षोडशी की षोडशोपचार उपासना ६

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अम्बर पांडेय द्वारा लिखे जा रहे बेजोड़ धारावाहिक उपन्यास माँमुनि के पांच अंश आप सौतुक पर पढ़ चुके हैं. वायदे के मुताबिक़, लेखक इस साल की नवरात्रि माँमुनि को लिखते और पाठकों के साथ साझा करते हुए मना रहे हैं. इसी क्रम में आज प्रस्तुत है उपन्यास का छठा अंश.

अम्बर पांडेय 

माघ के मेघों के असमय बरसने से यात्रा बीच बीच में बहुत बार रोकना पड़ी थी। शारदा और मुखोपाध्याय जी के शरीर पर पहने वस्त्र, पोटली में बँधे वस्त्र और समान दोनों पूर्णरूपेण भीग गए थे। दोनों भीगने के कारण भारी हो गए वस्त्रों में ठिठुरते, पंक में पाँव पाँव धरते चले जा रहे थे।

अपराह्न, तीर्थयात्रियों की मण्डली ने नलिनियों से भरे एक पोखर पर भोजन के लिए रुकने का निर्णय लिया। शारदा और महाशय मुखोपाध्याय मण्डली के संग भी चलते थे और थोड़ी दूर दूर भी। मण्डली में चलने पर तीर्थयात्रियों में से कोई ठाकुर के विषय में जिज्ञासा करता, उनके सम्बन्ध में सुने लोकोपवाद की सत्यता आँकना चाहता तो कोई ठाकुर के विषय में मन से गढ़ी हुई बात बताने लगता। मुखोपाध्याय जी अब तक जान चुके थे कि शारदा और ठाकुर का परिणय प्रश्नातीत है। वह ऐसे प्रश्न उठने ही नहीं देना चाहते थे।

तीर्थयात्री पुरुष सूखी काठ ढूँढने निकल पड़े और गाँव की स्त्रियाँ खिचड़ी बनाने के लिए अपने अपने संग लाए धान और चने की डाल संग मिलाने लगी। शारदा और मुखोपाध्याय जी प्रात: काल सरसों के तैल से उतारकर स्वादु कचौरियाँ लाए थे उनमें भी जल भर गया था। संकोच से दोनों दूर ही बैठे रहे। शारदा ठाकुर के लिए लुटियाभर कर शुद्ध घी लाई थी; उसे ही स्त्रियों को दे आई।

प्रथम बार की इतनी लम्बी यात्रा, माघ की शीत में बार बार भीगना और भीगे वस्त्र ही पहने रहना, भोजन का ठिकाना नहीं था। उसपर मन का कभी ठाकुर की रोगावस्था को लेकर बहुत आकुल हो जाना और कभी वर्षाभिसारिका की भाँति स्वामी से मिलने की आतुरता; इन सबसे शारदा के गात तपने लगे। कोई ढाक के पत्र पर खिचड़ी और घी दे गया किन्तु उससे खाया न गया।

पिताजी इतना कष्ट सहकर, घर के कामकाज त्याग उसके संग आए थे, तीर्थयात्रियों में माघी पूर्णमासी के स्नान की कितनी उत्कट अभिलाषा थी, सब देखकर शारदा अपनी टोली के संग आगे बढ़ चली। कोई नयन में नयन देकर देखता तो उस स्मितानना के ज्वर की कल्पना भी न कर सकता था।

जलते हुए तलवों को अभी अभी हुई माघ की वर्षा का गड्ढों में भरा जल ऐसा शीतल लगता कि जल्दी जल्दी पाँव उठाती जाती किन्तु पुनः शीतल जल में ही तो डालने को

जलते हुए तलवों को अभी अभी हुई माघ की वर्षा का गड्ढों में भरा जल ऐसा शीतल लगता कि जल्दी जल्दी पाँव उठाती जाती किन्तु पुनः शीतल जल में ही तो डालने को। आधे मार्ग पर शारदा न्यग्रोधतरु के नीचे दो घड़ी को बैठ गई, सोचा था कि थोड़ा विश्राम पाकर दौड़कर मण्डली से मिल जाएगी। मुखोपाध्याय जी भी पीने योग्य जल की व्यवस्था करने चले गए।

शारदा ने जब नेत्र खोले तो अन्धकार हो चुका था। वह घबराकर उठ बैठी और निकट बैठे अपने पिता से कहने लगी, “पिताजी, विलम्ब न कीजिए, हम दोनों दौड़कर मण्डली तक पहुँच जाते है।”

मुखोपाध्याय जी ने शारदा के मस्तक पर हाथ फेरते कहा, “खेमनकरी, मण्डली तो गंगातट पहुँच भी गई होगी। तुझे तेज ज्वर हुआ है। सोयी तो सोती ही रही। वह तो कहो, भगवानस्वरूप यह रामाधीन केवट मिल गया अन्यथा अपनी तरुण कन्या को लेकर इस अन्धकार में मैं कहाँ जाता!”

शारदा ने देखा भूमि पर ही एक बलिष्ठ शरीर वाला पुरुष और एक लम्बी स्त्री बैठे हुए है। उसे भूमि पर दरी पर सुलाया गया और उसके वस्त्र भी सूखे है।

“हमारे मैले कपड़ों का बुरा मत मानना दीदी” लम्बी स्त्री ने कहा और शारदा को लोटे से जल पिलाने लगी। शारदा को अनुभव हुआ उसने जब से जन्म हुआ है तबसे ही जल नहीं पिया। पिपासा से अधिक उसे भीतर अग्नि का अनुभव हुआ और जल ऐसा लगता जैसे तैल हो। जितना भीतर जाता उतनी अग्नि भभकती थी।

“कविराज ने बताया है जल की एक बूंद गले में नहीं पड़ना चाहिए। यदि आधी रात तक ताप नहीं घटा तो तुलसीदल और गंगाजल मुँह में देने को कहा है” बलिष्ठ शरीरवाले रामाधीन केवट ने कहा।

सुनते ही मुखोपाध्याय जी कण्ठ फाड़कर रोने लगे। शारदा सुनकर उठ बैठी और खड़े होने का यत्न करने लगी, “मैं ठाकुर के ठौर पहुँचे बिना प्राण नहीं त्यागूँगी, पिताजी। चलो, रात्रि हो या दिन हो अभी दक्षिणेश्वर निकल पड़ते…” वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था और शारदा भूमि पर लुढ़क गई।

पद्मा हाथ में दीपक लेकर शारदा के निकट बैठ गई। बार बार वह डिबरी के आलोक में शारदा के नेत्रों का परीक्षण कर लेती थी। बिजली चमकती तो शारदा का एक दिन में कंकाल हुआ देह दधीचि की हाड़ों जैसा प्रकाशमान दिखाई देता

मुखोपाध्याय जी तुरन्त शारदा की कलाई हाथ में लेकर नाड़ी देखने लगे। आयुर्वेद का थोड़ा ज्ञान उन्हें था। केवट दादा दौड़ा दौड़ा गया और नदी में नाव खोलने लगा।

“पद्मा, कविराज को लेकर आता हूँ” केवट का स्वर बहुत प्रयास से भीतर बैठे मुखोपाध्याय जी और लम्बी स्त्री पद्मा ने सुना क्योंकि बाहर बहुत वर्षा हो रही थी। पद्मा हाथ में दीपक लेकर शारदा के निकट बैठ गई। बार बार वह डिबरी के आलोक में शारदा के नेत्रों का परीक्षण कर लेती थी। बिजली चमकती तो शारदा का एक दिन में कंकाल हुआ देह दधीचि की हाड़ों जैसा प्रकाशमान दिखाई देता।

देर तक प्रतीक्षा करने के पश्चात् छाता लगाए दीर्घकाय वैद्य कविराज सीताचूड़ामणि आए और क्षण को नाड़ी देखकर कहा, “अंत्येष्टि के लिए शुष्क काष्ट की व्यवस्था करना आरम्भ कर दीजिए। दो दिनों से यहाँ धारासार वर्षा हो रही है, न मिलने पर बहुत सारा घी तैल लगेगा। ख़र्चा बहुत हो जावेगा”।

कहकर कविराज छाता लगाए नौका में जाकर बैठ गए। रामाधीन केवट बोला, “दीदी से मेरा एक दिन पुराना भी परिचय नहीं किन्तु ऐसा लगता है दीदी मेरी माँ है। मेरी पुत्री की वय की है किन्तु बार बार माँ जैसी दिखाई देती है। मैं इन्हें छोड़कर कविराज को घर छोड़ने नहीं जा सकता। पाप लगेगा, नरक मिलेगा, जगहँसाई होगी तो हो”। कहते कहते रामाधीन केवट रोने लगा।

भूमि पर पद्मा ने डिबरी धरी और अँधेरी निशा में दौड़कर नौका में बैठ गई। वर्षा में ही नौका खेकर वह कविराज को पार छोड़ने चली गई।

मुखोपाध्याय जी शारदा की नाड़ी बार बार देखते थे और संस्कृत में कोई श्लोक कहते जाते। बीच में रुके और रामाधीन केवट से कहने लगे, “यहाँ किसी बनिए की टाल हो तो कुछ काठ ख़रीदने की कह आ, बेटा”। मुखोपाध्याय जी का स्वर शुष्क था। उनका मन ऐसा जड़ हो गया था कि दुख का अनुभव ही नहीं होता था।

उधर श्रीराधासखी के रूप में तुलसी की मंजरियों का हार बनाते ठाकुर अचानक उठकर दौड़े और गोविन्दघर की ओर जाने लगे। वर्षा के कारण मन्दिर के आँगन में जल भरा हुआ था। ठाकुर गिरे और उनका शाँखापोला के कंकणों और सोने के गजमुखी कंगन से भरे दाएँ हाथ की हड्डी टूट गई, “मेरे काले कांत ने मेरी कलाई मरोड़ दी” इन्होंने चीत्कार की और मूर्च्छित हो गए।

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