प्रख्यात (अ)कवि निकानोर पार्रा को श्रद्धांजलि: कविता मर जाएगी अगर उसे तकलीफ न दो

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श्रीकांत दूबे/

साम्राज्‍यवाद के किसी भी स्‍वरूप के प्रति विद्रोह के नजरिए से लैटिन अमेरिका की जमीन कितनी ऊर्वर रही है, इससे समूचा विश्‍व वाकिफ है। बात सिमोन बोलिवार, एर्नेस्‍तो चे गेवारा या फिदेल कास्‍त्रो जैसे राजनैतिक क्रांतिकारियों की हो अथवा खोसे मार्ती जैसे कवि-बुद्धिजीवी की, ग़लत के प्रतिकार के स्‍वर को लैटिन अमेरिका के पूरे औपनिवेशिक इतिहास में एक सशक्‍त परंपरा की तरह लक्षित किया जा सकता है। यकीनन, वहां का साहित्‍य भी इससे अछूता नहीं रहा है। फिलहाल, विश्‍व साहित्‍य, तथा खास तौर पर लैटिन अमेरिकी साहित्‍य में रुचि रखने वालों को स्‍तब्‍ध कर देने वाली एक खबर यह है कि उस क्रांतिकारी परंपरा के अनिवार्य नाम निकानोर पार्रा का आज तड़के चिले के लास क्रूसेस में निधन हो गया। निकानोर पार्रा को अकादमिक विश्‍व महत्‍वपूर्ण गणितज्ञ/भौतिकीविद् के रूप में जानता रहा है लेकिन शेष दुनिया के लिए वे एक प्रमुख कवि रहे हैं। कविता के साथ निकानोर पार्रा के ताल्‍लुक को उनके द्वारा खुद को ‘अकवि’ (Antipoet) कहने भर से समझा जा सकता है। किसी भी स्‍थापना के प्रतिकार के उनके स्‍वर की बानगी के लिए एक कविता में लिखी उनकी यह पंक्ति ही काफी होंगी हैं:

‘‘संयुक्‍त राज्‍य: ऐसा देश जहां ‘आजादी’ एक मूर्ति[1] का नाम है।’’

निकानोर पार्रा उन विरले परिवर्तनकामियों में एक हुए जो अप्रासंगिक अथवा ग़लत महसूस होने पर अपने ही द्वारा प्रतिपादित मान्‍यताओं को भरी महफिल में खंडित करने का साहस रखते थे। यद्यपि उन्‍हें 103 वर्षों का दीर्घतर जीवन मिला, लेकिन उनके अवदान तथा क्षमताओं के मद्देनज़र उन्‍हें अभी और रहना था। करीब पांच-छ: वर्ष पहले एक जुनून के तहत मैंने उनकी चंद कविताओं के अनुवाद किए थे। बाद में जुनून की दिशा थोड़ी बदल गई, लेकिन पार्रा मेरे लिए हमारे वर्तमान के जरूरी कवियों की फेहरिश्‍त में शिखरस्‍थ बने रहे। मूलत: स्‍पैनिश में लिखे उनके रचना-संसार के अन्‍य पहलुओं के साथ जल्‍द ही वापस आने के वायदे के साथ यहां उनकी कुछ कविताएं दे रहा हूँ।

मर जाएगी कविता

कविता
मर जाएगी
अगर
उसे
तकलीफ न दो

लेकर के
गिरफ्त में, तोड़ना होगा
उसका दर्प सरेआम

फिर दिखेगा
क्या करती है वह।

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पहले सबकुछ भला दीखता था

पहले सबकुछ भला दीखता था
अब सब बुरा लगता है

छोटी घंटी वाला पुराना टेलीफोन
आविष्कार की कुतूहल भरी खुशियां देने को
काफी होता था
एक आराम कुर्सी – कोई भी चीज

इतवार की सुबहों में
मैं जाता था पारसी बाजार
और लौटता था एक दीवार घड़ी के साथ
-या कह लें कि घड़ी के बक्से के साथ –
और मकड़ी के जाले सरीखा
जर्जर सा विक्तोर्ला (फोनोग्राम) लेकर
अपने छोटे से ‘रानी के घरौंदे’ में
जहां मेरा इंतजार करता था वह छोटा बच्चा
और उसकी वयस्क मां, वहां की

खुशियों के थे वे दिन
या कम से कम रातें बिना तकलीफ की।

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एक अजनबी के लिए खत

जब गुजर जाएंगे साल,
साल जब गुजर जाएंगे और
हवा बना चुकी होगी एक दरार
मेरे और तुम्हारे दिलों के बीच;
जब गुजर जाएंगे साल और रह जाउंगा मैं
सिर्फ एक आदमी जिसने मोहब्बत की,
एक नाचीज जो एक पल के लिए
तुम्हारे होटों का कैदी रहा,
बागों में चलकर थक चुका एक बेचारा इंसान मैं,
पर कहां होगी तुम?
ओ, मेरे चुंबनों से रची बसी मेरी गुड़िया!
तुम कहां होगी?

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वे रहे, हू ब हू वैसे ही, जैसे वे थे

उन्होंने चांद को पूजा – लेकिन थोड़ा कम

उन्होंने टोकरियां बनाईं लकड़ियों की
गीत और धुनों से खाली थे वे
खड़े खड़े किए बेलौस प्यार
अपने मृतकों को दफनाया भी खड़े ही
वे रहे, हू ब हू वैसे ही, जैसे वे थे।

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श्रीकांत दूबे महीन संवेदनाओं की तीक्ष्ण अभिव्यक्ति के कवि और कहानीकार हैं.अपने कथा संग्रह पूर्वजकी कहानियों में श्रीकांत स्थितिजन्य दु:खों और दुविधाओं पर अन्वेषण करते दीखते हैं. साथ ही, श्रीकांत ने अनुवाद के बहुतेरे महती कार्य किये हैं, जिनमें निकानोर पार्रा के अतिरिक्त लोर्का और नेरुदा की कविताओं के साथ चेखव और वर्गास योसा की कहानियों का अनुवाद शामिल है. इन्होंने रोबर्तो बोलान्यो और साथियों द्वारा चलाए गए साहित्य आन्दोलन परायथार्थ ( इन्फ्रारियालिज्म) के घोषणापत्र का भी अनुवाद किया है. हाल ही में मेक्सिको  की यात्रा पर आधारित इनकी पुस्तक मेक्सिको: एक घर परदेश में प्रकाशित हुई है.

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[1] स्‍टैच्‍यू ऑफ लिबर्टी

 

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