अनिल यादव की कहानी: नागरिक

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अनिल यादव

अनिल यादव हिंदी के कुछ उन विरल प्रतिभाओं में से हैं जो साहित्यकार और पत्रकार दोनों हैं  और इन दोनों ही क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. इन्होंने पूर्वोत्तर पर आधारित ‘वह भी कोई देस है महाराज ‘ जैसा चर्चित यात्रा वृतांत लिखा है.

नागरिक

बलभद्र दास माखीजा दुकान से रात साढ़े दस बजे घर लौटे, पसीने से भीगी बनियान उतारते हुए दोहरे हो गए और रोज की तरह उसमें फंस कर अकुलाने लगे. वह कभी-कभार बनियान बिना फंसे भी उतार लेते थे. वह अनाथ खुशी का हल्का क्षण होता था जो तमाम संयोगों के बीच अचानक घटित होकर चुपचाप लुप्त हो जाता था.

दिल्ली के एक कान्वेन्ट स्कूल में ग्यारहवीं की छात्रा, उनकी बेटी एकांतिका ने बेआवाज हो चुकी कई साल पुरानी हंसी हंसते हुए सोचा, बचपन की आदत है अब क्या छूटेगी. दौड़कर एक बांह छुड़ाते हुए उसने छेड़ा, “पापा आप बनियान पहनना सीखने का क्या लोगे?.”

बेटी के मोह को एक लेप गाढ़ा करती, झेंप की परछाई उनके चेहरे पर आई और गई.

एकांतिका के पैर घुटनों के नीचे से बाहर की तरफ मुड़ने के कारण अंग्रेजी के ‘एक्स’ के आकार के हो गए थे. वे भीतर की ओर इस तरह लचकते थे कि भरम होता, वह चलती तो दाएं बाएं है लेकिन न जाने कैसे आगे की ओर बढ़ जाती है. सुंदर स्वस्थ लड़की लाचार लगती. उसकी निरीहता कहीं और से ज्यादा देर तक बलभद्र दास के भीतर टिकी रहती और कभी भी प्रकट होकर उदास कर जाती थी.

कहीं खोए हुए वह एक बार फिर सोचने लगे, बचपन से अकेली फ्लैट में बंद रही. अगर बच्चों के साथ खेलने-दौड़ने पाती तो ऐसा नहीं होता, थोड़ी और लम्बी भी हुई होती. साथ खेलने वाले बच्चे मिले ही नहीं. उन्होंने बहुमंजिला अपार्टमेंटों के चिकने फर्श पर पलने वाले कुत्तों की तरह बेटी के पैरों को धीरे-धीरे टेढ़े होते देखा था. वह उसका सिर सहलाना चाहते थे तभी गेट की घंटी बजी.

वह नंगे बदन बाहर निकले. छह पुलिस वाले थे. उनके पीछे दो जीपें खड़ी थीं. उनकी गिरफ्तारी का वारंट था. वे उन्हें एक लड़की का अपहरण कर बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार करने आए थे.

पुलिस वालों के सख्त चेहरे देखकर बलभद्र दास का दिल बेकाबू हो गया. वह मन के अंधेरे में डूबने लगे, न जाने आज रात मेरे परिवार पर क्या बीतने वाली है. शरीर भय से हल्का होकर कई बार लड़खड़ाया. उन्हें पता नहीं था कि वह गेट किसी पुतले की तरह खोल रहे हैं.

मुड़ी टांगों में टीसते गठिया को निरंतर कोसने वाली उनकी पत्नी दबे पांव उनके पीछे बरामदे तक चली आई थी. वह आशंका से फटती आवाज को हिम्मत से समेट कर बोली, “यहां पुलिस इतनी रात को क्या करने आई है.”

“भैनजी, इन महापुरूष ने जो किया है अगर आपकी बेटी के साथ हुआ होता तो फौरन समझ में आ जाता,” एक नौजवान कांस्टेबल ने कहा जो औरों से आगे धक्के मारता हुआ उन्हें ड्राइंगरूम की ओर ले आ रहा था.

वह पड़ोस के घरों की एक एक कर बुझती बत्तियों को देखकर सहम गए तभी एक मोटे दारोगा ने उनकी कमर पर अप्रत्याशित फुर्ती से लात मारी. वह दर्द से बिलबिलाकर सीधे हो गए. जो बेटी दो मिनट पहले उन्हें बनियान पहनना सिखाना चाहती थी, अब ड्राइंग रूम में हतप्रभ खड़ी उनके भीतर से अचानक निकल आए रीछ की तरह बालों से ढके एक नंगे अजनबी को देखना शुरू कर चुकी थी जिसे पुलिस सड़क से घर में ला रही थी. घर का पामेरेनियन कुत्ता भी चुपचाप कहीं जाकर दुबक गया लगता था.

उन्होंने निर्दोष होने के भाव से एकांतिका को देखा लेकिन तुरंत जान गये कि वह उनकी ओर देखना भी नहीं चाहती. वह तो जैसे बिल्लों, वर्दियों और लाल रंग के बूटों में अपने लिए कोई आश्वासन खोजने में खो चुकी थी. उनका हाथ पीठ पर था जहां धूल जूते के आधे तल्ले की तरह छपी थी. वह मोटे दारोगा की ओर उंगली उठाते हुए उखड़ी सी आवाज में कुछ बोले. उन्हें पता नहीं था कि वह चिल्ला रहे थे, “यह तुम मेरे साथ ठीक नहीं कर रहे हो.”

“चोप्प”…, एक जोर का थप्पड़ उनका मुंह बंद होने से पहले पड़ा, तुरंत होंठ सूज कर लटक गए, उनका रंग तेजी से बैंगनी होता जा रहा था. दारोगा ने गूंजती आवाज में कहा, “इस उमर में इतनी गरमी! सर्च करो, घर में वियाग्रा का गोदाम न मिले तो मेरा नाम बदल देना.”

ठहाके लगाते पुलिस वाले कमरों की तलाशी लेने लगे. बलभद्र दास की आंखों के आगे अनिश्चित आकार और रंग के चकत्ते उड़ रहे थे जिनके बीच लंबी चोटी वाली, बाकी सबके लिए अदृश्य, वे बावली लड़कियां दौड़ने लगीं जो पुरानी फिल्मों में शादी के सीन की शुरूआत में हमेशा एक ही ढंग से हंसते हुए घर के कमरों में फिरा करती थीं. दो सिपाही चाभी लेकर उनकी कार की तलाशी लेने लगे.

यह दारोगा तीन महीनों से अक्सर सुबह बलभद्र दास के पास आता था, जीप में बैठे बैठे गेट पर उनसे बातें करता और चला जाता था.

फ्लैट के पिछवाड़े गली में खड़ी कारों की कतार के सहारे धीरे-धीरे चलते हुए उनके मां-बाप दूर के एक मकान तक गए. काफी देर दरवाजा पीटने के बाद कोई बाहर नहीं आया तो बूढ़ी औरत गुहार लगाने लगीं, ‘वरी सांई भगवान के लिए कोई तो देखो पुलिस वाले मेरे बेटे को कहां ले जा रहे हैं.’ जवाब में कई घरों की लाइटें लगभग एक साथ बुझ गईं. तभी कुत्ते के साथ नंगे पैर एकांतिका आती दिखाई दी. उसने कहा, “कार भी ले जा रहे हैं.”

कपड़े पहनने का मौका देने के बाद बलभद्र दास को एक जीप में पीछे बिठा दिया गया. पड़ोस की अंधेरी खिड़कियों के पीछे कुछ परछाइयां हिल रही थीं. उनकी मां ने जीप के पास जाकर दारोगा से हाथ जोड़ कर कहा, “कुछ पता है बलात्कार क्या होता है?”

वह कहना चाहती थी कि बलभद्र दास ऐसा घिनौना काम नहीं कर सकते. दारोगा ने कहा, ‘माता जी, पुलिस वाले इतने भी बच्चे नहीं होते’. उन्होंने आखिरी ठहाका लगाया और बलभद्र दास को कार समेत लेकर चले गए.

गली में सन्नाटा होने के बाद एक खिड़की से किसी ने अनुपस्थित पुलिस वालों को संबोधित करके कहा, “कुछ पता तो चले कि मामला क्या है!”

थाना एक बहुत पुरानी, पीली इमारत में था जिसे बलभद्र दास पिछले चालीस साल से देखने के आदी थे. रास्ते में जीप से बाहर एक दूसरे में घुस कर आरपार होती, रोशनी में नहाई सड़कों के किनारे की दीवारों पर विज्ञापनों को गीला कर चमकाते लोगों को देखते हुए उन्होंने सोचा, क्या बात है इतनी दूरी में कहीं भी- देखो, गधा पेशाब कर रहा है- नहीं लिखा दिखाई पड़ा. क्या वाकई लोगों ने गलत को टोकना बंद कर दिया है.

थाने के सामने की सड़क पर उनकी स्टेशनरी की दुकान थी. जिन दिनों उन्होंने दुकान पर बैठना शुरू किया था वह किराने और ड्राई फ्रूटस की दुकान हुआ करती थी. वह सूनी दोपहरों में अकेले बैठे भयानक कल्पनाएं किया करते थे कि थाने के भीतर की अंधेरी कोठरियों में क्या होता होगा लेकिन आज उन्हें आश्चर्य हुआ कि वहां नए कंप्यूटर लगे थे और धीमा म्यूजिक बज रहा था. हवालात में बंद करने के बाद पुलिस वाले उन्हें ‘श्रीमान’ कहने लगे थे.

अगली सुबह चाय पिलाने के बाद संतरी ने उनके आगे एक अखबार और पालिथीन की थैली फेंकते हुए कहा, “श्रीमान, जांच कार्य में सहयोग करें. टायलेट में जाकर अपने पानी का नमूना निकाल दें.”

यह उसी दिन का अखबार था जिसे देर तक पलटने के बाद, आखिरी पन्ने पर एक नंगी विदेशी मॉडल की काफी बड़ी फोटो पर उनका ध्यान गया. संतरी इस तरह हंसा जैसे वह हंसी शुरू करने के लिए उसी क्षण का इंतजार कर रहा था. वे बलात्कार का सबसे बड़ा सबूत, उनका सीमेन हासिल करना चाह रहे थे. संतरी हवालात से निकाल कर उन्हें गलियारे के कोने में टायलेट तक ले गया, भीतर ठेलकर दरवाजा बंद कर दिया. उन्हें गंदगी और बदबू के भभके से चक्कर आ गया. यह हिरासत में रखे जाने वालों का संडास था.

मकड़ी के फटे जालों के बीच झूलते बल्ब की मंद रोशनी में उन्होंने देखा, भारी स्तनों वाली उस माडल का कोई विदेशी नाम था. अखबार में छपा था कि सारी दुनिया के लोग उसके दीवाने हैं, उनमें से पांच करोड़ फेसबुक पर उसके फालोअर हैं. वह उन्हें ही देखते हुए जैसे पूछ रही थी, आपको बलात्कार करने की क्या जरूरत थी? दुनिया में मुझ जैसी कई औरतें हैं जिन्हें कोई कभी संतुष्ट नहीं कर पाएगा.

बाहर गलियारे में सिपाही ताश खेल रहे थे. वह न जाने कितनी देर तक टायलेट की दीवार के झरते पलस्तर से बचने का कोई प्रयास किए बिना खड़े रहे. लगभग सुन्न हालत के बीच के एक लंबे अंतराल में दीवार पर एक दूसरे के पीछे भागती छिपकलियों की ओर उनका ध्यान गया तभी संतरी ने कुंडी खटकाई, “कपड़े पहन लो साहब आ रहे हैं.”

दारोगा एक चाय वाले छोकरे को साथ लेकर आया था. उसने बलभद्र दास की जेब में ठुंसे पालीथीन को निकाल कर बाहर फेंकते हुए कहा, ‘आपको यह काम करना ही होगा श्रीमान. आप अपनी पसंद की जिस हिरोइन या मॉडल की फोटो कहें हम कंप्यूटर से निकाल कर दे देंगे.’ कोई प्रतिक्रिया न पाकर उसने जाली में चाय के जूठे गिलास थामे छोकरे को आगे ठेलते हुए कहा, ‘अगर आपसे नहीं होता तो यह लड़का कर देगा. बस आपको आंख मूंद कर कुर्सी पर बैठे रहना होगा… जाओ इन्हें मेरे कमरे ले जाओ.’

लड़का गिलास जमींन पर रखकर, मुट्ठी में दबे बीस रूपयों को जेब में डालता हुआ उनका हाथ पकड़ कर चला तो उन्हें लगा जैसे पेट के निचले हिस्से में बिजली के दो तारों के छू जाने से चिन्गारी निकलने की आवाज हुई है. हड़बड़ाकर उन्होंने हाथ जोड़ दिए, फूट कर रोते हुए बोले, ‘मुझसे नहीं होगा… किसी सूरत हो ही नहीं सकता.’ दारोगा मक्कार शांति से उन्हें देखता रहा फिर चाय वाले लड़के को जाने का इशारा कर चला गया.

थोड़ी देर बाद सरकारी अस्पताल ले जाकर खून का नमूना लेने और कई कागजों पर दस्तखत कराने के बाद बलभद्र दास माखीजा को जेल भेज दिया गया जहां वे तिरेपन दिन रहे.

राजौरी गार्डन इलाके के जिस पार्क में बलभद्र दास रोज सुबह टहलने जाते थे, वहां रिटायर्ड बूढ़े, उस दिन का अखबार एक दूसरे को पढ़कर सुना रहे थे. खबर के मुताबिक एक रात संभवतः दुकान से लौटते हुए, कहीं रास्ते में एक सूने बस स्टाप पर एक छब्बीस साल की लड़की अहिल्या (काल्पनिक नाम) को उन्होंने घर छोड़ने का आग्रह कर लगभग जबर्दस्ती कार में खींच लिया था. वह उम्र और बुजुर्गों जैसा हुलिया देखकर उनके झांसे में आ गई थी. माखीजा ने उसे मारपीट कर जबर्दस्ती शराब पिलाई. जब वह लगभग बेहोश हो गई तो गाड़ी को एक सुनसान जगह ले जाकर बलात्कार किया और उसे सड़क के किनारे फेंककर चंपत हो गए. अगले दिन दो महिलाओं ने अहिल्या को वहां पड़ा देखकर पुलिस बुलाई जो उसे लेकर अस्पताल गई. यह भी बताया गया था कि अभियुक्त अक्सर अकेली महिलाओं का पीछा करता था और उन्हें लिफ्ट लेने के लिए बाध्य किया करता था.

बलभद्र दास माखीजा को जानने वालों को यकीन नहीं हो रहा था कि वे ऐसा कर सकते हैं लेकिन आदमी की जात की रहस्यमय फितरत की बुनियाद पर उनके व्यक्तित्व को तोड़फोड़ कर फिर से कई कई बार गढ़ा जा रहा था ताकि वे बलात्कार के काबिल हो सकें. विफल रहने पर कल्पना के फल और स्मृति के हत्थे वाले चाकू से उनके शरीर के भी कई टुकड़े किए गए और अंततः हाथ-पैर के घने बालों और मांसल पुट्ठों में छिपी ताकत के प्रयोग से लड़की के शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को एक चीख में बदल कर बार-बार अखबार में छपी घटना के करीब पहुंचने की कोशिश की गई. अंततः संभोग से भी अनिश्चित और आह्लादकारी वह सुख पाया गया जो मित्रों को अपरिचित और अपरिचितों को मित्र बना देता है.

बलभद्र दास उस पार्क में रोज सुबह, नीचे की ओर बहती हाफ पैन्ट की जेब में दो मुट्ठी चावल डालकर और बगल में एक अखबार दबाकर पहुंचा करते थे. भारी पैरों को पटकते हुए तेज चलते तो बेडौल, थुलथुल शरीर में लहरें डोलने लगती थीं, लगता वे अपने और उनका शरीर अपने रास्ते जा रहे हैं. वे सबसे पहले उन मोरों को खोजते जो टहलने के रास्ते के किनारे बिस्कुट खा रहे होते थे. इसके बाद जरा दूर झाड़ियों के आसपास तोतों, गिलहरियों और कौवों की बारी आती जो ज्योतिषियों की सलाह पर कष्ट निवारण के लिए लोगों द्वारा बनाई गई बिस्कुट की ढेरियों पर झिझकते हुए चोंच मार रहे होते थे.

आदमी की जिंदगी को प्रभावित करने वाले ग्रहों की चाल बदलने के लिए इन सब जीवों की सहायता की दरकार थी और इन दिनों की तेज भागती जिन्दगी में उन्हें रिझाने का सहज सुलभ चारा नमकीन-मीठे बिस्कुट ही हो सकते थे. वे मोरों की तरफ उंगली हिलाते हुए कहते, ‘बिस्कुट के चक्कर में तो पड़ना मत, लीवर खराब हो जाएगा,’ अन्य चिड़ियों के झुंड के सामने मुंह बिचकाते हुए वे टी शर्ट खींचकर देर तक चश्मा साफ करते और दोनों हाथ ऊपर उठाकर हा-हा करते दौड़ते, “तुम लोगों का कौन डाक्टर बैठ हुआ है!”

चिड़ियों को भगाते हुए सांस फूलने लगती तो वे बेंच पर बैठकर जोर से अखबार पढ़ने लगते…कोई हाथ लगा देता तो मृतक की जान बच जाती…वे बेचैनी से भरकर किसी को भी उस आदमी की खबर सुनाने लगते जो एक्सीडेन्ट के बाद दिल्ली की सड़क पर दो घंटे पड़ा रहा था, जब शरीर का सारा खून रिसकर खत्म हो गया तो मर गया. नाक की सीध में देखते, भारी सांसें छोड़ते मार्निंग वाकर्स उनसे बचकर तीर की तरह गुजरते रहते. उन्हें लगता था कोई उपेक्षित, अकेला है या किसी प्रोडक्ट की मार्केटिंग में विफल रहने वाला पस्तहाल सेल्समैन है जो सुबह की हवा से जरा ताजा हुआ उनका दिमाग चाट जाना चाहता है.

कोई परिचित दूर से ही हाथ उठाकर कहता अरे भाई, माखीजा क्यों रास्ता रोक कर खड़े हो जाते हो सबके घर अखबार आते हैं. ऐसा बिरले ही होता कि कोई नया आदमी खीझ कर उनसे पूछता, “मिस्टर न्यूजमैन डू वी नो ईच अदर?”

भीतर खुशी उमड़ने लगती. वे मसूढ़े खोल कर हाथ जोड़ते हुए उसकी ओर लपकते, हरे राम सांई…कोई दो मिनिट रूकेगा, बात करेगा तब जानेगा न. ऐसे चलते चलते कैसे जान जाएगा किसी को. ये सोसाइटी एकदम इंग्लिश फिल्म के माफिक होता जा रहा है किसी के पास नमस्ते लेने तक का टाइम नहीं है. पीछू पेट्रोल का फाहा लगा हुआ है…तब तक वह आदमी जा चुका होता था.

सड़क पर कहीं भीड़ लगी हो तो उनका खुद पर काबू रख पाना कठिन हो जाता था. जिस तरफ भीड़ होती, शरीर के उधर वाले हिस्से में तेज सुरसुरी होती जो उन्हें अंततः अपने साथ खींच ले जाती थी. सबकुछ भूल कर वे अपनी खटारा कार किनारे खड़ी कर कुहनियों के बीच की खाली जगह में से चुपचाप भीड़ में धंस जाते थे. अक्सर उन्हें एक्सीडेन्ट में घायल किसी साइकिल या स्कूटर वाले को सरकारी अस्पताल ले जाना पड़ता था. कभी इलाज के पैसे भी जेब से देने पड़ते थे. दो लोगों के झगड़े में खुद उनकी फजीहत हो जाती और किसी तरह जान बचाकर भागना पड़ता था. कुछ नहीं तो बाद में आने वालों को शराबी के संवाद या जेब कतरे ने पिटाई से बचने के लिए बेहोश होने का नाटक कैसे किया था, यह बताने में घंटों निकल जाते थे. उनके लिए यह एक जिम्मेदारी का मजेदार काम था.

यह चस्का बचपन का था जब मदारियों, संपेरों, जड़ी बेचने वालों नीमहकीमों का सम्मोहन तो था ही बढ़ई, लुहार और पंचर चिपकाने वालों के करतब देखने में स्कूल अपने आप कब गोल हो जाता था पता नहीं चलता था. ऊपर से वे अपनी किताबें बेचकर चूरन खाते थे इसलिए पढ़ नहीं पाए और बीए में फेल होने से काफी पहले अपने पिता के साथ किराने की दुकान संभालने लगे थे. बेसुध होकर तमाशा देखने की आदत के कारण के घर का कोई भी उनके साथ बाहर निकलने से बचता था. वे अक्सर डांटे जाते थे और अपने बचाव में सिर्फ इतना कह पाते थे, “आदमी आदमी को खींचता है.”

पुरानी बात है, तब उन्होंने अपने पिता के साथ दुकान पर बैठना शुरू ही किया था. एक बार हरियाणा का एक जाट लड़का अपने बाप की तमाशा देखने की आदत का शिकार होकर उनकी दुकान पर काम मांगने आया था. उसने बताया, कि उसका बाप चकबंदी करने वाले कर्मचारियों के पीछे कई महीने घूमता रहा था. उसे देखना था कि कैसे जमींन उड़ाकर एक गांव से उड़ाकर दूसरे गांव ले जाई जाती है. इस चक्कर में वह सबकुछ भूलकर उनकी जरीब ढोने लगा. चूंकि कहीं जमींन उड़ती नहीं दिखी इसलिए उसने अपने खेतों के बारे में कोई दरख्वास्त नहीं दी. चकबंदी जब खत्म हुई तो उसके सारे खेतों का बंदोबस्त बंजर इलाके में कर दिया गया था जहां कोई फसल नहीं पैदा होती थी. बलभद्र दास के पिता ने उस लड़के पर यकीन नहीं किया और भगा दिया लेकिन उन्हें लगा था कि ऐसा होना बिल्कुल संभव है. उन्होंने खुद को उस लड़के के बाप जैसा महसूस किया था जो अब अपने बेटे को कुछ नहीं दे सकता था.

एकांतिका ने शर्म के मारे स्कूल जाना बंद कर दिया था और घर में बंद रहने लगी थी. बलभद्र दास के बूढ़े मां बाप कालोनी में दुखड़ा रोते थे लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था. वे डीडीए कालोनी के सबसे पुराने बाशिंदों में थे लेकिन उनके मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया जाता था. पत्नी को कुछ समझ में नहीं आता था. वह घिसटते हुए एक बार जेल जाकर मिल आई थी और पुलिस वालों को लगातार श्राप देती रहती थी. उसका दिमाग काम करना बंद कर चुका था. जेल में मुलाकात के समय वह इतना झल्लायी थी कि बलभद्र दास ने उसे आइंदा आने से मना कर दिया था.

कोई पंद्रह दिन बाद, एक लड़की लभद्र दास से जेल में मिलने के बाद उनके घर आयी. उसने उनकी पत्नी से कहा, जिस दिन यह घटना हुई बताई जा रही है, वह उनकी दुकान पर गयी थी लेकिन दुकान बंद पाकर वापस लौट गयी थी. उस दिन वे शायद घर से निकले ही नहीं थे और घटना का जो समय बताया जा रहा है हो सकता है उस वक्त उनकी कार भी यहीं घर के बाहर खड़ी रही होगी.

यह लड़की कोई छोटी मोटी नौकरी करती थी. उसका कोई मुकदमा चल रहा था, बलभद्र दास से सलाह लेने और कागजों की फोटोकापी कराने यदा कदा दुकान पर आती थी और देर तक बैठी रहती थी.

घर वाले जैसे आसमान से गिरे. उन्होंने पहले रोजमर्रा की घटनाओं, उंगलियों फिर अंत में कैलेन्डर से मिलान कर हिसाब लगाया तो पाया कि उस दिन इतवार था जो बाजार की साप्ताहिक बंदी का दिन होता है. उस दिन सुबह टहल कर पार्क से लौटने के बाद वह कहीं गए ही नहीं थे. पिछवाड़े की सर्विस लेन में क्रिकेट खेलने वाले किशोर लड़कों को याद दिलाकर उन्होंने पूछा, क्या उस दिन उन्होंने घर के बाहर कार खड़ी देखी थी. वे पड़ोसियों के यहां गए जिनमें अधिकांश को कुछ याद नहीं था था और एक आदमी ने कहा कि उसे किसी की कार देखने का कोई शौक नहीं है. कई घरों में पूछताछ के बाद अंततः एक महिला ने कहा कि उसने उसी दिन अमेरिका से आई अपनी बहन के रोते हुए बच्चे को बहलाने के लिए जरा देर उनकी लाल रंग की कार के बोनट पर बिठाया था. क्रिकेट खेलने वाले बच्चों ने भी आपस में पूछताछ कर बताया कि उनकी कार तो उस दिन अपनी जगह खड़ी थी. नजर आने लगा कि बलभद्र दास को झूठे केस में फंसाया जा रहा है.

उस लड़की ने बलभद्र दास की मां के साथ पड़ोसियों के हाथ पैर जोड़कर बहुत मुश्किल से तीन लोगों को राजी किया, वह उन्हें बलभद्र दास के पिता और पत्नी के साथ लेकर पुलिस कमिश्नर के दफ्तर गई, उन्होंने एक आवेदन देकर कहा कि जिस कार को पुलिस ने बलात्कार के महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में अपने कब्जे में ले रखा है वह तथाकथित घटना के समय उनके घर के सामने खड़ी थी, इसके वे लोग गवाह हैं.

कमिश्नर जानता था कि पुलिस कैसी भी पुख्ता कहानी क्यों न गढ़े हर बार न जाने कैसे कोई न कोई दरार छूट ही जाती है. संभवतः इस मामले में भी यही हुआ था. पुराना कहानीकार होने के नाते वह जान गया था कि यह चूक इतनी बड़ी है कि छिपाई नहीं जा सकती लिहाजा उसने मामले की जांच क्राइम ब्रांच को सौंप दी. पुलिस महकमें के भीतर यह मजेदार जगह थी जहां ज्यादातर पुलिस वालों को सजा के तौर पर कमाई की जगहों से हटाकर भेजा गया था. यहां आकर उनमें से कईयों का क्षोभ नैतिक शक्ति में बदल जाता था जिससे कभी कभार उन मामलों में जिनमें राजनीतिक हस्तक्षेप न हो न्याय के फूल खिल जाया करते थे.

पहली ही बार पूछताछ के बाद जांचकर्ताओं की दिलचस्पी बलभद्र दास में खत्म हो गई सो उन्होंने इस केस के सबसे दिलचस्प चरित्र यानि बलात्कार की शिकार की लड़की अहिल्या से को खोजना शुरु किया. अहिल्या पूर्वी दिल्ली के झुग्गी और कालोनी के बीच की बसावट वाले मुहल्ले गणेश नगर में किराए के एक कमरे में रहती थी. वह अपने काम के सिलसिले में वह अक्सर बाहर रहती थी और कई कई दिनों बाद कमरे पर लौटती थी. उसके कमरे पर ताला पड़ा हुआ था लेकिन ताले की सुराख में एक पर्ची खुंसी थी जिस पर लिखा था, “लगता है लभेड़ होगी, तुम अपनी सैलरी लेकर घर चली जाओ.”

एफआईआर में उसका पता मेरठ के खरखौदा थाने के लंबूखेड़ा गांव का लिखा हुआ था. क्राइम ब्रांच का एक सिपाही उसे खोजने वहां गया तो पता फर्जी निकला, उस नाम का कोई गांव और पोस्ट आफिस उस इलाके में था ही नहीं. तीन दिन के इंतजार के बाद अहिल्या और पर्ची लिखने वाला बबलू दोनों गणेश नगर के बाहर मदर डेयरी के सामने की सड़क पर टहलते मिल गए. क्राइम ब्रांच के जरा सख्ती से पूछताछ करने पर जो कहानी पता चली हैरतअंगेज थी, तमाशा देखने की आदत ने बलभद्र दास माखीजा को एक बड़े जाल में ला फंसाया था जिससे निकल पाना उन अकेले के बूते में नहीं था. अच्छी तरह बुने गए जाल के कोनों को पुलिस, वकील, प्रेस और कई अफसरों ने मुस्तैदी से थाम रखा था.

जिस दिन बलभद्र दास माखीजा गिरफ्तार किए गए उसके एक दिन पहले मोटे दारोगा ने अहिल्या को अपने विश्वस्त मुखबिर बबलू से मिलवाया था. बबलू का चुनाव इसलिए किया गया था कि उसका ब्लड ग्रुप वही था जो माखीजा का था. माखीजा का ब्लडग्रुप, उनकी दुकान के पास की एक पैथालाजी से जहां वह अपनी शुगर की जांच कराते थे, पहले ही पता किया जा चुका था.

बबलू सुबह साढ़े पांच बजे पेशगी के दस हजार रूपए लेकर अहिल्या के कमरे पर पहुंचा जो उसका इंतजार कर रही थी. निहायत कामकाजी ढंग से उसने आधे घंटे के भीतर अहिल्या को शराब पिलाई, दारोगा के बताए तरीके से संभोग किया और उसे स्कूटर से एक वकील के चैंबर में छोड़ कर चलता बना जो बलात्कार के मामलों का माना हुआ विशेषज्ञ था. वकील को परीक्षण कर बताना था कि उसका शरीर आदर्श या स्टैंडर्ड बलात्कार के कानूनी खांचे में फिट हो रहा है या नहीं.

वकील तीस हजारी कोर्ट में प्रैक्टिस करता था. उसने बलभद्र दास माखीजा के समान ब्लडग्रुप वाले एक जज के बेटे को ऐश कराने के नाम पर अपने घर के बाहर बने चैंबर में रात से ही रोक रखा था. इस जज की कोर्ट में उसके मुवक्किलों को जमानत आसानी से मिल जाया करती थी जो उसकी आजीविका थी. इसके एवज में उसे उसके बेटे और परिजनों का ख्याल रखना पड़ता था.

अहिल्या के कपड़े उतरवा कर, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद वकील ने मुंह बिचका कर कहा, ‘अनाड़ी लौंडे ने सब गुड़ गोबर कर दिया है, उसे एक और आदमी से संभोग करना पड़ेगा.’ वकील ने चैंबर से बाहर निकलते हुए अहिल्या को जल्दी से जज के बेटे के साथ संभोग करने को कहा तो वह बिदक गई कि उसे पैसे सिर्फ एक आदमी के दिए गए हैं और काम दो आदमी का कराया जा रहा है.

जब वह उठकर जाने लगी, वकील उसे वापस चैंबर में घसीट लाया और अपने मोबाइल फोन पर दारोगा से बात कराई. इस पर भी अहिल्या राजी नहीं हुई तो दारोगा ने कहा कि ठीक है, वह दोबारा संभोग न करे लेकिन जैसा वकील कह रहा है करती जाए वरना सारा केस चौपट हो जाएगा. अगर नहीं मानेगी तो उल्टे वही झूठा केस दर्ज कराने और वेश्यावृत्ति के आरोप में जेल में डाल दी जाएगी. दारोगा की धमकी से सहमा देखकर दोनों उसे समझाने लगे, वह अगर राजी हो जाए तो उसे वे सरकार से बलात्कार का मुआवजा दिला देंगे जो उसके मेहनताने से कई गुना ज्यादा होगा लेकिन वह उनकी ओर देखे बगैर चुपचाप खड़ी रही.

पुलिस बरामद करे, उस वक्त अहिल्या बदहवास दिखे इसके लिए वकील ने उसे आधा गिलास नीट शराब पिलाई और दराज से एक पुड़िया कच्ची तंबाकू निकाल कर देते हुए चबाने को कहा. चक्कर आने से अहिल्या के पैर लड़खड़ाने लगे और उसकी आवाज बदल गई तब दोनों उसे कार में बिठाकर उस जगह छोड़ने चले जहां पुलिस के आने तक उसे चुपचाप लेटे रहना था. मोटे दारोगा ने घरेलू नौकरानियों का काम करने वाली दो महिलाओं को पैसे देकर वहां पहले से तैनात कर रखा था जिन्हें अहिल्या को देखने के बाद पुलिस को फौरन खबर करने का नागरिक कर्तव्य निभाना था.

चलती कार में जज के बेटे ने अचानक अहिल्या को इतनी जोर से अपनी ओर घसीटा कि उसकी चूड़िया टूट कर हाथ में धंस गई और उसका सिर सीट से टकराया. तेज तंबाकू के असर से उसे चक्कर आ रहा था और पसीना छूट रहा था. वह बिल्कुल प्रतिरोध करने की हालत में नहीं थी. उसने उसके सारे कपड़े जबरदस्ती उतार डाले और गालियां बकते हुए उसके नंगे शरीर पर हस्तमैथुन किया. बीच बीच में वह उसके पेट, स्तनों और नितंबों पर नाखून गड़ा कर जानवर की तरह गुर्राने लगता था. स्खलित होने से पहले तमाचे मार मार कर पूछता रहा, ‘बोल, मुआवजा लेना है…लेना है’.

अहिल्या के कपड़े पहन लेने के बाद, पहले से निर्धारित सुनसान जगह पर गाड़ी रोक कर उन्होंने उसे सड़क से थोड़ी दूर हट कर जमीन पर लेट जाने को कहा. वह उतर कर लड़खड़ाती हुई उल्टियां करने लगी फिर पस्त हालत होकर पसर गई. जब वह उल्टियां कर रही थी, वे दोनों जा चुके थे.

जल्दी ही एक छोटी सी भीड़ इकट्ठा हो गई, लोग उसके पति से लड़कर जहर खा लेने से लेकर मिर्गी का दौरा पड़ने तक के कयास लगा रहे थे लेकिन पास कोई नहीं आया. सड़क पर आते-जाते साइकिल और स्कूटर वाले थोड़ी देर के लिए ठिठकते और आगे बढ़ जाते.

अहिल्या ने भीड़ में मौजूद उन दोनों औरतों को अधमुंदी आंखों से पहले ही पहचान लिया था लेकिन जब वे आकर उसे हिलाने डुलाने लगीं तब उसने निश्चिंत होकर आंखे बंद कर लीं. वह चाहती थी उसकी हालत अधिक खराब जानकर वे जल्दी से पुलिस को बुला लाएं और उसे अस्पताल पहुंचा दिया जाए क्योंकि पीठ में कंकड़ चुभ रहे थे और सिर उड़ रहा था. उनमें से एक औरत करीब के थाने जाकर एक सबइंस्पेक्टर अपने साथ लेकर आई जिसने आकर पीसीआर वैन बुलाने के लिए फोन किया. जब तक वैन आती सबइंस्पेक्टर भीड़ को मां-बहन की गालियां देता रहा और उन नौकरानियों से फूहड़ मजाक करता रहा.

दोपहर में बाड़ा हिन्दूराव अस्पताल आकर उसी सबइंस्पेक्टर ने उसका बयान लिया जिसके आधार पर बलभद्र दास माखीजा को रात में उनके घर से गिरफ्तार कर लिया गया. जिस समय वह हवालात में थे उनकी कार में अहिल्या का चबाया च्यूंइगम, एक कान की बाली, कुछ बाल और चूड़ियों के टुकड़े डाल दिए गए. केस मुकम्मल होने के बाद सारे पात्रों को उनकी फीस देकर विदा कर दिया गया सिर्फ मुख्य किरदार अहिल्या को तीस हजार रूपए और मिलने बाकी थे जो बाद में दिए जाने थे.

जैसा कि आप जानते हैं, मोटा दारोगा अक्सर सुबह बलभद्र दास के पास आया करता था. गेट के सामने जीप पर बैठे बैठे उनसे बात करता था और चला जाता था. वह जिस दिन उनसे पहली बार मिलने आया, उससे पहले की रात वह मनुष्य और मनुष्य के बीच के खिंचाव के आगे अशक्त होकर एक विशाल भंवर में आ गिरे थे.

वह उस रात दुकान बढ़ाने के बाद कार से घर लौट रहे थे. रास्ते में महसूस हुआ कि जोर से पेशाब लगी है. पछताते हुए कि दुकान के पीछे की गली में फारिग हो कर निकलना चाहिए था, वह कोई माकूल जगह खोजने लगे.

वह एक सुनसान सड़क पर रुकने वाले थे कि पुलिस की एक जीप नजर आई जिसके पास दो कांस्टेबल मुस्तैद खड़े थे. उन्होंने फुर्ती से अपनी सीट बेल्ट बांधी और नजरें बचाते हुए बगल से गुजर गए. कुछ दूर आगे सड़क से नीचे सर्विस लेन में पेड़ों के बीच एक पिचके टायर वाली कबाड़ हो चुकी बस खड़ी थी. उन्होंने किनारे कार रोकी और बस की ओट में जाकर खड़े हो गए.

उन्हें लगा, बस के अंदर कोई दौड़ रहा है. रीढ़ की हड्डी में झुरझुरी पर काबू पाते हुए उन्होंने सोचा, नशा करने वाले बच्चे होंगे. अगले क्षण शीशा चटकने की आवाज आई, ऐसा लगा जैसे भीतर दो लोग लड़ रहे हैं. उन्होंने पेशाब करके लौटते हुए बस के आगे जाकर उचक कर भीतर झांका लेकिन धूल से ढके गंदले शीशों और बोनट पर मेरा भारत महान के साथ तिरंगे झंडे की धुंधली इबारत के सिवा कुछ नजर नहीं आया.

वह कार में आकर बैठे कि बस की खिड़की का एक शीशा झन्न की आवाज के साथ जमींन पर आ गिरा और खिड़की से एक लड़की का धड़ बाहर लटकने लगा, अंधेरे से निकला एक हाथ उसकी हाथ छातियां मसल रहा था. उसके बाल नीचे की ओर झूल रहे थे, वह डर से घिघियाते हुए बाहर निकलने के लिए छटपटा रही थी. बलभद्र दास माखीजा की सांस अटक गई, उन्होंने कार स्टार्ट की और कुछ कदम आगे भाग गए फिर अचानक रुके और दरवाजा खोलकर बाहर खड़े हो गए. वह जो हो रहा था उसे सिर्फ ठीक से देखना चाह रहे थे.

उस हाथ ने लड़की की कमर पकड़ करक भीतर घसीटने की कोशिश की लेकिन वह छिटक कर खिड़की से नीचे गिरी और कई गुलाटियां खा गई. उन्होंने देखा, पुलिस की वर्दी पहने एक मोटा आदमी खिड़की से झांक रहा था, उसका चेहरा फड़क रहा था और आंखें अंगारों की तरह दहक रही थीं.

उन्होंने दूर से हाथ नचाकर दबी आवाज में पूछा, “ये क्या हो रहा है सांई?”

पुलिस वाला दहाड़ा, “तुझे क्या परेशानी हो गई. जल्दी निकल ले यहां से.” यह वही मोटा दारोगा था.

लड़की लड़खड़ाते हुए सर्विस लेन के ऊपर चढ़ी और दौड़ते हुए सड़क पार कर गई. दूर तक कोई नहीं था सिर्फ एक ट्रक गरजते हुए गुजर गया. वह दौड़ते हुए इस पार आई और दोनों हाथों से उनकी कार का बोनट पीटने लगी. बलभद्र दास ने घबरा कर दारोगा को देखा जो बस का दरवाजा खोलकर चिल्ला रहा था, “अबे तू भागता क्यों नहीं, क्यों यहां खड़ा होकर नेतागिरी कर रहा है.”

वह भागकर कार के भीतर घुसे, इतने में दूसरे दरवाजे से आकर लड़की भी अंदर बैठ चुकी थी. उसकी टी शर्ट का कॉलर नुचा हुआ था और जमींन पर रगड़ खाने से चेहरे के एक तरफ खून छलछला रहा था.

उन्होंने बिना कुछ सोचे कार भगा दी. सोचने का वक्त ही नहीं था. लड़की खुद को शीशे में देखती हुई बड़बड़ाए जा रही थी…मैं एक प्राइवेट कंपनी में रिसेप्सनिस्ट का काम करती हूं. कुछ दिन पहले दफ्तर के सामने से मेरी स्कूटी चोरी हो गई. रिपोर्ट लिखाई थी, पूछताछ करने रोज थाने चली जाती थी और यह मुझे ऐसे घूरता था जैसे आंखों से ही रेप कर देगा. तभी मुझे लगा था कि कुछ हो जाएगा और मैने स्कूटी से संतोष कर लिया. आज सुबह थाने से फोन आया कि ऑटोलिफ्टरों का गैंग पकड़ा गया है. मुझे पकड़ी गई गाड़ियों में से अपनी स्कूटी पहचानने के लिए बुलाया गया था. कई घंटे बिठाने के बाद भी मुझे गाड़ी नहीं दिखाई. इसने कहा, तुम्हारी गाड़ी तो मिली नहीं है लेकिन मैं तुम्हें दूसरी गाड़ी दिला दूंगा. जब तक तुम्हारी वाली मिल नहीं जाती तुम इस पर पुरानी नंबर प्लेट लगाकर चला सकती हो. मैं गधी हूं, इसके झांसे में आ गई. यह मुझे बात करने के लिए इस बस में ले आया और मैं चली भी आई. यह मेरी जान ही ले लेता पता नहीं कैसे बच गई.

यह वही लड़की थी जो बलभद्र दास के पिता और पड़ोसियों को साथ लेकर कमिश्नर के यहां गई थी.

बलभद्र दास उसे लेकर सरकारी अस्पताल गए, मेडिकल कराने के बाद थाने ले जाकर रिपोर्ट लिखाई जिसमें प्रत्यक्षदर्शी और मददगार के रुप में उनका नाम भी डाला गया. रिपोर्ट लिखने वाले कांस्टेबल ने कहा, “सोच लो, कोर्ट कचहरी का लंबा चक्कर चलेगा और पंगा पुलिस वाले से है.”

उन्होंने कहा,” जो सच है वो सच है. अगर मैने इस लड़की की मदद नहीं की तो अपनी लड़की की भी नहीं कर पाऊंगा. ”

मामला जिस दिन अदालत में गया, पहली पेशी की सुबह दारोगा उनके घर आ धमका. उसके बाद तीन महीने तक बयान बदलने के लिए धमकाता रहा और तीन लाख रुपयों का लालच देता रहा. जब वह नहीं माने तो बलात्कार का महीन, लचीला और मजबूत जाल बुना गया.

बलभद्र दास माखीजा जेल में तिरेपन दिन बिताने के बाद जब घर लौटे तो उनकी पत्नी ने आरती उतारी और षड्यंत्र में शामिल कुल ग्यारह पुलिस वालों के लाइन हाजिर होने पर मिठाई बांटी. सबने उन्हें अपने अपने ढंग से समझाया, “गनीमत है कि इस बार जान बच गई. अब न तमाशा देखना और न दूसरे के फटे में टांग अड़ाना.”

उन्होंने कहा, “आदमी आदमी को खींचता है सांई! देखो तो दो फायदे हुए. एक तो पुलिस और जेल का डर निकल गया और  अब एकांतिका अकेली नहीं है. उसे अब बहन से भी सगी बहन मिल गई है.”

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