टीवी पर एक काल्पनिक प्राइम टाइम डिबेट

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शिवम शुक्ला/

हफ्ते के 7 दिनों में से 6 दिन ऑफिस की फाइलों में उलझकर, सहकर्मियों की छुट-पुट राजनीति से गुज़रते हुए बॉस की डांट खाने के बाद रविवार को हम थोडा ज़िन्दा सा महसूस करते हैं। इस ज़िन्दा हालत में हम हमारे कुछ निजी काम निपटा पाते हैं। ये निजी काम बाकी 6 दिन जिंदा रहने की ज़रूरत हैं। इन सभी कामों को ख़त्म करने के बाद शाम को झपकी लगना मानो दिन भर के काम-थकान के बाद मिला ईनाम हो। उस झपकी में भी इस अशांत मन को इतनी भी शांति नहीं  कि चैन से सोने दे।

शिवम शुक्ला

रात के नौ बजे सब काम ख़त्म कर टी.वी. देखने बैठा तो उसी दिन घोषित हुए सीबीएसई की बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट पर चर्चा चल रही थी। केंद्र सरकार के मानव संसाधन एवं विकास मंत्री के साथ कुछ राज्यों के शिक्षा मंत्री, कुछ सरकारी स्कूलों के प्राचार्य, टॉप 3  विद्यार्थियों के साथ कुल मिलाकर 11 लोग एक निजी चैनल के न्यूज़ रूम में साथ बैठे हुए इस रिजल्ट की विवेचना कर रहे थे। 2 घंटे के इस कार्यक्रम में सबसे पहले उन 3 टॉपर बच्चो से कुछ सवाल जवाब किये गए। उन्होंने बताया कि किस तरह रात दिन कठोर परिश्रम कर उन्होंने खुद को इस स्थान के काबिल बनाया है। इनकी बातों को सुनकर मंत्री जी प्रसन्न हो उठे और उनकी आगे की शिक्षा का भार वहन  करने का वचन दे दिया।

विद्यार्थियों से बातचीत के बाद शिक्षा तंत्र को मजबूत बनाने एवं अगले वर्ष के रिजल्ट्स को और बेहतर करने पर चर्चा प्रारंभ हुई। मंत्री जी ने शिक्षा के स्तर को बेहतर करने हेतु सुझाव मांगे। उन्होंने प्राचार्यों से पूछा कि और क्या बेहतर किया जा सकता है। प्राचार्यों ने अपने सुझाव में कहा कि शासकीय विद्यालयों को सर्व-सुविधा युक्त भवन की आवश्यकता है। इस भवन में प्रोजेक्टर, सभाग्रह खेल का मैदान और बढ़िया यंत्रों एवं रसायनों से युक्त प्रयोगशाला की आवश्यकता है।  जिन बच्चों के परीक्षा परिणाम अच्छे नहीं हैं उनकी पढ़ाई पर जोर देने के साथ यह जानना भी आवश्यक है कि उनकी रूचि किस क्षेत्र में है। कुछ विद्यार्थी विभिन्न कलाओं में निपुण हैं तो कुछ खेल कूद में। विद्यालयों में एक कार्यशाला की आवश्यकता है जिसमें विभिन्न प्रतिभाओं के धनी विद्यार्थियों को उनकी रूचि के अनुरूप सम्बंधित क्षेत्र में और बेहतर बनाया जा सके, जिससे विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने हेतु वह तैयार हो सकें एवं उन प्रतियोगिताओं में उनको सीधे भाग लेने के अवसर मिलें।

मैं इनकी बातें  सुनकर अचंभित था।

विचार-विमर्श जारी रहा, अच्छी किताबों एवं पत्रिकाओं को पुस्तकालय में लाने हेतु सुझाव आया, जिससे शिक्षक विद्यार्थियों को नई खोजों एवं तकनीकों से अवगत करा सकें। उच्च शिक्षित शिक्षकों को अच्छे वेतन पर बच्चो को पढ़ाने का अवसर देने की बात कही गयी। कस्बों एवं गावों के विद्यालयों में Computers के साथ बायोमेट्रिक मशीन लगाने का सुझाव भी सामने आया।

एक प्राचार्य ने विभिन्न क्षेत्रों में सफल लोगों से समय-समय पर वर्कशॉप एवं सेमीनार आयोजित करने का सुझाव दिया। स्कूल में योग-व्यायाम की कक्षाएँ प्रारंभ करने का सुझाव आया, जिससे विद्यार्थियों का शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकास हो सके।

न्यूज एंकर इन सभी बिन्दुओं को अपने लैपटॉप में क्रमशः अंकित करता जा रहा था। मैं हतप्रभ था। एक निजी न्यूज़ चैनल पर इस तरह से बैठकर इतनी प्रभावी बातें कोई मंत्री कैसे कर सकता है। मैं बेचैन हो रहा था। ये बेचैनी ख़ुशी वाली थी। मैं उस प्रोग्राम को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। मेरे साथियों, जो इन बातों में रूचि रखते हैं, को फ़ोन लगाकर बताने लगा।

विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक सभी तत्वों को ध्यान में रखकर बिना ब्रेक के 2 घंटे लम्बे चले इस कार्यक्रम के अंत में न्यूज़ एंकर ने अपने लैपटॉप में लिखित समस्त बिन्दुओं का प्रिंटआउट निकालकर सभी मंत्रियों एवं प्राचार्यों को सौंपा एवं उनके हस्ताक्षर लिए। और इन सभी बिन्दुओं को जुलाई से अमल में लाने का वचन देकर मंत्रीगण स्टूडियो से निकल गए।

सभी मंत्रियों, प्राचार्यों के सुझाव इतने उच्च स्तरीय थे कि भारत का एक सुनहरा भविष्य बनना तय था। इस कार्यक्रम को देखकर मैं धन्य हो गया। न जाने पिछली सरकारों ने क्यों इस मामले में ऐसी चुस्ती नहीं दिखाई। अगर दिखाई होती तो  मेरी शिक्षा और अच्छी हो सकती थी। वर्तमान सरकार ने कितने बढ़िया निर्णय लिए हैं।

पूरे कार्यक्रम में एक जो बात मुझे बहुत अच्छी लगी वह ये कि एंकर सारी बातों को सुनकर और  समझकर प्रतिक्रिया दे रहा था। सवाल भी बहुत अच्छे पूछ रहा था एवं सभी महत्वपूर्ण बिन्दुओं को नोट कर रहा था। मुझे सबकुछ बहुत अच्छा लग रहा था। अन्दर से नयापन एवं ताजगी बाहर आ रही थी।

मेरे दिमाग में अनेक सकारात्मक ख्याल उमड़ रहे थे। समाज और शिक्षा को लेकर मैं सजग हूँ। अधिकतर इस बारे में सोचता हूँ। मेरी आँखों से होते हुए मेरे गालों पर पानी की एक बूँद ठहर गयी। दूसरी बूँद आने तक वह वहीँ जमी रही। दूसरी आँख का भी बिल्कुल यही हाल था। मगर ये बूँदें इतनी ठंडी क्यों हैं। इसे पोछने के लिए मैंने आँखों को मसला तो मैंने देखा कि मेरा एक दोस्त मेरी आँखों पर एक एक बूँद करके पानी डाल रहा था। और, मैं नींद से जाग चुका था। मेरी ख़ुशी वहीँ कहीं दफन हो गयी थी। रात के 09:15 बज रहे थे।

मैंने न जाने किस उम्मीद से टी.वी. को चालू किया। वही न्यूज़ चैनल लगाया। उस चैनल के न्यूज़ रूम में वहाँ कुछ लोगों को किसी राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह की बातें करते हुए पाया। वह लोगों को राष्ट्रद्रोही और राष्ट्रवादी होने का तमगा दे रहे थे। गाय और सैनिकों की बातें कर रहे थे।

एक बार इन्होने पड़ोसी देश को एक्स्पोस भी किया था। क्या पडोसी मुल्क के लोग इन्हें देखते भी होंगे?

(शिवम शुक्ला इंदौर से इंजिनियरिंग और मैनेजमेंट की पढाई-लिखाई पूरी कर खुद के व्यवसाय में हैं. इंदौर में ही इनकी रहनवारी है. सामाजिक उतार-चढ़ाव पर ये बारीक नज़र रखते हैं.) 

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