अम्बर पाण्डेय की कविताएँ

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अम्बर जीनियसकी परिभाषा हैं। दर्शन के विद्यार्थी रहे अम्बर दर्शन की विभिन्न शाखाओं, उपशाखाओं का विधिवत अध्ययन करते हैं। हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी का व्यापक ज्ञान है। परिश्रमी रचनाकार हैं। अद्भुत कवि और गजब का गद्यकार। अम्बर को पढ़ना अनुभूति की चौहद्दी को बढ़ाने का उपक्रम है। यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि ऐसा रचनाकार किसी भी भाषा में विरले ही होता है, कुछ कुछ उस शेर को सही साबित करता हुआ कि हजारो साल नरगिस अपनी बेनुरी पर रोती है..

 

स्त्री के जीवन में कुंकुम और
आलते का महत्व

 
कालीघाट के
कारख़ाने का कुंकुम ही भरतीं, जटा जटा
हो चुके केशों का वेगवती हुगली में
प्रक्षालन कर

ऐसा कुंकुम जिसमें नये धान की सुगंध होती
जिसे देखकर रक्त का यों भ्रम होता
कि जीर्णज्वर से जर्जर
मृतप्रायः में भी जीवट जुगजुगाने लगता

यह स्त्री की ज्योति है
पूर्णिमा की भाँति निर्विवाद है
सुंदर होने की इच्छा से सुंदर
संसार में कुछ भी नहीं

“भाल तेरा सदैव जगमग रहे, दुर्गा।”

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दुर्गा का अपने पति भूतनाथ को हावड़ा, डाकखाने से पत्र भेजना

प्रत्येक षष्टि की रात्रि दुर्गा पति भूतनाथ को पत्र लिखती। पत्र का अभिप्राय भूतनाथ को छोड़ कोई समझे, यह दुर्गा को कभी इष्ट न था किंतु टीकाओं से बनी भारतभूमि पर वर्ष पर वर्ष कोई कवि पत्र चोरकर टीका करने बैठ जाता। प्रेम में, बताओ, क्या है जो इन्द्रियगोचर है पत्र मात्र को छोड़कर!

पत्र:
नाथ, अवश्य ही तुम्हें सती, पूर्वपत्नी
का स्मरण नित्य होता होगा जो अग्नि में
तुम्हारे मान के लिए भस्म हुई अपने
पिता के घर अन्यथा तुम मुझे पत्र लिखते।
मन तो अब भी सती के स्पर्श, दृष्टि तथा
रस के लिए व्याकुल होता है तुम्हारा?
इतने तो इंद्रियाराम नहीं हो मेरे
भूतनाथ। मुझे इष्ट बस तुम्हारे उछंग
लगकर बैठना है और विप्रलब्ध का क्या
है? जभी तुम्हारे निकटतम होती थी तब
विस्मृति के कारण अकेली हूँ ऐसा ही
लगता था। बुरा हो अद्वैत का। तुम्हारी
जूठी खिचड़ी खाऊँ तब सुखी हो सकूँगी
दुबारा। हाँ, यहाँ सुख बहुत है तात-माता
के निकट परंतु तुम्हारा उच्छिष्ट खाने
का सुख नहीं। अब चाण्डाल रूपसी बनकर
निशीथों को तुम्हारे निकट आऊँगी। तुम
चाण्डाल नर का भेष धरना। अधिक कहते
लज्जा होती है। मुझे पूरा संदेह है
कि कवि इधर मेरा पत्र छुपकर बाँचते है।

-दुर्गा

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दुर्गा का अपनी माँ और बहनों के संग
साड़ी ख़रीदने जाना

बड़े बड़े चक्षुओं में कज्जल देकर, स्फटिक के
कुण्डल पहनकर सब जातीं गड़ियाहाट
नूतन बस्त्रालय की प्राचीन पेढ़ी

जिसका मन कषाय न हुआ था
जो भगवा पहनता ऐसा गाड़ीवान बुलाती माँ
घोष ऊझ ऊझकर बतलाते
जामदानी ताँत, मुर्शिदाबाद का रेशम
और देहात से आये तोते कढ़े काँथे का काज

शारदामणि हर बार लाल पाड़े की धोती लेकर
कोना पकड़ लेती, बिष्णुप्रिया बनारसी साड़ी लेती
लाल किनोर की या जामुनी बालुचर

दुर्गा कोपवती, “कापटिक है माँ; बड़े घर की विराज बहू
है बिष्णुप्रिया तब ही न सदैव कांतिमती धोतियाँ लेती है
मुझे तो
कांतार में कुटी छवाकर रहनेवाले कापालिक को
दिया है, मेरा क्या है!
यह कापोत कुचैली धोती पहने रहूँ।”

माँ उधार करती और तीन बालुचरी धोतियाँ
मोल लेती, घोष को बताती, “दुर्गा षष्टि को हुई
तब से ही क्षण रूष्टा क्षण तुष्टा है।”

लौटते गौधूलि हो जाती मूंगे के कंकण के रंग की
बत्ती जलाने से पूर्व घर में भरा तिमिर –
कषाय नववस्त्रों से दर्पण जैसा भासता ।

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देवी दुर्गा का माँ के घर, हावड़ा आना

वाष्प, ऊमस, मेघों
के मारे दशा बुरी है जैसे
पारिजात गुँथकर सब
संग पसीज गए हो। गौड़
जनपद के नौकाघर
लगते लगते बनारस से चले
स्टीमर में देर हो
गई। दुर्गा देवी अपने
दो बेटों कार्तिक व
विनायक के संग, छोटी भगिनी
सरस्वती बीच बाट
बीन बजाकर थोड़ा हृदय
लगाए रख रही थी।

“माँ, गौडुम्ब मिलेगा? गौडुम्बों
को खाकर ही ऊमस
से उन्मुक्ति हो सकती है.”

ढेर जल पर डोलती
नाव पर जब हाथियों के टोले
जैसे मेघ घिरें हो’
ढाई मास से बरसात न
रुकी हो तब गौडुम्ब
कहाँ से हो!  ढुंढा, चूड़ा, लवन,
गुड़ खा यात्रा कटी।

हावड़ा में भीड़भड़क्का
भीषण। बक्सें, लोटा
छाते और गहने गिन-संभाल
उतारना. फिर उसके
पश्चात् स्नान, दर्पण, सब
शृंगार। तब मत्स्य
और भात का भोज। एड़ी और
अंगुली मध्य स्थान
जो है वह बहुत दुख आया
है। अबेर तक ठाढ़ी
कलकत्ते की भूमि देखने का
यत्न करती। कार्तिक
को तल देना लूची और
चाप। “मेरा कार्तिक
मद्रास चला गया। फिर लौटा न
कभी मुख तक दिखाने
के लिए। निर्मोही निकला.”

(भगवान को भी यात्रा में कष्ट होता हैं. भगवान के परिवार में भी क्लेश लगे रहते है, उनको भी मोह-माया, सुख और दुःख होते  है.)

*गौडुम्ब- तरबूज
*ढुंढा- गुड़ से बाँधा गया लावे का लड्डू.होते

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गुंजाफलों की माला पहने

थोड़ी मदिरा के कारण लड़खड़ाती हुई
टेढ़ा चंद्रमा केशों में खोंसे
शिशु गणपति को गोद में भरकर
स्तनपान कराती

कवियों से घिरी
किंतु हिमालय के शुक से श्लोक सुनती
देवी नैहर आने को निकल पड़ी है-

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शरद पूर्णिमा

नवान्नभक्षण के दिनों से
पूर्व, वृद्धवर्षा की सब
रात्रियों को; कास, कचनार
कोजागर, धान, सिंघाड़ों की
कचरघान से जब अटी पड़ी
होगी भूमि; अम्बर पांडे,
मैं आऊंगी तुमसे मिलने।

नाट्यमंडली के संग नित्
देशभ्रमण करते भी जान
न पाई अब तक कि स्त्री को
अपने पण्डित का आलिंगन
कैसे करना चाहिए उचित?

अति उत्कंठा से स्तनों का
आगे आगे का भाग लाल
कचूर दाड़िमकुसुमों जैसा
हो जायेगा, कठेठ भी तो
कच्चे कठूमरों जैसा। तब
ऐसे कसूँ ज्यों कठबन्धन
कि तुम्हारे कण्ठ पड़ जाये
काचमणियों के मेरे हार
की छाप या इतनी देर तक –
दोनों के स्वेद की सुगंध
एक हों। जिसका कलेवर तक
उसके न होने पर ही प्रकट
होता हो पुतलियों पर; उसे
जीभर कसने के सभी यत्न

वटपुष्प देखने की इच्छा
सरीखे विफल है। तुम्हारे
कंधे पर मेरे काटे का
चिह्न चन्द्रमा से दिनों होड़
करेगा। शुध्द सायण गिनकर
बनाया नीमच से प्रकाशित
निर्णयसागर पंचांग तो
मेरे कोई काम का नहीं।

अधिकमास गिनकर त्रयोदश
पौर्णमासियां हैं कागदों
में किन्तु कला एक भी नहीं।

उस भांति प्रेम में कवियों के
सब ग्रन्थ-पोथियाँ वृथा हैं.

कचूर- हल्दी की तरह लाल.
कठेठ- कठोर.
कठूमर- जंगली गूलर.
कठबन्धन- लकड़ी की सांकलें।

 

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दूसरा पाठ- बत्तीस पंक्तियों की अष्टपदी

नाट्यमंडली के संग नित्
देशभ्रमण करते भी जान
न पाई अब तक कि स्त्री को
अपने पण्डित का आलिंगन
कैसे करना चाहिए उचित?

अति उत्कंठा से स्तनों का
आगे आगे का भाग लाल
कचूर दाड़िमकुसुमों जैसा
हो जायेगा, कठेठ भी तो
कच्चे कठूमरों जैसा। तब
ऐसे कसूँ ज्यों कठबन्धन
कि तुम्हारे कण्ठ पड़ जाये
काचमणियों के मेरे हार
की छाप या इतनी देर तक –
दोनों के स्वेद की सुगंध
एक हों। जिसका कलेवर तक
उसके न होने पर ही प्रकट
होता हो पुतलियों पर; उसे
जीभर कसने के सभी यत्न

वटपुष्प देखने की इच्छा
सरीखे विफल है। तुम्हारे
कंधे पर मेरे काटे का
चिह्न चन्द्रमा से दिनों होड़
करेगा। शुध्द सायण गिनकर
बनाया नीमच से प्रकाशित
निर्णयसागर पंचांग तो
मेरे कोई काम का नहीं।

अधिकमास गिनकर त्रयोदश
पौर्णमासियां हैं कागदों
में किन्तु कला एक भी नहीं।
उस भांति प्रेम में कवियों के
सब ग्रन्थ-पोथियाँ वृथा हैं.

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संसार का अंतिम प्रेमी

पत्नी की चिता दाघ देने के पश्चात् वह श्मशान में ही रह गया। गया नहीं घर। संसार श्मशान उसके लिए एक ही थे दोनों। सूतक निवारण हेतु स्नान को ढिग बहती नर्मदा तक नहीं गया वह। कपालक्रिया पूर्व मुण्डन के पश्चात् शीश धोने के लिए भरा मटका रखा रहता है  उसका जल पी, चिताओं के धूम में पकते बेर खाकर, अस्थि की पोटलियों का तकिया कर जीवन किया।

वाचस्पति मिश्र की भामती की भाँति सुशील थी उसकी गृहिणी। पिता तो आए नहीं कभी। माँ, बुआ और बहनें आती थी ले जाने को घर, दूर से रोती, टेरती। जीवन तो जीवन का उद्देश्य नहीं। प्रेम, धर्म, विचार, परमार्थ, पर-हित के लिए जीवन है। प्रेम के लिए मरना उसे था प्रेय। किसी को पता न पड़ा वह कब मरा!

“क्यों प्रो. आशुतोष दुबे, क्या वह अम्बर पाण्डेय था?”

2 COMMENTS

  1. बहुत सुंदर कविताएँ । मनमोहक सुगंध से सराबोर । मौसम की ताजगी भरा ।

  2. नीमच से प्रकाशित
    निर्णयसागर पंचांग तो
    मेरे कोई काम का नहीं।, vaah kaviraaj

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