने बचाई जान प्रेमी की
और दारोग़ा ख़बर हो गया
प्रेमी का कुछ पता नहीं
हालाँकि उसे भी ख़बर बन जाना था बचकर

कल वह लड़का नहीं आया कचरा लेने
उसे कुत्ते ने काट लिया है कूड़ा चुनते वक़्त
न लड़का ख़बर में है न कुत्ता

ख़बर में है एक बूढ़ा इनदिनों
सुनते हैं, वह जवानों से भी ज़्यादा है जवान
जबकि जवान ख़बरों में नहीं हैं
वे असमय होते जा रहे हैं बूढ़े

तुम ग़ौर से पढ़ना अख़बार
परखना एक-एक ख़बर को
और जान लेना
जो ख़बरों में नहीं है
वही रोजमर्रा हमारा

जानना यह भी
राजा को पता है ख़बर और जलवायु का संबंध
वह गढ़ता है ख़बरें
कि हो आभास जलवायु-परिवर्तन का
ख़बरनवीस करते हैं सहयोग समर्पित

तुम समझना इन साज़िशों को
ख़बरों से भ्रमित मत होना, दोस्त.

***

सभ्यता

हर तस्वीर में वह हँसता दिखेगा
कहीं गले मिलते किसी सुपरस्टार से
कहीं मंत्री से पुरस्कार लेते
कहीं फीता काटते फैशन शो का
कहीं करते जनकल्याण

सारी तस्वीरें बड़े बड़े फ्रेमों में मढ़ी
उसके बैठकखाने में टँगी होंगी
जहाँ बैठाकर तुम्हें
उसका इंतजार करने को कहा जाएगा
उसके करतबों की खबरों से अख़बार पटे होंगे
ये अखबारी कतरनें भी बड़े फ्रेम में टँगी होंगी वहीँ
प्रमाणपत्रों की कई तस्वीरें होंगी

इन तस्वीरों को देख
तुम सिकुड़ा मत लेना सीना
रीढ़ की सुदृढ़ता बचाए रखना
जुबान को अनावश्यक मुलायम मत बनाना

बस याद करना
वह लंबा जंगली रास्ता
जिससे होकर तुम आए हो यहाँ तक

पगड़ी कसकर बाँध लेना
ठकठकाते रहना लाठी फर्श पर
और जब वह आए तुम्हारे आगे
आँखों से बिजली गिराए
जीभ से खंजर चमकाए

तो याद रखना
कदम-कदम पर वनपशुओं से लड़कर
और हराकर ही
मनुष्य ने बचाई है अपनी हस्ती
बनाई है अपनी सभ्यता.

***

समय उसके इशारे पर चलता था

लाइन कटते ही
डुलाने लगती थी बेना
डुलाती रहती थी उसके आने तक
और लाइन थी कि रात-रात भर
कटती थी हमारे शहर में

उठते बैठते सोते जागते
हजारों देवताओं को गोहराती थी
पचासेक नाम तो अब तक याद हैं हमें
उसे याद था पूरा सुन्दर काण्ड
और कई चालिसाएँ

हम जब बाहर जाते
स्कूल या किसी काम से
देवताओं को भेज देती हमारे पीछे
देवता हमारी रक्षा करते
हाथ पकड़कर पार करा देते सड़क
लकड़सूँघों से बचाते
ठीक-ठाक पहुँचा देते घर
हम जब बीमार होते
देवता लाते दवाइयाँ
और हमें ठीक कर देते
हर बात उसकी मानते थे देवता

हम देवताओं से चिढ़ते थे
अदृश्य होते हुए भी उनका साथ
हमें नहीं भाता था
हम उनके बिना चाहते थे बाहर जाना
भरपेट खेलना चाहते थे आवारा दोस्तों के संग
ट्रैक्टरों के पीछे लटकना चाहते थे
फाटक पीटकर बड़े घरों के भागना चाहते थे
बिना उसके चखे ही
खा जाना चाहते थे टोनहिनों का भेजा बाएन
जेब में नहीं रखना चाहते थे उजला प्याज
तलुओं में काजल लगाकर जाना हमें नहीं पसंद था
हम भी पगली बुढ़िया को चिढ़ाकर
सुनना चाहते थे उसकी बेरोक गाली

मगर देवता चुगली कर देते
तब वह खूब गुस्साती थी
गालियाँ भी देती
बड़ी देर तक समझाती
फुसलाती
हम बच्चे होते हुए भी
हार जाते उसकी जिद से

वह तानाशाह थी
और समय उसके इशारे पर चलता था
लहरें खूब उठती थीं समंदर में
मगर उसके बालू के घरौंदे को
बिना छुए लौट जाती थीं

हर रोज आता था रवनवा
जोगी बनकर पंचवटी में
और लछुमन थे कि टलते ही नहीं थे
सीता के रोने-गाने
खिसियाने
चिल्लाने के बावजूद

कहानियाँ चिड़ियाँ थीं
दिन भर उड़तीं आकाश-आकाश
दाना चुगतीं खेत -खेत
फिर लौट आतीं अपने खोते में
वह खोता हमारे साथ सोता था

गर्मी की एक दोपहर
उसी खोते में झाँकते हुए हमने
देखा उस तूफान को जिससे
लाई थी वह कश्ती निकाल कर
उसकी तानाशाही कम
अखड़ने लगी थी तब से

युगों बाद
कोई कहता है जब आज
कि बदल गई दुनिया
हम हँसते हैं
दुनिया उतनी ही बदली है
जितना बदलने को कहकर
वह गई है इसे.

***

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