पापा, तुम्हारे भाई

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प्रत्येक लेखक की कुछ कहानियां पाठकों के दिमाग पर कुछ ऐसे चस्पा होती हैं कि मौके-बेमौके पाठक उस कहानी को महसूस करता रहता है. सौतुक ऐसी सिग्नेचर कहानियों  का एक सिलसिला शुरू कर रहा है. इसकी शुरुआत शिल्पी की कहानी ‘पापा तुम्हारे भाई’ से. शिल्पी उन हिंदी कथाकारों में शुमार हैं जिन्होंने अपने लेखन के शुरुआत से ही पाठकों को गहरे प्रभावित किया है. प्रस्तुत है उनकी कहानी जो 2004 में हंस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी- मॉडरेटर 

 

शिल्पी

इस तस्वीर को देखिए, यह मैं हूं, झबरे बालों वाली लड़की जो जूते से अपनी एक आंख ढके हुए है। सामने घुटनों तक मोजे पहने, स्टिक को गिटार की तरह बजाते हुए जो आदमी नंगे बदन नाच रहा है, मेरे पापा हैं। आसमान पर बादल हैं, पानी बरसने वाला है। हम लोग बारिश में भी नाचेंगे और गरम जलेबी खाते हुए घर लौटेंगे। मेरे पापा को नहीं जानते आप, क्रिकेट से फुर्सत मिले तब न। जाट रेजिमेंट के थर्ड आर्टिलरी डिवीजन के सूबेदार मेजर भारत सिंह, वही बर्सिलोना ओलंपिक के गेममेकर मास्टरमाइंड लेफ्ट इन… और गेंद एक बार फिर भारत के कब्जे में, लचकदार कलाइयों की खूबसूरत ड्रिब्लिंग, दो को छकाया, बहुत आसान लगती जादुई फ्लिक, प्रतिद्वंद्वी भौचक, एकदम कार्नर से रिवर्स क्रॉस, फॉरवर्ड ने गेंद को ट्रैप करके समय गवाने का जोखिम नहीं लिया, बेहिचक शॉट, गोलकीपर के बाएं पैर को छूती हुई गेंद अंदर और ये गोओओ….। गांव के लोग पापा की मौत को भी इसी तरह याद करते हैं। वे कारगिल की लड़ाई में मारे गए। नए ताबूत की वार्निश की भीगी महक और उनका सोया चेहरा मुझे याद है। लेकिन, यह तस्वीर मैं दिखा किसे रही हूं?

ओह पापा, तुम ज़िंदा होते तो देखते, लोग कहते हैं, मैं एकदम तुम्हारी तरह खेलती हूं। विरोधियों के घेरे में उन्हें ललचाते हुए, खिलवाड़ करते हुए लेकिन घेरा तोड़ने की नई-नई चालें सोचते हुए। तुम्हारी अचानक छूटी गोली जैसी दौड़ अब मेरी पिंडलियों में ज़िंदा है। तुम्हारी यह स्टिक हमेशा मेरे किट में रहती है जिस पर किसी अल्हड़ लड़की की चलाई कैंची का निशान है। मां इसके लिए तुमसे कितना लड़ती थी। अक्सर कुढ़कर उसे चूल्हे में लगा देने के लिए खोजती थी और तुम उसे बच्चों की तरह कहीं अनाज के ढेर में तो कहीं दुछत्ती पर छिपाते फिरते थे। मां से घर में कोई कुछ भी छिपा सकता है क्या? वह भी जानती थी कि वह स्टिक कहां रखी है, फिर भी मुझसे पूछती थी। जैसे मैं बता दूंगी। मैं हमेशा शरारत से इनकार में सिर हिलाती थी और वह मुझ पर झल्लाने लगती थी। हम औरतें ऐसी ही होती हैं, पापा।

लेकिन तुम क्या जानो इस बार मैं कैसा घेरा तोड़कर भागी हूं, अचानक बहुत बड़ी होकर शर्म से लिथड़ गई हूं। ख़ून, रिश्ते, समाज, प्यार मेरे लिए सब बंजर-ऊसर हो गए हैं। अभी तो अपने कमरे से बाहर भी नहीं निकल सकती। अभी तो स्पोर्ट्स हॉस्टल के कमरे की इन चहारदीवारों के बीच सिर्फ़ तुमसे बात की जा सकती है, लेकिन यक़ीन रखो, एक दिन मैं सच्चे खिलाड़ी की तरह सब का सामना करूंगी। घेरा चाहे जितना मज़बूत हो, विरोधी चाहे जितने क्रूर और कमीने हों। तुम्ही मैच के बीच चिल्लाया करते थे ‘मुश्किल वक़्त, कमांडो सख्त’, और मैं फिर एक बार उठ कर जूझने के लिए तैयार हो जाती थी।

लेकिन तुम क्या जानो इस बार मैं कैसा घेरा तोड़कर भागी हूं,अचानक बहुत बड़ी होकर शर्म से लिथड़ गई हूं

तुम्हारे चले जाने के बाद मेरी प्रेक्टिस धवरी और उसके बछड़े ने कराई। वह जानती तो थी ही कि तुम नहीं रहे, यह भी जान गई थी कि तुम्हारा सपना क्या था। इसलिए उसने यह काम अपने हाथ में ले लिया। आए दिन दुहे जाने से ठीक पहले रोज़ सुबह वह खूंटे को झटका देकर भाग निकलती थी और मैं उसके पीछे। दूर खेत में खड़ी होकर वह और उसका बछड़ा मुझे शरारत से देखते थे, जैसे चिढ़ा रहे हों। गांव की ऊबड़-खाबड़ संकरी गलियों से होते हुए फसलों से भरे खेतों, खलिहान, टीलों, कीचड़ और तालाब के छिछले पानी में मां-बेटे पकड़ने की चुनौती देते हुए मुझे दौड़ाते रहते थे। थककर पस्त हो जाने के बाद जब मैं हांफते हुए दोनों को कोसने, मुंह चिढ़ाने, या गालियां देने लगती थी तो वे चुपचाप खड़े हो जाते थे। गले का पगहा पकड़ाते समय वह मुझे उसी तरह देखती थी जैसे तुम सुबह की कठिन प्रैक्टिस के बाद हंसती आंख से देखते थे। घर की ओर लौटते हुए उसका बछड़ा मुझे पीछे से ठेलकर छेड़ता था। अब वह पूरा बैल हो गया है और गंभीर रहता है। वह किसी और को अपने थन पर हाथ भी नहीं लगाने देती थी। एक दुलत्ती और बाल्टी मुंह पर, पैर ऊपर। लाठियों का असर उस पर नहीं होता था। मेरे हाथ लगाते ही चुपचाप खड़ी हो जाती थी, और जैसे दूध का झरना बहने लगता था। मुटियार, दूध भी इतना देती थी कि दुहते-दुहते बाहें भर जाती थीं और बाल्टी संभाले टांगें थरथराने लगती थीं। इतना थक जाती थी, आधे दिन तक मुझे नींद में पूरा स्कूल हिलता हुआ लगता था। मेरे हॉस्टल आ जाने के बाद सनकी, मनमौजी और ज़बर समझी जाने वाली इस शानदार गाय को बेच दिया गया।

और घर के आंगन में! वहां भी ‘स्किल हॉनिंग सेशन’ चलता रहता था। मां बड़ी देर से बाहर का दरवाज़ा बंद करने के लिए बड़बड़ा रही है। एक ड्रैग हिट, धड़ाक! दरवाज़ा बंद। पिसने के लिए सूख रहे गेहूं पर कौवे टूट रहे हैं, स्कूप…भाग गए साले! चाची का बेटा रो रहा है , एक रंग-बिरंगी कैप उसके सिर पर रखने के बाद टांगों के बीच से ड्रिब्लिंग, टूटे दांतों की खिड़की खुल गई। हर वक़्त की मेरी खट-खट से और सभी चाहे जितना नाराज़ हों मां ने कभी कुछ नहीं कहा।  शायद उन्हें तुम्हारी याद आती होगी और अच्छा लगता होगा, है न! कभी-कभार बड़बड़ाती थीं कि पता नहीं हज़ारों मर्दों के सामने बित्ता भर की स्कर्ट पहने नंगी टांगें दिखाते हुए कैसे दौड़ती है। उन्हें क्या पता, जिन लड़कियों की टांगें सूखी और डिशेप हो जाती हैं वे उन्हें भरी-भरी बनाने के लिए क्या-क्या उपाय करती हैं ताकि सेलेक्टरों और कोच की नज़र उन पर से हटे नहीं। टीवी और अख़बार वाले भी अपने कैमरे ऐसी ही लड़कियों पर फोकस किए रहते हैं, खेल उनका चाहे जैसा हो। आजकल खिलाड़ी खेल से बनता है, लेकिन स्टार तो टांगें ही बनाती हैं।

अख़बार और टीवी वालों की छोड़ो, पापा, तुम्हारे भाई! मर्यादा सिंह जो तुम्हारे मेडल, ट्रॉफियां, सर्टिफिकेट संभाल कर रखते थे और अख़बारों-पत्रिकाओं में तुम्हारे बारे में जो छपता था उसकी फाइल बनाते थे। बता दूं कि गुज़र गए, अगर तुम ज़िंदा होते तो भी तुम्हें दुख नहीं होता। हद से हद शर्म और पछतावा होता।

उन्होंने पता नहीं कहां-कहां से तस्वीरें काट कर महिला जिमनास्टों, तैराकों और टेनिस स्टारों का मोटा-सा अलबम बना रखा था, उसे ताले में बंद रखते थे और अकेले में देखते रहते थे। नादिया कोमानेची, वोल्गा कोरबुत, बुला चौधरी, निशा मिलेट, गैबरीला सबातीनी, अन्ना कुर्निकोवा, मोनिका सेलेस… और भी ढेरों तस्वीरें। मैं उन्हें खिड़की की झिरी से उचक कर देखती थी और बहुत बड़ा खेलप्रेमी समझती थी। मुझे लगता था, उनकी यह झक डाक टिकट, सिक्के या सिगरेट की डिब्बियां जमा करने जैसा ही कोई शौक़ है। लेकिन पापा, एक दिन अचानक मैं समझ गई। मैंने देखा, अपने पजामे के ऊपर वे मेरी लाल रंग की स्कर्ट पहनकर, बंद कमरे में बेवकूफों की तरह घूम रहे थे और बार-बार वह अलबम पलट रहे थे, रह-रहकर उसे उठाकर डरावनी आंखों से उसमें कुछ घूरते थे और फिर फेंक देते थे। मुझे लगा वे बुखार में है और उनका दिमाग चल गया है…मैंने कहा न, मैं समझ गई थी। हां, तुमसे सच कहूं तो पहले मुझे थोड़ा-सा अच्छा लगा और बाद में बहुत हंसी आई। हंसते-हंसते मैं पागल हो गई, तो जाकर मैंने मां को बता दिया।

मां का सुंदर चेहरा अपमान और पीड़ा से ऐंठ गया। वो चिल्लाई,”और तू दांत निकाल रही है, रांड! और टांगें दिखा, और घोड़ी की तरह कूद। देखती जा तेरी क्या गति बनती है।”

“मैंने क्या कर दिया?”

जवाब में बाल पकड़कर घसीटते हुए मां मुझे चौके में ले गई और एक तमाचा मारा। फिर वहीं बैठ कर रोने लगी। तुमसे कहा,”ये कौन सा चलन सिखा गए हो इस घोड़ी को, अब इस घर को बर्बाद करके मानेगी।”

मां ने चाची से कुछ कहा होगा। दो दिन बाद चाचा मां पर फट पड़े, “बहुत दिखाई देने लगा है तुम्हें और तुम्हारी छोकरी को। मेरा पजामा और लंगोट तक दिखने लगा है। पता नहीं किस-किस जात के लड़कों के साथ सिंगापुर, मलेशिया, नेपाल और कलकत्ता घूमती रहती है, वह नहीं दिखता। अगर तुम लोगों को इसी तरह बातें बनानी हैं तो अलग हो जाओ और गांव भर के मर्दों के बारे में किस्से गढ़ती रहो।”

मां, अकेली विधवा, शायद अलग होकर नहीं जी सकती थी, चुप लगा गई।

और चाचा बस जलती आंखों से घूरते रहते थे। उनका घूरना मुझे अब भी कंपा देता है। बचपन में भी तुम तो जानते ही हो मैं कभी उनकी गोद में नहीं जाती थी। वे मुझे ज़बरदस्ती उठाते थे। उनके छूने में ही कुछ जंगली और अजीब था कि मैं बिदक जाती थी। घर में मां चुपके-चुपके महीना भर मेरे अंडरवियर, स्कर्ट, हाफ पैंट खोजती रही, फिर सब को धोकर बक्से में बंद कर दिया। घर पर अपने पहले तो ट्रैक सूट फिर और लड़कियों की तरह सलवार कुर्ता पहनने लगी।

तब की बात नहीं है पापा, हाईस्कूल के बाद की बात है। मैंने अविनाश से अपनी टी-शर्ट बदल ली। तुम तो जानते ही हो कि खिलाड़ियों के जर्सी बदल लेने का क्या मतलब होता है। क़स्बे के धर्मपाल गूजर का बेटा अविनाश, मेरा सीनियर। क्या खेल था उसका। नेशनल खेल चुका था।

गुलाबों की महक से पागल होकर शायद मैं भी उससे प्यार करने लगी

खेल की बात नहीं है, मेरे लिए तुम्हारे जैसा कोई कभी नहीं खेल पाएगा। वह एकदम तुम्हारी तरह भोला और प्यारा-सा था। एक बार मैंने उससे मज़ाक में हांक दिया मेरे पापा गांव में कई एकड़ का लॉन और स्विमिंग पूल बनवा कर गए हैं। उन्होंने एक इटालियन सैलून भी खुलवाया है जिसमें गांव के लोग बाल कटवाते हैं। वह मुंह बाए सुनता रहा, उसने विश्वास कर लिया। एक दिन वह मोटरसाइकिल से अपने एक दोस्त के साथ बाल कटवाने हमारे गांव आ गया। वह लड़का फोटो खींचने के लिए एक कैमरा भी लाया था। मज़ा आ गया। उन दोनों को मैंने फकीरे नाई का चबूतरा दिखाया जहां वह ईंटों के ऊपर बैठकर चाचा की दाढ़ी बना रहा था। ईंटों वाला सैलून इटालियन हुआ न! स्विमिंग पूल देखकर तो वह उछलने लगा। तालाब में भैंसें बिना कास्ट्यूम पहने तैर रही थीं और चारों तरफ़ लहलहाती फसलों का हरियाला लॉन तो था ही। यह वैसा ही हुआ न, जब तुम घर होते थे, मैं स्कूल से लौटकर स्टिक हवा में उछालकर चहकते हुए तुमसे बताती थी कि आज हम लोगों ने सीनियर टीम को हरा दिया और तुम ख़ुश हो कर तुरंत जलेबी खिलाते थे। खाने के बाद मैं बताती थी कि दरअसल हम लोग बुरी तरह हारे और मैं घायल हो गई हूं। इसलिए जलेबी खाना ज़्यादा ज़रूरी था।

आए दिन मुझे अपने किटबैग में गुलाब के फूलों के गुच्छे मिलने लगे। कोई इन्हें खेल के दौरान चुपके से रख जाता था। हालात यह हो गए कि मेरे जूते, पैड, एंकलेट, गेंद, नीकैप, नैपकिन, कपड़े सबमें गुलाबों की गंध समा गई और चारों तरफ़ मुझे फूल ही फूल नज़र आने लगे। अक्सर मेरी स्टिक हवा में ही उठी रह जाती थी। मुझे लगता था मैं फूल को हिट करने जा रही हूं। उसकी पंखुड़ी-पंखुड़ी छितरा जाएगी। टीम की लड़कियां मुझे ‘गुलाबो’ कहकर चिढ़ाने लगीं।  मैंने हिम्मत बटोरकर एक दिन उससे कहा,”मैं अपने चाचा को बता दूंगी फिर होश ठिकाने आ जाएगा। पहले तो वह झेंपा फिर कोमलता से बोला,”अब चाहे जिससे बताओ, हद से हद क्या होगा, मैं तैयार हूं।”

गुलाबों की महक से पागल होकर शायद मैं भी उससे प्यार करने लगी। वह रोज़ भोर में क़स्बे से आठ किलोमीटर जॉगिंग करता हुआ हमारे गांव के बाहर नदी किनारे तक आ जाता था। मैं भी वार्मअप करते हुए घुटनों भर वाली नदी पार कर पहुंच जाती थी। अभी तारे भी डूबे नहीं होते थे, अक्सर चांद भी चमक रहा होता था। हम लोग गन्ने के खेतों में, प्राइमरी स्कूल के बरामदे में, बीज गोदाम के पिछवाड़े मिलते थे, बातें करते थे। आख़िरकार मैंने कह ही दिया कि अपना पहला नेशनल खेलने के बाद उससे शादी कर लूंगी, और फिर कभी गांव नहीं लौटूंगी।

मुझे ही नहीं पता चला, कई गांवों में सबको पता था। यहां तक कि लोग गुलाबों वाला क़िस्सा भी जानते थे। कई लड़के खेतों में कंबल ओढ़ कर सिर्फ़ हम दोनों को देखने के लिए रात भर बैठे जागते रहते थे। मां ने मुझसे पूछा तो मैंने अपने मन की बात बता दी। उन्होंने माथा पीट लिया। वे दालान के दरवाज़े पर ताला लगाकर और चाभी तकिए के नीचे रखकर सोने लगीं। महीनों बाद जब चाचा की गालियां, लड़कों के ताने, बूढ़ों के भद्दे द्विअर्थी मज़ाक जब मंद पड़ने लगे तो मैं फिर सुबह एक्सरसाइज के लिए निकलने लगी। और तभी एक सुबह घात लगाकर चाचा और गांव के लड़कों ने हमें पकड़ लिया।

आज उसका दूसरा दिन था। मेरे मना करने के बाद भी वह मरने चला आया था। उस समय वह एक गन्ना तोड़ कर उसे स्टिक की तरह इस्तेमाल करते हुए, मेरे फेंके ढेले को रोककर पेनाल्टी कॉर्नर हिट करना बता रहा था। अचानक ओस में भीगी शांत फसलों के बीच से निकली भीड़ ने हम दोनों को दबोच लिया। चाचा चीख़े,”साले गन्ने के खेत में डांडिया रास कर रहे थे।” मैं डर के मारे सुन्न हो गई।

अविनाश को मारते-पीटते गांव लाया गया और मुझे एक कमरे में बंद कर दिया गया। दरवाज़े पर पूरा गांव जमा हो गया। पड़ोस के गांवों  के लोग भी आने लगे। मां ने कमरे में आना चाहा तो चाचा ने धकेल दिया, “रांड कहीं की, उसे यार के साथ भगाने जा रही थी।”

घर की औरतों, बच्चों को पड़ोस के घर में बंद कर चाचा आए, सिटकिनी चढ़ाई, जलती आंखों से घूरते रहे। अचानक बालों से पकड़कर उन्होंने मुझे उठा लिया। कान से मुंह सटाकर भिंची आवाज़ में बोले, “गरमी शांत करने के लिए कोई बिरादरी का छोरा नहीं मिला जो सुअर गुज्जर को बुला लाई हमारी नाक कटाने।”

ज़मीन पर पटककर मेरे ऊपर बैठ गए। फिर वही यहां-वहां नोचता हुआ जंगली जानवर का पता। घबड़ाकर मैंने रोते हुए कहा, “यह क्या कर रहे हैं आप?”

“वही जो साले गुज्जर इतने दिनों से कर रहे थे।” घिन और अपमान से तिलमिलाकर मैंने अपने पैर उनके पेट में जमा कर पूरी ताक़त से ठेल दिया। वह उछलकर गिरे और सिर दीवार से लग कर फट गया। फिर कितनी गालियां, घूसे, लात मुझपर पड़े, नहीं पता। मैं घुटनों में सिर देकर पड़ी रही। बाहर अविनाश को जो आता, वही चोर की तरह पीट रहा था। मुझे बाद में पता चला वह मूर्ख लगातार बड़बड़ाए जा रहा था, “हमने कोई ग़लत काम नहीं किया, ग़लत काम नहीं किया।”

वह जितना बकता, उतना पिटता। वह पिटते-पिटते बेहोश हो गया। बाहर पंचायत बुलाने की तैयारी हो रही थी।

पुराने मोजे को फाड़ कर बनाई पट्टी बांधे चाचा थोड़ी देर बाद फिर लौटे, इस बार उन्होंने शांत ढंग से कहा, “सोच ले, अभी मैंने पंचायत के लिए हां नहीं कही है। अगर एक बार पंच बैठ गए तो तुम दोनों फांसी पर लटका दिए जाओगे।” चाचा सौदेबाजी कर रहे थे, मैं सुन्न बैठी रोती रही।

दो, चार, छह या पता नहीं कितने घंटे बाद मुझे बाहर लाया गया, रोशनी से मैं चौंधिया गई। मुझे घूरती अजनबी आंखों और मक्खियों जैसी  भन्नाहट के सिवा और कुछ याद नहीं है। हां, चलते समय एक पुराना कपड़ा लेकर मैंने सिर पर डाल लिया। मैंने कभी ओढ़नी सिर पर नहीं डाली थी, सारे गांव में ट्रैक सूट पहनकर कूदती फिरती थी। पता नहीं मुझे क्यों ऐसा लग रहा था कि इस कपड़े से सिर ढंक कर खड़े रहने से वे मुझे और अविनाश को शायद छोड़ देंगे। थोड़ी बहुत और मार पड़ेगी, बस! अब और कितना मारेंगे? ज़्यादा से ज़्यादा थूककर चाटने को कहा जाएगा या एक-दूसरे के कान पकड़कर उठक-बैठक कराने के बाद मेरा घर से निकलना बंद करा दिया जाएगा। हो सकता है, मैंने सुन रखा था कि इंदिरा गांधी को सिर पर पल्लू रख लेने के कारण ही लोगों ने प्रधानमंत्री बना दिया था, इसलिए यह बात उस समय दिमाग में आई हो। उम्मीद का बेवकूफी से रिश्ता बहुत पुराना है।

मैंने सुन रखा था कि इंदिरा गांधी को सिर पर पल्लू रख लेने के कारण ही लोगों ने प्रधानमंत्री बना दिया था

बाहर निकल कर मैंने कई बार कहा, प्यास लगी है, पानी चाहिए, किसी ने ध्यान नहीं दिया। मुझे लग रहा था, मैं चिल्ला रही हूं लेकिन कोई सुन ही नहीं रहा था। आज लोग सुनना भूल गए थे। बस देख रहे थे। मैंने दरवाजे के बाहर हैंडपंप के सामने झुक कर अंजुरी रोप दी। झुके-झुके पता नहीं कितना समय बीत गया, कोई चलाने नहीं आया। सीधे खड़े होकर देखा तो लोग हंस रहे थे। जैसे पागलों को विचित्र हरकतें करते देख कर हंसते हैं। सहमते-झिझकते कुछ बच्चे आगे बढ़े। बच्चे जो हैंडपंप चलाने के नाम से ही उछल पड़ते थे, फटी-फटी आंखों से ठंडे, भावहीन ढंग से मुझे देखते हुए इस तरह हैंडपंप से बेमन से जूझ रहे थे कि मुझे कोठरी से भी ज़्यादा डर लगा। अचानक एक बूढ़े आदमी ने बच्चों को डांटा, गुज्जरों की रखैल अपनी मौसी को गंगास्नान करा रहे हो।”

बच्चे उसकी बात पूरी होने से पहले ही भाग गए। किसी ने मेरे सिर से वह कपड़ा भी नोच कर फेंक दिया और मुझे ठेलते हुए पंचायत में ले जाया गया।

गांव के बाहर के बगीचे में लोग ही लोग भरे हुए थे। इक्का-दुक्का बंदूकें, लाठियां, तलवारें भी थीं ताकि किसी को भी दखल देने से रोका जा सके। कई तो तमाशा देखने के लिए पहले से पेड़ों पर चढ़ कर बैठे हुए थे। मेरे पहुंचते ही एक मरियल से आदमी ने इमली के पुराने पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर चढ़कर हांक लगाई, “भारत सिंह की छोरी अनीता और गूजर धर्मपाल के नालायक छोरे अविनाश ने वह काम किया है कि जाटों की इज्जत मिट्टी में मिल गई है। सर्वशक्तिमान पंच इस पर विचार कर न्याय करें। फैसला पूरी बिरादरी को मंजूर होगा।”

यह आदमी त्योहारों और शादियों में नगाड़ा बजाकर नाचता था और लोगों की झाड़ सुनने के लिए तरह-तरह की मसखरी करता रहता था। लेकिन आज वह मुझे बहुत भयानक लगा। इज्जत! कहां है इज्जत? किसकी? इसकी? नगाड़े वाले की? अचानक मुझे लगा कि इज्जत कोई अदृश्य रहस्यमय प्रेत है, जिसकी सवारी आते ही मसखरे भी भयानक लगने लगते हैं।

लोग चुप हो गए, सन्नाटा छा गया। चबूतरे पर बैठे पंचों ने अपनी गरदनें झुका लीं, जैसे बहुत गंभीरता से सोच रहे हों। अविनाश का चेहरा पहचाना नहीं जा रहा था, वह भावशून्य ढंग से देखे जा रहा था, जैसे वहां जो कुछ हो रहा था, उस पर उसे यक़ीन ही नहीं आ रहा हो। उसके हाथ पीछे बंधे थे, पैर में जानवरों को बांधा जाने वाला छन्ना डाल दिया गया था, गले में किसी जानवर का पगहा था। उसे घसीटते हुए यहां लाया गया था।

सन्नाटे से अचानक चौंककर मैंने पंचों की ओर देखा। उनके बीच में हुक्का सुलग रहा था। लेकिन उसे किसी ने छुआ तक नहीं। बगल में एक बांस की टोकरी में गुड़ की डलियों का ढेर था और एक ड्रम में पानी रखा था। और पंच भी कौन थे पापा! हुकुम सिंह, जिनके दादे-परदादे जानवर चुराते थे और उनकी सींगें तराशकर बेच देते थे। वे अब मानिंद किसान और गांवसभा के मुखिया हो गए। वे अपनी अधपगली पत्नी को सरेआम लाठियों से पीटते थे। चौधरी राजिंदर सिंह जिनकी डेयरी में यूरिया मिलाकर सैकड़ों लीटर दूध तैयार होता था और बेचा जाता था। शहर में उनका बड़ा होटल था, जहां अफसरों-ठेकेदारों को लड़कियां सप्लाई की जाती थीं। मान सिंह, सारा गांव जानता है कि अफीम खिलाकर अपनी भांजी के साथ उन्होंने कई महीने बलात्कार किया। जब वह गर्भवती हो गई तो उसे पागल बताकर पता नहीं कहां छोड़ आए। मैनेजर सिंह कोटेदार, जो दहेज के लिए अपनी बहू को जलाकर जेल हो आए थे। उनकी दुकान का सारा राशन और तेल ब्लैक में बिक जाता था। और पट्टी बांधे डकैत लग रहे थे मेरे चाचा ख़ुद जिन्होंने आज सुबह ही अपनी भतीजी से सौदेबाजी की थी।

“…तो ये मेरा न्याय करेंगे, अपनी इज्जत बचाने के लिए।”

उनकी इज्जत और मेरी इज्जत अलग-अलग है। मेरी इज्जत बर्बाद किए बिना, यहां तक कि मेरी जान लिए बिना उनकी इज्जत बच ही नहीं सकती। अकेली मैं, अकेला अविनाश और इतने सारे इज्जतदार लोग। पंच, सरपंच। मैं अकेली…

मेरी इज्जत बर्बाद किए बिना, यहां तक कि मेरी जान लिए बिना उनकी इज्जत बच ही नहीं सकती

मैंने पहले कभी इस तरह इन लोगों को नहीं देखा था। मैंने सोचा इज्जत… आंखों के आगे अंधेरे के बीच रोशनी के चकत्ते उड़ने लगे। मुझे लगा अविनाश ब्लेजर के नीचे टाई पहने विक्ट्री स्टैंड पर खड़ा है, और मैं ताली बजा रही हूं। नहीं शायद वह डॉक्टर था, जो गले में आला लटकाकर भीड़ से घिरे किसी मरीज़ को देख रहा था। नहीं, वह बछड़ा था जो मेरा हाथ चाटने के लिए गरदन हिला कर अपने पास बुला रहा था।

मैं रोने लगी।

पंचों के बीच में मेरे बिल्कुल सामने चाचा नंगे बैठे हुए हैं, उन्होंने गले में बड़ा-सा ताबीज पहन रखा है और उनके सफेद जूतों से जलती-बुझती रोशनी निकल रही है। तभी पापा आ गए, हंसने लगे। उन्होंने मुझे कंधे पर उठाकर, लोगों की तरफ़ इशारा किया। इस भीड़ में सबके हाथों में एक-एक पेटीकोट था और वे उसके कमर के घेरे में फूंक मार रहे थे और पंच इससे कुढ़कर माथे पर हाथ दिए बैठे थे। मुझे हंसी आ गई।

मैं हंसने लगी, लोगों को देखा वे भी रंग-बिरंगे पेटीकोट हिलाते हुए हंस रहे थे। तभी मेरी मां ने वहां आकर नाचना शुरू कर दिया। नाचते हुए वे गांव की ओर चलीं तो सभी उनके पीछे चले गए और मैं अकेली खड़ी रह गई। मेरी किसी सहेली ने आकर बड़ा-सा पत्थर देकर कहा शादी मुबारक हो। मैं बंदरिया बन गई। पगड़ी बांधे मदारी ने कहा, गुलाबो, चलकर दिखाओ, ससुराल का काम करके दिखाओ। मैं ठुमकने लगी।

मैं पता नहीं कितनी देर तक इसी तरह हंसती-रोती, बड़बड़ाती रही।

बीच में किसी ने फुसफुसाकर कहा फांसी। फिर सभी लोग फांसी, फांसी जपने लगे जैसे वे किसी मंदिर में बैठकर कीर्तन कर रहे हों। मूर्तियों के ऊपर लाल कपड़े के आगे दो कठपुतलियां झूल रही थीं। उनको नचाने वाले खेल के बीच में ही कहीं चले गए थे।

अचानक मुझे होश आया, तब मैं एक रस्सी पकड़ बैठी खांस रही थी। पूरा शरीर दुख रहा था और दूर खड़ी भीड़ हंस रही थी। अरे! पंचायत ने मुझे इमली के पेड़ से लटकाकर फांसी पर चढ़ा दिया था। ऊपर बंधी रस्सी खुल जाने के कारण मैं गिर पड़ी थी। क्या पता कोई मुझे बचाना चाहता हो और उसने गांठ ही ऐसी लगाई हो। उस भीड़ में कितने ही लोग थे जिन्होंने मुझे गोद में खिलाया था। मेरे साथ खेले थे, मुझे कंधे पर बैठाकर घुमाया था, पापा की मौत पर मेरे साथ रोए थे।

मैं गले में रस्सी लिए-दिए उठकर भाग चली।हाथ-पैर जकड़ गए थे। मैं लंगड़ाते हुए फुदक रही थी, तभी लाठियां, बंदूकें लिए भीड़ ललकारते हुए मुझ पर झपटी। शरीर में भय की बिजली कौंधी और मेरे पैरों को पंख लग गए। मैं सरपत के जंगल की ओर मुड़ गई ताकि ऊंची झाड़ियों के पीछे मुझे कोई खोज न सके। चीख़ती, पगलाई भीड़ करीब आती जा रही थी और मैं सरपट भागी जा रही थी। मेरे पीछे सांप की तरह लहराती रस्सी सरसरा रही थी। इतना भी होश नहीं था कि उसे निकाल फेंकूं। अगर किसी झाड़ी में उलझती तो मैं इस बार की फांसी से नहीं बच पाती।

बहुत देर तक भागने के बाद मैंने पीछे मुड़ कर देखना चाहा। अचानक मैं एक विशाल गड्ढे में लुढ़क गई। कंकालों, गिद्धों, कुत्तों, मांस के लोथड़ों पर लुढ़कते हुए मैं तलहटी में जाकर थमी तो असह्य बदबू के मारे सिर चकरा रहा था और सांस घुट रही थी। यह गांव से काफी दूर कोई गड्ढा था जिसमें मरे जानवर फेंके जाते थे। मेरे सामने दो भैंसे फटी-नुची पड़ी थीं। और एक लाश किस जानवर की थी पहचानना मुश्किल था। जानवरों के बिखरे सिर, सींगों, अस्थिपंजर के बीच गिद्ध किंकियाते हुए मुझ पर उचक-उचककर लपक रहे थे और कुत्ते दांत फाड़े गुर्रा रहे थे। मैं भय से जकड़ी बैठी रही। भैंसों के ऊपर और मेरे चारों तरफ़ गिद्ध ही गिद्ध थे। सौ से ज़्यादा ही रहे होंगे। उनके बीच से कुत्ते उन्हें ठेलकर मुझ पर लपक रहे थे। गिद्धों के फैलते-सिकुड़ते भारी डैनों से उठती अलग तीखी गंध थी। जल्दी ही मांस से लिथड़े मेरे शरीर को मक्खियों ने ढंक लिया। थोड़ी देर बाद, जब किसी कुत्ते ने मुझे काटा नहीं तब मैंने धीरे-धीरे गले में बंधी रस्सी के फंदे को ढीला कर बाहर निकाला, रस्सी को कई परत मोड़ कर चाबुक की तरफ घुमाना शुरू किया तो गिद्ध उचकते हुए दूर खिसकने लगे। थोड़ी देर में वे समझ गए कि मैं उनके खाने में हिस्सा बंटाने नहीं आई हूं, तो वे आपस में लड़ते हुए अपने काम में जुट गए। अचानक कुत्ते भी शांत हो गए।

गिद्धों की किंकियाहट और मक्खियों की भन-भन से हटकर मैंने कान लगाकर ऊपर की आवाज़ें सुनने की कोशिश की तभी बदबू के भभके के साथ, पेट में मरोड़ उठी। उल्टी के साथ सब कुछ बाहर आ गया। ट्रैक सूट की बांह से आंसू और लार पोंछकर मैंने किसी जानवर का पीला पड़ चुका सूखी हड्डियों वाला भारी अस्थिपंजर घसीट-घसीटकर ओढ़ लिया और उसके नीचे दुबक कर बैठ गई।

बहुत छोटी-छोटी सांसे लेते हुए मैं बदबू की अभ्यस्त होने की कोशिश करने लगी। यह बहुत सुरक्षित जगह थी। बदबू के मारे देर तक किनारे खड़ा होकर कोई गड्ढे के भीतर देख नहीं सकता था। अगर देखता भी तो सैकड़ों उचकते गिद्धों के बीच पंजर से ढंकी मैं आसानी से नज़र नहीं आ सकती थी। मैंने तय किया कि रात में यहां से निकलूंगी और किसी सड़क या रेलवे लाइन तक पहुंचने के बाद हॉस्टल पहुंच जाऊंगी। फिर देखा जाएगा।

मैं मांस पर टूटते, थककर किनारे बैठे, आपस में लड़ते, एक दूसरे के पंख खुजलाते गिद्धों को देखने लगी। यदा-कदा कोई गिद्ध अचानक उचककर मेरी ओर लपकता था, लेकिन पंजर के करीब आते ही वापस लौट जाता था। उनके इस खिलवाड़ को देखते हुए मैंने सोचा, “गड्ढे के बाहर आसपास मेरे घर-गांव के गिद्ध मेरी बोटी-बोटी नोच डालने के लिए खोज रहे हैं और यहां सचमुच के गिद्धों के कारण मैं अभी तक ज़िंदा हूं।”

शायद गिद्धों को देखते-देखते थक जाने के कारण मेरी आंखें मुंदने लगीं। मैं सो रही हूं, नींद आ रही है… यह ख़याल आते ही झुरझुरी दौड़ गई। कहीं इन गिद्धों और कुत्तों ने मरा समझकर मुझे भी नोच डाला तो, मेरी आंखें ही निकाल लें तो? अगल-बगल कई जानवरों के सिर थे, जिनमें आंखों की जगह अंधेरे से भरे दो सुराख थे। मैंने नायलान की फंदे वाली रस्सी को कई परत हाथ में लपेट लिया और हाथ को इस पोजीशन में रख लिया कि एक झटके में किसी गिद्ध की गर्दन लुढ़काई जा सके।

मेरे घर-गांव के गिद्ध मेरी बोटी-बोटी नोच डालने के लिए खोज रहे हैं और यहां सचमुच के गिद्धों के कारण मैं अभी तक ज़िंदा हूं

भारी अस्थिपंजर के नीचे से मैंने धुंधलाते आसमान को देखा। पता नहीं कितने लंबे इंतज़ार के बाद अब शाम उतर रही थी। तभी गिद्धों के झुंड में हलचल हुई, वे उड़कर वापस जाने लगे। वे अपने घोसलों की ओर लौट रहे थे। भय से मेरा दिल बैठने लगा, ये चले जाएंगे तो इस वीरान गड्ढे में मुझे वे आसानी से देख लेंगे और खींच ले जाएंगे। जिनसे मैं अब तक डर रही थी, वे गिद्ध अब मुझे अच्छे लगने लगे। मुझे रामलीला में देखे जटायु की याद, पता नहीं कहां से आई। अगर मैं उनकी भाषा जानती तो कहती कि आज वे बस थोड़ी देर और रुक जाएं। मेरे आसपास तब तक रहें जब तक पूरी तरह अंधेरा न हो जाए। कुत्ते भी एक-एक कर जा रहे थे।

जब आख़िरी कुत्ता गड्ढे से निकला, आसमान में एक तारा नज़र आने लगा था। तभी मैंने अपनी तरफ़ बढ़ती आवाज़ें सुनीं, लोग इधर ही चले आ रहे थे। गड्ढे के ऊपर हिलते-डुलते लोग झिलमिलाने लगे। मैंने अपना सिर बांहों में दबाकर ज़मीन में गाड़ दिया कि ज़रा भी हलचल न हो कि उनका इधर ध्यान जाए। मुझे अपनी धड़कन शोर की तरह सुनाई दे रही थी।

थोड़ी देर बाद बहुत भारी चीज़ लुढ़कती हुई आकर गड्ढे में गिरी। मुझे लगा शायद वे मेरी ओर दौड़ पड़े हैं। मैं वैसी ही मुर्दा बनी पड़ी रही। ऊपर से आवाज़ें आनी बंद हो गईं। लोगों के जाते पैरों की आवाज़ सुनने के बहुत देर बाद मैंने सिर उठाया तो चारों ओर अंधेरा था, मच्छर भिनभिना रहे थे। हड्डियों के बीच अब भी ढेरों छोटे-छोटे जानवर इधर उधर डोल रहे थे। वे लोग कोई मरा हुआ जानवर फेंकने आए थे। मैं बेवजह इतना डर गई थी।

भारी पंजर हटाकर, मैं अंधेरे में मच्छरों को भगाती बैठी रही। फिर धीरे-धीरे सरकते हुए गड्ढे के बाहर आ गई। आसमान में चांद निकल रहा था। मैंने गांव की उलटी दिशा का अनुमान लगाया और तेज़ी से चल पड़ी। यह तो मुझे दो दिन बाद पता चला कि जिसे मैंने जानवर समझा था, वह अविनाश था। फांसी पर लटकाकर दिनभर नुमाइश करने के बाद पंचों ने उसकी लाश को उसी गड्ढे में चील-कौवों के खाने के लिए फेंकवा दिया था।

थोड़ी देर चलने के बाद सड़क पर आती जाती गाड़ियों की बत्तियां झिलमिलाने लगीं। झिझकते-डरते एक ट्रक को रुकवा कर लिफ्ट ली। थोड़ी देर बाद ड्राइवर ने ट्रक किनारे रोक कर उतरने को कहा, क्योंकि मेरे शरीर की बदबू उसके लिए असह्य थी। मैंने अपने ट्रैक सूट का अपर खिड़की से बाहर फेंकने के बाद उससे बड़ी देर तक विनती की, तब जाकर उसने मुझे शहर तक छोड़ा। हॉस्टल आकर वार्डन और कोच से मैंने पूरा वाकया बताया।

तुम्हारा नाम और मेरी गिरती-पड़ती हिम्मत बहुत काम आई। खिलाड़ियों ने पूरा साथ दिया। लेकिन पूरे दो दिन बाद पुलिस ने गांव जाकर अविनाश की अधखाई, सड़ी  लाश बरामद की। चाचा और सरपंच पुलिस को देखकर हट-बढ़ गए थे। पुलिस खानापूरी कर लौट आई।

महीने भर बाद अब फिर अख़बारों से पता चला और मां ने ख़बर भिजवाई है कि चाचा को मचान पर सोते में गोली मारकर ख़त्म कर दिया गया। अविनाश के भाई सत्यप्रकाश ने घात लगाकर उनकी हत्या कर दी। बदला लेने के लिए गूजर लगातार उनको खोज रहे थे।

जो हुआ, अच्छा हुआ, लेकिन मेरी मुसीबत अख़बारों में छपी चाचा की लाश की फ़ोटो है। उनके औंधे शरीर पर कपड़े के नाम पर बस मेरी वही सुर्ख लाल स्कर्ट है, ख़ून में भीगी हुई। लड़कियां तक कह रही हैं कि मैं अपने चाचा की ‘सिद्ध ‘ की हुई स्कर्ट पहनकर मैदान में उतरने के कारण ही इतना अच्छा खेलती थी! गांव में लोग कह रहे हैं कि मेरा और अविनाश का प्रेम नाटक था। चाचा ने पंचायत सिर्फ़ अविनाश को रास्ते से हटाने और मुझे भगाने के लिए बुलाई थी। जब उन्हें गोली मारी गई तब मैं भी उनके साथ थी और एक बार फिर मौत को चकमा देकर भाग निकली। यह ठीक है, पापा! चलो थोड़ी देर को मान लिया कि मैंने बिरादरी की इज्जत ख़राब की, लेकिन मैं अपनी इज्जत तो सहेज कर रखना चाहती थी। लेकिन वह अब एक लाश की कमर पर ख़ून से भीगकर हमेशा के लिए चिपक गई है। लेकिन पापा यह बताओ! मान लो, अगर इस वक़्त तुम ज़िंदा होते तो! कहीं तुम भी तो इज्जत के रहस्यमय प्रेत के असर में पंचों के साथ तो नहीं खड़े हो गए होते? नहीं पापा, ऐसा मत करना, मेरा यह भरम बनाए रखना। माफ़ करना यह पूछा, इसलिए कि अब मैं तुम्हारे जितनी बड़ी हो गई हूं और तुम्हारे जूते मेरे पैर में आने लगे हैं।

समाप्त!

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