ठीक बीच में नदी आ गई

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रचनाशीलता को अपना जीवन-सूत्र स्थापित करने वाले विरल लोगों में से एक शेषनाथ पाण्डेय हैं। निश्छल, वात्सल्यपूर्ण और ईमानदार व्यक्तित्व के धनी शेषनाथ रचनात्मकता को पवित्र किसी कार्य की तरह बरतते हैं। और शायद इसलिए भी जितनी योजनाएं कहानियों की इनके पास लिखी हैं, उसका दशांश भी प्रकट में नहीं आ पाता। लेकिन जो आता है, वो क्या खूब आता है! अगर आपको शेषनाथ की ‘ईलाहाबाद भी’ याद हो तो आप भी इस बात से इत्तफ़ाक रखेंगे। प्रस्तुत कहानी आदम की मशहूर और आदिम गुत्थी को सुलझाने के बजाए और से और उलझाने की कोशिश करती है। यह गालिब से प्रेरणा का स्वत: ही हासिल है, जिसमें आदम की इस कठिनतम गुत्थी को न सुलझा पाने की स्थिति में उलझाते चले जाने को ही उपलब्धि गिनाते हैं। पढ़िए शेषनाथ की कहानी: ठीक बीच में नदी आ गई। उनसे उनके मोबाईल नंबर- 9594282918 या मेल [email protected]।com पर संपर्क किया जा सकता है

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शेषनाथ पांडेय/

आरके तुम्हारे कदम चलने के लिए नहीं उड़ने और तैरने के लिए ही बने हैं।

करीब चालीस साल पहले आरके से यह बात उससे अजीज हो रही एक लड़की ने कहा था। आरके के लिए यह एक अभीष्ट वाक्य भर नहीं था। उसने खूब उड़ान भरी थी अपनी जिंदगी में। एक ड्राइवर की जिंदगी को पार कर के आर के इंडस्ट्रीज के मालिक तक पहुँच जाने में उसके उड़ान और तैराकी की मिसाल दी जाने लगी थी। लेकिन आज अभी वो अपने बनवाए हुए स्विमिंग पूल में तैरने के लिए जा रहा है और उसे लग रहा है कि वह उड़ते हुए आया है तैरने के लिए। यह तैरना उसकी ख़ुशी से बढ़कर उसका हासिल था।

शेषनाथ पांडेय

हासिल की ख़ुशी में सराबोर इंसान कैसा होता होगा? जब किसी को हासिल की  खुशियाँ लगती होगीं तो वह क्या करता होगा? अगर वो कहीं अपना पहला कदम रख रहा होगा तो क्या कदम रखते-रखते ही हवाओं में फैल जाता होगा और तीसरे  कदम पर फिर अपनी जगह पर आ जाता होगा? या वहीं खड़े-खड़े नाच जाता होगा? शायद उसको लगता होगा कि वो खुद को गुदगुदा रहा है या उसके अंदर कोई चीज है जो उसे गुदगुदा रही है? उसकी गिरहें खोल रही है? उसे भयमुक्त खुशियाँ दे रही है? एक नशे में उतार रही है? लेकिन आरके अभी अपने हासिल में उतर रहा है और वो भी बिना किसी यत्न के।  इस महसूसियत से एक शोर उठता है उसके आस पास – “आरके तुम्हारे कदम चलने के लिए नहीं उड़ने और तैरने के लिए ही बने हैं।” इस शोर को सुनते ही उसके कदमों की नीचे की धरती जिसे संगमरमर के कपड़े पहना दिए गए थे और मुलायम हो जाती है।

ड्राइवर कुछ कहना चाह रहा है लेकिन स्विमिंग पूल की ओर कदम बढ़ा रहे आरके को लगता है कि उसकी  मुलायम धरती पर कोई और अपना पैर रगड़ रहा है। वह एक इशारे से पलटने को होता  हैं तो ड्राइवर थोड़ा संकोच से कहता है –“मैडम ने आपके टेस्ट के लिए अप्वाइंटमेंट लिया है। आठ बजे तक डॉक्टर आएँगे। आपको याद दिलाने के लिए कहा था मैडम ने।” आर के अभी अपनी धरती पर एक तिनके का भार तक सहन नहीं करना चाहता –“ मुझे याद था। याद है।।। उनसे बोल देना कि आज का कैंसिल कर दें।”  ड्राइवर कुछ कहना चाहता है लेकिन वो कहने से ज्यादा अपने बॉस के इशारे को जानता है। इसलिए वह गाड़ी लेकर चला जाता है।

आरके अपने इस नए बंगले में अपने परिवार के साथ एक महीने पहले शिफ्ट हुआ था। इसमें स्विमिंग पूल, क्लब, थियेटर, पार्क, गार्डन सहित कई प्राकृतिक सुखों को औकात दिखाती सुविधाएँ थीं लेकिन अपने अतिव्यस्त शेड्यूल की वजह से वो इस स्विमिंग पूल में अभी तक तैर नहीं पाया था।

सरला बार -बार अपने बने हुए पैग को बनाने के लिए एक अधिकार के साथ राम खेलावन से बोलती और राम खेलावन बार -बार अपना कर्तव्य निभाते हुए एक गंभीरता से कहता कि आपका पैग अभी खत्म नहीं हुआ है।

आर के स्विमिंग पूल को देखता है तो उसकी आँखों में स्विमिंग पूल तैरता है। वह स्विमिंग पूल के किनारे खड़े हो कर आँखें बंद करता है और कुछ महसूस करना चाहता है। लेकिन उसके चेहरे पर सब कुछ हासिल करने का दर्प से भरा एक गर्व है। और यह गर्व होता ही इतना भारी है कि उसके नीचे गर्दन को तान देने के सिवा कुछ महसूस ही नहीं हो पाता। वह धीरे धीरे अपनी बाँहें खोलता है। उसके बैकग्राउंड से जीत का शोर फैलने लगता है जिसमें अब तक की उसकी बीत चुकी जिंदगी की ध्वनियाँ, हासिल की हुई ध्वनियों के शोर में दबी हुई घिसट रही हैं। इसलिए उसे अपनी बीत चुकी जिंदगी का नहीं, हासिल की हुई ध्वनियों का शोर सुनाई दे रहा है और उसे यही भा रहा है। उसे ऐसा लगता है कि वे ध्वनियाँ कहीं-कहीं से आ कर उसमें समा जा रही हैं।

वह धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलते हुए स्विमिंग पूल के पानी को अपने हाथ में लेता हैं मानो गंगाजल ले रहा हो। वह उसे गंगाजल की तरह महसूस करे तभी स्विमिंग पूल रोशनियों से नहा उठता है और उसके जल के सतह पर रोशनियों से एक घड़ी बनती है और उस पर सिक्स पी एम शो होता है। वह उस जल को अपने चेहरे पर डालता है लेकिन उसका चेहरा जल से नहीं रोशनियों से भीग जाता है। उसकी आँखें बंद हैं और वे उस जल को एक दिव्य वरदान की तरह महसूस करना चाहता है। लेकिन उसके  होठों पर अब तक की खुशियों से फूटती एक मुस्कान की जगह एक कनिंग स्माइल छूटती है। और वह अपनी इस तैरने की चाह को थोड़ा टाल देना चाहता है।

वह शायद अपने इस हासिल को जज्ब करना चाह रहा हो ताकि अपने चालीस-पैंतालीस सालों के इंतजार और संघर्ष को एक बार महसूस कर सके। उसके अंदर एक शिकारी भाव भी कुलबुलाता है। जैसे शिकार जब हाथ में आ जाता है और उसके भागने की संभावना एकदम न्यून हो जाती है तो उसे इस भाव से छोड़ दिया जाता है कि अब जाएगा कहाँ। कुछ वैसे ही आरके अपने स्विमिंग पूल के साथ कर रहा है कि अब ये कहाँ जाएगा। ये तो अब उसका ही है। इसलिए अब वह उसके किनारे पर कभी ऊकड़ू, कभी पालथी मार के तो कभी घुटनों के बल बैठता और उठता तो टहलते हुए उससे बातें करता मानो यह स्विमिंग पूल उसके हाथों में आई एक जादू की छड़ी है जिससे वह सबकुछ दिखा सकता है।

लेकिन खुशियों की अपनी बेचैनी होती है और वो जितनी मारक होती है उतनी ही मोहक भी। इसी बेचैनी में वह ख़ुद को एक तसव्वुर में देर तक यूँ ही बैठे रहने की फिलॉसफी को देखता लेकिन हकीकत में वह अपने तसव्वुर की तमाम आदतों से तौबा कर चुका था । इसलिए देर तक यूँ ही बैठना उसे कुछ अखरने जैसा लगा। वह तुरंत अपने पैरों को  जूते मोजे के साथ पानी में डालता है। पानी में हलचल से ज़्यादा तरेंगे उठती है।

वे तरंगें थीं लेकिन वह उन तरंगों को अपने हाथों में छपे हुए लकीरों की तरह देखता है जो उसकी हथेलियों से फूट कर पानी में अपना आकार गढ़ रही हैं। उन आकृतियों को देखते हुए उसका चेहरा अचानक से कठोर होता है और फिर धीरे-धीरे अठारह साल के युवा में बदल जाता है। एक सुगठित गँवई शरीर और उस पर आसमानी रंग का ड्रेस उस दिन उस पर खूब फब रहा था। फबने वाली बात प्रोपर्टी बिल्डर के उभरते हुए बादशाह सर एच चंदानी की सेक्रेटरी सरला सेठ ने कही थी। लेकिन वह जानता था कि वह अभी ड्राईवर है। सर एच चंदानी का  ड्राइवर। वह यह भी जानता था  कि सर एच चंदानी की सेक्रेटरी उनकी केवल सेक्रेटरी नहीं थी। लेकिन सबसे ज्यादा आरके इस बात को जानता था कि उनका नाम राम खेलावन सिंह है और वह  ग्राम+पोस्ट भकुरा, जिला बक्सर, बिहार से कलकता कमाने के लिए गया था और वहाँ से वाया दिल्ली बंबई कमाने आया है।

राम खेलावन गाड़ी रोकता है। अपना गेट खोलता है और भागते हुए आ कर अपने बॉस का गेट खोलता है। बॉस अपने सेक्रेटरी सरला के साथ एकदम सहज तरीके से बाहर आते हैं। राम खेलावन गाड़ी से आइरिश वाइन और स्कॉच की बोतलें, सिगरेट स्नैक्स निकालता है। फिर गेट बंद करते ही वह सिगरेट के दो पैकटों में से कुछ सिगरेट निकालकर अपने सिगरेट के डब्बे में डालता है और ड्राइवर के पास बने बॉक्स में रख देता है। ऐसा करते हुए वो एक बार अपने बॉस की तरफ देखता है और स्नैक्स का एक पॉकेट भी रख लेता है। सामान ले जाने के दौरान एक सामान उसके हाथ से फिसलता है और वो उसे सँभालता अपने बॉस के पीछे चल देता है।

यह सर एच चंदानी का फार्म हाउस है। इससे पहले यह प्रकृति से सजा हुआ लोनावाला था। जहाँ नवधनाढ्य अपनी सजावट से प्रकृति को झुठलाने में लगे हुए थे। लेकिन सर चंदानी अक्सर कहते कि हम प्रकृति को झुठला नहीं रहे। उसके साथ उसके सौंदर्य पर ताल दे रहे हैं। ऐसा कहते हुए सर एच चंदानी का चेहरा ताल देने के भाव से भरा हुआ लगता और सुनने वाले इस ताल पर थिरक जाते।

स्विमिंग पूल के किनारे कुछ आराम कुर्सियाँ और टेबल लगे हुए थे। जहाँ चंदानी के कुछ दोस्त पीते हुए उनका इंतजार कर रहे थे। सर चंदानी और सरला के पहुँचते ही हाय हैल्लो का एक मीठा दौर चलता है। फिर राम खेलावन सब के लिए मय सर्व करता है और धीरे-धीरे सबकी आँखों में स्विमिंग पूल जैसा कोई सुख चलने लगता है।

हीरालाल चंदानी तब एच चंदानी के रूप में स्थापित हो गए थे और अब सर एच चंदानी के रूप में स्थापित हो रहे थे। उनके दोस्त यार दिन रात बंबई के उपनगरीय इलाकों को बंबई से भी बड़ा होने की संभावनाओं और उसके छल प्रपंच में डूबे रहते। और उन्होंने अपने लिए ऐसी कोई छुट्टी भी इसलिए ईजाद कर रखी थी ताकि वे इत्मिनान से अपने बिजनेस की बारीकियों को और बेहतरी से समझ सकें। लेकिन ऐसी छुट्टियों में वे न चाहते हुए भी देश दुनिया की बातें करने लगते। एक दूसरे का मजाक उड़ाते, एक दूसरे को सच्चा झूठा साबित करते। जीवन और अपनी समृद्धि की निरर्थकता पर बहस करते। शांति की तलाश में खुद को होम कर देने की बात करते और फिर किसी उभर रही अभिनेत्री में खो जाते और एक बेचैनी से भर जाते। फिर वे अपनी अपनी फ्रेंड्स – जो अमूमन उनकी मैनेजर या सेक्रेटरी हुआ करतीं – के साथ स्विमिंग पूल में तैरते-तैरते कहीं चले जाते।

लेकिन सबसे ज्यादा बेचैन होता राम खेलावन क्योंकि उसे सुबह में चंदानी से पहले जगना होता और उनके लिए गाड़ी तैयार रखनी होती। इसलिए वो इन बहसों और बेचैनियों के रोमांच का ना तो समझता और ना ही स्विमिंग पूल में तैरते तैरते कहीं चले जाने के रहस्य को जान पाता। जैसे अभी जान नहीं पा रहा है कि सरला सेठ उसे क्यों परेशान कर रही है।

सरला बार-बार अपने बने हुए पैग को बनाने के लिए एक अधिकार के साथ राम खेलावन से बोलती और राम खेलावन बार-बार अपना कर्तव्य निभाते हुए एक गंभीरता से कहता कि आपका पैग अभी खत्म नहीं हुआ है। इस पर सरला एक खुश्क भाव से उसे देखती और कहती कि तब सिगरेट ही जला दो बॉस। राम खेलावन उसी कर्तव्यनिष्ठा से कहता कि आपकी सिगरेट भी जल रही है। सरला इसके जवाब में राम खेलावन से कुछ नहीं कहती लेकिन महफिल को देखती और लोगों से कहती कि जस्ट लुक एट मी। मेरी सिगरेट जल रही है। इस पर सभी हँसते या हँसने की कोशिश करते।

सरला को ऐसी हरकतें करते हुए चार-पाँच बार हो गया था। राम खेलावन कहना चाह रहा था कि अब आप रहने दीजिए। दारू चढ़ने की वजह से ऐसा हो रहा है। लेकिन वह इतनी बड़ी बात कैसे कह सकता था। वह सरला सेठ से कहीं ज्यादा सर एच चंदानी को जानता था। उनके रूतबे को। उनकी ताकत को। वह तो बस इसी रहस्य में डूबा रहता कि उनकी आधी से भी कम उम्र की सरला सेठ में ऐसा क्या है कि सर एच चंदानी उससे हर बात पर राय लेते और उसकी हामी पर संतुष्ट होते।

राम खेलावन इसी रहस्य से निकलना चाह रहा है कि तभी सर चंदानी की लुढ़कती हुई आवाज आती है -“राम खेलावन पैग तो बना दो यार।” राम खेलावन पैग बनाता है तो सरला भी अपना पैग बढ़ा देती है -“राम खेलावन मेरा भी बना दो। प्लीज।” इस बार राम खेलावन सरला को देखता है तो सरला को भी लगता है उसने कुछ एक्स्ट्रा कहा है। राम खेलावन पैग बना कर जाने के लिए होता है कि सरला उससे पूछती है कि मैंने कुछ एक्स्ट्रा तो नहीं कहा है? सरला के सवाल पर सभी अनभिज्ञता जाहिर करते हैं और अपने-अपने पैग को उठाते हैं कि राम खेलावन कहता है कि आप ने आज राम की जगह राम खेलावन कहा।

सरला की इस पहल पर सभी अपने रोके हुए पैग को अंदर लेते हैं और राम खेलावन का “क्या स्टायलिश नाम रहेगा” इस पर विचार करते हैं। वे राम खेलावन को नया नाम रखने के लिए उसे परखने की कोशिश करते हैं। इसके लिए वे उससे कभी चल कर दिखाने के लिए कहते हैं तो कभी बैठ कर चलने के लिए।

घंटो से चल रही महफिल में राम खेलावन के मुँह से निकली यह पहली बात थी या इस बात में न जाने क्या बात थी कि सभी ने अपना अपना पैग मुँह में ले जाने से पहले रोक दिया था। सरला इशारों को राम खेलावन से कहीं ज्यादा समझती थी लेकिन राम खेलावन उस डर को कहीं ज्यादा समझता था जो रूतबों की महफिल में बोलने पर हुआ करता है। पल भर के लिए वह ठिठक जाता है। चूँकि सरला इशारों को समझती थी इसलिए वह अपने पैग का एक घूँट लेती है और कहती है कि आज राम खेलावन का नया नाम रखा जाएगा। थोड़ा नया, थोड़ा स्टायलिश। क्यों राम खेलावन तुम्हें इस नाम से दिक्कत है ना? राम खेलावन कहना चाह रहा है कि उसे अपने नाम से कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन वह अभी-अभी एक बात बोल के डर गया था इसलिए अपने बोलने को अपने अंदर के किसी खोह में डाल देता है।

सरला की इस पहल पर सभी अपने रोके हुए पैग को अंदर लेते हैं और राम खेलावन का “क्या स्टायलिश नाम रहेगा” इस पर विचार करते हैं। वे राम खेलावन को नया नाम रखने के लिए उसे परखने की कोशिश करते हैं। इसके लिए वे उससे कभी चल कर दिखाने के लिए कहते हैं तो कभी बैठ कर चलने के लिए। उसे कभी वे कुर्सी पर बैठाते हैं तो कभी मॉडल की तरह चलवाते हैं। और ऐसा करते हुए उन्हें लगता है कि वे किसी अपूर्व आनंद में डूबते जा रहे हैं। लेकिन सरला का दाँव उल्टा पड़ गया था। उसने बात बदलने के लिए बात कही थी लेकिन वह भी राम खेलावन के साथ खुद को दलदल में फँसा हुआ पाती है।

राम खेलावन किसी भी इशारे को सरला से कम समझता था, लेकिन समझता था। इसलिए उसके चेहरे के उजले बादल अपमान के काले बादल में बदलने लगे थे। लेकिन सरला उसकी तरह लाचार नहीं थी या हो सकता है उससे कहीं ज्यादा लाचार हो लेकिन वो इशारों को ज्यादा समझती थी इसलिए वो जानती थी कि अगर वह और लाचार हुई तो जी नहीं पाएगी।

सरला अचानक से खड़ी हुई और अपने हाई हील की सैंडिल को एक एक कर के पैरों से हवा में उछाल दिया। कोई इस पर कुछ कहता इसके पहले उसने स्विमिंग पूल में छलाँग लगा दी। सरला के छलाँग लगाते ही सभी को लगा कि वे सब इस बात को भूल कैसे गए थे कि उन्हें अभी तैरना है।

सर चंदानी का भी मन करता है कि वे भी ऐसे ही जूते उछाल कर फेंके और स्विमिंग पूल में छलाँग लगा लें लेकिन उनके मन से उनकी उम्र जा कर फँस जाती है। इसलिए वो सूटेड बूटेड ही पानी में छलाँग लगाने की कोशिश करते हैं लेकिन छलाँग लगाने में पानी के अंदर गिर जाते हैं। धीरे-धीरे सभी छलाँग लगाने की कोशिश करते हैं लेकिन उनमें से लड़कियाँ ही छलाँग लगा पाती है बाकी सब को पूल में लड़खड़ाते हुए उतरना पड़ता है।

राम खेलावन को भी चढ़ी रहती है और वह छलाँग लगा के दिखा देना चाहता है कि तुम सब कितने कच्चे हो। लेकिन अभी थोड़ी देर पहले का दृश्य उसे कँपा दे रहा है जिसमें उसका मजाक उड़ाया जा रहा था। वह पाता है कि उसके पैर जाम हो गए हैं। इसलिए वह अपना कदम पैग की तरफ बढ़ा लेता है और जल्दी से अपना पैग बनाता है और एक घूँट में पी लेता है। तेजी से पीना उसे एक प्रतिवाद की तरह लगता है क्योंकि सभी बहुत धीमे पी रहे थे। अपने इस प्रतिवाद पर वह फिदा हो जाता है। फिर एक और पैग बनाता है और इस बार भी एक घूँट में पीता है।

अब राम खेलावन की आँखें लाल हैं और मुँह में सिगरेट सुलग रही है। लेकिन अभी भी वह स्विमिंग पूल की तरफ पीठ किए खड़ा है और धुआँ छोड़ रहा है। उसे लग रहा है कि उसके अंदर की कोई ऐसी चीज सुलग रही है जो सुलगने और धधकने के लिए ही होती है। वह अपनी अंदर की सुलगने वाली चीज को हवा देना चाह रहा है ताकि वह पूरी तरह से धधक सके। इसके लिए वह बुदबुदाते हुए सरला सेठ को छोड़कर सभी को गाली देता है। वह कभी दाँत पीसता तो कभी मुट्ठियाँ भींचता सुलग रहा था कि स्विमिंग पूल से एक मधुर आवाज उससे टकराती है। आरके तुम भी आ जाओ। कम ऑन।

राम खेलावन पलट कर देखता है कि आरके कौन आ गया? किसी को न पाकर वह थोड़ा हैरान होने को होता है कि सरला उससे कहती है नाऊ यू आर आरके।।। कम ऑन। राम खेलावन को इस पर हैरान हो जाना चाहिए था या उसे पूछना चाहिए था या फिर नया नाम देने के लिए थैंक्यू कहना चाहिए था या फिर अपने कदमों को ठिठका देना चाहिए था लेकिन राम खेलावन अब आरके था। वो सरला की तरह अपने पैरों के जूते को एक एक कर के हवा में उछालता है और गिरह के साथ स्विमिंग पूल में छलाँग लगा लेता है।

आर के जैसे ही पानी के उपर आता है तो देखता है कि उसका बॉस सरला का कपड़ा उतारने की कोशिश करता है और सरला उस पर पानी का छप्पाका मार के हँसती हुई पानी में डुबकी लगा लेती है। बॉस उसे पकड़ता है। खेलता है। थक जाता है। फिर हाँफ कर के बाहर निकल आता है और किनारे पर बैठ जाता है। वह चाहता है कि सरला भी बाहर आ जाय। लेकिन वह अभी भी इस पार से उस पार कर रही है और देख रही है कि राम खेलावन से आरके बना कोई लड़का कैसा लग रहा है।

सरला देखती है कि आरके उससे ज्यादा अपने बॉस सर एच चंदानी को देखने की कोशिश कर रहा है तो वो उसकी तरफ जाने लगती है। आरके घबरा जाता है। सर चंदानी देखते हैं कि सरला अब बिकनी और ब्रा में रह गई है। वो जैसे जैसे आर के के करीब बढ़ रही है सर चंदानी की भौंहे और चौड़ी होती जा रही हैं। उनका गुस्सा टूट कर स्विमिंग पूल में फैलने लगता है। सरला आरके के पास पहुँचकर तैरने की बाजी खेलती है। फिर दोनों तैरने लगते हैं।

धीरे धीरे सभी छलाँग लगाने की कोशिश करते हैं लेकिन उनमें से लड़कियाँ ही छलाँग लगा पाती है बाकी सब को पूल में लड़खड़ाते हुए उतरना पड़ता है।

सर चंदानी उस डेस्टिनेशन के पास पहुँच कर खड़े है जहाँ दोनों तैर के पहुँचने वाले है। चंदानी के दोस्त चंदानी को जानते हैं इसलिए वे धीरे-धीरे बाहर निकल जाते हैं। स्विमिंग पूल अनहोनी की आशंकाओं से खामोश हो जाता है। बस दो लोगों की तैरने की आवाज आ रही है। और यह आवाज चंदानी के पास आते आते और तेज होती है। आरके किनारे पर पहुँच कर देखना चाहता है कि वो जीता या हारा कि तभी उसके गाल पर सर चंदानी का एक करारा तमाचा पड़ता है। वो कुछ इस पर रियेक्ट करे इससे पहले चंदानी उसे एक करारा थप्पड़ और मारते हुए कहते है -मेरे खयाल से अब तुम्हारा नशा फट गया होगा। अगर फट गया है तो जाओ यहाँ से और कभी मुँह मत दिखाना अपना। अदर वाइज आई विल किल यू बास्टर्ड।

वे तरंगे नहीं लकीरें  ही थी

इसलिए आरके अपने स्विमिंग पूल में खड़े होकर हँसी उड़ाने वाली हँसी हँसता है। मानो ये हँसी सर एच चंदानी से कह रही हो कि बॉस उस दिन नशा जरूर फटा था मेरा। लेकिन उस फटे हुए नशे को मैंने बाहर जाने ही नहीं दिया। अपने अंदर उसे बिखर जाने दिया ताकि वह मेरी शिराओं में पैबस्त हो सके। उस दिन के बाद मैं कभी कहीं तैरने नहीं गया कि अपने स्विमिंग पूल में ही तैरूँगा। एक दिन वो था और ये आज का मेरा दिन। काश कि आप आज जिंदा होते सर एच चंदानी और देख पाते कि आज मेरे पास  अपना स्विमिंग पूल है।

आरके तैरने के लिए पानी पर झुकते हुए पानी ऐसे काटता है मानों अपनी दोनों बाँहों से दुनिया को साइड करते हुए आगे बढ़ रहा है। तभी उसे लगता है कि उसके पैर स्विमिंग पूल के तल को छोड़ नहीं पा रहे हैं। वे बार-बार तैरने की मुद्रा में आता । पैरों को पानी में लहराता लेकिन उसके पैर अनायास ही तल पर टिकने लगते। उसके तैरने की कोशिशों के अवांतर धीरे-धीरे से उसके अन्दर कुछ क़बूल हुआ जाता  है कि वह तो तैर ही नहीं पा रहा है। लेकिन इस बात पर यकीन करना उसके लिए बहुत दूर की बात है अभी तो ये सोच भी नहीं पा रहा है कि वह तैर नहीं सकता।

वह अपनी टाई को ढीला करता है और तैरने के लिए मचल जाता है। उसका मचलना पानी में लहराने की कोशिश करते हुए उसके पैरों से मात खा जाता है। वह  एक-एक कर के कोट शर्ट पैंट जूते मोजे सब उतार के स्विमिंग पूल में फेंक देता है। उसे  लगता है कि अब तैरने में आसानी होगी। वह फिर से तैरने की मुद्रा में आता है। वह चाहता है कि उसके  अंदर एक बार फिर से हासिल की हुई खुशियों की एक लहर उछले। ऐसी लहर जिसको चीरते हुए वह यहाँ तक पहुँचा है। इसलिए वह फिर से एक डुबकी लगाता है और चालीस साल पहले के एक पल में निकलता है ।

राम खेलावन से आर के होने की अगली सुबह वह स्विमिंग पूल के फर्श पर लेटा हुआ है। उसे सरला जगाती है और गाड़ी की चाभी देती है। राम खेलावन से आरके बनने का यह पहला ही दिन था लेकिन उसके अंदर आत्मविश्वास और स्वाभिमान के बीज अंकुरित हो गए थे। वह चाभी लेने से मना करता है कि मेरी भी इज्जत है। मैं भी इंसान हूँ। सरला मुस्कराती हुए अपने बाएँ हाथ से उसका दायाँ हाथ पकड़ती है। उसमें चाभी रखते हुए उसकी हथेली को बंद करते हुए कहती है – “इंसान होना काफी नहीं होता। इंसान बने रहने के लिए इंसानी इशारों को समझना जरूरी होता है।”

शीर्षकहीनताएँ-२ के नाम से महेश वर्मा द्वारा बनाया गया चित्र

आरके इंसानी इशारों को नहीं समझ पा रहा था लेकिन सरला सेठ आरके को इशारों को समझाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। सरला आरके से चंदानी की एक डील को लीक करवाने में मदद लेती है और उसके बदले में महीने में भर में तीन हजार कमाने वाले आरके को दस हजार देती है। लेकिन इस बीच आर के सरला का डील ही नहीं करता बल्कि उसके माता-पिता के बीच के एक झगड़े को हमेशा के लिए खत्म करा देता है।

हुआ यह था कि सरला उससे अब अपनी निजी बात बताने लगी थी। वह अक्सर अपने मम्मी-पापा के बीच के झगड़े का जिक्र करती। आरके अपने जवार के एक लड़के बब्बन शुकुल को जानता था जो कमाने के लिए आया था लेकिन उसका जातीय अभिमान नौकरी करने के बीच आड़े आ गया और वह पुरोहिताई के पेशे में उतर कर लूटने जैसा कमाने लगा था। आरके ने सरला को बताया कि घर में कलह कोहराम ऊपरी चीजों से भी हुआ करती है।

इसके बाद आरके बब्बन शुकुल को सरला के घर ले गया। बब्बन ने रहस्यमय तरीके से पूरे घर और आसपास को देखते हुए सामने के एक पेड़ को देखने लगा। वह गुलमोहर का पेड़ था जो फूलों से लदा हुआ था। सभी उसकी तरफ देख रहे थे। वह एक रहस्मयी मुस्कान से मुड़ा और कहा कि इस पेड़ पर एक बूढ़ा ब्रह्म रहता है जो आप लोगों को लड़ाता रहता है। यह सुन के सभी एक सिहरन से भर जाते है। वह सभी को रिलैक्स करते हुए कहता है कि ब्रह्म पीपल के पेड़ पर रहता है इसलिए पहले एक पीपल का पेड़ लगाइए और उस गुलमोहर की पेड़ की तरफ खुलने वाली एक खिड़की अपने बेड रूम में बनवा दीजिये और सोते जागते उस पेड़ का दर्शन कीजिये। बाकी मैं ब्रह्मपूजा करवा देता हूँ, सब ठीक हो जाएगा। ये सुन के सरला सहित उसके मम्मी पापा काफी डर गए लेकिन वे इस बात से खुश हुए कि उनके झगड़े में उनकी कोई गलती नहीं है। इसलिए उन्होंने महसूस किया कि अब तक वे अपनी अपनी जिन गलतियों की वजह से गिल्ट में भरे रहते उसका बोझ कुछ कम हुआ है। उन्होंने पेड़ लगाए खिड़की बनवाई और  ब्रह्म पूजा करवा के  शांति से रहने लगे।

अब आरके सरला के लिए ही नहीं उसके मम्मी-पापा के लिए भी जरूरी हो गया था। और इसी जरूरी दिनों में सरला को लगा कि आरके का इस्तेमाल ही नहीं किया जा सकता उस पर मरा भी जा सकता है। आरके जो अब तक सरला को रहस्यमयी निगाह से देखता रहता था अब उसे मुग्ध भाव से देखने लगा था। इसी मुग्धता में आरके को भी वही लगने लगा जो अब तक सरला को लगने लगा था। लेकिन सरला अभी भी सर एच चंदानी की सेक्रेटरी थी और वह ड्राईवर। सरला को आरके का यह ओहदा उससे ज्यादा अखरता था। इसलिए उसने आरके को पचास हजार रुपया और दिया और एक पुरानी फियेट लेने में मदद की। अब आर के अपनी गाड़ी का मालिक था और सर एच चंदानी से आजाद था।

एक साल के अंदर आरके ने सरला को एच चंदानी से आज़ाद करवाने में मदद की और दोनों ने सांताक्रुज में प्रोप्रर्टी डीलिंग की एजेंसी खोल ली। दोनों पर कर्ज का बोझ बढ़ गया था और इसी हताशा में दोनों अपने एक रूम के ऑफिस में रात में बैठे पी रहे थे तो सरला ने कहा –“तुम क्यों इतने निराश हो रहे हो डार्लिंग तुम्हारे पैर चलने के लिए नहीं उड़ने और तैरने के लिए बने हैं।” आर के को यह बात इतनी अच्छी लगी कि मयनोशी कर लेने के बाद वो अपने कमरे पर नहीं गया सीधे बब्बन शुकुल के यहाँ पहुँचा ताकि वो शादी की तारीख देख सके और उसकी रस्में करवा सके।

शादी के बाद प्रोपर्टी डीलिंग का धंधा इतना परवान चढ़ा कि उन्हें लगने लगा कि वे सच में चलने के लिए ही नहीं तैरने और उड़ने के लिए ही बने हैं। पूँजी पर छलकता हुआ यह शहर खड़ा होने के लिए अठखेलियाँ कर रहा था। पहाड़ तोड़े जा रहे थे। झीलें सुखाई जा रही थीं। मैंग्रोव को काटा जा रहा था। गर्दनें उतारी जा रही थीं और यह शहर आबाद हो रहा था। अब एक पैसा बचाना एक पैसा कमाने वाली अवधारणा पीछे छूट गई थी। दो पैसा लगावो और दो सौ रुपए पाओ का सिद्धांत चलन में राज करने लगा था। इसलिए दोनों पैसे लगाते और रुपये पाते।

अब दोनों इस शहर को देखते तो ऐसा लगता कि इस शहर की चमक से रोशनी नहीं पैसे झर रहे हैं। और वे दोनों इन रोशनियों के नीचे बिखरे पैसे लूटने में लगे थे कि उन्हें अहसास हुआ कि उनमें से एक जब तैर रहा होता है तो दूसरा उड़ रहा होता। दोनों को इस नोट पर थोड़ा हैरान थोड़ा दुखी होना चाहिए था लेकिन दोनों अब जान चुके थे कि उनके पैर चलने के लिए नहीं उड़ने और तैरने के लिए ही बने हैं।

दिक्कत तब आई जब आरके को लगा कि उसका राम खेलावन उससे एक बच्चे की बात कर रहा है जो उसके अर्जित को भोग सके। सरला भी यही चाहती थी लेकिन नए सिद्धांत की माँग ने न सिर्फ उसकी जीवन शैली को बदल दिया था बल्कि उसकी जैविक संरचना में एक छेद कर दिया था। उसकी बच्चेदानी निकलवानी पड़ी थी। लेकिन जिसके पैर चलने के लिए नहीं उड़ने और तैरने के लिए बने हैं वे कब तक और कहाँ तक इस नोट पर चल सकते थे कि उनके जीवन में उसकी विरासत को भोगने वाले की कमी रह जाएगी। आरके इस नोट पर पूरी तरह से लड़खड़ा गया।

अब आरके भी इशारों को समझने लगा था और सरला का तो यह दिया हुआ मंत्र ही था लेकिन इस बार मंत्र का वार खुद पर पा कर वह तिलमिला गई। उसने चाहा कि आरके से कहे कि आखिर उड़ान की भी एक सीमा होती है और तैरने की भी। और यह चलने की तरह नहीं होता कि थक जाओ तो बैठ कर कहीं आराम कर लो, उसमें या तो उड़ कर गिरना होता है या तैरते हुए डूबना। लेकिन उसने महसूस किया कि यह एक अहसास है और इसे इशारे में कैसे बदले और आरके से इसका इशारा कैसे करे! फिर भी उसने आरके को इशारे किये, उसके साथ दुनिया भर की यात्रा की लेकिन यह एक ऐसा  इशारा था कि इसमें उसे  ख़ुद को होने का सबूत देना पड़ता और वह नहीं चाहती थी कि वह अपने आरके के सामने अपने होने का सबूत दे जिसने उसके इशारों को अपनी मंजिल बना उसके साथ इतनी यात्रा की थी। इसलिए लाचार होकर उसने तलाक के कागज पर अपना साइन कर दिया।

आरके घूटता हुआ एक डुबकी से बाहर निकलता है। यह डुबकी उसे एक  कोफ्त से भरती है। और यह कोफ्त अफसोस में उबलता है। इस उबाल में वह फफाते हुए देखता  है कि उसे तैरने के सिवा कुछ नहीं दिखाई दे रहा है। वह उन्माद से भरे अपने हाथ पाँव को खूब मार रहा है।  लेकिन पानी पर वह एक सेकेंड के लिए भी खुद को स्थिर नहीं कर पा रहा है। अब उसके ऊपर एक दौरा पड़ने जैसा होता है कि वह तैर क्यों नहीं पा रहा है? वह अचानक से चीखने लगता है। स्विमिंग पूल के मीटर में उसका कोलाहल रीड होता है और ऑटोमेटिक तरीके से स्विमिंग पूल पर रंग बिरंगी रोशनियाँ झिलमिलाने लगती हैं।

आर के को यह पूरी तरह से याद है कि स्विमिंग पूल का इंजीनियर उसे  बता रहा था कि स्विमिंग पूल में जब लोग मौज मस्ती करेंगे। जश्न करेंगे तो उनके साउंड का संकेत पा कर ऐसी रोशनी जल उठेंगी। आरके खुद से पूछना नहीं चाहता है कि उस की चीखें क्या जश्न का संकेत हैं? लेकिन वह इस संकेत को देख रहा है। स्विमिंग पूल के जल पर फैली रोशनियाँ  एक शिकारी की तरह दिखती हैं उसे और वह शिकार की तरह बेबस हो उन्हें देखता है।

आरके की चीखें वॉच मैन और उसके नौकरों तक पहुँचते हुए उसकी वंश बेल चलाने वाली पत्नी तक पहुँची और पत्नी के पीछे उसका पूरा परिवार भागता हुआ स्विमिंग पूल के पास आ गया। लेकिन आर के को अपने स्विमिंग पूल में तैरना था। उसके लिए बर्दाश्त के बाहर की बात थी कि वह तैर नहीं सकता । जबकि वह अपने गाँव में खूब तैरा करता था । और गाँव में क्या उस दिन तो सर एच चंदानी की पार्टी में उसने तैरने का ही तो गुनाह किया था। इतना ही नहीं उसके जीवन में जो भी बदलाव आया उस दिन के तैरने की वजह से ही तो आया था।

पूँजी पर छलकता हुआ यह शहर खड़ा होने के लिए अठखेलियाँ कर रहा था। पहाड़ तोड़े जा रहे थे। झीलें सुखाई जा रही थीं। मैंग्रोव को काटा जा रहा था। गर्दनें उतारी जा रही थीं और यह शहर आबाद हो रहा था।

उसकी पत्नी उसके बच्चे सब मिन्नतें करते हैं कि आप बाहर आ जाइए। कल तैर लीजिएगा लेकिन आरके अब बाद में कुछ कर देने वाली अवधारणा से बहुत पहले ऊपर उठ चुका था । इसलिए बिना तैरे वह वहाँ से हटना नहीं चाहता था। उसके लिए स्विमिंग पूल पर खाने को लाया गया और वह रात भर स्विमिंग पूल के फर्श पर आधा पैर पानी में डाले लेटा रहा।

सुबह बब्बन शुकुल को पूजा करवाने के लिए बुलाया गया। बब्बन शुकुल ने पूजा करवाया और शांति की कामना की। जैसे ही पूजा खत्म हुई आर के ने इस उम्मीद से छलाँग लगा ली कि बब्बन ने कुछ कर दिया होगा और अब तो वह तैर पाएगा। लेकिन इस बार भी उसके पैर स्विमिंग पूल के तल को छोड़ ही नहीं पा रहे थे। वह हाँफ कर पानी को देख रहा था कि ऐसा कैसा हो गया कि वह तैरना भूल गया ।

लेकिन उसकी हैरानी से ज्यादा उसके घर वाले हैरान थे और सबसे ज़्यादा बब्बन शुकुल। उन्होंने राम खेलावन का पूरा चढ़ाव देखा था लेकिन कभी इतना परेशान होते हुए नहीं देखा। वे पानी में उतर गए और आरके के  पास आकर समझाते हुए कहा – “अरे का हो गइल राम खेलावन। काहे पवँरे के फेरा में परल बाड़ और पूरा परिवार के फेरा में डलले बाड़। ई पँवरे के कौन धुन सवार हो गइल तोहरा सर पे? का हो जाई ना पवँर ब त?  कौनो बाढ़ आई का जे डूब जइब? बोका कहीं के, चल मरदे, बाहर निकल। पूरा परिवार परेशान बा और तू डरामा कइले बाड़। चल चल।” बब्बन शुकुल ने आर के के हाथ को खींचते हुए बाहर निकालना चाहा। लेकिन आर के ने बब्बन को झटक दिया।

बब्बन शुकुल को कहीं कुछ पाठ उद्दीपन करवाने जाना था। वे जल्दी में थे। वे बड़बड़ाते हुए बाहर निकले – “जाने दो तुम लोग टेंशन मत लो। हम जानते है इसको। मूडी है। जब मूड करेगा बाहर आएगा।”लेकिन चार दिन हो गया आरके बाहर नहीं निकला । वह खाने या चाय पीने के लिए बाहर निकलता फिर पानी में जा कर खड़ा हो जाता और तैरने की कोशिश करता । फिर रात में वहीं स्विमिंग पूल के फर्श पर सो जाता और जब नींद खुलती तो पूल में इस उम्मीद में छलाँग लगा लेता कि इस बार वह  तैर लेगा। लेकिन हर बार उसकी उम्मीद डूब जाती ।

पाँचवे दिन डॉक्टरों की टीम आई और आर के की मनःस्थिति का जायजा लेने लगी। आरके गंभीरता से पूरी बात बता रहा था और अपनी तैरने की इच्छा प्रकट कर रहा था । डॉक्टरों ने सोच विचार करने के बाद कहा कि ऐसा कभी नहीं हो सकता कि एक इनसान अगर तैरता है तो वह कभी तैरना भूल जाय। आप गाँव के हैं और आपके गाँव में नदी है इसलिए आपको लगता है कि आपको तैरना आता होगा। लेकिन यह जरूरी तो नहीं। आप शायद भूल रहे हैं।

आरके के लिए इस बात को पचा पाना अहसनीय है। वह डॉक्टर पर भड़क जाता है – गाँव की बात छोड़िए। मैं यहाँ पर जब आया था तो अपने बॉस के स्विमिंग पूल में तैरता था। मैं अपनी पहली पत्नी के साथ पहली बार।।। इतना कहते हुए वह रुक जाता है। वह बगल में खड़ी अपनी पत्नी को देखता है और हया और पछतावे की धुंध उस पर छा जाती है। उसकी पत्नी भी इस बात से असहज होती है।

आरके अपनी बात बदलते हुए कहता है -मैं झूठ क्यों बोलूँगा। मैं तैरना भूल गया हूँ लेकिन मैं इस बात को अभी भी जानता हूँ कि डॉक्टरों से झूठ नहीं बोलना चाहिए। मुझे पूरी तरह से याद है। एक बार तो मैं अपने गाँव की नदी – जिसका नाम धर्मावती है। बाढ़ के दिनों में गंगा की तरह उफनने लगती थी। उसमें मैं तैरते-तैरते इतना आगे चला गया कि डूबने लगा। फिर एक मछुआरे ने आकर मुझे बचा लिया।

आर के की बात सुन कर डॉक्टर की आँखें चमक उठती है -एक्जेक्टली व्हाट आई एम सेईंग सर। आपको याद नहीं है। अगर आपको तैरना आता तो आप डूबते नहीं। आप कुछ भूल रहे हैं। नहीं तो ऐसा नहीं हो सकता कि… डॉक्टर अपनी बात पूरी करता इससे पहले तिलमिला कर आरके कहता है -लेकिन आप को ये तो पता होना चाहिए कि तैरने वाला ही डूबता है। अगर मुझे कोई साइक्लोजिकल बीमारी है। जिसकी वजह से मैं तैरना भूल गया हूँ तो उसकी दवा दीजिए। कोई उपाय बताइए। लेकिन ये मत कहिए कि मैं तैर नहीं सकता।

डॉक्टरों की टीम एक पल के लिए चुप हो जाती है। वे एक दूसरे का मुँह देखते हैं और उनमें से एक फिर समझाने की कोशिश करते हुए कहता है -चालीस-पैंतालीस साल पहले की बात है। और यह किसी बात को भूलने के लिए बहुत ज्यादा है। यह बहुत नेचुरल है कि इंसान कोई बात भूल भी सकता है। इस बात पर आर के को कुछ कहना गवाँरा नहीं लगता। वह सॉरी कहता है और स्विमिंग पूल में छलाँग लगा लेता है। उसके छलाँग लगाते ही उसकी पत्नी छाती पीटने लगती है कि क्या हो गया इन्हें। आर के को अपनी पत्नी की हाय-हाय सुनाई पड़ती है लेकिन वह डुबकी लगा लेता है।

किसी को कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करे। स्विमिंग पूल पर अब रोशनियों से ज्यादा नींबू मिर्च और फेंगु सुई के यंत्र दिखने लगे। हवन और लोहबान के धुएँ से पूरा माहौल एक भुतिहा  वातावरण में तब्दील हो गया। इसी तब्दीली में जब रात के साथ उसकी बेचैनी किसी गह्वर में भटकने लगी तो उसे लगा कि उसे सरला से मिलना चाहिए।

सरला के घर के बाहर जब आरके पहुँचता है तो उसे अचानक से समय देखने का खयाल आता है। उसे घड़ी देखने की बजाय आकाश को देखना उचित लगा। जैसे राम खेलावन रात में जब जगता तो तारों की स्थिति देखकर अनुमान लगाता कि रात कितनी बाकी रह गई है ताकि सुबह होने से पहले कटनी करने निकल जाए। नहीं तो नौ बजते-बजते धूप इतनी तेज होती कि खेत में रुकना असहनीय हो जाता और कटनी का काम नहीं हो पाता। आरके ने आकाश को देखा तो पाया कि यह एक निरभ्र रात है। तारों से भरी। उसने सोचा कि ऐसी रात उसने कब देखी थी। यह सोचते हुए उसे  घबराहट हुई और उसने सरला के फ्लैट की घंटी बजा दी।

अंदर से एक महिला निकली। उसे पता था कि सरला पैरालाइज्ड है और वो दरवाजे तक नहीं आ सकती। इसलिए महिला को देखकर समझ गया कि वो कोई नर्स होगी। वह महिला आरके को सरला के पास ले जाती है। सरला अभी तक जगी हुई थी और सामने की दीवार की तरफ देख रही थी। आरके उसके पास बैठता है लेकिन उसकी बेचैनी सरला के बारे में कम अपने तैरने को लेकर ज़्यादा है। वह बहुत कुछ कहना चाहता है लेकिन शुरू जहां से करना चाहता है हर उस बात में एक गुनाह की तरह ख़ुद को फंसा हुआ पाता है और उसके मुंह से सॉरी निकलता है! वह इससे आगे कुछ कहे सरला उसके हाथों पर अपना हाथ रखती है। जब वह सरला को ठीक होने का दिलासा देता है तो वह अपनी लड़खड़ाती आवाज में पूछना चाह रही थी कि इतनी रात गए? वह इतना ही कह पाई कि आरके ने उसे कुछ कहने से रोक लिया। दोनों कुछ पल तक खामोश बैठे एक दूसरे को देखते रहे लेकिन आर के इस बात के लिए खुद को तैयार कर रहा था कि वह पूछ सके कि “क्या मैं उस दिन तैर रहा था जिस दिन सर एच चंदानी ने मुझे थप्पड़ मारा था?”

आरके अपनी बात कहने का कोई सिरा तलाशता हुआ कुछ कहता और सरला उसकी हथेलियाँ दबा कर चुप रहने की कोशिश करती। और इस कहने और चुप रहने की कोशिशों में आरके ने उद्विग्न हो कर बात का सिरा पकड़ लिया  – “ अच्छा तुम्हें याद है जिस रात चंदानी ने मुझे थप्पड़ मारा था?

सरला इस प्रश्न को सुनने के बाद हैरान हो सकती थी लेकिव वो बिफरने जैसे होने को होती है कि इसका जवाब हाँ ना में नहीं दिया जा सकता है। लेकिन वो जानती है कि उससे कोई सवाल पूछने आया है। वो यह भी जानती है कि पूछने वाला कौन है। वह खुद को किसी वक्त की किरचों में फँसी हुई महसूस करने वाली होती है कि उसे मुस्कराना अच्छा लगता है। उसके चेहरे पर एक निश्चल मुस्कान फैलती है। आर के इस मुस्कान को देखने की कोशिश करता है कि इस हाल में भी सरला की हँसी कितनी प्यारी लग रही है। लेकिन उसे अभी अपने तैरने के बारे में जानना है और सरला एक सबूत की तरह बची हुई है इसलिए पूछता है – “उस दिन स्विमिंग पूल में पानी कम था ना  जिस वजह से मैं इस पार से उस पार तक चलते हुए गया और झूठ-मूठ तैरने का नाटक करता रहा?

इस सवाल के बाद सरला के चेहरे के पर  विस्मृति से उभरा हुआ एक गहरा तनाव खुरच गया। वह कुछ कहती इससे पहले आरके ने पूछ लिया – मुझे  तैरना तो आता है? उस दिन मैं तुम्हारे साथ तैर ही तो रहा था ?

अभी आरके इतना ही कह पाया था कि सरला की हथेली उसकी हथेली पर एक जकड़ के साथ कस गयी और उसने एक उमड़ते-घुमड़ते दर्द के झटके के साथ उठना चाहा मगर उसके मुंह से लार और थूक के साथ फेन जैसा कुछ निकलने लगा। आर के घबरा कर नर्स को आवाज़ देता है। नर्स ने देखते ही कहा कि मेजर अटैक है अभी हॉस्पिटल ले जाना होगा।

आरके सरला को हॉस्पिटल में भर्ती करवा के लौटता है तो पाता है कि वाकई चालीस-पैंतालीस साल का वक्त बहुत ज़्यादा होता है। फिर भी उससे यह बात स्वीकारी नहीं जा रही कि वह तैर नहीं सकता। वह वक्त के इस स्वीकार अस्वीकार के बीच जो सिलवटें पड़ गई थी उसे समझने की कोशिश करता है तो उसके सामने इंसानी इशारों की अनगढ़ मूर्तियाँ अपने को पूरा करने के लिए टेर लगाने लगती हैं। वह उन टेरों को सुनता हुआ अपनी गाड़ी को रात भर इधर-उधर घुमाता रहा कि ऐसा कैसे हो गया कि वह तैरना भूल गया और उसके तैरने का यकीन अब उसके पास से जा रहा है।

वह अपने आलीशान बंगले पर लौटता है तो स्विमिंग पूल की तरफ देखता भी नहीं सीधे घर जाता है और जा कर टिकिट बुक कर  चुपचाप अपने कमरे में सो जाता है। उसको  सोता हुआ देख उसका  परिवार दस दिन बाद चैन की साँस लेता है। लेकिन आरके की नींद जैसे ही खुलती है वो टाइम देखता है और हड़बड़ा के उठता  है। वह तुरंत अपना बैग तैयार करता है और पत्नी से कहता है कि ड्राइवर से बोलो कि गाड़ी निकाल ले। मुझे फ्लाइट पकड़नी है। पत्नी पूछती है कि कहाँ जा रहे हैं ?आर के बिना लाग लपेट के कहता है – “गाँव”।

पत्नी साथ चलने की बात करती है तो वह यह कह कर के दो-तीन दिन में आता हूँ, निकल जाता है। उसके पीछे पत्नी का प्लीज प्लीज का निवेदन पानी की बुलबुले की तरह उठता है और फूट जाता है।

आरके हवाई अड्डे से अपने गाँव के लिए टैक्सी लेता है तो उसे गहरे तौर पर राहत का अहसास होता है। उसे लगता है कि वह बिना मतलब दस दिनों से परेशान था। उसे गाँव आ कर अपनी नदी में तैरना चाहिए था।

वह जैसे-जैसे गाँव के करीब आ रहा था  उसका राम खेलावन जो अब तक कहीं खामोश बैठा था, उसमें एक सुगबुगाहट सी होती है। तभी उसे लगता है कि वह एक पुल से गुजर रहा है। वह इस पुल को नहीं जानता था । लेकिन जिस पर पुल खड़ा हुआ था और जिसका एक हिस्सा गाँव से और दूसरा हिस्सा एक बन रहे कस्बे से जुड़ा हुआ था, उसे लगा कि वह इस जगह को पहचानता है।

वह अब तक खुद से पूछ रहा था कि वह  तैरना कैसे और कब भूल गया था ?वैसे ही वह  नदी से पूछ रहा है कि कैसे और कब तुम्हारा पानी सूख गया?

यह पहचान उसे मथ देती है। वह थोड़ा सचेत हो कर इस जगह को पहचानने की कोशिश करता है तो पाता है कि उसे  हैरान होना चाहिए या खुश!  यह तो उसके गाँव की नदी है। इस पर पुल कब बन गया? उसे खुशी होती है कि उसकी अपनी धर्मावती नदी पर पुल बन गया है। उसे  अच्छा लगता है कि बाढ़ के दिनों में उनका गाँव जो बाहर की दुनिया से पूरी तरह कट जाता था अब नहीं कटेगा।

वह ड्राइवर से गाड़ी रोकने के लिए कहता है। वह तेजी से दरवाजा खोलते हुए और पुल के किनारे आ कर अपने उन दिनों को देखना चाहता हैं जिसमें वह तैरते हुए बड़ा हुआ है। जिसमें अब वह तैर के इस झूठ को झुठला सकता है कि वह तैर नहीं सकता। वह अपने सबूत के पास था। सरला सेठ के बाद यह ऐसा सबूत था जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता।

लेकिन यह क्या? यह हैरान होने से भी कोई बड़ी बात थी। नदी को देखते ही जैसे लगता है कि वह किसी दुःस्वप्न में है। जैसे वह अब तक खुद से पूछ रहा था कि वह  तैरना कैसे और कब भूल गया था? वैसे ही वह नदी से पूछ रहा है कि कैसे और कब तुम्हारा पानी सूख गया?

वह अपने ऊपर  तेज हवा के एक झोंके को महसूस करता है। उसका राम खेलावन कहता है कि फगुनहटा बह रही है। और तुमको याद है गाँव के लड़के-लड़कियाँ इस नदी में होली खेलने के बाद अपना रंग धुलने के लिए आते थे और अबीर खेलने के वक्त तक तैरते रहते थे। अब तक वह अपने गाँव को लेकर भावुक हो रहा था । इस याद से उसे सिहर जाना था लेकिन वह पूरी तरह से काँप गया।

उसने चाहा कि अब यहाँ से लौट जाय तभी उसका एक हमउम्र जो बाइक से कहीं जा रहा था, उसे देखकर – “अरे ई तो राम खेलावन है” कहते हुए आगे जा कर अपनी बाइक रोक देता है। उसे देखकर आर के को लगा कि जानने वाले को पहचानने के लिए चालीस पैंतालीस साल का वक्त कोई बहुत ज्यादा वक्त नहीं होता। वह खुद को भरा हुआ महसूस करने लगा लेकिन उसके तैरने में चालीस-पैंतालीस का वक्त कैसे ज्यादा हो गया? इस प्रश्न की बेधाई उसमें कहीं गहरे तौर पर सुराख़ बनाने लगी।

आरके ने हमउम्र से कहा कि काम कर के लौटो तो मुलाकात होती है। लेकिन उसका हमउम्र जो यह  कहता है “अरे काम होई नू। कितना दिन बाद त तू आइल बाड़। चल पहले घरे।” आरके उसी के साथ गाँव आता है।

गाँव में घुसते हुए वह उस जगह को देखता है जहाँ सप्ताहिक मेला लगा करता था, अब वह एक कस्बे में बदल चुका है। पलटू और बड़का घर के बगीचे कट गए हैं। उन जगह पर बंगलों जैसे घर बन गए हैं। गाँव की गलियाँ पक्की हो गई हैं। खेतों तक जाने वाली छवरों पर ईंटें बिछ गई हैं। उसे यह सब देखकर खुश होना चाहिए था लेकिन वह एक पुल पार कर के आया था। एक ऐसा पुल जिसके नीचे नदी नहीं नदी की आकृति बह रही थी।

आरके गाँव वालों से एक संकोच के साथ नदी की बात करता है तो पाता है कि बरसात में दो महीने नदी में पानी दिखता है, वो भी तब जब खूब अच्छी बरसात होती है। और वो पानी भी छठ तक आते आते सूख जाता है। इसलिए अब लोग अपने घरों में ही छठ पूजा करने लगे हैं।

रात होने पर आरके नदी की तरफ निकलता है। नदी के किनारे पर पहुँच कर इस भाव से देखता है कि उसके देखने से नदी में पानी आ जाएगा। लेकिन नदी अपने तल में समतल हो चुकी थी। उस समतल पर क्रिकेट के पिच, पिच से थोड़ी दूर पर हाई जम्प की कुदाई के लिए बना गड्ढा, उससे थोड़ी दूर पे बैडमिंटन के नेट, नेट के बाई तरफ नदी से मिट्टी निकालने के लिए खड़े ट्रक और ट्रैक्टर और सब पर चाँदनी पूरी तरह से खिली हुई है। चाँदनी में सूखी नदी सफेद साड़ी में लिपटी विधवा की तरह दिखाई देती है। वह जा कर नदी के बीच तल में बैठ जाता है। वह चाहता है की  नदी को महसूस करे, उसे छू ले उसमें तैरे। तैरते हुए डूबने की बात सोचते हुए वही लेट गया।

सोचना ख़ुद से बात करना भी होता है। वह बात करते हुए पाता है कि “फागुन की हवा में चाँदनी का स्वाद पता चलता है।” यह ऐसा स्वाद था कि सोचना छोड़कर उसे ख़ुद से पूछना पड़ रहा है कि –“नदी में अगर पानी होता तो क्या चाँदनी का स्वाद इतना ही होता? उसमें हवा के साथ पानी का स्वाद मिलता तो कैसा स्वाद बनता? उसे इस स्वाद को पाने की चाह उमड़ती है। वह नदी को अपनी अंदर की उद्विग्नता से दबा कर देखता है। उसकी आँखों में आँसुओं की कुछ बूँदें जालीदार परदे की तरह झिलमिलाने लगती है। वह देखता है कि नदी में पानी भरा हुआ है। नदी के उपर चाँदनी फैली हुई है और उस पर फगुनहटा बह रहा है। और वह पानी, हवा और चाँदनी का स्वाद लेते हुए नदी के बीचोबीच तैर रहा है।

तैरने वाला ही डूबता है। अगर मुझे कोई साइक्लोजिकल बीमारी है। जिसकी वजह से मैं तैरना भूल गया हूँ तो उसकी दवा दीजिए। कोई उपाय बताइए। लेकिन ये मत कहिए कि मैं तैर नहीं सकता।

तैरते-तैरते वह थक कर अपना हाथ पाँव मार रहा है। लेकिन हाथ पाँव काम नहीं कर रहे हैं। वह पूरे दम के साथ चीखता है। नदी के किनारे पर खड़े लोग उसे बचाने के लिए नदी में छलांग लगा चुके हैं लेकिन उनकी दूरी इतनी है कि वे अब उसे नहीं बचा सकते। लेकिन किनारे से उसके कानों में राम खेलावन राम खेलावन की  पुकार के साथ लोगों के तैरने की आवाज़ आ रही है। अचानक से उसे लगता है कि पुकारते हुए लोग हँसने लगे हैं। सच में लोग हंस रहे थे और उसको घेर कर खड़े थे। वह अपनी आँख खोलते हुए लोगों को सुनता है – का राम खेलावन। नदी से मोहा गइल का?

लेकिन आरके जगा तो उसके अन्दर मोह नहीं, माया बची थी। जो उससे उसके होने का वजह मांग रही थी। इसलिए वह यह कह के कि  -“अरे यार बहुत अच्छी हवा बह रही थी तो नींद लग गई थी”;  उठाता है और चल देता है। वह किनारे पर जा कर नदी को एक बार पलट कर देखता है। नदी में चांदनी की जगह धूप और पानी की जगह मिट्टी निकाल कर ले जाने के लिए ट्रक और ट्रैक्टर की आवाज़ फैल रही थी। वह अपना चेहरा घुमाता है तो दूसरी तरफ चमकने के लिए बेताब गाँव दिखाई देता है। उसके चेहरे पर एक कनिंग स्माइल आती है। वह अपने एक हमउम्र जो अब गाँव का प्रधान हो चुका था, से कहता है कि गाँव में पक्के घर बनने लगे हैं। नदी से मिट्टी मिल जाएगी तो ईंट का एक भट्टा डाला जा सकता है। उसका हमउम्र इस बात को एक नेमत की तरह लेता है। और आरके खुद को एक बंधन से मुक्त पाता है।

आरके अपने गाँव में भट्टे की पूरी तैयार कर के लौटता है। उसके चेहरे पर नेमत अता करने का भाव है। वह अपने स्विमिंग पूल में एक बड़ा सा स्विमिंग बेड डाल के लेटा   हुआ है और अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर रहा है। उसके चेहरे पर  तैर न पाने का कोई अफसोस या पीड़ा नहीं है। वह अपना पैग गटकने के लिए ऊपर आकाश की तरफ देखता है। देखना भी ख़ुद से बात करने जैसा ही होता है लेकिन वह अपने दोस्तों से गाँव में अपना बिजनेश शुरू करने के लिए चियर्स करते हुए कहता है – “मैं बिना मतलब परेशान हो गया था। अरे जब नदी सूख गई है तो मैं तैरूँ या ना तैरूँ क्या फर्क पड़ता है ?” आरके के दोस्त इस बात पर चियर्स करते हैं।

आरके अपना पैग एक हासिल की हुई ख़ुशी के साथ गटकता है। उसके हलक में उतरता हुआ एक ठंढा और खारा उबाल पानी के फर्क से जोड़ देता है। उसे यह फर्क ऐसा चुभता है मानो उसके गले के ठीक बीच नदी आ गयी हो। वह नदी को गटक जाना चाहता है और जैसे ही एक घूँट उसके भीतर जाता है। ठीक उस रात की तरह जैसे सरला सेठ के गले से लार थूक और फेन एक साथ निकला था, आरके के गले से निकलता है और वह एक तड़प के साथ मुंह के बल अपने स्विमिंग पूल में गिर जाता है। वहां क्या हुआ क्या हुआ।।। का शोर मचता है और स्विमिंग पूल की तकनीक उस शोर को एक उत्सवी कोलाहल में रीड करती है। स्विमिंग पूल उत्सव की रोशनियों से झिलमिला जाता है। रोशनियों के इस झिलमिल के बीच आरके के पास जब तक लोग पहुंचते तब तक उसका शरीर पानी में तैरने लगा था।

 

1 COMMENT

  1. एक ऐसी कहानी जिसके भीतर न जाने कितनी चीजें हैं। यह ऊपर से भरते चले जाने पर भीतर से सूखते चले जाने की कहानी है जिसके बीच में न जाने कितने घात-प्रतिघात छुपे हुए हैं। शेषनाथ को इस कहानी के लिए बहुत बहुत बधाई। उन्हें और और लिखना चाहिए।

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